अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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में चलाई। उसके मित्र कुछ ज्योतिषी तो थे नहीं! फल कैसे
बतलाते। यह बात बढ़ते २ उस वेश्या के कान तक पहुँची।
वह उस को वज्र मूर्ख समझकर उन अशर्फियों को लेने की
फिराक में पड़ी। उसको ज्ञात था कि मूर्ख ने इस बात
को तमाम लोगों में बाँट दिया है, गवाहों की कमी
न पड़ेगी। दूसरे ही दिन वह उसके मकान पर गई
और अपना नाम बतला कर रात वाली अशर्फियाँ माँगने
लगी। उस गरीब के घर अशर्फियों का दर्शन मिलना
दुर्लभ था, देता कहाँ से। उसे झूठी कहकर नकर गया।
वेश्या उससे जबरी करने लगी और उसे पकड़कर शहर
कोतवाल के पास ले गई। कोतवाल ने उनका बयान
लिया। जब उसे सच झूठ का ज्ञान नहीं हुआ तो लाचार
होकर उन्हें बीरबल के पास ले गया।
बीरबल ने बारी-बारी दोनों का बयान लिया। उनकी बातें
भलीभाँति समझ-बूझकर एक दर्पण और दश अशर्फियाँ बाजार
से मँगवाया। तब एक ऐनक वेश्या के सामने रख कर
अशर्फियों को इस चालाकी से रक्खा कि जिससे उनका विम्ब
दर्पण पर पड़ता रहे। इस प्रकार बीरबल ऐनक में अशर्फियों
को दिखलाकर वेश्या से बोला-“इस शीशे में की अशर्फियाँ
तू ले ले !” तब वेश्या ने कहा-“भला मैं इन्हें कैसे ले सकती
हूँ, यह तो अशर्फियों की शाया दीखती है ?” तब बीरबल को
मौका मिला उसने उस वेश्या से कहा-“तुम को भी तो
अशर्फियों का देना उसने स्वप्न में ही स्वीकार किया था न ।
अब तूं उससे क्यों माँग रही है ?”