अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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बीरबल के न्याय से वेश्या की गरदन नीची हो गई और
उसने वहाँ से खिसकने का विचार किया। उसको जाते हुए
देखकर बीरबल ने कहा- "क्यों कहाँ को चली, अपने किये
का प्रतिफल लेती जा, तूने इस गरीब को नाहक परेशान
किया है और इसके कार्यों में बाधा पहुँचाई है अतएव इस
अपराध में तुझे दो मास का कारागृह वास करना पड़ेगा।
इस प्रकार दण्ड देकर बीरबल ने उसे तुरत जेल भेजवा
दिया और बिचारे गरीब की छुटकारा हुई।
बुलाता आ
एक दिन बादशाह प्रातः काल हाथ मुँह धोकर अपने एक
नौकर से बोला- "बुलाता आ।" लेकिन आगेका मतलब नहीं
बतलाया कि फलाँ को बुलाता आ। बिचारे नौकर ने बहुतेरा
मूड़ मारा, पर उसकी समझ में कुछ न आया कि आखिरस
किसको ले जावे। वह निरर्थक बहुतेरे आदमियों के पास
दौड़ा, आया, गया परन्तु किसी की समझ में असल बात न
आई कि बादशाह किसे बुलाया चाहते हैं।
वह विवश होकर बीरबल के घर पहुँचा और सब घटना
कहकर इस बात का जिज्ञासू हुआ कि बादशाह किस को बुला
रहे हैं। बीरबल ने उससे पूछा- "उस समय बादशाह क्या कर
रहे थे।" तब नौकर ने जवाब दिया- "वे हाथ मुँह धोकर बैठे
हुए थे।" बीरबल ने बतलाया कि वे हजामत बनवाना चाहते
हैं, अतएव तू हज्जाम को लिवा ले जा।" नौकर हज्जाम को ले