अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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Read in context११७ अकबर बीरबल बिनोद
पर हाजिर होने का निश्चय कर वह अपने घर आया। जब बाद-
शाह को विदित हुआ कि बीरबल तीर्थाटन कर लौट आया है
तो एक दूत उसे बुलाने को भेजा। बीरबल बादशाह के बुलावे
पर तुरत दर्बार में हाजिर हुआ और अदब से सलाम कर अपनी
जगह पर जा बैठा। बादशाह को अब भी पहली बात की ढक
सवार थी। वह बोला- "बीरबल ताक पर का सेव।" बीरबल ने
उत्तर दिया- "जी हुजूर पाखाने वाला देव।" बीरबल के इस
उत्तर से बादशाह की आँखें खुल गईं और वह अपने किये
पर शरमिन्दा हुआ। उसी दिन से सवाल का जवाब पाकर
फिर उसने बीरबल से सेव की बात कभी न छेड़ी।
कालान्तर में उसे विदित हो गया कि जंगल वाला देव
और कोई न था बल्कि वह बीरबल की ही करतूत थी। अत-
एव देव का भ्रम जो उसके हृदय में समा गया था वह
क्रमशः जाता रहा और दिन सानन्द बीतने लगे।
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दर्पण में मोहरें
एक रात्रि में किसी मनुष्य को जब कि वह अचेत निद्रा
देवी की गोद में पड़ा २ विश्राम कर रहा था, ऐसा स्वप्न
दीख पड़ा- "मैं किसी वेश्या के पास सोया हुआ हूँ। तमाम रात
उसके साथ सोहबत करने के बाद उसे दस अशर्फियाँ देकर घर
लौट रहा हूँ।" जब वह नींद से जगा तो उसे स्वप्न की सारी
बातें ज्यों की त्यों स्मरण रहीं। उस का फलाफल जानने के
अभिप्राय से उस मनुष्य ने स्वप्न की बातें अपनी मित्रमण्डली