ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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उपांशु—उपांशु और अन्तर्याम दो घड़े होते हैं। इनके ऊपर जो
प्याले रक्खे होते हैं, उन्हें उपांशु ग्रह, और अन्तर्याम ग्रह
कहते हैं (२।२१)।
उष्णिक्—७-७-७-७ अक्षरों से बना २८ अक्षर का छन्द।
एकधन = एकधना—वह जल जो यज्ञ के दिन ही प्रातःकाल लाया
जाता है।
एकाह—एक दिन में पूर्ण होने वाला सोमयज्ञ।
किंशारू—चावल की भूसी (२।६) (चावल के अंग—किंशारू,
तुषा, कण और कसार)।
कुहू—अमावस्या का पूर्वार्ध।
खर—प्रवृञ्जन स्थान (यज्ञ पात्र रखने की चबूतरी) (१।२२)।
गायत्री—८-८-८ के क्रम से तीन पाद वाले २४ अक्षरों का छन्द।
गोष्ठ—जहाँ पशु शाम को बँधते हैं।
घृत—देवों का घी आज्य, मनुष्यों का घृत, पितरों का आयुत और
गर्भस्थ जीवों का घी नवनीत कहलाता है। पिघला घी आज्य,
जमा हुआ घृत, आधा पिघला हुआ आयुत और मक्खन नवनी
कहलाता है।
चरु या ओदन—उबला चावल, जिसमें दूध और घी भी मिला
होता है।
चितैध—चिता का ईंधन (४।१०)।
जगती—१२-१२-१२-१२ अक्षरों से बने ४८ अक्षरों का छन्द।
जातवेद—अग्नि (उत्पन्न हुये को पाया)—व्युत्पत्ति (३।३६)।
जुष्टि—रियायती आहुति (१।३०)।
ज्योतिष्टोम—सोमयाग का प्रथम विभाग है। इसकी चार संस्थाएँ-
अग्निष्टोम, उक्थ्य, षोडशी और अतिरात्र हैं।
तूष्णींशंस—चुपचाप जाप या प्रार्थना (२।३१)।
तृच्—तीन ऋचाओं से मिल कर बने।
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