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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

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DevanagariSanskritpublished505 pages

Page 457 of 505

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Page 457

प्राज्ञ परिशिष्ट ४६३
१४०. प्राज्ञ — वेदान्त दर्शन की मान्यतानुसार 'प्राज्ञ' जीव की एक संज्ञा है। शंकराचार्य के अनुसार 'परब्रह्म' ही
देहेन्द्रिय, मन एवं बुद्धि आदि की उपाधियों से परिच्छिन्न होकर शरीरधारी जीव कहा जाता है। दूसरे शब्दों में हम
कह सकते हैं कि परब्रह्म (शुद्ध चैतन्य) ही अविद्या की उपाधि से युक्त होकर शरीरेन्द्रिय से परिच्छिन्न होकर 'जीव'
कहलाता है। कुछ विद्वान् घटावच्छिन्न आकाश की तरह शरीरचित्तावच्छिन्न चैतन्य को जीव कहते हैं। 'जीव' का
सम्बन्ध तीनों शरीरों १. स्थूल २. सूक्ष्म ३. कारण से होता है। अन्नादि से परिपोषित चर्मचक्षुओं से दृष्टिगोचर होने
वाला शरीर 'स्थूल-शरीर' कहलाता है। इस स्थूल के अन्दर ज्ञानेन्द्रियों-कर्मेन्द्रियों-प्राण, मन एवं बुद्धि का एक
तन्त्र कार्य करता हुआ अनुभव में आता है-यह सूक्ष्म-शरीर है। सूक्ष्म शरीर को भी सक्रिय-गतिमान् करने वाला
अज्ञानोपहित चैतन्य जो अहंकार आदि का कारण है, 'कारण शरीर' कहलाता है।
उक्त तीनों शरीरों से सम्बद्ध चैतन्य को तीन संज्ञाएँ प्रदान की गई हैं। स्थूल शरीर की व्यष्टि उपहित चैतन्य
की 'विश्व', सूक्ष्म शरीर की व्यष्टि उपहित चैतन्य की 'तैजस' तथा कारण शरीर की व्यष्टि उपहित चैतन्य की 'प्राज्ञ'
संज्ञा है। 'प्राज्ञ' संज्ञक अज्ञानोपहित चैतन्य मलिन सत्त्व प्रधान होने से अधिक प्रकाशक नहीं होता। यह आनन्दमय
कोश से समन्वित है। सभी प्रपञ्चों (सक्रियता) का इसमें उपराम होने से इसकी सुषुप्ति अवस्था होती है। आनन्द
की अनुभूति करने वाला चैतन्य यही 'प्राज्ञ' है।
१४१. प्राण-पञ्चप्राण — सूक्ष्म जीवनवायु के पाँच प्रकारों- प्राण, अपान, व्यान, उदान तथा समान में से एक प्राण है।
व्यापक रूप में प्राण शब्द ज्ञानेन्द्रिय या चेतना को प्रकट करता है। कभी-कभी यह शब्द केवल श्वास का साधारण
अर्थ बोध कराता है। जिस आन्तरिक सूक्ष्म शक्ति द्वारा जीवात्मा का दृश्य जगत् में देह से सम्बन्ध होता है, उसे
प्राणशक्ति कहते हैं। यह प्राणशक्ति ही स्थूल प्राण (ऊर्ध्वगमनशील), अपान (अधोगमनशील), व्यान (सम्पूर्ण
शरीर में गमनशील), उदान (उद्‌गिरनशील-उगलने की प्रवृत्ति) एवं समान (समान वितरणशील-रस, रक्त आदि
का समान वितरण) की सञ्चालिका है। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और स्थिति के मूल में इस प्राणशक्ति का ही
साम्राज्य है। प्राण को साक्षात् ब्रह्म के रूप में स्वीकार किया गया हैं- प्राणो वै ब्रह्म (जै०उ०३.३८.२)। प्राण ही
प्राणियों की आयु है-प्राणो हि भूतानामायुः (तैत्ति०२.३.१)। प्राणा वै यशो वीर्यम् (बृह०१.२.६), यो वै
प्राणः सा प्रज्ञा या वा प्रज्ञा स प्राणः (कौ०ब्रा०३.३)। आदित्य प्राणरूप ही है, क्योंकि वे ही प्राण बरसाते हैं-
आदित्यो ह वै प्राणः (प्रश्न०१.५)। रथ के पहिए की नाभि में लगे अरों की भाँति प्राण में ही सब प्रतिष्ठित हैं-
अरा इव रथनाभौ प्राणे सर्वं प्रतिष्ठितम् (प्रश्न०२.६)। प्राण को ही इन्द्र तथा रुद्र रूप में परिरक्षक कहा गया है-
इन्द्रस्त्वं प्राण तेजसा रुद्रोऽसि परिरक्षिता (प्रश्न०२.९)। नाग (डकार आना), कूर्म (पलक झपकना), कृकल
(भूख लगना), धनञ्जय (समस्त शरीर का पोषण करना), देवदत्त (जँभाई आना)-ये पाँच उपप्राण कहलाते हैं।
१४२. प्रारब्ध — मनुष्य कर्म करने में स्वतन्त्र है, परन्तु फल भोगने में नहीं। मनुष्य के सभी कर्म सञ्चित होते रहते हैं,
जिसका फल उसे भविष्य में अवश्य भोगना पड़ता है। दूसरे कर्म वे हैं, जिसका फल वह वर्तमान में भोग रहा है,
उसे प्रारब्ध कर्म कहते हैं। जन्मभेद से कर्म के चार विभाग किये जाते हैं- सञ्चित, प्रारब्ध, क्रियमाण और भावी।
प्रारब्ध कर्मों के फलभोग प्रारम्भ हो चुके होते हैं। इसे भाग्य या किस्मत भी कहते हैं। नादबिन्दूपनिषद् में वर्णन
मिलता है कि जन्म-जन्मान्तरों के जो कर्म हैं, वे ही प्रारब्ध कहे गये हैं- कर्म जन्मान्तरीयं यत्प्रारब्धमिति
कीर्तितम् (ना०बि०२३)। उपनिषद् का कथन है कि समस्त प्रारब्ध कर्मों को भोगते हुए तुम्हें उद्विग्न नहीं होना
चाहिए- प्रारब्धमखिलं भुञ्जन्नोद्वेगं कर्तुमर्हसि (ना०बि०२१)। तत्त्वज्ञान हो जाने पर भी प्रारब्ध नहीं छोड़ता,
किन्तु तत्त्वज्ञान हो जाने से प्रारब्ध (ज्ञानी की दृष्टि में) नहीं रहता- उत्पन्ने तत्त्वविज्ञाने प्रारब्धं नैव मुञ्चति।
तत्त्वज्ञानोदयादूर्ध्वं प्रारब्धं नैव विद्यते (ना०बि०२२)।
१४३. बन्धन — मोक्ष की प्राप्ति मनुष्य का परम लक्ष्य है। इसके विपरीत मोक्ष प्राप्ति में बाधक सभी घटकों को बन्धन
कहा गया है। सांसारिक विषयों, पदार्थों अथवा व्यक्तियों से अत्यधिक ममता या आसक्ति का होना बन्धन है।
कामना से युक्त कर्मों को भी बन्धन रूप कहा गया है। विषय-विकारों तथा अहम्भाव को बंधन माना गया है।
निरालम्ब उपनिषद् में बन्धन रूप सभी तथ्यों को विस्तारपूर्वक उपन्यस्त किया गया है। अनादि अविद्या की वासना
(संस्कार) द्वारा उत्पन्न इस प्रकार का विचार कि मैं हूँ (मैं ही जन्मता-मरता हूँ), यही बन्धन है। माता-पिता, भ्राता,