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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

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DevanagariSanskritpublished505 pages

Page 456 of 505

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Page 456

४६२ परिशिष्ट प्रमाद
'प्रज्ञा' के कार्य व्यवहार को विस्तारपूर्वक समझाया गया है। प्रज्ञा से मनुष्य सत्य और संकल्प शक्ति को धारण करता
है- प्रज्ञया सत्यं संकल्पम् (कौ० ब्रा० ३.२)। प्रकृष्ट ज्ञान को प्रज्ञान कहते हैं। प्रकृष्ट ज्ञान ही ब्रह्मज्ञान है, क्योंकि
ब्रह्म की ही त्रैकालिकी सत्ता है और वही ज्ञान का परमलक्ष्य है। उपनिषद् ग्रन्थों में इसीलिए प्रज्ञान को ब्रह्म का
पर्याय माना गया है- प्रज्ञानं ब्रह्म (शु०२० २.१, आ०बो० १.१)।
१३६. प्रतिष्ठा - प्रतिष्ठा शब्द के पर्यायवाची शब्द हैं- स्थापना, स्थान, गौरव, कीर्ति, आदर, निवास, आधार आदि।
उपनिषद् में वर्णित है कि जो कोई प्रतिष्ठा को जानता है, वह इस लोक और परलोक में प्रतिष्ठित होता है। चक्षु
ही प्रतिष्ठा है- यो ह वै प्रतिष्ठां वेद प्रति ह तिष्ठत्यस्मिंश्च लोकेऽमुष्मिंश्च। चक्षुर्वाव प्रतिष्ठा (छान्दो०
५.१.३)। जब साधक उस परमात्मा की अदृश्य, अशरीर, अवर्णनीय, अनाश्रित, अभय, प्रतिष्ठा (स्थिति) को प्राप्त
करता है, तब वह सर्वदा निर्भय पद को प्राप्त होता है- यदा ह्येवैष एतस्मिन्नदृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयनेऽभयं
प्रतिष्ठां विन्दते। अथ सोऽभयं गतो भवति (तैत्ति० २.७.१)। चारों दिशाओं के सदृश प्रतिष्ठा भी चार प्रकार की
मानी गयी है- अथ याश्चतस्रः प्रतिष्ठा इमा एव ताश्चतस्रो दिशः (जै० उ० १.२१.२)।
१३७. प्रत्यगात्मा - प्रत्यगात्मा शब्द दो शब्दों के मेल से बना है- प्रत्यक् + आत्मा। वह पुरुष जिसकी चित्तवृत्ति निर्मल
हो चुकी हो, जो अपना स्वरूप समझने लगा हो, जिसे आत्मज्ञान की प्राप्ति हो गयी हो, उसे प्रत्यगात्मा कहा गया
है। यह शब्द विशुद्ध अन्तरात्मा या परमेश्वर के लिए भी प्रयुक्त हुआ है। उपनिषद् का कथन है कि कोई विरला धीर
पुरुष ही अमरत्व प्राप्ति की इच्छा करके चक्षु आदि इन्द्रियों को बाह्य विषयों से लौटाकर अन्तरात्मा (प्रत्यगात्मा)
को देख पाया है- कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षदावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन् (कठ० २.१.१)। सर्वसारोपनिषद् में
प्रश्न है- प्रत्यगात्मा, परमात्मा और माया ये तत्त्व क्या हैं? प्रत्यगात्मा को जीवात्मा के आशय से त्वं पद से निरूपित
किया गया है। प्रत्यगात्मा अज्ञान, माया और शक्ति का साक्षीरूप है। मैं ही एक ब्रह्मरूप हूँ, इस प्रकार का भाव
चिन्तन करते हुए वह स्वयं ब्रह्म ही हो जाता है- प्रत्यगात्मानमज्ञानमायाशक्तेश्च साक्षिणम्। एकं ब्रह्माहमस्मीति
ब्रह्मैव भवति स्वयम् (कठ०रु० १६)।
१३८. प्रत्याहार - योग के अन्तर्गत योग के आठ अङ्गों का निरूपण शास्त्रों में दृष्टिगोचर होता है- यमनियमासन-
प्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टावङ्गानि (यो०द० २.२९)। यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार,
धारणा, ध्यान, समाधि। प्रत्याहार में चित्तवृत्तियों को या इन्द्रियों को उनके विषयों से हटाकर चित्त को हर स्थिति में
शान्त रखा जाता है। अपने चिन्तन को अनात्म पदार्थों से हटाकर आत्मा में लगाये रहना प्रत्याहार है। इसी तथ्य की
पुष्टि अमृतनादोपनिषद् में होती है- शब्दादि विषयान् पञ्च मनश्चैवातिचञ्चलम्। चिन्तयेदात्मनो रश्मीन्
प्रत्याहारः स उच्यते (अमृ० ५)। योगी कुम्भक में स्थित होकर (प्राणायाम द्वारा प्राण को भीतर धारण किये रहना)
इन्द्रियों को उनके विषयों से खींचकर लाए, यह प्रत्याहार कहा जाता है। उस समय नेत्रों से जो कुछ देखे, उसे
आत्मभावना से ग्रहण करे- इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यो यत्प्रत्याहरणं स्फुटम्। योगी कुम्भकमास्थाय प्रत्याहारः स
उच्यते। यद्यत्पश्यति चक्षुर्भ्यां तत्तदात्मेति भावयेत् (यो०त० ६८-६९)। इस प्रकार के अभ्यास से योगी को चित्त
शक्ति बढ़ती जाएगी। प्रत्याहार से इन्द्रियों के सांसर्गिक दोषों को तथा ध्यान से अनीश्वरीय गुणों को नष्ट किया जाता
है- प्रत्याहारेण संसर्गान्ध्यानेनानीश्वरानुणान् (अमृ० ८)।
१३९. प्रमाद - प्रमाद का सामान्य अर्थ मानसिक आलस्य, शिथिलता या अक्रियता के रूप में लिया जाता है। कहीं इसे
उन्माद, लापरवाही या आन्तरिक दुर्बलता कहकर निरूपित किया गया है। ब्रह्मनिष्ठों के लिए प्रमाद करना अनुचित
है और ब्रह्मवादिन् के लिए विद्या में प्रमाद मृत्यु के सदृश कहा जाता है- प्रमादो ब्रह्मनिष्ठायां न कर्तव्यः
कदाचन। प्रमादो मृत्युरित्याहुर्विद्यायां ब्रह्मवादिनः (अध्या० १४)। गीता में भगवान् ने प्रमाद को तमस् का रूप
बताया है, जो जीवात्मा को बाँधता है- तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्। प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति
भारत (गी०१४.८)। मनुष्य का तमोगुण ही उसके ज्ञान को ढककर उसे प्रमाद में लगाता है- ज्ञानमावृत्य तु तमः
प्रमादे संजयत्युत (गी० १४.९)। रामानुजाचार्य ने कहा है- "कर्त्तव्य कर्म से भिन्न कर्म में प्रवृत्त करने वाली
असावधानी का नाम प्रमाद है।" अर्थात् प्रमाद से कर्त्तव्यशीलता नष्ट हो जाती है, जो व्यक्ति को कल्याण मार्ग से
च्युत कर देती है।