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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

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DevanagariSanskritpublished505 pages

Page 458 of 505

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Page 458

४६४ [परिशिष्ट] ब्रह्म-परब्रह्म
पुत्र, गृह, उद्यान तथा खेत आदि मेरे अपने हैं, इस प्रकार के सांसारिक आवरण स्वरूप विचार भी बन्धन रूप है।
कर्तापन के अहंकार का संकल्प भी बन्धनरूप है। अणिमा आदि आठ ऐश्वर्यों को प्राप्त करने का सङ्कल्प भी बन्धन
है। कामनापूर्ति के लिए सङ्कल्पपूर्वक को गयी उपासना भी बन्धन रूप है। यमादि अष्टाङ्ग योग का सङ्कल्प भी
बन्धन ही है। वर्ण और आश्रम धर्म-कर्म के सङ्कल्प भी बन्धन स्वरूप है। आशा, भय, संशय आदि के सङ्कल्प भी
बन्धन हैं। यज्ञ, व्रत, तप और दान के विधि-विधान तथा ज्ञान के सङ्कल्प भी बन्धन हैं। मोक्ष प्राप्ति का विचार करना
भी बन्धन है। सङ्कल्प मात्र से जो कुछ सम्भव है, वह सभी बन्धनस्वरूप है (निरा० १८-२८)। गीता ३.९ में
यज्ञार्थाय कर्म के अतिरिक्त अन्य सभी कर्मों को बन्धनस्वरूप माना गया है। उपनिषद् के अनुसार मन ही मनुष्यों
के बन्धन और मोक्ष का कारण है। विषयों में आसक्त मन ही बन्धन का कारण है और विषय रहित मन मोक्ष का
कारण है- मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः। बन्धाय विषयासक्तं मुक्त्यै निर्विषयं स्मृतमिति
(मैत्रा०४.११)।
१४४. बलि— भूमि को उपज का वह अंश जो भूपति (कृषक) प्रतिवर्ष राजा को देता है, उसे बलि कहते हैं। उपहार
या भेंट या देवता को दिया गया भोज्य पदार्थ भी बलि कहलाता है। पञ्च महायज्ञों में चौथा भूतयज्ञ भी बलि कहा
जाता है। भूतबलि के अन्तर्गत पिपीलिका बलि, श्वानबलि, गो-बलि, काकबलि, देवबलि आदि है। श्राद्ध या पितरों
को बलि देना पितृयज्ञ होता है। सम्पूर्ण प्रजा और सम्पूर्ण देवगण प्राणरूप ब्रह्म को बलि (भेंट) समर्पित करते हैं-
तुभ्यं प्राणः प्रजास्त्विमा बलिं हरन्ति यः प्राणैः प्रतितिष्ठसि (प्र०२.७), तथो एवास्मै (प्राणाय ब्रह्मणे)
सर्वाणि भूतान्ययाचमानायैव बलिं हरन्ति (कौ०ब्रा०२.१), तस्मै वा एतस्मै प्राणाय ब्रह्मण एताः सर्वा देवता
अयाचमानाय बलिं हरन्ति (कौ०ब्रा०२.१)। पके हुए अन्न में से एक अंश अग्नि आदि देवों को अर्पित करना
बलिवैश्व कहलाता है। भूतयज्ञ को बलिवैश्व देव भी कहते हैं।
१४५. बुद्धि-धी— मनुष्य की वह शक्ति, जिसके द्वारा वह उपस्थित विषय के सम्बन्ध में ठीक-ठीक निर्णय या निश्चय
करता है। इसी को धीष्णा, धी, मति आदि भी कहते हैं। इसी के परिष्कृत स्वरूप को मनीषा कहते हैं। इसी के
उत्तरोत्तर विकास क्रम में प्रज्ञा, मेधा, भूमा और ब्राह्मी स्थिति प्राप्त होती है। बुद्धि को चैतन्य आत्मा का गुण माना
जाता है। मनस्, इन्द्रियाँ और अहंकार बुद्धि के लिए कार्य करते हैं। प्रसिद्ध गायत्री मंत्र में सवितादेव मे यह प्रार्थना
को गयी है कि हम उस सविता के वरेण्य भर्ग (पापनाशक तेजस्) को धारण करते हैं, वह देव हमारी बुद्धि को
सन्मार्ग में प्रेरित करे (ऋ० ३.६२.१०)। गीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने बुद्धि के सात्त्विकी, राजसी और तामसी- ये
तीन भेद बताये हैं । अन्तःकरण चतुष्टय के अन्तर्गत मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार हैं। बुद्धि से मनुष्य समझता है।
चित्त मे चैतन्य होता है। अहंकार मे अहंता का अनुभव करता है- बुद्ध्या बुध्यति। चित्तेन चेतयति।
अहंकारेणाहंकरोति (ना०प०६.३)।
१४६. बोध-प्रतिबोध— ज्ञान, समझ या जानकारी के अर्थ में बोध शब्द प्रयुक्त होता है। सामान्यतया विशिष्ट
अनुभूतिजन्य ज्ञान के अर्थ में भी बोध शब्द का प्रयोग होता है। आत्मबोध मनुष्य का परम लक्ष्य है। उपनिषद् ज्ञान
के अनुसार अहम्भाव (सत्त्वभाव) और दयाभाव-यह ज्ञान को पराकाष्ठा है- अहंभावो दयाभावो बोधस्य परमावधिः
(अध्या०४१)। वैराग्य का फल बोध होता है और बोध का फल चित्तशान्ति है-वैराग्यस्य फलं बोधो बोधस्योपरतिः
फलम् (अध्या०२८)।
प्रतिबोध शब्द के पर्याय जागरण, ज्ञान, स्मरण आदि हैं। अन्तःप्रेरणा से प्राप्त बोध या अन्तःस्फुरणा से
उत्पन्न ज्ञान के अर्थ में इस शब्द का प्रयोग कहीं-कहीं हुआ है। केनोपनिषद् में वर्णित है कि प्रतिबोध मे उत्पन्न ज्ञान
ही यथार्थ है, इसी से अमृतस्वरूप परमात्मा को प्राप्ति होती है- प्रतिबोधविदितं मतममृतत्वं हि विन्दते (केन०२.४)।
१४७. ब्रह्म-परब्रह्म— वेदान्त दर्शन का प्रमुख प्रतिपाद्य विषय 'ब्रह्म' है। 'ब्रह्म' शब्द की व्युत्पत्ति ही अपने स्वरूप
को प्रकट कर देती है- बृंहति वर्द्धते निरतिशयमहत्त्वलक्षणवृद्धिमन् भवतीत्यर्थः (शब्द०)। बृंह् धातु वर्धमान-
वृद्धिमन् अर्थ में प्रयुक्त होती है, जो निरतिशय महत्त्व को दृष्टि से वृद्धिमान् है, वह ब्रह्म है, अर्थात् जो सत्ता सर्वत्र
विद्यमान है-शाश्वत है-नित्य है-अपरिवर्तनशील है, वह 'ब्रह्म' है, इससे अतिरिक्त अन्य सभी नश्वर हैं- ब्रह्मैव
नित्यं वस्तु तदन्यदखिलमनित्यम्।