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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

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DevanagariSanskritpublished505 pages

Page 378 of 505

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Page 378

३७८ मुद्गलोपनिषद्
उन चतुर्थपादात्मक नारायण ने विश्व की रचना के निमित्त प्रकृति को प्रादुर्भूत किया। (प्रकृतिरूप)
ब्रह्मा जी शरीर प्राप्त करने के उपरान्त भी सृष्टि रचना के रहस्य को नहीं समझ सके। तदनन्तर उन अनिरुद्ध
स्वरूप नारायण ने ब्रह्माजी को सृष्टि संरचना का उपदेश दिया। उन्होंने कहा- हे ब्रह्मन् ! आप अपनी
वागादि सभी इन्द्रियों को यज्ञकर्त्ताओं के रूप में मानें। कमलकोश से प्रकट, सुदृढ़ शक्ति सम्पन्न अपने
शरीर को हवि रूप में जानें। वसन्त ऋतु को घृत, ग्रीष्म ऋतु को समिधा तथा शरद् ऋतु को रसरूप में
अनुभव करें। इस तरह से अग्नि में यज्ञ करने के उपरान्त आपका शरीर अत्यन्त शक्ति-सम्पन्न हो जाएगा।
और इस शरीर के स्पर्श से वज्र भी कुण्ठित हो जायेगा। तत्पश्चात् इस यज्ञकर्म के प्रतिफल स्वरूप समस्त
प्राणि - समुदाय प्रकट होंगे। इस प्रकार सभी स्थावर-जङ्गम से परिपूर्ण यह समस्त विश्व दृष्टिगोचर होने
लगेगा॥ ५॥
एतेन जीवात्मनोर्योगेन मोक्षप्रकारश्च कथित इत्यनुसंधेयम् ॥ ६ ॥
इस प्रकार जीव और आत्मा के मिलन द्वारा मोक्ष की प्राप्ति का वर्णन किया गया है॥ ६॥
य इमं सृष्टियज्ञं जानाति मोक्षप्रकारं च सर्वमायुरेति ॥ ७ ॥
जो भी साधक इस सृष्टि-यज्ञ और मोक्ष की विधि को समझता है, वह व्यक्ति पूर्ण आयुष्य प्राप्त
करने में समर्थ होता है॥ ७॥
॥ तृतीयः खण्डः ॥
एको देवो बहुधा निविष्ट अजायमानो बहुधा विजायते ॥ १ ॥
(इस सृष्टि में) अनेक रूपों में समाविष्ट हुआ वह एक ही देव है, जो स्वयं अजन्मा रहते हुए भी विभिन्न
प्रकार से उत्पन्न होता रहता है॥ १॥
तमेतमग्निरित्यध्वर्यव उपासते। यजुरित्येष हीदं सर्वं युनक्ति। सामेति छन्दोगाः।
एतस्मिन्हीदं सर्वं प्रतिष्ठितम्। विषमिति सर्पाः। सर्प इति सर्पविदः। ऊर्गिति देवाः। रयिरिति
मनुष्याः। मायेत्यसुराः। स्वधेति पितरः। देवजन इति देवजनविदः। रूपमिति गन्धर्वाः।
गन्धर्व इत्यप्सरसः ॥ २॥
उसी (विराट् पुरुष) की उपासना समस्त अध्वर्युओं ने अग्निदेव के रूप में की है। यजुर्वेदीय
याज्ञिक उस (देव) को 'यह यजुः है' ऐसा मानते हुए सर्व यज्ञीय कर्मों में नियोजित करते हैं। सामगान
वाले उस (देव) को साम के रूप में जानते हैं। इसी (विराट् पुरुष) रूप में निश्चित ही वह सर्वत्र विद्यमान
है। सर्प (गतिशील प्राण) उसे (विराट् पुरुष को) विष रूप में स्वीकार करते हैं तथा सर्पवेत्ता (योगी)
सर्प-प्राण-रूप से उसे प्राप्त करते हैं। देवगण उसे अमृत रूप में ग्रहण करते हैं तथा सामान्य जन इसे
(जीवन) धन समझकर जीवनयापन करते हैं। असुर (इन्हें) माया के रूप में जानते हैं, पितर स्वधा
(अर्थात् पितृ भोजन के रूप में) मानते हैं, देवोपासक इसे देव रूप में स्वीकार करते हैं। गन्धर्वगण रूप-
सौन्दर्य के रूप में जानते हैं तथा अप्सराएँ गन्धर्व के रूप में उस (विराट् देवपुरुष) को जानती हैं॥ २॥
तं यथायथोपासते तथैव भवति। तस्माद् ब्राह्मणः पुरुषरूपं परंब्रह्मैवाहमिति
भावयेत्। तद्रूपो भवति। य एवं वेद ॥ ३॥