१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)
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Read in contextखण्ड २ मन्त्र ५ ३७७
उपस्थित हुए। भगवान् ने उस परम कल्याणकारी रहस्य का ज्ञान पुरुषसूक्त के दो खण्डों में इन्द्रदेव को
प्रदान किया॥ १॥
द्वौ खण्डावुच्येते । योऽयमुक्तः स पुरुषो नामरूपज्ञानागोचरं संसारिणामतिदुर्ज्ञेयं
विषयं विहाय क्लेशादिभिः संक्लिष्टदेवादिजिहीर्षया सहस्रकलावयवकल्याणं दृष्टमात्रेण
मोक्षदं वेषमाददे । तेन वेषेण भूम्यादिलोकं व्याप्यानन्तयोजनमत्यतिष्ठत्॥ २॥
'पुरुष सूक्त' के दो खण्ड निर्धारित किये गये हैं। इस सूक्त में जिस विराट् पुरुष का उल्लेख किया गया
है, वह नाम-रूप एवं ज्ञान से परे होने के कारण विश्व के समस्त जीवों (प्राणियों) के लिए अगम्य है।
अतः अपने इस अगम्य रूप को त्याग कर क्लेशादि में पड़े हुए देवादि विशिष्ट प्राणियों के उद्धार एवं समस्त
जीवों के कल्याण की इच्छा से उन्होंने अनन्त कलाओं वाले रूप को धारण किया। यह रूप दर्शन मात्र से
ही मोक्ष प्रदान करने वाला है। उसी रूप (वेष) से पृथिवी आदि लोकों में व्याप्त होकर उन्होंने अपना
विस्तार अनन्त योजनों तक कर लिया॥ २॥
पुरुषो नारायणो भूतं भव्यं भविष्यच्चासीत्। स एष सर्वेषां मोक्षदश्चासीत्। स च
सर्वस्मान्महिम्नो ज्यायान्। तस्मान्न कोऽपि ज्यायान्॥ ३॥
सृष्टि रचना के पहले पूर्ण पुरुष भगवान् श्रीनारायण ही भूत, वर्तमान और भविष्यत् तीन कालों के
रूप में विद्यमान थे। वे (नारायण) ही इन समस्त प्राणियों को मोक्ष प्रदान करने वाले हैं। वे ही महान्
शक्तिशाली जनों में विशिष्ट हैं। उन (विराट् पुरुष) से अधिक विशिष्ट अन्य कोई भी नहीं है। वही सर्व
शक्तिमान् हैं॥ ३॥
महापुरुष आत्मानं चतुर्था कृत्वा त्रिपादेन परमे व्योम्नि चासीत्। इतरेण
चतुर्थेनानिरुद्धनारायणेन विश्वान्यासन्॥ ४॥
उन परम पुरुष (परमात्मा) ने स्वयं को चार भागों में विभक्त करके चतुर्व्यूहों के रूप में उत्पन्न
किया। उनमें से तीन अंशों (वासुदेव, प्रद्युम्न और सङ्कर्षण रूप) का निवास परमधाम वैकुण्ठ में है। चतुर्थ
अंश व्यूह स्वरूप अनिरुद्ध नाम से प्रसिद्ध भगवान् श्रीनारायण के द्वारा ही सम्पूर्ण जगत् की सृष्टि हुई॥ ४॥
[ उस विराट् पुरुष के तीन चरण उच्च लोकों में ही निरुद्ध (नियंत्रित-रोके हुए) रहते हैं। एक
चरण अनिरुद्ध (जिसे व्यक्त होने से रोका नहीं गया) होता है; उसी व्यक्त चरण से यह सृष्टि उपजी है। शेष
तीन नाम मन्त्र में व्यक्त नहीं हैं, फिर भी अनिरुद्ध के आधार पर भगवान् के इन नामों को विद्वानों ने मान्य
किया है। ये चरण वासुदेव-सबको वास देने वाले, प्रद्युम्न-विशेष रूप से प्रकाशमान तथा संकर्षण-
आकर्षण करने वाले हैं, फिर भी अव्यक्त हैं।]
स च पादनारायणो जगत्स्रष्टुं प्रकृतिमजनयत्। स समृद्धकायः सन्स्सृष्टिकर्म न
जज्ञिवान्। सोऽनिरुद्धनारायणस्तस्मै सृष्टिमुपादिशत्। ब्रह्मांस्तवेन्द्रियाणि याजकानि ध्यात्वा
कोशभूतं दृढं ग्रन्थिकलेवरं हविर्ध्यात्वा मां हविर्भुजं ध्यात्वा वसन्तकालमाज्यं ध्यात्वा
ग्रीष्ममिध्मं ध्यात्वा शरदृतुं रसं ध्यात्वैवमग्नौ हुत्वाङ्गस्पर्शोत्कलेवरो वज्रं हीष्यते। ततः
स्वकार्यान्सर्वप्राणिजीवान्सृष्ट्वा पश्चाद्याः प्रादुर्भविष्यन्ति। ततः स्थावरजङ्गमात्मकं
जगद्भविष्यति॥ ५॥