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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

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DevanagariSanskritpublished505 pages

Page 379 of 505

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Page 379

खण्ड ४ मन्त्र ९ ३७९
उस (श्रेष्ठ परमात्मतत्त्व) की (जो साधक) जिस-जिस भाव से उपासना करता है, वह परमात्मतत्त्व
उसके लिए उसी ही भाव (रूप) का हो जाता है। अतः ब्रह्मज्ञानी जनों को 'पूर्ण पुरुष रूप' परम ब्रह्म 'मैं
स्वयं ही हूँ' इस प्रकार का भाव अपने अन्तःकरण में रखना चाहिए। इस प्रकार के भाव से वह (साधक)
उसी देव स्वरूप को प्राप्त कर लेता है। जो भी मनुष्य (साधक) इस रहस्य को इस भाँति समझता है, वह
स्वयमेव उसी के अनुरूप हो जाता है॥ ३॥
॥ चतुर्थः खण्डः॥
तद्ब्रह्म तापत्रयातीतं षट्कोशविनिर्मुक्तं षडूर्मिवर्जितं पञ्चकोशातीतं षड्भाव -
विकारशून्यमेवमादिसर्वविलक्षणं भवति॥ १॥
वह ब्रह्म (पूर्ण पुरुष) त्रिताप शून्य, छः कोशों से परे, षड् ऊर्मियों से रहित, पंच कोषों से रहित
और षड्भाव विकारों से अतीत है। इस प्रकार (वह ब्रह्म) सभी से विलक्षण है॥ १॥
तापत्रयं त्वाध्यात्मिकाधिभौतिकाधिदैविकं कर्तृकर्मकार्यज्ञातृज्ञानज्ञेयभोक्तृ-
भोगभोग्यमिति त्रिविधम्॥ २॥
ये 'त्रिताप' आध्यात्मिक, आधिभौतिक एवं आधिदैविक हैं, जो कर्त्ता, कर्म, कार्य; ज्ञाता,
ज्ञान, ज्ञेय तथा भोक्ता, भोग, भोग्य इस प्रकार ये तीनों एक-एक होते हुए भी त्रिविध अर्थात् तीन-
तीन प्रकार के हैं॥ २॥
त्वङ्मांसशोणितास्थिस्नायुमज्जाः षट्कोशाः ॥ ३॥
छः कोश (धातु) क्रमशः चर्म, मांस, अस्थि, स्नायु (नसें), रक्त एवं मज्जा कहे गये हैं॥ ३॥
कामक्रोधलोभमोहमदमात्सर्यमित्यरिषड्वर्गः॥ ४॥
काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य- ये छः षड्रिपु कहे गये हैं॥ ४॥
अन्नमयप्राणमयमनोमयविज्ञानमयानन्दमया इति पञ्चकोशाः ॥ ५॥
अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय तथा आनन्दमय ये शरीर के पाँच कोश हैं॥ ५॥
प्रियात्मजननवर्धनपरिणामक्षयनाशाः षड्भावाः ॥ ६ ॥
छः भावविकार क्रमशः प्रिय होना, प्रादुर्भूत होना, वर्द्धित होना, परिवर्तित होना, क्षय अर्थात् न्यूनातिन्यून
होते जाना तथा विनाश होना बताये गये हैं॥ ६॥
अशनायापिपासाशोकमोहजरामरणानीति षडूर्मयः ॥ ७॥
छः ऊर्मियाँ क्रमशः क्षुधा, पिपासा, शोक, मोह, वृद्धावस्था और मृत्यु कही गयी हैं॥ ७॥
कुलगोत्रजातिवर्णाश्रमरूपाणि षड्भ्रमाः ॥ ८॥
कुल (वंश), गोत्र, जाति, वर्ण, आश्रम एवं रूप (सौन्दर्य) ये षड्भ्रम कहे गये हैं॥ ८॥
एतद्योगेन परमपुरुषो जीवो भवति नान्यः ॥ ९॥
इन सभी के योग से (वह) परम पुरुष ही जीव (प्राणिरूप में परिणत) होता है, अन्य और कोई
दूसरा समर्थ नहीं हो सकता ॥९॥