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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

पृष्ठ 12, कुल 505 में से

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पृष्ठ 12

१२ [भूमिका]
उपनिषदों के स्रोत एवं उनकी संख्या

उपनिषदों की प्राप्ति के स्रोत के बारे में कोई
एक बात कही जा सकती है, तो वह यही है कि
उनका उद्भव ऋषियों-द्रष्टाओं के अनुभूति जन्य
ज्ञान से हुआ है। जैसा कि उल्लेख किया जा चुका है
कि उपनिषदों को 'वेद' के ब्राह्मण आरण्यक
प्रभाग के अन्तर्गत माना जाता है। कुछ उपनिषदें
संहिता (मन्त्र भाग), ब्राह्मण एवं आरण्यक की
अंगभूता-अंशभूता हैं, जबकि अधिकांश वैदिक एवं
उत्तर वैदिक काल के ऋषियों के प्रातिभ चक्षु से
दृष्ट हैं, जिनका स्वतन्त्र अस्तित्व है। 'ऐतरेयोपनिषद्'
ऋग्वेद के ऐतरेय आरण्यक का भाग (२.४.६) है
तथा 'तैत्तिरीय उपनिषद्' कृष्ण यजुर्वेद के तैत्तिरीय
आरण्यक का भाग (प्रपाठक ७-८) है। इसी
आरण्यक का अन्तिम प्रपाठक (क्र. १०)
'नारायणोपनिषद्' कहलाता है, जो अथर्ववेदीय
'महानारायणोपनिषद् से भिन्न है।
शुक्ल यजुर्वेदीय शतपथ ब्राह्मण के अन्तिम
(१४वें) काण्ड के अन्तिम छः अध्याय को 'बृहदा-
रण्यकोपनिषद्' कहा गया है। ब्राह्मण ग्रन्थ का यह
भाग आरण्यक भी है और उपनिषद् भी है। इसी
प्रकार 'ईशावास्योपनिषद्' भी यजुर्वेद की माध्यन्दिन
और काण्व संहिताओं का ४० वाँ अध्याय है।
सामवेद की कौथुमी शाखा के तलवकार
ब्राह्मण ग्रन्थ के अन्तिम भागों (३३ से ४० अध्यायों)
को छान्दोग्योपनिषद् कहा गया है। ऋग्वेदीय
'कौषीतकि' या 'शाङ्खायन आरण्यक' के अध्याय
३-६ को 'कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद्' कहते हैं।
मुक्तिकोपनिषद् (श्लोक क्र. ३० से ३९)
में १०८ उपनिषदों की सूची प्राप्त है। इन १०८ में से
ऋग्वेद की १०, शुक्ल यजुर्वेद की १९, कृष्ण यजुर्वेद
की ३२, सामवेद की १६ तथा अथर्ववेद की ३१ उप-
निषदें कही गयी हैं। मुक्तिकोपनिषद में चारों वेदों
की शाखाओं की संख्या देते हुए प्रत्येक शाखा की
एक-एक उपनिषद् होने की बात भी कही गयी है-
ऋग्वेदादिविभागेन वेदाश्चत्वार ईरिताः।
तेषां शाखा ह्यनेकाः स्युस्तासूपनिषदस्तथा ।।
ऋग्वेदस्य तु शाखाः स्युरेकविंशति संख्यकाः।
नवाधिकशतं शाखा यजुषो मारुतात्मज ।।
सहस्त्रसंख्यया जाताः शाखाः साम्नः परन्तपं।
अथर्वणस्य शाखाः स्युः पंचाशद्भेदतो हरे ।।
एकैकस्यास्तु शाखाया एकैकोपनिषन्मता।
-मुक्तिकोपनिषद् ११-१४
ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद भेद
से वेद चार कहे गये हैं। उन चारों की अनेक शाखाएं
हैं तथा उनकी उपनिषदें भी अनेक हैं। ऋग्वेद की
इक्कीस शाखाएं, यजुर्वेद की एक सौ नौ शाखाएँ,
सामवेद की एक हजार शाखाएं तथा अथर्ववेद की
पचास शाखाएं मानी जाती हैं। एक-एक शाखा की
एक-एक उपनिषद् मानी गयी है। इस उक्ति के
अनुसार ११८० उपनिषदें होनी चाहिए; किन्तु आगे
(श्लोक ३० से ३९ तक) जो नाम गिनाये गये हैं,
वे केवल १०८ ही हैं।
मुक्तिकोपनिषद् में जिन एक सौ आठ
उपनिषदों के नाम आते हैं, वे सभी 'निर्णय सागर
प्रेस' बम्बई से मूल गुटका के रूप में प्रकाशित हैं।
इसके अतिरिक्त 'अड्यार लाइब्रेरी' मद्रास से भी
उपनिषदों का संग्रह प्रकाशित हुआ है, जिसमें लगभग
१७९ उपनिषदों का प्रकाशन है। 'गुजराती प्रिंटिंग
प्रेस' बम्बई से मुद्रित उपनिषद् वाक्य महाकोश में
२२३ उपनिषदों की नामावली दी गई है। इनमें दो
उपनिषद्- (१) उपनिषत्स्तुति तथा (२) देव्युपनिषद्
नं० २ की चर्चा शिव रहस्य नामक ग्रन्थ में की गई
है। ये दोनों अभी तक उपलब्ध नहीं हो सकी हैं।
शेष २२१ उपनिषदों के वाक्यांश इस महाकोश में
संकलित हुए हैं। इनमें भी माण्डूक्यकारिका के
चार प्रकरण चार जगह गिने गये हैं। इन सबकी