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१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

अध्याय ३ खण्ड १ मन्त्र ५ २९९

अध्याय ३ खण्ड १ मन्त्र ५ २९९
एकरस से सम्पन्न, मंगलमय, अत्यन्त शांत एवं अमर है, वही परम् अविनाशी ब्रह्म है। वही तुम हो। ज्ञान के
द्वारा तुम उसे जानो ॥ ४॥
य एको देव आत्मशक्तिप्रधानः सर्वज्ञः सर्वेश्वरः सर्वभूतान्तरात्मा सर्वभूताधिवासः
सर्वभूतनिगूढो भूतयोनिर्यौगैकगम्यः । यश्च विश्वं सृजति विश्वं बिभर्ति विश्वं भुङ्क्ते स आत्मा।
आत्मनि तं तं लोकं विजानीहि ॥ ५ ॥
जो एक ही देव आत्मा की शक्ति के रूप में प्रमुख, सब प्रकार से ज्ञान सम्पन्न, सर्वेश्वर, समस्त प्राणियों
की अन्तरात्मा, सभी प्राणियों में निवास करने वाले, सब प्राणियों में छिपे हुए, सभी प्राणियों का मूल उत्पत्ति
स्थान, केवल योग के द्वारा ही जाने जा सकने योग्य है, जो विश्व की सृष्टि, पालन एवं विलय स्वयं करता है,
वही आत्मा है। तुम आत्मा में ही उन सबको स्थित जानो ॥ ५ ॥
मा शोचीरात्मविज्ञानी शोकस्यान्तं गमिष्यसि ॥ ६ ॥
तुम शोक बिल्कुल न करो। आत्मा का विशिष्ट ज्ञान पाकर के तुम शोक का अन्त कर सकोगे ॥ ६ ॥
॥ तृतीयोऽध्यायः ॥
॥ प्रथमः खण्डः ॥
अथ हैनं शाण्डिल्योऽथर्वाणं पप्रच्छ यदेकमक्षरं निष्क्रियं शिवं सन्मात्रं परंब्रह्म ।
तस्मात्कथमिदं विश्वं जायते कथं स्थीयते कथमस्मिंल्लीयते । तन्मे संशयं छेत्तुमर्हसीति ॥१ ॥
इस प्रकार अथर्वा मुनि से जानकारी प्राप्त करने के पश्चात् महात्मा शाण्डिल्य ने पुनः प्रश्न किया- हे
भगवन् ! जो परब्रह्म एकाक्षर, क्रिया विहीन, मङ्गलमय, सत्ता मात्र एवं आत्म स्वरूप है, उससे यह जगत् किस
प्रकार से प्रादुर्भूत होता है ? किस प्रकार वह प्रतिष्ठित होता है तथा किस तरह से उसमें विलीन हो जाता है ?
मेरी यह शंका दूर करना अत्यन्त आवश्यक है ॥ १ ॥
स होवाचाथर्वा सत्यं शाण्डिल्य परब्रह्म निष्क्रियमक्षरमिति । अथाप्यस्यारूपस्य
ब्रह्मणस्त्रीणि रूपाणि भवन्ति सकलं निष्कलं सकलनिष्कलं चेति ॥२-३॥
ऐसा सुनकर अथर्वा मुनि ने कहा- हे शाण्डिल्य ! यह सत्य है कि परब्रह्म निष्क्रिय एवं अक्षर रूप है, तब
भी इस अविनाशी परब्रह्म के तीन स्वरूप-सकल, निष्कल एवं सकल-निष्कल हैं ॥ २-३ ॥
यत्तत्सत्यं विज्ञानमानन्दं निष्क्रियं निरञ्जनं सर्वगतं सुसूक्ष्मं सर्वतोमुखमनिर्देश्य-ममृतमस्ति
तदिदं निष्कलं रूपम् ॥ ४॥
जो सत्यरूप, विज्ञानयुक्त, आनन्दस्वरूप, क्रियारहित, निरञ्जन, सर्वव्यापी, सूक्ष्मातिसूक्ष्म, चतुर्दिक
मुखवाला, अनिर्वचनीय और अमर है, यह ब्रह्म का निष्कल रूप है ॥ ४ ॥
अथास्य या सहजास्त्यविद्या मूलप्रकृतिर्माया लोहितशुक्लकृष्णा । तया सहायवान्
देवः कृष्णपिङ्गलो महेश्वर ईष्टे । तदिदमस्य सकलं रूपम् ॥ ५ ॥
इसके पश्चात् अब इस परब्रह्म की जो सहज अविद्या, मूल प्रकृति और माया शक्ति है, वह लाल, श्वेत
एवं कृष्ण रंग से युक्त है। उस (माया) की सहायता प्राप्त करके यह देव कृष्ण एवं पीत रंग से युक्त होकर सभी
का ईश्वर और नियन्ता होता है। यह इस ब्रह्म का 'सकल' रूप है ॥ ५ ॥

३०० शाण्डिल्योपनिषद्
अथैष ज्ञानमयेन तपसा चीयमानोऽकामयत बहुस्यां प्रजायेयेति। अथैतस्मात्तप्यमा-
नात्सत्यकामात्रीण्यक्षराण्यजायन्त। तिस्रो व्याहृतयस्त्रिपदा गायत्री त्रयो वेदास्त्रयो देवास्त्रयो
वर्णास्त्रयोऽग्नयश्च जायन्ते। योऽसौ देवो भगवान्सर्वैश्वर्यसंपन्नः सर्वव्यापी सर्वभूतानां हृदये
संनिविष्टो मायावी मायया क्रीडति स ब्रह्मा स विष्णुः स रुद्रः स इन्द्रः स सर्वे देवाः सर्वाणि
भूतानि स एव पुरस्तात्स एव पश्चात्स एवोत्तरतः स एव दक्षिणतः स एवाधस्तात्स एवोप-
रिष्टात्स एव सर्वम्। अथास्य देवस्यात्मशक्तेरात्मक्रीडस्य भक्तानुकम्पिनो दत्तात्रेयरूपा सुरूपा
तनूरवासा इन्दीवरदलप्रख्या चतुर्बाहुरघोरापापकाशिनी। तदिदमस्य सकलनिष्कलं रूपम् ॥६॥
तत्पश्चात् इस परब्रह्म ने ज्ञानमय तप से वृद्धि प्राप्त कर इच्छा की कि "मैं विभिन्न रूपों में प्रकट
(प्रादुर्भूत) हो जाऊँ।" तदनन्तर तप प्रारम्भ किया। तभी समस्त कामनाओं से सम्पन्न तीन अक्षर प्रादुर्भूत हुए,
वैसे ही तीन व्याहृतियाँ, तीन पदों वाली गायत्री, तीन वेद, तीन देव, तीन वर्ण एवं तीन अग्नियां उत्पन्न हुईं। जो
यह देव भगवान् होकर समस्त ऐश्वर्यों से सम्पन्न, सर्वत्र व्याप्त रहने वाला, समस्त प्राणियों के हृदय में रहने
वाला, मायावी एवं माया के साथ क्रीड़ा- कल्लोल करता है, वही ब्रह्मा, वही विष्णु, वही रुद्र, वही इन्द्र, वही
समस्त देवताओं एवं सभी भूत-प्राणियों के रूप में है। वही अग्रभाग में, वही पृष्ठभाग में, वही उत्तर की ओर,
वही दक्षिण की ओर, वही नीचे की ओर तथा वही ऊर्ध्व की ओर प्रतिष्ठित है। इस तरह से वही सब कुछ है।
यह देव अपनी शक्ति से क्रीड़ा करने वाला तथा अपने भक्तों के प्रति अनुकम्पा बनाये रखने वाला है। इसका
शरीर दत्तात्रेय रूप, सुन्दर, वस्त्र रहित, कमल की पंखुड़ी के सदृश कोमल, चार भुजाओं से सम्पन्न, भयंकरता
से रहित एवं पापरहित होकर प्रकाश से युक्त है। यही उसका 'सकल-निष्कल' रूप है ॥ ६ ॥
॥ द्वितीयः खण्डः ॥
अथ हैनमथर्वाणं शाण्डिल्यः पप्रच्छ भगवन्सन्मात्रं चिदानन्दैकरसं कस्मादुच्यते परं
ब्रह्मेति। स होवाचाथर्वा यस्माच्च बृहति बृंहयति च सर्वं तस्मादुच्यते परंब्रह्मेति ॥ १-२ ॥
इसके पश्चात् महर्षि शाण्डिल्य ने अथर्वा मुनि से पुनः प्रश्न किया- "हे भगवन् ! मात्र सत्य स्वरूप,
चैतन्य युक्त एवं आनन्दस्वरूप एकरस सम्पन्न यह परब्रह्म क्यों कहा जाता है ?" तब अथर्वा मुनि ने उत्तर
दिया- "हे शाण्डिल्य ! वह ब्रह्म स्वयं वृद्धि को प्राप्त होता है तथा अन्य दूसरों को वृद्धि प्रदान करता है, अतः
इस कारण से वह अविनाशी शाश्वत ब्रह्म कहलाता है ॥ १-२ ॥
अथ कस्मादुच्यते आत्मेति। यस्मात्सर्वमाप्नोति सर्वमादत्ते सर्वमत्ति च तस्मादुच्यते
आत्मेति ॥ ३-४ ॥
इसके अनन्तर 'वह आत्मा क्यों कहा जाता है?' (ऐसा पूछने पर अथर्वा मुनि ने कहा-) वह (ब्रह्म)
सर्वत्र सभी में विद्यमान रहता है, सभी को स्वीकार करता है तथा सभी का भक्षण कर लेता है अर्थात् अपने
में मिला लेता है, इस कारण वह आत्मा कहलाता है ॥ ३-४॥
अथ कस्मादुच्यते महेश्वर इति। यस्मान्महत ईशः शब्दध्वन्या चात्मशक्त्या च महत
ईशते तस्मादुच्यते महेश्वर इति ॥ ५-६ ॥
वह महेश्वर क्यों कहा जाता है? (अथर्वा मुनि ने कहा-) क्योंकि वह शब्द ध्वनि एवं आत्मशक्ति से
बड़ों-बड़ों का नियंत्रण करता है तथा बड़ों-बड़ों का ईश्वर है, इसलिए वह महेश्वर कहलाता है ॥ ५-६॥