संतमत: कबीर साहिब एवं ३२ संत परम्परा (Sant Mat Lineage)
अन्य नाम संतमत, सन्तमत, कबीर साहिब ३२ संत, सजीवन नाम धारा, अनुराग सागर वंशवृक्ष, Sant Mat, Sant Mat Lineage, Kabir 32 Sants, Sajeevan Naam, राधास्वामी मत, शाह मस्ताना, डेरा सच्चा सौदा, डेरावाद इतिहास
कबीर मंसूर और अनुराग सागर के अनुसार कलियुग में कबीर साहिब द्वारा ३२ संतों को नाम दीक्षा का अधिकार, राधास्वामी एवं आधुनिक डेरा सच्चा सौदा (शाह मस्ताना से राम रहीम) का ऐतिहासिक वंशवृक्ष, तथा सजीवन नाम की शास्त्रीय कसौटी का संपूर्ण विश्लेषण।
प्रोफ़ाइल
प्रोफ़ाइल संपादित करेंकबीर साहिब द्वारा ३२ संतों को नाम दीक्षा का शास्त्रीय विधान एवं सजीवन नाम की एकमात्र जीवित धारा
"कबीर मंसूर अरु अनुराग बानी, जिन लखी तिनकी सुध आनी।
बावन लाख को नाम जो दीन्हा, छत्तीस लाख हंस करि लीन्हा।
बत्तीस हंसन को दीन्ह अधिकारा, काल जाल ते करन उबारा॥"
संत कबीर साहिब (विक्रम संवत् १४५५ / १३९८ ई. - १५१८ ई.) सत्यलोक (अमरलोक) से अवतरित आदि सतगुरु हैं। उनका प्राकट्य किसी नश्वर देह या सांसारिक मत-पंथ की स्थापना के लिए नहीं, अपितु काल निरंजन के त्रिगुणी जाल में फँसी जीवात्माओं को 'सजीवन नाम' (जीवित चेतन नाम / सार शब्द) देकर सदा के लिए मुक्त कराने हेतु हुआ था।
कबीर साहिब के वचनों और संतमत के प्रामाणिक इतिहास के अनुसार:
- ५२ लाख जीवों को नाम दान: कबीर साहिब ने कलियुग में ५२ लाख जीवों को सजीवन नाम प्रदान किया था।
- ३६ लाख हंसों का मोक्ष: इन ५२ लाख में से ३६ लाख जीवों ने पूर्ण मर्यादा का पालन किया और इसी जन्म में काल के चक्र से छूटकर अमरलोक (सत्यलोक) का स्थाई मोक्ष प्राप्त किया। शेष १६ लाख जीव मर्यादा खंडित होने के कारण उस समय परम पद से वंचित रह गए।
- ३२ संतों को नाम दीक्षा का अधिकार: कबीर साहिब ने कलियुग में आगे भक्ति और सजीवन नाम का प्रवाह जारी रखने हेतु ३२ विशिष्ट हंसों/संतों को नाम दीक्षा देने का गुप्त आध्यात्मिक अधिकार प्रदान किया था।
१. सजीवन नाम बनाम वर्णनात्मक नाम (शास्त्रीय कसौटी)
संतमत दर्शन का मूल आधार यह है कि मुक्ति अक्षरों से नहीं, अपितु 'जीवित चेतन धारा' से होती है:
- वर्णनात्मक नाम (Dead Letters / Spoken Words):
संसार के सभी मंत्र, ५२ अक्षर, वेद-शास्त्र, पोथियां और पुस्तकें जिन्हें जिह्वा से पढ़ा या बोला जाता है, वे 'वर्णनात्मक' हैं। वे मन और प्रकृति (त्रिगुण) के दायरे में हैं। कबीर साहिब का स्पष्ट वचन है:"बावन आखर जोड़े जोई, बिन सतगुरु मुकति न होई।
आखर माहीं सब जग भूला, सहज नाम नहिं काहू सूझा॥" - सजीवन नाम (Alive Holy Name):
यह ५२ अक्षरों से परे अलेख और अकथनीय चेतन शक्ति है। यह केवल एक जीवित पूर्ण सतगुरु की 'पारस सुरति' द्वारा शिष्य के अंतःकरण में जाग्रत की जाती है। जब तक जलता हुआ दीपक सामने न हो, बुझे हुए दीपकों या दीपक की तस्वीरों से अंधेरा दूर नहीं हो सकता।
२. कबीर साहिब द्वारा अधिकृत ३२ संतों का संपूर्ण शास्त्रीय विवरण (एक समान श्रेणी)
कबीर साहिब की परंपरा में अधिकृत किए गए सभी ३२ संत एक ही दिव्य विधान के अंग हैं। इन्हें किसी छोटे-बड़े वर्ग में विभाजित नहीं किया जा सकता। कबीर मन्शूर (भूमिका पृ. १०, अध्याय १ पृ. १४-१६, अध्याय ५ पृ. २९०-२९६, अध्याय १५ पृ. ६३४-६६०) और अनुराग सागर (पृ. ५२, १७६-१७८) के अनुसार सभी ३२ संतों का प्रामाणिक विवरण निम्नवत है:
| क्र. | संत / शाखा का नाम | शास्त्रीय पीठ एवं दिशा | मूल ग्रंथ संदर्भ (Book Reference) | ऐतिहासिक वंशावली एवं शक्ति-लोप का कारण | वर्तमान स्थिति |
|---|---|---|---|---|---|
| १ | धनी धर्मदास जी | बांदवगढ़ (उत्तर दिशा) | कबीर मन्शूर (पृ. १४–१६, २८९–२९२), अनुराग सागर (पृ. ५२, १३२) | सत्यलोक में 'सुकृत अंश'। कबीर साहिब ने कोट-ज्ञान वाणी (ऋग्वेद) व ४२ वंश वरदान दिया। अनुराग सागर अनुसार ७वीं पीढ़ी बाद काल के प्रभाव से सजीवन शक्ति लुप्त हुई। | दामाखेड़ा गद्दी (छत्तीसगढ़) — १५वें वंश प्रकाश मुनि व १६वें वंश उदित मुनि |
| २ | चतुर्भुजदास जी | कर्नाटक / द्वारका (दक्षिण दिशा) | कबीर मन्शूर (अध्याय १, पृ. १५) | सत्यलोक में 'अक्षय अंश'। टकसार वाणी (यजुर्वेद)। कबीर साहिब द्वारा दक्षिण दिशा के गुरु नियुक्त। समय के साथ स्वतंत्र गद्दी विलीन हुई। | ऐतिहासिक टकसार परंपरा |
| ३ | राय बांके जी | दरभंगा (पूर्व दिशा) | कबीर मन्शूर (अध्याय १, पृ. १५) | सत्यलोक में 'जदंक अंश'। मूल-ज्ञान वाणी (सामवेद) व १६ वंश। समय के साथ धारा बाह्य नियमों में लुप्त हुई। | ऐतिहासिक पूर्व शाखा |
| ४ | गोसाईं सहेते जी | मानपुर (पश्चिम दिशा) | कबीर मन्शूर (अध्याय १, पृ. १५–१६) | सत्यलोक में 'दिगंबर अंश'। बीजक-ज्ञान वाणी (अथर्ववेद)। पश्चिम दिशा का गुरुत्व सौंपा गया। | ऐतिहासिक पश्चिम शाखा |
| ५ | स्वामी रामानंद जी | पंचगंगा घाट, काशी | कबीर मन्शूर (पृ. २७०–२७२) | कबीर साहिब ने लोक-मर्यादा हेतु गुरु बनाया, तत्पश्चात स्वामी रामानंद जी को सत्यलोक का गूढ़ रहस्य देकर सजीवन नाम प्रदान किया। | काशी रामानंदी परंपरा |
| ६ | श्री गुरु नानक देव जी | करतारपुर / पंजाब | कबीर मन्शूर (अध्याय १५, पृ. ६३९–६४६; जनमसाखी) | कबीर साहिब से भेंट व जिन्दा पीर संवाद। १० मानवीय गुरुओं के बाद १७०८ ई. में नांदेड़ में मानवीय देह गुरु परंपरा समाप्त कर ग्रंथ साहिब को गुरु पद सौंपा गया। | श्री गुरु ग्रंथ साहिब (शाश्वत शब्द गुरु); नामधारी जीवित शाखा |
| ७ | संत दादू दयाल जी | नरेना धाम (राजस्थान) | कबीर मन्शूर (अध्याय १५, पृ. ६४७–६५०) | बुड्ढन बाबा (कबीर साहिब) से दीक्षा। ५२ थंभों की स्थापना। गरीबदास से २२ आचार्यों की परंपरा; वर्तमान में केवल दादू वाणी पठन व नैतिक शिक्षा शेष। | नरेना प्रधान पीठ — २२वें पीठाधीश्वर स्वामी ओमप्रकाश दास जी |
| ८ | संत शिरोमणि रविदास जी | सीर गोवर्धनपुर (वाराणसी) | कबीर मन्शूर (पृ. २९६) | कबीर साहिब के समकालीन व आध्यात्मिक भ्राता। बेगमपुरा संदेश। २०वीं सदी में डेरा सचखंड बल्लां (पंजाब) द्वारा संगठित; वर्तमान में सामाजिक-धार्मिक संप्रदाय (अमृतबानी) में परिवर्तित। | डेरा सचखंड बल्लां — संत निरंजन दास जी महाराज |
| ९ | संत पलटू साहिब | रामकोट (अयोध्या) व जलालपुर | कबीर मन्शूर (अध्याय १५) | बावरी पंथ (यारी साहिब → भीखा साहिब → गोविंद साहिब → पलटू साहिब)। 'द्वितीय कबीर' कहलाए। वर्तमान में अखाड़ा व्यवस्था, समाधि पूजा व वार्षिक मेले तक सीमित। | पलटू दास अखाड़ा — महंत रामप्रसाद दास जी |
| १० | संत गरीब दास जी | छुड़ानी धाम (हरियाणा) | कबीर मन्शूर (पृ. ५९६–६००) | १७२७ ई. में १० वर्ष की आयु में कबीर दर्शन। 'सद्गुरु ग्रंथ साहिब'। बाद में संप्रदाय वाद-विवाद व पुस्तक मुद्रण तक सीमित हुआ। | छुड़ानी धाम (महंत जगन्नाथ दास) व विभिन्न डेरे |
| ११ | संत मलूक दास जी | कड़ा धाम (कौशाम्बी, उ.प्र.) | कबीर मन्शूर (भूमिका पृ. १०, अध्याय १५) | अजगर करे न चाकरी पंथ प्रवर्तक। कालांतर में सगुण वैष्णव रामानंदी पूजा-पद्धति और मंदिर विग्रह सेवा में समाहित हुआ। | कड़ा मठ एवं वृंदावन मलूक पीठ |
| १२ | संत जगजीवन दास जी | कोटवा धाम (बाराबंकी, उ.प्र.) | कबीर मन्शूर (भूमिका पृ. १०; टकसारी/सत्यनामी) | सत्यनामी पंथ प्रवर्तक ('अघ-विनाश')। पारिवारिक गोसाईं गद्दी में बदलकर ग्रामीण समाधि पूजा तक सीमित हुआ। | कोटवा धाम तीर्थ |
| १३ | संत घीसा दास जी | खेकड़ा (बागपत, उ.प्र.) | कबीर मन्शूर (अध्याय १५, पृ. ६५४) | घीसा पंथ। कोई अखंड जीवित दीक्षा शृंखला नहीं चली; वार्षिक भजन मेलों तक सीमित। | खेकड़ा धाम आश्रम |
| १४ | संत दरिया साहिब (बिहार) | धरकंधा (रोहतास, बिहार) | कबीर मन्शूर (भूमिका पृ. १०, अध्याय १५) | 'दरिया सागर' रचयिता। कबीर साहिब के अमरलोक मार्ग का उपदेश। कालांतर में मठ संपत्ति प्रबंधन तक सिमटा। | ऐतिहासिक धरकंधा मठ |
| १५ | संत चरणदास जी | दिल्ली एवं डेहरा (अलवर) | कबीर मन्शूर (अध्याय १५) | ५२ शिष्यों (सहजोबाई, दयाबाई) की परंपरा। पातंजल योग व सगुण कृष्ण भक्ति के मिश्रण से मूल सजीवन धारा लुप्त हुई। | पुरानी दिल्ली व राजस्थान के मंदिर |
| १६ | सूरत गोपाल जी | कबीर चौरा मूलगादी (काशी) | कबीर मन्शूर (भूमिका पृ. १०; 'बाप' मठ) | कबीर साहिब के प्रत्यक्ष संन्यासी शिष्य। ऐतिहासिक कबीर चौरा की स्थापना। वर्तमान में ऐतिहासिक साहित्यिक न्यास। | कबीर चौरा मूलगादी — आचार्य विवेकदास जी |
| १७ | भगवान दास (भग्गोज़ी) | धनौती मठ (सिवान, बिहार) | कबीर मन्शूर (भूमिका पृ. १०; धनौती शाखा) | कबीर पंथ की उत्तरी शाखा। मध्यकाल में ज़मींदारी व मठ संपदा के प्रबंधन में उलझकर चेतन नाम शक्ति से विलग हुई। | ऐतिहासिक धनौती मठ |
| १८ | संत दरिया साहिब (मारवाड़) | रेण (नागौर, राजस्थान) | कबीर मन्शूर (अध्याय १५; रेण परंपरा) | कबीर वाणी के अनुयायी। बाद में रामस्नेही संप्रदाय में समाहित होकर बाह्य 'राम' स्मरण तक सीमित हुए। | रेण पीठ, नागौर |
| १९ | संत तुलसी साहिब | हाथरस (उ.प्र.) | घट रामायण एवं रत्न सागर | कबीर साहिब के सुरत शब्द योग के महान प्रख्याता। कोई औपचारिक बाह्य गद्दी नहीं बनाई; देहावसान बाद धारा विलीन हुई। | हाथरस समाधि स्थल |
| २० | संत सेना जी (भगत सैन) | बांदवगढ़ (म.प्र.) | आदि ग्रंथ एवं कबीर मन्शूर (भूमिका) | कबीर साहिब के समकालीन। वाणी गुरु ग्रंथ साहिब में दर्ज; कोई स्वतंत्र जीवित गद्दी नहीं चली। | ऐतिहासिक स्मारक स्थल |
| २१ | संत पीपा जी | गागरोन दुर्ग (राजस्थान) | कबीर मन्शूर (भूमिका) एवं भक्तमाल | गागरोन के राजा जिन्होंने राजपाट त्यागकर सत्यनाम धारण किया। कालांतर में मंदिर पूजा में परिवर्तित। | समदड़ी व गागरोन मंदिर |
| २२ | संत धन्ना जी | धुंआ कलां (टोंक, राजस्थान) | भक्तमाल एवं आदि ग्रंथ | कबीर साहिब के नाम मत के साधक। लोकगाथाओं व ग्रंथ साहिब में पद सुरक्षित; कोई जीवित दीक्षा पीठ नहीं। | धुंआ कलां स्मारक |
| २३ | संत सधना जी | सेहवान (सिंध) | भक्तमाल एवं आदि ग्रंथ | सत्यनाम के साधक। मध्यकाल के संघर्षों व भौगोलिक विस्थापन में परंपरा विलीन हुई। | सिंध व पंजाब में स्मृति स्थल |
| २४ | संत बेणी जी | आसंदी (उत्तर भारत) | आदि ग्रंथ | कबीर साहिब के गूढ़ सुरति मार्ग के एकांत साधक। कोई संप्रदाय नहीं रचा। | शास्त्रोक्त उल्लेख |
| २५ | संत त्रिलोचन जी | बारसी (महाराष्ट्र) / काशी | आदि ग्रंथ | कबीर साहिब के समकालीन नाम-साधक। कोई बाह्य पीठ नहीं बनाई। | शास्त्रोक्त पद |
| २६ | बाबा बुल्लेशाह | कसूर (पंजाब) | काफ़ी साहित्य एवं सूफ़ी-संत संवाद | मुर्शिद शाह इनायत द्वारा सत्यनाम धारा से जुड़े। वर्तमान में केवल मज़ार व कव्वाली तक सीमित। | मज़ार बाबा बुल्लेशाह, कसूर |
| २७ | बाबा फ़रीद (गंजशकर) | पाकपट्टन (पंजाब) | आदि ग्रंथ एवं सूफ़ी-संत परंपरा | कबीर साहिब की सत्यनाम वाणी से साम्य रखने वाले सूफ़ी महापुरुष। वर्तमान में चिश्ती दरगाह परंपरा। | दरबार बाबा फ़रीद, पाकपट्टन |
| २८ | संत सुंदरदास जी (छोटे) | दौसा व फतेहपुर शेखावाटी | सुंदर विलास व दादू परंपरा | दादू दयाल जी के शिष्य। महान दार्शनिक; ज्ञान-काव्य व संस्कृत पांडित्य तक सीमित रहे। | सांगानेर समाधि |
| २९ | संत रज्जब जी | सांगानेर, जयपुर (राजस्थान) | रज्जब वाणी व सर्वांगी | कबीर व दादू मत के अद्वितीय साधक। वर्तमान में 'रज्जब द्वार' स्मारक पीठ। | रज्जब द्वार, सांगानेर |
| ३० | संत बाबा लालदास जी | धोलीधूब व शेरपुर (अलवर) | लालदासी पंथ | कबीर साहिब के निर्गुण मत का मेवात में प्रचार। सामाजिक सद्भाव की शिक्षा, जीवित सजीवन नाम लुप्त। | शेरपुर समाधि स्थल |
| ३१ | कमाल जी | काशी / मगहर | कबीर मन्शूर (भूमिका पृ. १०, अध्याय ६ पृ. २७५) | कबीर साहिब के निकटतम शिष्य। कमाल ने स्वयं संप्रदाय चलाने से मना किया ("बूड़ा वंश कबीर का उपजा पूत कमाल" )। | काशी में समाधि |
| ३२ | कमाली जी | काशी / मगहर | कबीर मन्शूर (भूमिका पृ. १०, अध्याय ६ पृ. २८२) | कबीर साहिब की शिष्या; ज्ञान संपन्न हंस। कोई स्वतंत्र पंथ नहीं चलाया। | काशी में समाधि |
३. शास्त्रीय स्पष्टीकरण: मीराबाई की संत रविदास जी से दीक्षा
मीराबाई पूर्व में चित्तौड़ के राजघराने में सगुण कृष्ण भक्ति किया करती थीं। किंतु जब वे संत शिरोमणि रविदास जी की शरण में आईं, तो उनसे सजीवन नाम लेकर उन्होंने अपनी पुरानी सगुण-मूर्ति पूजा और कुल की लोकलाज का परित्याग कर दिया:
"गुरु मिलिया रविदास जी दीनी ज्ञान की गुटकी।
लोकलाज कुल की मरजादा सिर से डार दई॥
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो।
वस्तु अमोलक दी मेरे सतगुरु, किरपा करि अपनायो॥"
मीराबाई संत रविदास जी की शिष्या थीं, वे कबीर साहिब द्वारा सीधे अधिकृत ३२ स्वतंत्र गुरुओं की सूची में नहीं आतीं।
४. सजीवन नाम की एकमात्र जीवित धारा: संत गिरिधरानंद परमहंस से सतगुरु मधु परमहंस
अनुराग सागर के वचनों के अनुसार, ३१ धाराएं समय के साथ पुस्तकों, समाधियों, मठ-संपदा और बाह्य कर्मकांडों में सिमट गईं। किंतु कबीर साहिब का मूल सजीवन नाम कभी नहीं मरा। वह गुप्त संत परंपरा (Gupt Parampara) के माध्यम से एक जीवित सिद्ध से दूसरे जीवित सिद्ध तक अंतरंग रूप से प्रवाहित होता रहा।
कबीर साहिब की आदि सजीवन धारा
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संत गिरिधरानंद परमहंस जी महाराज
(संतमत के शिरोमणि • गोंडा, उत्तर प्रदेश)
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सन् १९६८ में १८ वर्ष की आयु में शिष्य को
'संत सतगुरु' पद एवं १००% आध्यात्मिक शक्ति सौंपी
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संत सतगुरु मधु परमहंस जी महाराज (साहिब जी)
★ बाल ब्रह्मचारी
★ नाम दीक्षा (1970 to till date)
★ वर्तमान में पावन आयु: ७८ वर्ष (२०२६)
★ संस्थापक: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्था
★ एकमात्र जीवित पूर्ण सतगुरु जिनके पास 'सजीवन नाम' व 'पारस सुरति' है
बाल ब्रह्मचारी सतगुरु मधु परमहंस जी महाराज:
- दीक्षा एवं उत्तराधिकार: उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में परमहंस संत गिरिधरानंद जी महाराज ने अपने १८ वर्षीय अनन्य शिष्य को सन् १९६८ में अपने जीवनकाल में ही संपूर्ण आध्यात्मिक शक्ति सौंपकर 'संत सतगुरु' की उपाधि से विभूषित किया।
- नाम दीक्षा (1970 to till date): बाल ब्रह्मचारी साहिब जी ने २४ वर्ष भारतीय सेना (महार रेजिमेंट) में देश सेवा करते हुए भी निस्वार्थ भाव से आध्यात्मिक अलख जगाए रखी और सन् १९७० से लेकर आज तक (till date) निरंतर ५६ वर्षों से लाखों आत्माओं को सजीवन नाम दान देकर काल के जाल से छुड़ा रहे हैं।
- वर्तमान काल में ७८ वर्ष की आयु (२०२६): २०२६ में पूज्य साहिब जी की पावन आयु ७८ वर्ष हो चुकी है।
५. मानव जीवन के लिए पावन संदेश
अनमोल मनुष्य जन्म:
चौरासी लाख योनियों के असहनीय कष्टों के उपरांत यह दुर्लभ मनुष्य तन प्राप्त हुआ है।
ग्रंथ केवल पता बताते हैं, भवसागर पार केवल जीवित सतगुरु ही उतारते हैं।
यह मनुष्य जन्म अत्यंत अनमोल है। शीघ्र ही सांबा (जम्मू) स्थित रांझड़ी आश्रम में प्रत्येक पूर्णिमा (Pournima) को पधारकर बाल ब्रह्मचारी साहिब जी से सजीवन नाम दान लेकर इस जीवन को सफल बनाएं और परम मोक्ष के भागीदार बनें।
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