सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
“तिनका कबहुँ ना निंदिये, जो पाँवन तर होय” — कबीर

पृष्ठभूमि चुनें

कबीर के दोहे

तिनका कबहुँ ना निंदिये, जो पाँवन तर होय कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय

अर्थ

पैरों तले पड़े तिनके को भी छोटा मत समझो; वह उड़कर आँख में पड़ जाए तो बहुत पीड़ा देता है। किसी को भी तुच्छ न समझें।

रोमन अक्षरों में

tinka kabhun na nindiye, jo paanvan tar hoy kabhun udi aankhin pade, to pir ghaneri hoy

0