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सर्वकोश
“पावक रूपी साँइयाँ, सब घट रह्या समाय” — कबीर

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कबीर के दोहे

पावक रूपी साँइयाँ, सब घट रह्या समाय चित चकमक लागै नहीं, ताते बुझि बुझि जाय

अर्थ

प्रभु अग्नि की तरह हर हृदय में समाए हैं, पर मन रूपी चकमक ठीक से नहीं रगड़ा जाता, इसलिए ज्योति जलकर भी बुझ-बुझ जाती है।

रोमन अक्षरों में

paavak rupi saaniyaan, sab ghat rahya samaay chit chakmak laagai nahin, taate bujhi bujhi jaay

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