कबीर के दोहे
हिरदा भीतर आरसी, मुख देखा नहिं जाय मुख तो तबहीं देखिहै, जब दिल की दुविधा जाय
अर्थ
हृदय के भीतर ही दर्पण है, पर उसमें चेहरा नहीं दिखता। वह तभी दिखेगा जब मन की दुविधा मिट जाएगी।
रोमन अक्षरों में
hirda bhitar aarsi, mukh dekha nahin jaay mukh to tabhin dekhihai, jab dil ki duvidha jaay
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