योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
४४ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः
अर्धचन्द्रः बिन्दोरर्धभागः, तथाकारः दीपाकार एव। पादमात्रः मात्राकालस्य
चतुर्थभागोच्चारणकाल इत्यर्थः। तदूर्ध्वके बिन्दोरूर्ध्वभागे। बिन्दूपरिदेशे पाद-
मात्रोच्चारणकालो दीपाकारोऽर्धचन्द्र इत्यर्थः। ज्योत्स्नाकारा चन्द्रिकासमकान्तिः,
१तदष्टांशा मात्राष्टांशोच्चारणकाला, त्र्यस्रविग्रहा त्रिकोणाकारा रोधिनी। द्वयोरपि
स्वच्छन्दसंग्रहे प्रपञ्चो यथा—
अर्धचन्द्रस्तदूर्ध्वे तु रोधिनी तस्य चोपरि।
ज्योत्स्ना ज्योत्स्नावती कान्तिः सुप्रभा विमलापि च॥
अर्धचन्द्र२स्थिता ह्येताः कलाः पञ्च प्रकीर्तिताः।
रुन्धिनी रोधिनी रोधा ज्ञानरोधा तमोपहा॥
निरोधिकाकलाः पञ्च कथितास्तव सुन्दरि।
ब्रह्मादिपरमेशानां परप्राप्तिनिरोधनात्॥
निरोधिकेति सा प्रोक्ता तस्या भेदाद् वरानने।
परसादाख्यसम्प्राप्तिः .... .... ॥इति॥२९॥
बिन्दुद्वयान्तरे दण्डः शेवरूपो मणिप्रभः।
कलांशो द्विगुणांशश्च नादान्तो विद्युदुज्ज्वलः॥३०॥
अर्धचन्द्र बिन्दु के आधे भाग से बनता है। यह भी दीपक के समान प्रकाशमय
आकृति वाला है। पादमात्र का अर्थ यह है कि इसके उच्चारण में एक मात्रा का चौथा
भाग समय लगता है। बिन्दु के ऊपर यह स्थित है। बिन्दु के ऊपर के भाग में स्थित,
चौथाई मात्रा उच्चारण काल वाला और दीपक के समान उज्ज्वल कान्ति वाला अर्धचन्द्र
कहलाता है। रोधिनी चन्द्रिका के समान कान्ति वाली और त्रिकोण सदृश आकृति
वाली है। इसका उच्चारण काल मात्रा काल का आठवां भाग है। अर्धचन्द्र और रोधिनी
का स्वच्छन्दसंग्रह में इस तरह से विस्तार किया गया है —
बिन्दु के ऊपर अर्धचन्द्र और अर्धचन्द्र के ऊपर रोधिनी स्थित है। ज्योत्स्ना,
ज्योत्स्नावती, कान्ति, सुप्रभा और विमला नाम की पांच कलाएँ निरोधिका में स्थित हैं।
हे सुन्दरि ! यह सब मैंने तुमको सुनाया है। यह निरोधिका इस लिये कहलाती है कि
ब्रह्मा प्रभृति श्रेष्ठ देवताओं को भी यह परतत्त्व तक पहुँचने से रोक देती है। इस
निरोधिका शक्ति का भेदन करने के उपरान्त ही परसादाख्य तत्त्व की प्राप्ति होती
है॥ २९॥
दो बिन्दुओं के बीच में एक सीधी रेखा—यही नाद का आकार है। शेव-
सदृश इस नाद की कान्ति मणि के समान उज्ज्वल है। इसका उच्चारण काल
१. अष्टांशा-ख. ने. ज. झ., अष्टांशः अष्टांशोच्चारणकालः-ग.। २. न्द्रोदिता-ख.,
न्द्रोत्थिता-क., न्द्रस्थिता-ग. ङ.।
प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ४५
हलाकारस्तु सव्यस्थबिन्दुयुक्तो विराजते ।
बिन्दुद्वयमध्यगत ऋजुरेखाकारः शेवरूपः, मुष्कद्वयमध्यगता शिरा शेव इत्यु-
च्यते, तत्तुल्यरूपः । मणिप्रभः पद्मरागसवर्णवर्णः । कलांशः, कलाः षोडशमात्राः,
षोडशांशोच्चारणकाल इत्यर्थः । स पुनः कलांशो नादस्तन्त्रेणोच्यते । “१‘कलो
नादस्तु गम्भीरे ध्वनौ तु मधुरास्फुटे” इत्यमरः । मधुरास्फुटो ध्वनिर्नादः । नाद-
प्रपञ्चः स्वच्छन्दसंग्रहे यथा—
रोधिन्याख्यं यदुक्तं ते नादस्तस्योर्ध्वसंस्थितः ।
पद्मकिञ्जल्कसंकाशः कोटिसूर्यसमप्रभः ॥
पुरैः परिवृतोऽसंख्यैर्मध्ये पञ्चकलावृतः ।
इन्धिका दीपिका चैव २रोचिका मोचिका तथा ॥
ऊर्ध्वगा मध्यगा तासां पञ्चमो परमा कला ।
चन्द्रकोटिसमप्रख्यं तन्मध्येऽर्बुदयोजनम् ॥
मात्रा का सोलहवां भाग है। नादान्त का उच्चारण काल मात्रा का ३२ वां
भाग है। यह बिजली के समान चमकीला है और इसका आकार हल के सदृश
है। इसके दक्षिण भाग में एक बिन्दु भी बना रहता है ॥ ३० ॥
दो बिन्दुओं के बीच में एक सीधी रेखा खींच देने पर उसका आकार शेव के समान
हो जाता है। दो अण्डकोशों के बीच की सीवन को शेव कहते हैं। नाद की आकृति
ऐसी ही होती है। पद्मराग मणि के समान इसकी कान्ति है। मात्रा का कलांश अर्थात्
सोलहवां भाग इस कलांश (नाद) का उच्चारण काल है। कलांश पद की दो बार
आवृत्ति करने से यह अर्थ निकलता है। ‘कलो नादस्तु’ इत्यादि अमरकोश के वचन के
अनुसार मधुर और अस्फुट ध्वनि को नाद कहते हैं। इस नाद का परिचय भी
स्वच्छन्दसंग्रह में दिया गया है—
अभी तुम्हें रोधिनी का स्वरूप समझाया है। इसके ऊपर नाद की स्थिति है। पद्म
की केसर के समान इसका वर्ण और करोड़ों सूर्यों के समान इसकी कान्ति है। यह
असंख्य भुवनों से आवृत है और उन सबके बीच में पांच कलाएं हैं। इनके नाम इन्धिका,
दीपिका, रोचिका, मोचिका और ऊर्ध्वगा हैं। पांचवीं सर्वश्रेष्ठ कला मध्यभाग में
विराजमान है। इन सब इन्धिका प्रभृति देवियों से घिरे हुए करोड़ों चन्द्र की समान कान्ति
वाले एक अर्बुद (अरब) योजन विस्तार वाले इस पद्म के बीच में बैठे हुए, अरबों
१. ‘कलो नादो ध्वनौ तु मधुरास्फुटे कलः—ख. ग. ज. झ. उ., ‘ध्वनौ तु मधुरास्फुटे।
'कलो नादस्तु गम्भीरे' (१।६।२२) इति तु मूलस्य पाठः । २. रेचिका—क. ख. नै.
४६ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः
पद्ममध्ये समासीनमीश्वरं चोर्ध्वगामिनम् ।
चन्द्रायुतप्रतीकाशं पञ्चवक्त्रं त्रिलोचनम् ॥
१इन्धिकाद्यैर्वृतं देवं शूलपाणिं जटाधरम् ।
तस्योत्सङ्गगतामूर्ध्वगामिनीं परमां शिवाम् ॥
ध्यायेत् ॥इति।
विद्युदुज्ज्वलः तडित्सदृशकान्तिः । हलाकारः लाङ्गलसदृशरूपः । सव्यस्थ-
बिन्दुयुक्तः बिन्दुद्वयमध्ये दक्षिणभागस्थितबिन्दुयुक्तः । द्विगुणांशश्च पूर्वोक्तषोड-
शांशानां द्विगुणांशो द्वात्रिंशत्तमो भागः । कोऽर्थः ? मात्राद्वात्रिंशत्तमांशोच्चारण-
कालो हलाकारादिविशेषणविशेषितो नादान्त इत्यर्थः । नादस्यान्तो लयो भवति
यत्र ब्रह्मारन्ध्रे, तस्य प्रपञ्चः स्वच्छन्दसंग्रहे यथा—
हलाकारस्तु नादान्तो भित्त्वा सर्वमिदं जगत् ।
अधःशक्त्या विनिर्भिद्य ऊर्ध्वशक्त्यवसानकः ॥
नाड्यां ब्रह्मबिले लीनस्त्वव्यक्तध्वनिलक्षणः ।
अतो ब्रह्मबिलं ज्ञेयं रुद्रकोट्यर्बुदैर्युतम्२ ॥
तत्र ३ब्रह्मशिवो ज्ञेयः शशाङ्कशसन्निभः ।
दशबाहुस्त्रिनेत्रश्च पञ्चवक्त्रेन्दुशेखरः ॥
चन्द्रों की समान कान्ति वाले, पांच मुँह और तीन नेत्र वाले, त्रिशूल हाथ में लिये जटाजूट-
धारी ऊर्ध्वगामी भगवान् शिव का और उनके उत्संग ( गोद ) में बैठी ऊर्ध्वगामिनी
भगवती भवानी का ध्यान करना चाहिए ॥
नादान्त बिजली के समान चमक वाला और हल के समान आकार वाला है । दो
बिन्दुओं में से एक बिन्दु इसकी दक्षिण की ओर रहता है । इसका उच्चारण काल सोलह
का दुगुना, अर्थात् मात्रा का ३२ वां भाग होता है। इसका अभिप्राय यह है कि नादान्त
का उच्चारण काल मात्रा का ३२ वां भाग है और इसका आकार हलाकार आदि विशे-
षताओं से युक्त है । नादान्त का स्थान ब्रह्मारन्ध्र में है, क्योंकि यहीं नाद का अन्त (लय)
होता है । स्वच्छन्दसंग्रह में नादान्त का प्रपंच ( विस्तृत वर्णन ) इस तरह से किया
गया है—
नादान्त का आकार हल के सदृश है, अतः इस सारे जगत् को भेद कर, अधःशक्ति
से लेकर ऊर्ध्वशक्ति पर्यन्त समस्त शक्ति चक्रों को भी भेद कर ब्रह्मबिल ( ब्रह्मरन्ध्र )
में स्थित नाडी ( सुषुम्ना ) में लीन हो जाता है । उस समय अव्यक्त मधुर ध्वनि के रूप
में मात्र योगीजन इसका अनुभव कर सकते हैं । यह ब्रह्मबिल ११ करोड़ अरब योजन
विस्तार वाला है । यहां ब्रह्म रूपी शिव निवास करते हैं । सैंकड़ों चन्द्रों के सदृश इनकी
१. इन्धिका-ग. ज. ङ. । २. र्वृतम्-क. ग. । ३. ब्रह्म-ग. ङ. ज. ।
प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ४७
ब्रह्माणी त्वपरा शक्तिर्ब्रह्मणोत्सङ्गगामिनी ।
द्वारं सा मोक्षमार्गस्य रोधयित्वा व्यवस्थिता ॥ इति ॥ ३० ॥
शक्तिर्वामस्थबिन्दूत्थस्थिरेराकारा तथा पुनः ॥ ३१ ॥
व्यापिका बिन्दुविलसत्त्रिकोणाकारतां गता ।
पुनःशब्देन पूर्वेभ्यो विशेषो द्योत्यते । पूर्वेषां बिन्द्वाद्यंशानां स्वरूपवर्णमात्रा-
कालांशा२ अभिकल्पिताः । शक्तिमारभ्य समनान्तानामंशानां स्वरूपवर्णमात्रा३-
कालाः पश्चाद् वक्ष्यन्त इत्यर्थः । शक्तिर्बिन्दुद्वयमध्ये वामभागस्थबिन्दूत्थ४स्थिरा-
कारा । शक्तिप्रपञ्चः स्वच्छन्दसंग्रहे यथा—
शक्तितत्त्वं समाख्यातं भुवनै५रावृतं महत् ।
आधारं भुवनानां च प्रवक्ष्यामि समासतः ॥
सूक्ष्मा चैव सुसूक्ष्मा च तथा चैवामृता मृता ।
चतुर्दिक्षु स्थितास्तासां मध्यस्था व्यापिनी ६स्मृता ॥
कान्ति है । ये दश भुजा वाले, तीन नेत्र वाले, पांच मुंह वाले और इन्दुशेखर हैं ।
इनकी गोद में ब्रह्माणी नाम की शक्ति विराजमान है । यह शक्ति मोक्ष के मार्ग को रोक
कर बैठी रहती है ॥ ३० ॥
शक्ति का आकार सीधी रेखा के वाम भाग में बिन्दु को रखने से बनता है ।
व्यापिका का आकार त्रिकोणमय है । इस त्रिकोण के नीचे एक बिन्दु शोभित
है ॥ ३१ ॥
श्लोक में विद्यमान पुनः शब्द एक विशेषता का द्योतक है । पूर्व वर्णित बिन्दु
प्रभृति का स्वरूप, वर्ण और मात्राकाल भी साथ में ही बताया गया है । अब शक्ति से
लेकर समना पर्यन्त अंशों का १स्वरूप, वर्ण और मात्राकाल बाद में बताया जायगा । दो
बिन्दुओं में से वाम भाग में स्थित बिन्दु से एक स्थिर रेखा खींच देने पर शक्ति का
आकार बनता है । स्वच्छन्दसंग्रह में यह इस तरह से वर्णित है—
शक्तितत्त्व अनेक महान् भुवनों से आवृत है । यही सारे भुवनों का आधार है ।
इसका मैं संक्षेप में वर्णन करूँगा । चार दिशाओं में स्थित सूक्ष्मा, सुसूक्ष्मा, अमृता और
मृता नाम की चार शक्तियों के बीच में व्यापिनी विराजमान है । यह पांचवीं शक्ति
१. शिवा—ग. ने. छ. झ. उ., शिवाकारतया—ने. ज. । २. कलांशाः कल्पिताः—ख. ग.
ने. ज. झ. उ. । ३. कलाः—क. ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ४. शिवा—ज. झ. उ. ।
५. राश्रितम्—ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ६. स्थिता—ख. ग. ।
१. बिन्दु से उन्मना पर्यन्त कलाओं के स्वरूप को जानने के लिये भास्करराय के
वरिवस्यारहस्य के अड्यार लाइब्रेरी, मद्रास से प्रकाशित संस्करण के अन्त में दिया गया
चित्र देखना चाहिये ।
४८ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः
पञ्चवक्त्रा त्रिनेत्रा च सुतेजस्का च पञ्चमी।
शक्तितत्त्वं समाख्यातं ध्यानान्मुक्तिफलप्रदम् ॥इति।
व्यापिका बिन्दोर्विलासाद् १वामादित्रिशक्तिमया त्रिकोणरूपतां गतेत्यर्थः।
इयं तु शक्तितत्त्वकथनेनैव कथिता स्वच्छन्दसंग्रहे यथा—२“सूक्ष्मा चैव” इत्यादि
“स्थिताः” इत्यन्तं पूर्वोक्तम् ॥३१॥
बिन्दुद्वयान्तरालस्था ३ऋजुरेखामयी पुनः ॥३२॥
समना बिन्दुविलसदृजुरेखा तथोन्मना।
स्पष्टम्। समनायाः प्रपञ्चः स्वच्छन्दसंग्रहे४—
चिदानन्दस्वरूपा तु पराशक्तिस्तदूर्ध्वतः।
समना नाम सा शक्तिः सर्वकारणकारणम् ॥
सर्वाण्डानि५ बिभर्तीयं शिवेन समधिष्ठिता।
अत्रारूढः स भगवान् शिवः परमकारणम् ॥
अत्यन्त तेजस्विनी है, पांच मुँह और तीन नेत्र वाली है। यह शक्तितत्त्व ध्यान मात्र से
मुक्ति का प्रदाता है ॥
व्यापिका बिन्दु के विलास से वामा प्रभृति तीन शक्तियों से संवलित त्रिकोण का
आकार धारण कर लेती है। स्वच्छन्दसंग्रह में इसका वर्णन शक्ति तत्त्व के अन्तर्गत ही
किया गया है। “सूक्ष्मा चैव” से लेकर “स्थिताः” पर्यन्त श्लोकों को अभी-अभी ऊपर के
अनुच्छेद में उद्धृत किया जा चुका है ॥३१॥
ऊपर और नीचे विद्यमान दो बिन्दुओं के बीच में स्थित सीधी रेखा से
समना का और एक बिन्दु के ऊपर शोभित सीधी रेखा से उन्मना का आकार
बनता है ॥३२॥
इस श्लोक का अर्थ स्पष्ट है। स्वच्छन्दसंग्रह में समना का परिचय इस तरह से
दिया गया है—
इस व्यापिनी शक्ति के ऊपर चिदानन्दस्वरूपिणी परा शक्ति विद्यमान है। यह समना
नाम की शक्ति सभी कारण पदार्थों की भी कारण है, अर्थात् सारे कारण पदार्थों की
सृष्टि इसी से होती है। शिव के द्वारा समधिष्ठित यह शक्ति ही सभी अण्डों का भरण-
१. 'वामादि' नास्ति-ग. च. उ.। २. सम्पूर्णः श्लोकः पुनरप्यत्र-ख. ग. ने. ज. उ. ।
३. लस्थऋ-ख. ग. च. छ. ज. झ. उ. । ४. भैरवे यथा-ख. ग. ने. ज. झ. उ. ।
५. सर्वान्तानि-ख. ग. ने. ज. झ. उ. ।
प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ४९
१सृष्टिं स्थितिं च संहारं तिरोभावमनुग्रहम् ।
शिवः करोति सततं सर्वकारणकारणम् ॥
शिवः सर्वस्य कर्तेयं शक्तिः कारणमिष्यते ।
एकस्मादेव बिन्दोर्विलसद्दृजुरेखारूपा उन्मना । उन्मनायाः प्रपञ्चः स्वच्छन्द-
संग्रहे यथा—
या शक्तिः कारणत्वेन तदूर्ध्वे २उन्मना ३स्मृता ।
४मनः संक्रमते यत्र तेन सा उन्मना स्मृता ॥
नात्र कालकलाभानं न तत्त्वं न च देवता ।
सुनिर्वाणं परं शुद्धं रुद्रवक्त्रं तदुच्यते ॥
शिवशक्तिरिति ख्यातं५ निर्विकल्पं निरञ्जनम् । इति ॥३२॥
शक्त्यादीनां समनान्तानां वर्णं मात्रांश६कालं चाह—
शक्त्यादीनां वपुः स्फूर्जद्द्वादशादित्यसंनिभम् ॥३३॥
पोषण करती है। इस समना शक्ति के सहारे ही परम कारण भगवान् शिव सृष्टि, स्थिति,
संहार, तिरोभाव और अनुग्रह नामक पाँच कृत्यों का निरन्तर संपादन करते रहते हैं
और इस तरह से वे भी सभी कारणों के कारण कहलाते हैं। यहाँ शिव सबके कर्ता और
शक्ति सबकी कारणस्वरूप है ।
एक ही बिन्दु के ऊपर शोभित हो रही सीधी रेखा से उन्मना का आकार बनता
है । इसका भी वर्णन स्वच्छन्दसंग्रह में किया गया है—
अभी जिस समना नाम की कारण शक्ति का वर्णन किया गया है, उसके ऊपर
उन्मना शक्ति स्थित है। यहाँ आकर मन लीन हो जाता है, इसलिये इसका नाम उन्मना
है। यहाँ मन के लीन हो जाने से काल की कला की, किसी तत्त्व या देवता की भी
प्रतीति नहीं होने पाती । परमशुद्ध सच्चे निर्वाण की यही स्थिति मानी जाती है । इसी
को ७रुद्रवक्त्र कहते हैं। यह शिव की निर्विकल्प निरंजन शक्ति के नाम से प्रसिद्ध
है ॥३२॥
अब शक्ति प्रभृति के वर्ण और मात्राकाल का वर्णन किया जाता है—
शक्ति प्रभृति का स्वरूप एक साथ उगे १२ आदित्यों के समान है। शक्ति
का उच्चारण काल मात्रा का ६४ वाँ भाग है। शक्ति से लेकर समना पर्यन्त
१. सृष्टिमिति श्लोको नास्ति–ख. ग. ने. ज. झ. उ. । २. उन्मनी–ख. ग. ने.
ज. झ. उ । ३. स्थिता–ने., मता–उग. । ४. नास्त्येषा पङ्क्तिः–ख. ग. ने. ज.
झ. उ. । ५. तां···कारा···ञ्जना–क. ख. । ६. मात्रांशकत्वं–उ., मात्रांत्वं कलां–ख. ।
७. विज्ञानभैरव (श्लोक २४) में रुद्रवक्त्र सौबीजक के नाम से वर्णित है।
४
५० योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः
चतुष्षष्टिस्तदूर्ध्वं तु द्विगुणं द्विगुणं ततः ।
शक्त्यादीनां तु मात्रांशो मनोन्मन्यास्तथोन्मनी ॥३४॥
मनोन्मन्या२ मनोन्मनीपर्यन्तम् । मनोन्मनी नाम समना, मनःसहितत्वात्,
तद्रहितत्वादुन्मनीत्युच्यते । शक्त्यादीनां ३मनोन्मनीपर्यन्तानामंशानां वपुः स्वरूपं
स्फूर्जद्द्वादशादित्यसंनिभम् एकत्र हेलयोदितद्वादशादित्यसवर्णवर्णम् । मात्रांश-
श्चतुष्षष्टिः मात्रांशकालश्चतुष्षष्टितमोंऽश इत्यर्थः । तदूर्ध्वं तु१ व्यापिकाया मात्रांशो-
च्चारणं द्विगुणं व्यापिकोच्चारणमात्रावयवकालोऽष्टाविंशत्युत्तरशततमो भाग
इत्यर्थः । ततः४ समनोच्चारणमात्रावयवकालः षडधिकपञ्चाशदुत्तरद्विशततमो
भाग इत्यर्थः । उन्मनी यथेदानीं५ कथितविशेषणा तथा निराकारा निरुच्चारा,
“यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह” (तै० उ० २।४) इत्युपनिषदुकरीत्या
अंशों का उच्चारण काल दुगुना सूक्ष्म होता जाता है । उन्मनी का न तो कोई
आकार होता है और न इसका उच्चारण ही संभव है ॥३३-३४॥
'मनोन्मन्याः' पद का अर्थ मनोन्मनी पर्यन्त किया जाता है । मनोन्मनी शब्द से यहाँ
समना गृहीत है, क्योंकि मन की स्थिति यहीं तक है । उन्मनी में मन की स्थिति नहीं
रहती । शक्ति से लेकर मनोन्मनी (समना) पर्यन्त अंशों का स्वरूप एक स्थान पर एका-
एक उगे १२ आदित्यों (सूर्यों) की कान्ति के समान है । १शक्ति का उच्चारण काल मात्रा
का ६४ वाँ भाग है । इसके ऊपर व्यापिका का उच्चारण काल इससे दुगुना, अर्थात् मात्रा
का १२८ वाँ भाग होगा । इसके बाद की समना का उच्चारण काल मात्रा का
२५६ वाँ भाग होगा । १उन्मना को निराकार और निरुच्चार कहा गया है, अर्थात्
इसका न तो कोई आकार है और न इसका उच्चारण ही किया जा सकता है । तैत्तिरीय
उपनिषद् में बताया गया है-“मन के साथ वाणी भी यहाँ तक आकर लौट जाती है,
क्योंकि उनकी यहाँ तक पहुँच नहीं है ।” इस तरह से वाणी और मन की गति यहाँ
१. व्यापिका-ग. उ. । २. 'मनोन्मन्याः' नास्ति-ग, उ. । ३. उन्मनी-ख. ग. ज.
झ. उ. । ४. 'ततः' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. दानीम-झ. उ. ।
- प्रस्तुत प्रकरण की व्याख्या करते समय तथा वरिवस्यारहस्य (पृ० १३-१४) में
भी भास्करराय ने समना के समान उन्मना का भी उच्चारण काल मात्रा का २५६ वाँ
भाग माना है । भास्करराय वरिवस्यारहस्य (पृ० १३-१४) में एक अन्य मत का उल्लेख
करते हैं । तदनुसार उन्मना का उच्चारण काल मात्रा का ५१२ वाँ भाग है । श्रद्धेय
कविराज जी भी अपने 'तान्त्रिक वाङ् मय में शाक्त दृष्टि' नामक ग्रन्थ में 'नादतत्त्व'
शीर्षक के अन्तर्गत (पृ० ३०८) इस पक्ष की चर्चा करते हैं ।
प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ५१
<sup>१</sup>वाङ्मनोऽतीतगोचरत्वादुन्मनीत्युच्यते । महाबिन्दौ चाकाररूपवर्णोच्चारकाला न
विद्यन्ते । अतो नात्रोच्यन्ते, तस्य विश्वोत्तीर्णत्वात् । तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे—
तत्त्वातीतं वरारोहे वाङ्मनोऽतीतगोचरम् ॥
अनिष्कलं चासकलं नीरूपं <sup>२</sup>निर्विकल्पकम् ।
निर्द्वन्द्वं परमं तत्त्वं शिवाख्यं परमं पदम् ॥ इति ।
हकारादिबिन्द्वन्तानां स्थूलवर्णानामुच्चारणकालो मात्रा, बिन्द्वादिसमनान्ता-
नामर्धमात्रा । तदर्धादिक्रमेण लवपर्यन्तमुच्चारणकालः । लवो नाम<sup>३</sup>
नलिनीपत्रसंहत्यां सूक्ष्मसूच्यभिभेदने ।
दले दले तु यः कालः स कालो लववाचकः ॥ (प्र० सा० १।२९)
इति वचनात् । तदूर्ध्वं<sup>४</sup> शून्य एव, तदधिकसूक्ष्मतरकालाभावात् । एवं-
विध<sup>५</sup>भावनया शिव एव भूयादित्यर्थः । तदुक्तं विज्ञानभैरवभट्टारकैः—
आकर रुक जाती है । इसीलिये इसे उन्मना कहते हैं । महाबिन्दु में तो सुतरां आकार
(रूप), वर्ण और उच्चारण काल की भी कोई स्थिति नहीं है, अतः उनका यहाँ वर्णन
नहीं किया गया है, क्योंकि वह महाबिन्दु <sup>१</sup>विश्वोत्तीर्ण तत्त्व है । इसका वर्णन स्वच्छन्द-
संग्रह में इस तरह से किया गया है—
हे वरारोहे ! वाणी और मन से अगोचर, सभी तत्त्वों से अतीत यह महाबिन्दु
अनिष्कल, असकल, नीरूप, निर्विकल्पक, निर्द्वन्द्व परम तत्त्व है । यही शिव नामक परम
पद है ॥
हकार से लेकर बिन्दु पर्यन्त स्थूल वर्णों का उच्चारण काल एक मात्रात्मक है,
बिन्दु से समना पर्यन्त कलाओं का काल अर्धमात्रा है । प्रत्येक आगे वाली कला में यह
काल आधा होता जाता है । यह उच्चारण काल लव पर्यन्त सूक्ष्म होता है । प्रपंचसार में
लव का लक्षण इस तरह से वर्णित है—
कमल के सहस्र पत्रों को एक साथ रख कर उनको तीखी सुई से छेदते समय एक-
एक पत्र के छेदन में जो काल लगता है, उसी को लव कहा जाता है ॥
इसके ऊपर कुछ भी नहीं है, क्योंकि इससे अधिक सूक्ष्म काल की कल्पना ही नहीं
की जा सकती । इस तरह इन सूक्ष्म नाद-कलाओं का ध्यान करने वाला साक्षात् शिव
हो जाता है, जैसा कि विज्ञानभैरव के निम्न श्लोक में कहा गया है—
१. 'वाङ्' नास्ति-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । २. निरुपद्रवम्-ग. उ. । ३. 'नाम'
नास्ति-ख. ज. झ. । ४. तदूर्ध्वं लवोर्ध्वं-क. ने. ज. । ५. विधविश्व-ख. ग. ने. ज. झ. उ. ।
१. पृ० १५ की टिप्पणी देखिये ।
५२ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः
'पिण्डरूपस्य मन्त्रस्य स्थूलवर्णक्रमेण तु।
अर्धेन्दुबिन्दुनादान्तशून्योच्चाराद् भवेच्छिवः ॥ इति ।
(वि० भै०, श्लो० ४२)
अत्र 'बिन्द्वर्धेन्दु' इति वक्तव्ये वृत्तानुरोधेन व्यत्यासः । बिन्द्वर्धेन्दुनादान्त-
शून्योच्चाराद् भवेच्छिव इति प्रत्याहाररीत्या ग्रहणम् । अर्धेन्दोरुपरि रोधिनी-
नादयोर्नादान्तस्य चोपरि शक्तिव्यापिकासमनानां च विद्यमानत्वात् । शून्यशब्दे-
नोन्मना उच्यते । अतोऽर्धेन्दुबिन्दुनादान्तशून्योच्चाराद् भवेच्छिव इति २पिण्डरूपस्य
मन्त्रस्य संग्रहेणोक्तिः ॥३३-३४॥
देशकालानवच्छिन्नं तदूर्ध्वे परमं महत् ।
निसर्गसुन्दरं तत्तु परैरानन्दविघूर्णितम् ॥३५॥
तदूर्ध्वे हकारादिमहाबिन्द्वन्तानां सकल-सकलनिष्कल-केवलनिष्कलानां
त्रयाणामप्यूर्ध्वे । परमं महत् । महत्त्वं घटादीनामप्यस्ति न्यूनपरिमाणापेक्षया, अत
उक्तं परमिति । यतः परं महत्त्वं नास्ति तत् परमं महत् । अत एव देशकालान-
ॐकार, ह्रींकार प्रभृति पिण्ड मन्त्रों के स्थूल वर्णों का क्रमशः उच्चारण करने
के बाद बिन्दु, अर्धचन्द्र, नाद, नादान्त आदि सूक्ष्म कलाओं का क्रम से उच्चारण करने
से साधक शिव हो जाता है ॥
विज्ञानभैरव के इस श्लोक में 'बिन्द्वर्धेन्दु' ऐसा पाठ होना चाहिये, किन्तु छन्द की
दृष्टि से 'अर्धेन्दुबिन्दु' ऐसा पाठ है । बिन्दु, अर्धेन्दु, नादान्त और शून्य का उच्चारण
करने से शिव बन जाता है, इस वाक्य में प्रत्याहार की पद्धति अपनाई गई है । इससे
अर्धेन्दु के बाद रोधिनी और नाद का तथा नादान्त के बाद शक्ति, व्यापिका ओर
समना कलाओं का उच्चारण अभिप्रेत है । शून्य शब्द यहाँ उन्मना का बोधक है । अतः
'अर्धेन्दुबिन्दु' श्लोक की इस पंक्ति के द्वारा पिण्डमन्त्र की सभी कलाओं का संक्षेप में
उल्लेख हुआ है, ऐसा माना जाना चाहिये ॥३३-३४॥
इसके ऊपर देश और काल आदि से अपरिच्छिन्न वह परम महान् स्वभाव-
सुन्दर तत्त्व विद्यमान है, जो कि सदा परम आनन्द में लीन रहता है ॥३५॥
हकार से लेकर महाबिन्दु पर्यन्त कलाओं की यह जो त्रिविध – सकल, सकलनिष्कल
और केवल निष्कल नाम की भावनाएँ बताई गई हैं, इन सबसे ऊपर वह परम महत्
तत्त्व अवस्थित है । छोटे घड़े की अपेक्षा बड़े घड़े का भी परिमाण महत् (बड़ा) होता
है, अतः यहाँ उसका विशेषण परम जोड़ा गया है । जिससे अधिक बड़ा कोई न हो, उसे
१. वि० भै०, पृ० ४२। २. पिण्ड-क० ख०। ३. परमानन्द-च०, ख०, ग०, घ०, ङ०।
प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ५३
वच्छिन्नम् । देशकालाकारैरनवच्छिन्नमेव परमं महदित्युच्यते¹ । तेन निसर्ग-
सुन्दरम् । लोकेऽसुन्दरमपि वस्तु वस्त्राद्यलङ्कारैरारोपितैः सुन्दरमिव प्रतीयते ।
इदं तु स्वभावसुन्दरम्, सर्वैः स्वस्वात्मतया स्पृहणीयत्वात् । ²परानन्द-
विघूर्णितम् । आनन्दः शब्दादिविषयानुभवेऽप्यस्ति क्षणिकः, तत³ उच्यते परा-
नन्दविघूर्णितमिति । कोऽर्थः ? त्रित्रिरूप⁴समवस्थितवस्तुभ्यः पुरातनी देशकाला-
नवच्छिन्ना परममहद्रूपा स्वभावसुन्दरी परप्रकाशात्मकपरशिवसामरस्यपरि⁵-
पूर्णपरानन्दशालिनी विमर्शशक्तिः श्रीमहान्त्रिपुरसुन्दरीत्यर्थः ॥३५॥
"प्रसृतं विश्वलहरीस्थानं मातृत्रयात्मकम्"⁶ (१।११) इत्यत्र सूचितां मातृका-
मयवासनामिदानीं विवृणोति—
आत्मनः स्फुरणं पश्येद् यदा सा परमा कला ।
अम्बिकारूपमापन्ना परा वाक् समुदीरिता ॥३६॥
यहाँ परम महान् कहा गया है। देश, काल और आकार से परिमित न होने से यह परम
महान् है। इसीलिये यह निसर्गसुन्दर है। लोक में असुन्दर वस्तु को भी वस्त्र, अलंकार
आदि पहनाकर सुन्दर सा बना दिया जाता है, किन्तु यहाँ ऐसी बात नहीं है। यह तत्त्व
तो स्वभाव से ही सुन्दर है, क्योंकि सभी प्राणी इसको अपनी आत्मा ही मानते हैं
और आत्मा के साथ सभी का स्वाभाविक स्नेह रहता है। यह तत्त्व परानन्द से विघूर्णित
है। शब्द आदि लौकिक विषयों का अनुभव करने से भी क्षणिक आनन्द की सृष्टि होती
है। इससे विलक्षण आनन्द की सृष्टि परम तत्त्व की अनुभूति से होती है। इसीलिये इसको
परानन्दविघूर्णित कहा गया है। इसका अभिप्राय यह है कि तीन-तीन संख्या वाली समस्त
वस्तुओं से पहले विद्यमान, देश, काल और आकार से अपरिमित, परम महान् परिमाण
वाली, स्वभाव से ही सुन्दर और परम प्रकाशात्मक परम शिव के साथ समरस रूप में
अवस्थित, विमर्शशक्ति स्वरूपिणी यह महात्रिपुरसुन्दरी भगवती सदा परम आनन्द से
ओतप्रोत रहती है। अन्ततः इससे यह अभिप्राय निकलता है कि उक्त भावना के अभ्यास
से साधक तद्रूप हो जाता है, जैसा कि कामकलाविलास के पूर्वोद्धृत (पृ० १०) छठे श्लोक
में बताया गया है ॥३५॥
पहले (१।११) चक्र को मातृत्रयात्मक बताया गया था, उसी विषय को अब यहाँ
विस्तार से समझाया जा रहा है—
ऊपर वर्णित यह परम कला जब अपने ¹स्फुरण (विस्तार) को देखना चाहती
१. 'उच्यते' नास्ति—ख. ज. झ. । २. परमानन्द—ज. झ. उ. । ३. तदु—ख. ग.
ज. उ. । ४. समस्त—ग. उ. । ५. 'परिपूर्ण' नास्ति—ने. ज. झ. उ. । ६. इतः परम्—
'बैन्दवं चक्रम्' इत्यधिकं—ख. ने. ज. उ. ।
१. स्फुरण शब्द पूर्व प्रतिपादित (१।१०-११) स्फुरत्ता का पर्याय है। इस तरह से
५४ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः
सा परमा सर्ववर्णाद्यभूतविमर्शरूपा, कला विमर्शशक्तिः, आत्मनः परशिवस्य,
स्फुरणं पश्यन्त्यादिक्रमेण वैखरीपर्यन्तं विमर्शनम्, पश्येद् द्रष्टुमिच्छेत्, तदा
परमा शान्तात्मिका भूत्वा, अम्बिकारूपमापन्ना प्रकाशांशभूताया अम्बिकायाः
सामरस्यमापन्ना, परा वाक् समुदीरिता परा मातृकोच्यते। तदुक्तं संकेत-
पद्धत्याम्—"अनयोः सामरस्यं यत् परस्मिन् महसि स्फुटम्" इति ॥३६॥
बीजभावस्थितं विश्वं स्फुटीकर्तुं यदोन्मुखी।
वामा विश्वस्य वमनादङ्कुशाकारतां गता ॥३७॥
इच्छाशक्तिस्तदा सेयं पश्यन्तीवपुषा स्थिता।
है, तो सबसे पहले अम्बिका शक्ति का रूप धारण करती है। इसी को परा वाक्
कहा जाता है ॥३६॥
सभी वर्णों की आदिभूत विमर्शशक्ति जब प्रकाशात्मक शिव के विस्तार को पश्यन्ती
से लेकर वैखरी पर्यन्त वाणी के रूप में देखना चाहती है, तब वह परम शान्त विमर्श-
शक्ति प्रकाश की अंशभूत अम्बिका शक्ति से समरस हो जाती है और इस तरह से परा
वाणी, परा मातृका का स्वरूप धारण कर लेती है। संकेतपद्धति में इस स्थिति का वर्णन
इस तरह से किया गया है—"प्रकाश और विमर्श का सामरस्य इस परप्रकाशात्मक¹
स्वरूप में स्पष्ट है" ॥३६॥
यह परा वाणी अपने में बीज रूप से विद्यमान् जगत् को जब प्रकट करने
लगती है, तब विश्व का वमन करने के कारण अंकुश सदृश वामा शक्ति का रूप
पूर्व उपक्रान्त श्रीचक्र की निष्पत्ति-प्रक्रिया का यहाँ उपसंहार किया जा रहा है। इस
विषय की चर्चा पहले भी (पृ० १९ की टिप्पणी में) आ चुकी है।
१. 'परस्मिन् महसि' के स्थान पर 'परस्मिन्नहमि' पाठ उचित प्रतीत होता है।
कामकलाविलास की टीका चिद्वल्ली (पृ० १५) में यही पाठ गृहीत है। ऋजुविमर्शिनी
(पृ० ९८) और दीपिका (२।६३-६४) में उद्धृत संकेतपद्धति के इस वचन से पहले विद्य-
मान 'अकारः' इत्यादि श्लोक में अकार और हकार की प्रकाशविमर्शात्मकता का प्रति-
पादन किया गया है। पृ० १६-१७ की टिप्पणी में हम विस्तार से बता चुके हैं कि अहमा-
त्मक अद्वयतत्त्व से जिस बिन्दु तत्त्व की निष्पत्ति होती है, वही कामकला का रूप धारण
कर लेता है। यहाँ उस अद्वयतत्त्व से परा, पश्यन्ती आदि चार वाणियों का विकासक्रम
बताया गया है। कामकलाविलास (श्लो० २२-२७) तथा आगे उद्धृत (२।६३-६४)
संकेतपद्धति के वचनों से इस विषय की अधिक स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है। वहाँ
परम प्रकाशमय बिन्दुतत्त्व की परा वाणी-स्वरूपता का, एकादशधा पश्यन्ती का तथा
मध्यमा की नवधादशमशत का निरूपण किया गया है।
प्रथमः ] दीपिकभाषाअनुवादसहितम् ५५
बीजभावस्थितं विश्वम् । यथा बीजे वृक्षस्तथा षट्त्रिंशत्तत्त्वात्मकं विश्वं
परायां कारणतावन्मात्रतामास्थितम्, स्फुटीकर्तुं यदोन्मुखी स्फुटीकर्तुमुत्पाद-
यितुमुन्मुखी । अत्रोत्पादनं नाम १कारणे सत एव कार्यस्य स्फुटीकरणम् । अत एव
कार्यस्य स्फुटीकरणाद् वामा, विश्वस्य वमनात् कारणे सत२ उत्पादनात् । वमनं
नामोदरस्थस्य आहारादेर्बहिर्३निर्यासनम् । उत्पादनमप्येवमेव । अत एव गर्भभावे-
नात्मोदरगतस्य विश्वस्य बहिर्वमनाद् वामा । अङ्कुशाकारतां गता वक्रत्वाच्च
वामा शृङ्गाटस्य वामरेखा सृष्टिरूपाऽ४भूदित्यर्थः । त(था ? दा) इच्छाशक्तिर्वामा-
शक्तिसामरस्यमापन्ना पश्यन्तीरूपेण स्थितेत्यर्थः ।।३७।।
ज्ञानशक्तिस्तथा ज्येष्ठा मध्यमा वागुदीरिता ।।३८।।
ऋजुरेखामयी विश्वस्थितौ प्रथितविग्रहा ।
धारण कर लेती है । इस वामा शक्ति का जब इच्छा शक्ति के साथ मिलन होता
है, तो वह पश्यन्ती के रूप में परिणत हो जाती है ।।३७।।
बीज में जैसे वृक्ष छिपा बैठा है, उसी तरह से यह ३६ तत्त्व वाला सारा जगत् परा
वाणी में सूक्ष्म रूप में विद्यमान है । अपने में छिपे हुए इस विश्व को यह परा वाणी
प्रकट करने में लग जाती है । कारण में पहले से विद्यमान कार्य की अभिव्यक्ति ही यहाँ
उत्पत्ति मानी गई है । कारण से कार्य को अभिव्यक्त करने वाली यह शक्ति तब
वामा कहलाती है, क्योंकि यह विश्व का वमन करती है, कारण में विद्यमान वस्तु
को कार्य के रूप में परिणत कर देती है । पेट में विद्यमान भोजन, जल आदि का मुँह से
बाहर निकल आना वमन (उल्टी) कहलाता है । जगत् के उत्पादन की भी यही पद्धति
है । इसीलिये गर्भ के रूप में अपने पेट में विद्यमान इस जगत् को बाहर निकालने वाली
शक्ति वामा है । इसका आकार अंकुश सरीखा तिरछा है, इस तिरछेपन के कारण भी
इसको वामा कहते हैं । वामा शक्ति का यह तिरछापन ही शृंगाट (त्रिकोण) की बाईं
रेखा के रूप से दिखाई पड़ता है, जो कि सारी सृष्टि का प्रतीक है । इस समय इच्छा
शक्ति आकर इस वामा शक्ति से मिल जाती है । इन दोनों की यह समरस दशा ही
पश्यन्ती वाणी के रूप में प्रकट होती है ।।३७।।
इसी तरह से ज्येष्ठा शक्ति और ज्ञान शक्ति के मिलन से मध्यमा वाणी
अभिव्यक्त होती है । शृंगाट की सीधी रेखा इसका प्रतीक चिह्न है । यह शक्ति
विश्व की स्थिति की कारणभूत है ।।३८।।
१. 'कारणे सत एव कार्यस्य' नास्ति-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । २. सतो विश्वस्य
वमनात्-ख. ग. ज. झ. उ. । ३. निर्वां-ख. ग. ने. ज. उ. । ४. पाप्यभू-ने. ज.
झ. उ. ।
५६ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः
तथा ज्येष्ठाशक्तिर्ज्ञानशक्तिः, यथा वामाशक्तिरिच्छाशक्तिसामरस्यमापन्ना
सृष्ट्यात्मकशृङ्गाटवामरेखासीत् तथा ज्येष्ठाशक्तिरपि ज्ञानशक्तिसामरस्य-
मापन्ना। विश्वस्थितौ प्रथितविग्रहा, सृष्टिविश्वस्थितौ ²हेतुभूतत्वात्। ऋजुरेखा-
मयी। अत्र शृङ्गाटाग्ररेखाकारा। मध्यमा वागुदीरिता मध्यमामातृकात्व-
मापन्ना ॥३८॥
तत्संहृतिदशायां तु बैन्दवं रूपमास्थिता ॥३९॥
प्रत्यावृत्तिक्रमेणैव शृङ्गाटवपुरुज्ज्वला।
क्रियाशक्तिस्तु रौद्रीयं वैखरी विश्वविग्रहा ॥४०॥
सृष्टस्य स्थितस्य विश्वस्य संहारकाले, बैन्दवं रूपमास्थिता अम्बिका शान्ता-
सामरस्यरूपा³ स्थिता, मध्यबिन्दोराविर्भूय सृष्टिं स्थितिं च सम्पाद्य तत्संहारो-
जैसे वामा शक्ति इच्छा शक्ति से मिलकर शृंगाट की सृष्टिस্বরূপ वाम रेखा का
आकार धारण करती है, उसी तरह से ज्येष्ठा शक्ति ज्ञान शक्ति से मिलकर सृष्ट विश्व
की स्थिति के कारणभूत शृंगाट के अग्रभाग की सीधी रेखा का स्वरूप ग्रहण करती है।
उक्त दोनों शक्तियों की इसी समरस स्थिति को मध्यमा वाणी का प्रतीक माना जाता
है। मातृका के सूक्ष्म रूप पश्यन्ती और स्थूल रूप वैखरी के बीच में इसकी स्थिति है,
अतः इसको मध्यमा कहा जाता है ॥३८॥
उस विश्व की संहार दशा में पुनः अपने बैन्दव स्वरूप में प्रविष्ट होने की
कामना से वह शक्ति लौट पड़ती है। इस तरह से शृंगाट की दक्षिण रेखा के
निर्माण के साथ इसका पूर्ण स्वरूप स्पष्ट हो जाता है। इस प्रकार रौद्री और
क्रिया शक्ति के मिलन से वाणी के सारे विस्तार को मुखरित करने वाली वैखरी
वाणी का यह प्रतीक स्वरूप बनता है ॥३९-४०॥
सृष्ट और स्थित विश्व का संहार करते समय यह शक्ति पुनः बैन्दव¹ स्वरूप में
प्रविष्ट हो जाती है, अर्थात् अम्बिका और शान्ता शक्ति के साथ एकरस हो जाती है।
१. 'सामरस्य''''ज्ञानशक्ति' नास्ति-ख. ग. ने. ज. झ. ड.। २. हेतुत्वात्-ख. ने. ज.
झ.। ३. रूपेण-ग. ड.।
- समरस बिन्दु जब कामकला का स्वरूप धारण करता है, तो ऊर्ध्व बिन्दु काम
तथा अधः स्थित बिन्दुद्वय कला के नाम से अभिहित होते हैं। ऊर्ध्व बिन्दु से निकली
वामरेखा सृष्टि तथा ऋजुरेखा स्थिति कृत्य की प्रतीक है। संहार कृत्य की प्रतीक दक्षिण
रेखा लौटकर पुनः बैन्दव स्वरूप में, अर्थात् प्रकाशात्मक कामबिन्दु में और अन्ततः समरस
बिन्दु में लीन हो जाती है।
Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ५७
न्मुखी पुनर्बिन्दुमेव प्रविष्टेत्यर्थः। एवं प्रत्यावृत्तिक्रमेण, इयं रौद्री क्रियाशक्ति-
सामरस्यात्, सैव शृङ्गाटवपुः शृङ्गाटस्य दक्षिणरेखा भूत्वा, उज्ज्वला शृङ्गाट-
रूपेण भासमाना। शृङ्गाटं नाम त्रिकोणम्। वैखरी विश्वविग्रहा वाग्रूपप्रपञ्चमय-
वैखरीरूपा जातेत्यर्थः ॥३९-४०॥
प्रकाशविमर्शांशरूपाणामम्बिकादीनां १शान्तादीनां चतसृणां शक्तीनां शृङ्गाट-
रूपतामुक्त्वा पुनरिदानीं त्रिकोणान्तर्गतपीठाकारवर्णलिङ्गावस्थाचतुष्टयमयता-
वासनामाह "भासनाद्विश्वरूपस्य" इत्यादिना "तुर्यरूपाण्यमूनि च" (१।४९)
इत्यन्तेन—
भासनाद् विश्वरूपस्य स्वरूपे बाह्यतोऽपि च।
एताश्चतस्रः शक्त्यस्तु का पू जा ओ इति क्रमात् ॥४१॥
उत्तरार्धवक्ष्यमाणचतुष्टये २ हेतुमाह—भासनादिति। विश्वं शिवादिभूम्यन्तं
नामरूपात्मकम्, तद्रूपस्य स्वरूपे बीजभावेन, बाह्यतः सृष्ट्यात्मना भासनात्,
इसका तात्पर्य यह है कि मध्य बिन्दु से प्रकट होकर शक्ति सृष्टि और स्थिति नामक दो
कृत्यों का सम्पादन करने के बाद जब संहार कृत्य में प्रवृत्त होती है, तो उस समय वह
पुनः बिन्दु में प्रविष्ट हो जाती है। इस तरह से शक्ति की एक आवृत्ति पूरी हो जाती
है। इस प्रत्यावृत्ति (वापस लौटना) के क्रम में रौद्री और क्रिया शक्ति के मिलन से
शृंगाट की दक्षिण रेखा बनती है और इस तरह से शृंगाट का पूर्ण स्वरूप भासित हो
उठता है। शृंगाट शब्द यहाँ त्रिकोण के अर्थ में प्रयुक्त है। सिंघाड़े का आकार त्रिकोणा-
त्मक ही होता है। यह तृतीय रेखा वैखरी वाणी की प्रतीक है, जो कि वाणी के सारे
स्थूल प्रपंच को मुखरित करती है ॥३९-४०॥
इस तरह से प्रकाश की अंशभूत अम्बिका आदि तथा विमर्श की अंशभूत शान्ता
प्रभृति चार-चार शक्तियों से सम्पन्न शृंगाट के स्वरूप का वर्णन करने के बाद अब पुनः
इस शृंगाटसदृश त्रिकोण के अन्तर्गत विद्यमान पीठों की, उनके आकार और वर्ण को,
चार लिंगों और चार अवस्थाओं की भावना का वर्णन आगे (१।४१-४९) किया जा
रहा है—
नामरूपात्मक जगत् को जब ये चार शक्तियाँ अपने भीतर और बाहर
प्रकाशित करती हैं, तो का पू जा ओ नामक पीठों का स्वरूप धारण कर लेती
हैं ॥४१॥
सबसे पहले ४१ वें श्लोक के उत्तरार्ध में कहे जाने वाले चार पीठों के हेतु (कारण)
का वर्णन 'भासनात्' इस पंक्ति में किया गया है। विश्व का अर्थ है शिव से लेकर पृथ्वी
१. 'शान्तादीनां' नास्ति—ग. झ. ड.। २. ष्टयत्वे—ग. ने. ड.।
५८ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः
एताश्चतस्रः शक्तयस्तु "शक्लृ १व्याप्तौ" (१२६२ स्वा०) इत्यस्माद् धातोः
शक्तिशब्दव्युत्पत्तिः । चतस्रः २अम्बिकाद्याः शान्ताद्याश्चतस्रः । क्रमेण परस्परं
सामरस्यमापन्नाः का पू जा ओ इति क्रमादासन् । का कामरूपपीठम्, पू पूर्णगिरि-
पीठम्, जा जालन्धरपीठम्, ओ ओड्याणपीठम् । प्रकाशविमर्शात्मतया समरसी-
भूताः पूर्वोक्ताश्चतस्रः शक्तयः कामरूपपूर्णगिरिजालन्धरौड्याणपीठरूपेण
परिणता ३इत्यर्थः ॥४१॥
पीठचतुष्टयस्य पिण्डादिमयतावासनामाह—
पीठाः कन्दे पदे रूपे रूपातीते क्रमात् स्थिताः ।
४कन्दं नाम सुषुम्नामूलम् । कन्दशब्देन तत्रस्था पिण्डाख्या कुण्डली लक्ष्यते ।
तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे—
"५नयित्वा तं सुषुम्नाऽधः कन्दस्थाने च मारुतम् ।
इच्छाज्ञानक्रियारूपां कुण्डलीं परमेश्वरीम् ॥
प्रसुप्तभुजगाकारां मातृकारूपिणीं शिवाम् । इति ।
पर्यन्त नामरूपात्मक जगत् । इस विश्व के स्वरूप में बीजभाव से भीतर और सृष्टिभाव से
बाहर उक्त चार शक्तियों का ही भासन होता है । व्याप्ति अर्थवाली 'शक्लृ' धातु से
शक्ति शब्द बनता है । अम्बिका आदि और शान्ता आदि चार-चार शक्तियाँ क्रमशः
परस्पर मिलकर का पू जा ओ बन जाती हैं । का से कामरूप पीठ, पू से पूर्णगिरि पीठ,
जा से जालन्धर पीठ और ओ से ओडद्याण पीठ समझना चाहिये । प्रकाश और विमर्श
स्वरूप उक्त चार-चार शक्तियाँ जब समरस हो जाती हैं, तो उनका अगला परिणाम
कामरूप, पूर्णगिरि, जालन्धर और ओडद्याण पीठ के रूप में होता है ॥४१॥
इन चार पीठों की पिण्ड आदि के रूप में भावना करनी चाहिये—
ये चार पीठ क्रमशः कन्द, पद, रूप और रूपातीत में स्थित हैं ।
सुषुम्ना नाडी का मूल स्थान कन्द कहलाता है । यहाँ कन्द शब्द से उसमें विराज-
मान कुण्डलिनी शक्ति, जिसको पिण्ड भी कहते हैं, गृहीत होती है । स्वच्छन्दसंग्रह इसमें
प्रमाण है—
उस पवन को सुषुम्ना के मूल में विद्यमान कन्द स्थान में ले जाना चाहिये और वहाँ
सोये हुए सर्प के समान आकारवाली मातृकास्वरूपिणी और इच्छा-ज्ञान-क्रिया शक्ति
समष्टिरूपिणी भगवती कुण्डलिनी का मंगलमय दर्शन करना चाहिये ॥
१. 'शक्तौ' इति धातुपाठस्थः पाठः । २. 'अम्बिकाद्याः शान्ताद्याश्चतस्रः' नास्ति-ख.
ग. ज. झ. उ. । ३. 'इत्यर्थः' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. कन्द इति-ख. ग. ने.
ज. झ. उ. । ५. लङ्घित्वा-ख. झ., लयित्वा-ग. उ. ।
प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ५९
पदं १नाम हंसः । रूपं २नाम बिन्दुः । रूपातीतं ३नाम निरञ्जनं तत्त्वम् ।
तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे—
पिण्डं कुण्डलिनीशक्तिः पदं हंसः प्रकीर्तितः ।
रूपं बिन्दुरिति ख्यातं रूपातीतं तु चिन्मयम् ॥ इति ।
पीठाश्चत्वारः । पिण्डपदरूपरूपातीतशब्देन तत्तत्स्थानान्याधारहृदयभ्रूमध्य-
ब्रह्मरन्ध्राणि लक्ष्यन्ते । तेन क्रमात् तेषु स्थानेषु स्थितास्तत्तन्मया इत्यर्थः ।
तेषां पृथिवीवायुसलिलतेजोरूपतां ४सूचयन् तत्त्वरूपभेद५माह—
चतुरस्रं तथा बिन्दुषट्कयुक्तं च वृत्तकम् ॥४२॥
अर्धचन्द्रं त्रिकोणं च रूपाण्येषां क्रमेण तु ।
चतुरस्रं चतुरस्ररूपः कामरूपपीठः । भूतत्त्वमित्यर्थः, भूमण्डलस्य चतुरस्र-
रूपत्वात् । बिन्दुषट्कयुक्तं च वृत्तकम् । पूर्णगिरिपीठः षड्बिन्दुयुक्तवृत्तरूपः ।
वायुतत्त्वमित्यर्थः, वायुमण्डलस्य षडावर्तवद्वृत्तरूपत्वात् । अर्धचन्द्रं जालन्धर-
ऊपर कुण्डलिनी शक्ति को पिण्ड नाम से भी कहा गया है। इसी तरह से पद का
अर्थ हंस, रूप का बिन्दु और रूपातीत का अर्थ निरंजन तत्त्व होता है। इसमें भी
स्वच्छन्दसंग्रह ही प्रमाण है—
पिण्ड कुण्डलिनी शक्ति को कहते हैं। पद हंस को कहा जाता है। रूप ही बिन्दु के
नाम से भी प्रसिद्ध है और रूपातीत चिन्मय तत्त्व को कहते हैं॥
चार पीठों के नाम ऊपर बताये गये हैं। पिण्ड, पद, रूप और रूपातीत शब्द से
उनके स्थान आधार, हृदय, भ्रूमध्य और ब्रह्मरन्ध्र का ग्रहण करना चाहिये। तब इसका
अर्थ होगा कि उक्त चार पीठ उक्त चार स्थानों में स्थित हैं और उसी रूप में इनकी
भावना करनी चाहिये।
अब यह बताया जा रहा है कि ये चार पीठ पृथिवी, वायु, जल और तेज के प्रति-
निधि हैं और इन तत्त्वों के आकार के समान ही इनका भी आकार है—
चतुरस्र, वृत्ताकार छः बिन्दु, अर्धचन्द्र तथा त्रिकोण—ये चार क्रमशः चार
पीठों के स्वरूप हैं ॥४२॥
चतुरस्र का अर्थ है चौकोर, कामरूप पीठ का आकार चौकोर है। पृथ्वी भी
चौकोर है, इस तरह से कामरूप पीठ पृथ्वी तत्त्व का प्रतिनिधि है। पूर्णगिरि पीठ का
आकार छः बिन्दुओं की गोलाई के समान है। वायुमण्डल का आकार चक्करदार छः
बिन्दुओं सरीखा होता है। अतः वायुतत्त्व के प्रतिनिधि इस पीठ का आकार भी वायु-
मण्डल सदृश है। जालन्धर पीठ अर्धचन्द्र सरीखा है। जलीय मण्डल का आकार
१'नाम' नास्ति-ख. ग. ने. ज. झ. ते.। २'संज्ञम्'-ज.। ३'देह'-ज.।
६० योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः
पीठोऽर्धचन्द्ररूपः, अप्स्तत्त्वमयः, 'अम्मण्डलस्यार्धचन्द्ररूपत्वात् । त्रिकोणम्
ओड्याणपीठस्त्रिकोणरूपः, तेजस्तत्त्वमयः, अग्निमण्डलस्य त्रिकोणरूपत्वात् ।
क्रमेण कामरूपादीनां पीठानामेतानि रूपाणीत्यर्थः । अत्र गगनतत्त्वस्यारूपत्वान्निर-
वयवत्वाच्चानुक्तिः ॥४२॥
पीठानामेव क्रमेण वर्णनाह—
पीतो धूम्रस्तथा श्वेतो रक्तो रूपं च कीर्तितम् ॥४३॥
पृथिवीवायुसलिलतेजसां क्रमेण पीतधूम्रश्वेतरक्तवर्णत्वात् पीठानामपि त एव
वर्णा इत्यर्थः । अवयवार्थः स्पष्टः । अत्र भूतानामक्रमः पीठानुसारेण । पीठानां
त्वाम्नायभेदेन क्रमस्य नियमात्^२ ॥४३॥
पीठेषु लिङ्गान्याह—
स्वयम्भूर्बाणलिङ्गं च इतरं च परं पुनः ।
पीठेष्वेतानि लिङ्गानि संस्थितानि वरानने ॥४४॥
अर्धचन्द्र के समान होता है, अतः जलतत्त्व के प्रतिनिधि जालन्धर पीठ का आकार भी
वैसा ही है। ओड्याण पीठ तिकोना होता है। अग्निमण्डल का आकार त्रिकोण-
सदृश बनता है, अतः तेजस्तत्त्व के प्रतिनिधि इस पीठ का आकार भी तिकोना माना
गया है। इस तरह से क्रमशः कामरूप आदि पीठों के ये स्वरूप हैं। गगनमण्डल रूप-
रहित और निरवयव होता है। इसलिये यहाँ उसका उल्लेख नहीं हुआ है ॥४२॥
अब इन पीठों के वर्ण (रंग) बताये जा रहे हैं—
पीत, धूम्र, श्वेत तथा रक्त—ये क्रमशः इन चार पीठों के वर्ण (रंग) होते
हैं ॥४३॥
पृथिवी, वायु, जल और तेज नामक तत्त्व क्रमशः पीत (पीला), धूम्र (मटमैला),
श्वेत (सफेद) और रक्त (लाल) वर्ण वाले होते हैं, अतः इन तत्त्वों के प्रतिनिधि उक्त
चार पीठों का भी वही रंग होता है। श्लोक के शब्दों का अर्थ स्पष्ट है। पृथिवी
प्रभृति चार भूतों की चर्चा यहाँ तत्त्वों के क्रम से न होकर पीठों के क्रम के अनुसार
है। पीठों का यह क्रम शास्त्रों में निश्चित है और प्रस्तुत प्रकरण पीठों से ही
संबद्ध है ॥४३॥
इन पीठों में लिंगों की स्थिति इस तरह से है—
हे वरानने ! उक्त पीठों में क्रमशः स्वयंभू, बाण, इतर और पर नामक लिंग
स्थित हैं ॥४४॥
१. 'अम्मण्डलं वार्धचन्द्रम्' २. नियमाद् इति पाठान्तरम् ।
प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ६१
लीनं बाह्येन्द्रियागोचरं चिद्रूपमर्थं गमयन्तीति लिङ्गानि । मनोऽहङ्कारबुद्धि-
चित्तात्मकानि कामरूपादीनि चित्स्फुरत्ताधारत्वात् पीठानि । एतेष्वन्तःकरण-
चतुष्टयरूपेषु तत्तद्वृत्तिचतुष्टयमयानि लिङ्गानि स्वयम्भ्वादीनि वसन्तीत्यर्थः ।
एतत्सर्वं सौभाग्यसुधोदये प्रपञ्चितम् । यथा—
पुनरेव कामपीठे तदग्रकोणस्थिते मनोरूपे ।
प्रतिफलितं तज्ज्योतिः स्वयम्भुलिङ्गं समीरितं सद्भिः ॥५।६॥
दक्षिणकोणेऽहङ्कृतिरूपे जालन्धरे तु संक्रान्तम् ।
परधाम बाणलिङ्गं^१ जातं संक्रान्त्युपाधिभेदवशात् ॥५।४॥
मध्यत्रिकोणकोणे वामे श्रीपूर्णपीठमेतस्मिन् ।
बुद्धिमये परतेजः प्रतिफलितं त्वितरलिङ्गतां यातम् ॥५।२॥
चित्तमये श्रीपीठे ज्योतिर्बिन्दौ^२ यदस्य संक्रान्तम् ।
प्रतिफलितं परधाम्नः परलिङ्गं तत् प्रकीर्त्यते प्राज्ञैः ॥४।१॥ इति॥४४॥
लीन अर्थात् बाह्य इन्द्रियों के अविषय चित्स्वरूप अर्थ का बोध कराने वाला तत्त्व
यहाँ लिंग नाम से कहा गया है । मन, अहंकार, बुद्धि और चित्त के प्रतिनिधि कामरूप
प्रभृति को पीठ इसलिये कहा जाता है कि इन्हीं के सहारे चित् तत्त्व का स्फुरण होता
है । इस तरह से इन चार अन्तःकरणों के प्रतिनिधि उक्त चार पीठों में इन अन्तः-
करणों की चार वृत्तियों के समान स्वयंभू प्रभृति चार लिंगों की स्थिति मानी जाती है ।
इस विषय को दीपिकाकार ने अपने दूसरे ग्रन्थ ^१सौभाग्यसुधोदय में समझाया है—
उस त्रिकोण के अग्रभाग की सीधी रेखा मनोमय कामरूप पीठ का प्रतिनिधित्व
करती है । इस स्थान पर परम प्रकाशमय महाबिन्दु का तेज जब पुनः प्रतिफलित होता
है, तो उससे स्वयंभू लिंग का आविर्भाव होता है । त्रिकोण के अहंकारमय दक्षिण कोण
में स्थित जालन्धर पीठ में जब यह तेज संक्रान्त होता है, तो वह उपाधि के भेद से भिन्न
आकार ग्रहण कर बाण लिंग के नाम से जाना जाता है । इसी मध्यत्रिकोण के बुद्धिमय
वाम कोण में स्थित पूर्णगिरि पीठ में जब यह परम प्रकाश प्रतिफलित होता है, तो वह
इतर लिंग के रूप में अभिव्यक्त होता है । चित्तमय ओड्याण पीठ की स्थिति त्रिकोण
१. लिङ्गाज्जातं-ग. उ. । २. विन्दोस्तदस्य-ग. ने. ज. झ. उ. ।
१. यह ग्रन्थ भी नित्याषोडशिकार्णव के परिशिष्ट भाग (पृ० ३०६-३२१) में
प्रकाशित हो चुका है। दीपिका के पूर्व संस्करणों में इस ग्रन्थ का नाम सौभाग्यसुभगोदय
दिया गया है। यह ठीक नहीं है। भास्करराय ने ललितासहस्रनाम के अपने सौभाग्य-
भास्कर नामक भाष्य (पृ० १००, १२२, १२५), वरिवस्यारहस्य (पृ० ६८) तथा
नित्याषोडशिकार्णवटीका सेतुबन्ध (पृ० २९१) में सौभाग्यसुधोदय के नाम से ही इसको
उद्धृत किया है। आनन्दवर्द्धन के अनुसार इसका रचनाकाल विक्रम संवत् १६७० (सन् १६१३ ई०) है।
६२ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः
लिङ्गानां स्वरूपं पीतादिवर्णान् वैखरीवर्णांश्च विभज्याह—
हेमबन्धूककुसुमशरच्चन्द्रनिभानि तु ।
स्वरावृतं त्रिकूटं च महालिङ्गं स्वयम्भुवम् ॥४५॥
कादितान्ताक्षरवृतं बाणलिङ्गं त्रिकोणकम् ।
कदम्बगोलकाकारं थादिसान्ताक्षरावृतम् ॥४६॥
सूक्ष्मरूपं समस्तार्णवृतं परमलिङ्गकम् ।
बिन्दुरूपं परानन्दकन्दं नित्यपदोदितम् ॥४७॥
हेमनिभं पीतवर्णम्, त्रिकूटं बिन्दुत्रयकूटरूपम्, स्वरावृतम् अकारादिषोडश-
स्वरावृतं स्वयम्भुलिङ्गम्। बन्धूककुसुमनिभं रक्तवर्णं त्रिकोणरूपं कादितान्ता-
ऽक्षरवृतं बाणलिङ्गम्। शरच्चन्द्रनिभं श्वेतवर्णं कदम्बगोलकाकारं कदम्बकुसुम-
गोलकरूपं थादिसान्ताक्षरावृतम् इतरलिङ्गम्। परलिङ्गस्य परतेजोरूपत्वा-
के बीच में स्थित बिन्दु में मानी गई है। इस श्रीपीठ में विद्यमान ज्योतिर्बिन्दु में जब
परप्रकाशमय तेज संक्रान्त होता है, तो उससे परलिंग की अभिव्यक्ति होती है ॥४४॥
अब इन लिंगों का स्वरूप, पीत आदि रंग और वैखरी वाणी के वर्णों की उनमें
स्थिति बताई जा रही है—
सुवर्ण सदृश पीला रंग, बन्धूक पुष्प के सदृश लाल रंग और शरच्चन्द्र के
समान सफेद रंग क्रमशः स्वयंभू, बाण और इतर लिंग का होता है। स्वयंभू
नामक महालिंग तीन शिखरों जैसे आकार वाला और १६ स्वरों से घिरा हुआ
है। बाण लिंग त्रिकोण सदृश आकार वाला और क से त पर्यन्त १६ अक्षरों से
घिरा हुआ है। इतर लिंग कदम्ब के फल के सदृश गोल आकार वाला और थ
से स पर्यन्त १६ अक्षरों से घिरा हुआ है। पर लिंग अत्यन्त सूक्ष्म स्वरूप वाला
है, अतः बिन्दु से इसका बोध कराया जाता है। यह समस्त वर्णों से आवृत है।
यह परमानन्द का सार तथा नित्य पद से उदित माना जाता है ॥४५-४७॥
सुवर्ण के समान चमक लिये हुए पीले रंग का, तीन बिन्दुओं से बने तीन शिखर
सदृश आकृति वाला, अकार से अःकार पर्यन्त १६ स्वरों से घिरा हुआ है स्वयंभू लिंग।
बन्धूक के पुष्प के समान लाल रंग का त्रिकोण सरीखो आकृति वाला क से त पर्यन्त १६
अक्षरों से घिरा हुआ है बाण लिंग। शरत्पूर्णिमा के चाँद के समान चटकीले सफेद रंग
का, कदम्ब के फूल के समान गोल आकार वाला थ से स पर्यन्त १६ अक्षरों से आवृत
है इतर लिंग। पर लिंग परम तेजस्वी है, अतः इसका कोई वर्ण नहीं होता। इसका
प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ६३
दवर्णत्वम् । अतः सूक्ष्मरूपमनिन्द्रियगोचरम् । अत एव बिन्दुरूपं समस्तार्णवृतम्
आदिक्षान्तपञ्चाशदक्षरवृतं परलिङ्गं परानन्दकन्दं पराया अक्षररूपायाः पश्य-
न्त्यादिशाखावत्या लताया आनन्दमयं कन्दं नित्यपदोदितम्, नित्यत्वं च मातृ-
१काया उत्पत्तिविनाशरहितत्वात् । पदाद् विश्वमुमुक्षुमनःप्राप्यात्, उदितं प्रथम-
स्पन्दरूपतया ॥४५-४७॥
२एतानि सर्वाण्यपि बीजत्रितययुक्तायास्तुरीयविद्याया वाच्यरूपाणीत्याह—
बीजत्रितययुक्तस्य सकलस्य मनोः पुनः ।
एतानि वाच्यरूपाणि कुलकौलमयानि तु ॥४८॥
एतानि शक्तिचतुष्टयं मातृकाचतुष्टयं मध्यकोणचतुष्टयं पीठचतुष्टयं लिङ्ग-
चतुष्टयं चेत्येतानि सर्वाणि बीजत्रितययुक्तस्य सकलस्य मनोर्वाग्भवकामराजशक्ति-
बीजसमेतायास्तत्समष्टिरूपायास्तुरीयविद्याया वाच्यरूपाणि । विद्या वाचिका,
एतानि सर्वाणि वाच्यानि । अत एव तच्चतुष्टयरूपिणीयं विद्येत्यर्थः, वाच्यवाच-
कयोरभेदात् । कुलं मेयमानमातृलक्षणम्, कौलं तत्समष्टिः । तन्मयानीत्यर्थः ॥४८॥
आकार अत्यन्त सूक्ष्म है, अतः इसका इन्द्रियों से साक्षात्कार नहीं हो सकता ।
इसीलिये इसको बिन्दुस्वरूप माना गया है । यह पर लिंग अकार से क्षकार पर्यन्त समस्त
५० वर्णों से आवृत है । यह पर लिंग परानन्दकन्द और नित्यपदोदित है, अर्थात् अक्षर
स्वरूप परा वाणी और पश्यन्ती आदि शाखा वाली लता का यह आनन्दमय सार है ।
परा मातृका का स्वरूप उत्पत्ति और विनाश से रहित होने से नित्य कहलाता है ।
इस नित्य पद का साक्षात्कार विश्व से मुक्ति की कामना वाले योगी के मन में ही हो सकता
है, अर्थात् ऐसे ही योगी के मन में इस पर लिंग का प्रथम स्पन्दन होता है ॥४५-४७॥
अब ऊपर बताये गये सभी प्रकार तीन बीजों वाली तुरीय (चतुर्थ) श्रीविद्या के
ही वाच्य स्वरूप हैं, इस विषय को यहाँ समझाया जा रहा है—
ऊपर बताये गये शक्ति, मातृका आदि के चार-चार समस्त कुलकौलमय
भेद तीन बीजों वाली और सकल स्वरूप वाली श्रीविद्या से ही बोधित
होते हैं ॥४८॥
अभी ऊपर अम्बिका तथा शान्ता आदि चार शक्तियों का, परा आदि चार वाणियों
का, मध्य बिन्दु और त्रिकोण को मिलाकर मध्यकोणचतुष्टय का, चार पीठ और चार
लिंगों का वर्णन किया गया है । यह सब वाग्भव, कामराज और शक्ति बीज वाली तथा
समष्टिरूपिणी सकलस्वरूपिणी तुरीया श्रीविद्या के वाच्य हैं। श्रीविद्या इनकी वाचिका
और ये सब उसके द्वारा बोधित होते हैं । इस तरह से उक्त चारों रूपों में यह श्रीविद्या
१. कात्वात्-ख. झ. उ., कारूपत्वात्-ज. । २. 'एतानि' नास्ति-ख. ग. ने. ज.