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योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३५
अधश्चोर्ध्वं सुषुम्नायाः सहस्रदलसंयुक्तम् ।
रक्तं श्वेतं च साहस्रदलस्थं शक्तिभिर्वृतम् ॥
ऊर्ध्वाधोमुखमीशानि कर्णिकाकेसरान्वितम् ।
शक्तिरूपं महादेवि २कुलाकुलमयं शुभम् ॥
पङ्कजद्वयमीशानि स्थितं शाश्वतमव्ययम् ।
तयोर्मध्ये सुषुम्नान्तस्त्रिंशदाधारपङ्कजम् ॥
शक्तिरूपं शिवाकारं शर्वाण्याः सन्निजालयम् ।
तेषां रूपं क्रियां चैव ४क्रमाद् वक्ष्येऽधुना शृणु ॥
गुदमेढ्रान्तरं देवि पञ्चाङ्गुलसमुच्छ्रितम्५ ।
६कन्दमेकाङ्गुलं मध्ये द्वयाङ्गुलविसारणम् ॥
तस्य ७मध्ये महायोनिस्त्रिकोणाकाररूपिणी ।
सुषुम्ना योनिमध्यस्था तस्या मूले महेश्वरि ॥
अधःपद्मं सहस्रारं कर्णिकाकेसरान्वितम् ।
तैजसं ८रत्नसंदोप्तं तद्दलस्थितशक्तिभिः ॥
सुषुम्ना के नीचे और ऊपर सहस्रदल से संयुक्त रक्त और श्वेत वर्ण के दो पद्म हैं।
हे ईशानि ! रक्तदल पद्म का मुँह ऊपर की तरफ तथा श्वेतदल पद्म का मुख नीचे
की ओर है। ये दोनों पद्म शक्तिसमूह से आवृत हैं, कर्णिका और केसर से संयुक्त हैं।
हे महादेवि ! शक्तिस्वरूप कुलाकुलमय ये शुभ पंकज शाश्वत और अव्यय हैं। इनकी यही
स्थिति सदा बनी रहती है, अपनी इस स्थिति से ये कभी च्युत नहीं होते। इन दोनों
पद्मों के बीच में सुषुम्ना के भीतर ३० आधार पंकज माने गये हैं। ये शिवशक्तिस्वरूप
हैं और इनमें भगवती शर्वाणी (पार्वती) निवास करती हैं। इन आधार पंकजों के स्वरूप
और कार्य को अब मैं बताता हूँ, तुम सुनो। हे देवि ! गुदा और मेढ्र (लिंग) के बीच में
पाँच अंगुल की ऊँची जगह है। इसके बीच में एक अंगुल के ऊँचे और दो अंगुल विस्तार
वाले स्थान को कन्द कहते हैं। इस कन्द स्थान के मध्य में त्रिकोण सदृश आकार वाली
महायोनि विराजमान है। इस योनि के मध्य में सुषुम्ना नाडी अवस्थित है। हे महेश्वरि
इसी सुषुम्ना नाडी के मूल में कर्णिका और केसर से संयुक्त नीचे वाला रक्तदल सहस्रार
पद्म विराजमान है। यह तेजोमय पंकज रत्नों की प्रभा के समान उज्ज्वल है। हे प्रिये !
१. इतः परम्—'पर्वाङ्गुलसमुच्छ्रयम् । गुदमेकाङ्गुलं मध्ये' इत्यधिकं—ने. ज. उ. ।
२. द्वयाङ्गुलकुलाकुलम्—ज. । ३. सर्वेभ्यो मत्प्रियालयम्—क., सर्वाभ्यासनिजालयम्—ख.
ने. झ. । ४. क्रमं—ख. ग. ने. ज. झ. । ५. द्वयम्—ने. ज. उ. । ६. गुद—ख. ग. घ.
ने. ज. झ. उ. । ७. मले—ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ८. रक्तवह्नीप्तं—घ. ने. ज. झ. उ. ।

प्रतिकिञ्जल्कसंस्थाभिः शक्तिभिः संवृतं प्रिये ।
कर्णिकामध्यतो देवि कुलदेवी च संस्थिता ॥
तत्पद्मोर्ध्वं सुषुम्नाया मध्ये त्वेकाङ्गुलोपरि ॥
पद्ममष्टदलेर्युक्तमष्टग्रन्थिसमन्वितम् ॥
रक्तं सुकर्णिकोपेतं रक्तकिञ्जल्कशोभितम् ।
ग्रन्थ्यग्रस्थत्रिशृङ्गं¹ च ब्रह्माण्याद्यष्टभैरवैः ॥
अष्टपत्रस्थितग्रन्थिस्थित²वामादिशक्तिभिः ।
तदन्यशक्तिभिश्चैव शृङ्गस्थाभिः समावृतम् ॥
तन्मध्ये कौलशक्त्या तु सेवितं च स्मरेत् ततः ।
एकाङ्गुलप्रमाणोर्ध्वं षड्दलं कुलपङ्कजम् ॥ इति ।
ननु कुलादन्यदकुलमिति चेदर्थस्तर्हि तदन्तरालस्थिताऽष्टदलपद्मस्याप्यकुलत्वं
किं न स्यादित्यत आह—विषुसंज्ञे चेति । "विषॢ व्याप्तौ" (१०९५ जु०) । यत्
पंकज के प्रत्येक दल और केसर में विभिन्न शक्तियों का निवास है और हे देवि ! कर्णिका
के मध्य में कुलदेवी विराजमान हैं ॥
इस पद्म के एक अंगुल ऊपर सुषुम्ना नाडी के मध्य में आठ दल और आठ ग्रन्थियों
से युक्त लाल वर्ण का पद्म है । इसकी कर्णिका सुन्दर है और यह लाल वर्ण की केसर से
सुशोभित है । प्रत्येक ग्रन्थि के अग्र भाग में त्रिकोण है और उनमें ¹आठ भैरवों के साथ आठ
ब्रह्माणी प्रभृति देवियाँ विराजमान हैं । आठ दलों की ग्रन्थियों में वामा प्रभृति आठ शक्तियाँ
विराजमान हैं और शृंग (केसर) में भी अनेक शक्तियों का निवास है । इन सबके बीच
का स्थान कौल शक्ति से सेवित है, अर्थात् इस कमल की कर्णिका में कौल शक्ति निवास
करती है । इस अष्टदल कमल से एक अंगुल ऊपर छः दल वाला कुल पंकज अवस्थित है ॥
यहाँ प्रश्न होता है कि ऊपर कुलचक्र से भिन्न चक्र को अकुल कहा गया है,
इसके अनुसार दोनों के बीच में विद्यमान अष्टदल पद्म की भी अकुल संज्ञा हो जायगी ।
इसका समाधान यह है कि इसी आशंका की निवृत्ति के लिये 'अकुले' पद का 'विषुसंज्ञे'²
१. शृङ्गाग्रे-घ., शूलं च-उ. । २. वर्गादि-ख, ग, घ, ज, झ, ।

  1. असिताङ्ग, रुरु, चण्ड, क्रोध, उन्मत्त, कपाली, भीषण और संहार नामक आठ
    भैरव तथा ब्रह्माणी, माहेशी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इन्द्राणी, चामुण्डा और महालक्ष्मी
    नामक आठ देवियाँ मानी जाती हैं। वामा, ज्येष्ठा, रौद्री, कलविकरणी, बलविकरणी,
    बलप्रमथिनी, सर्वभूतदमनी और मनोन्मनी—ये आठ वामा प्रभृति शक्तियाँ हैं।
  2. अमृतानन्द ने यहाँ आठ ही स्थान माने हैं, जब कि भास्करराय को नौ स्थान
    अभिप्रेत हैं। इसीलिये वे अकुल से विषु चक्र की स्थिति भिन्न मानते हैं। उनका अनुमान
    है कि स्वच्छन्दसंग्रह में निर्दिष्ट अष्टदल और षड्दल कमलों में से कोई एक प्राचीन तन्त्रों

प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३७
सुषुम्नां तदन्तर्गतत्रिंशत्पङ्कजानि च व्याप्नोति, तत्सहस्रदलकमलं विषुवम्¹,
²तस्य सर्वाधारत्वात्। ततो नाष्टदलकमलमकुलमित्यर्थः।
शाक्ते वह्नाविति। अत्र वह्नौ शाक्त इति व्यत्ययेन पठितव्यम्। वह्निर्मूला-
धारः, वह्निबिम्बाधारत्वात्। तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे—
आधारपङ्कजं पीतं चतुष्पत्रं सुकेसरम्।
अधोमुखं च तन्मध्ये कुण्डली परमेश्वरी³ ॥
स्वयम्भुमध्यगा चिन्त्या वरदादिभिरावृता⁴।
पार्थिवं पङ्कजं ह्येतत् तस्योर्ध्वं⁵ पङ्कजं परम्॥
यह विशेषण दिया गया है। 'विष्लृ' धातु का अर्थ व्याप्ति होता है। जो चक्र सुषुम्ना
नाडी और उसके मध्य में विद्यमान ३० पंकजों में व्याप्त है, वह सहस्रदल कमल विषुव
कहलाता है, क्योंकि वही इन सबका आधार है। अष्टदल कमल इन सबमें व्याप्त नहीं है,
अतः इसको अकुल (विषुव) नहीं कहा जायगा।
'शाक्ते वह्नौ' इसको 'वह्नौ शाक्ते' इस क्रम से पढ़ना चाहिये। वह्नि शब्द से मूला-
धार चक्र गृहीत होता है, क्योंकि यही वह्निबिम्ब का आधार है, जैसा कि स्वच्छन्दसंग्रह
में वर्णित है—
आधार पंकज पीत वर्ण का चार दल वाला और सुन्दर केसर से संयुक्त है। यह
चक्र अधोमुख है। इस चक्र के मध्य में स्वयम्भू लिंग विराजमान है। उस स्वयम्भू
लिंग के बीच में ²वरदा प्रभृति शक्तियों से घिरी हुई भगवती कुण्डलिनी का ध्यान
१. विषुवत्-ने.। २. 'तस्य' नास्ति-ग. ने. ज. झ. उ.। ३. इतः परम्-'तदुक्तं
गोरक्षसंहितायाम्-योनिमध्ये महालिङ्गं पश्चिमाभिमुखं त्वधः। मस्तके मणिवद् भिन्नं यो
जानाति स योगवित्॥' इत्याधिकः पाठः-ग. उ.। ४. इतः परम्-'पृथिवीमण्डलं पीतं
चतुरस्रं सुशोभनम्। तप्तचामीकराभासं तडिल्लेखेव विस्फुरत्॥ चतुरस्रं पुरं वह्नेरधो
मैत्रादवस्थितम्। इति गोरक्षे' इत्याधिकः पाठः-ग. उ.। ५. तस्याधः-घ. ने. ज. झ. उ.।
में विषु नाम से जाना जाता था। उनका यह अनुमान सही लगता है। दीपिकाकार ने
अष्टदल पद्म का विशेष वर्णन किया है, षड्दल का केवल संक्षेप में उल्लेख कर दिया है।
अतः अष्टदल पद्म की ही विषु संज्ञा होनी चाहिये। इस विषय पर उपोद्घात में विशेष
चर्चा की जायगी। सकलनिष्कल भावना जैसे बिन्दु से उन्मना पर्यन्त नौ कलाओं में की
जाती है, उसी तरह से सकल भावना के भी नौ ही स्थान होने चाहिये। आगे (३।१४२-
१४४) स्वयं दीपिकाकार ने स्वच्छन्दसंग्रह के एक वचन को उद्धृत किया है, जिसमें
नवाधार तथा षट्‌चक्रों का स्पष्ट उल्लेख है। छः चक्रों का उल्लेख मूलग्रन्थ (३।३०) में
भी मिलता है।
१. व श ष स इन चार अक्षरों की अधिष्ठात्री वरदा, श्री, षण्ढा और सरस्वती
नाम्नी चार शक्तियों का ध्यान यहाँ विहित किया गया है।

३८ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः
तैजसं परमेशानि तन्मध्य^१स्थितशक्तयः ।
निष्कलाः परमेशानि विद्युत्पुञ्जनिभाः स्मरेत् ॥
तदूर्ध्वे कर्णिकामध्ये वह्निबिम्बं तदूर्ध्वगम् ।
पूर्णपीठं च ^२तन्मध्ये शाकिनी संस्थिता शिवे ॥ इति ।
शाक्ते, शक्तिः हृल्लेखा, तदूर्ध्वस्थितत्वाच्छाक्तं^३ स्वाधिष्ठानं ^४षडस्र-
कमलम् । तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे—
आधारपङ्कजस्योर्ध्वे सार्धद्वयङ्गुलकोपरि ।
तैजसं साष्टपत्रं च पीतकर्णिकया युतम् ॥
हृल्लेखाकर्णिकामध्ये स्थितानङ्गादिसेविते^५ ।
एतस्माद् द्व्यङ्गुलादूर्ध्वं स्वाधिष्ठानं षडस्रकम् ॥
आप्यं च ^६बन्दिनीशक्तिपूर्वाभिः शक्तिभिर्वृतम्^७ ।
काकिनीमभिसंचिन्त्य ... .... ॥ इति ।
किया जाता है। यह पंकज पृथ्वी तत्त्व का प्रतिनिधि है। इसके ऊपर दूसरा तैजस पंकज
विद्यमान है। हे परमेश्वरि ! इस चक्र में विद्युत्पुंज के समान देदीप्यमान निष्कल शक्तियों
का ध्यान करना चाहिये । इस चक्र पर कर्णिका के मध्य में वह्निबिम्ब विद्यमान है और
इसके ऊपर पूर्णगिरि पीठ है । हे शिवे ! यहाँ शाकिनी देवी निवास करती हैं।
शक्ति हृल्लेखा को कहते हैं। ऊपर वर्णित वह्निचक्र के ऊपर विद्यमान शाक्त षड्-
दल कमल स्वाधिष्ठान के नाम से प्रसिद्ध है। स्वच्छन्दसंग्रह में यह इस तरह से
वर्णित है—
आधार पंकज से ढाई अंगुल के ऊपर तैजस कमल विद्यमान है। यह आठ दल
वाला और पीतवर्ण की कर्णिका से युक्त है। इसकी कर्णिका में हृल्लेखा विद्यमान है और
उसमें ^१अनङ्गा प्रभृति शक्तियाँ निवास करती हैं। इस अष्टदल चक्र से दो अंगुल ऊपर
षड्दल स्वाधिष्ठान चक्र स्थित है। यह जल तत्त्व का प्रतिनिधि है। इसमें ^२बन्दिनी
प्रभृति शक्तियों से घिरी हुई काकिनी देवी का ध्यान किया जाता है।
१. मध्ये सित-ग. घ. ने. ज. झ. उ. । २. तस्योर्ध्वे-ख. ग. घ. ने. झ. उ. ।
३. शाक्तस्याधिष्ठानं-ग. ने. । ४. 'षडस्रकमलम्' नास्ति-ख. ग. घ. ने. ज. उ. ।
५. देवता-ख. । ६. वशिनी-ग. घ. ने. उ. । ७. वृतम्-ग. घ. ज. उ. ।
१. नित्याषोडशिकार्णव (१।१७७-१७८) में वर्णित अनङ्गकुसुमा आदि आठ देवियों
को यहाँ स्मरण किया गया लगता है।
२. ब भ म य र ल इन छः अक्षरों की अधिष्ठात्री बन्दिनो, भद्रकाली, महामाया,
यशस्विनी, रक्ता और लम्बौष्ठिका नामक देवियों का ध्यान यहाँ किया जाता है।

प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३९
नाभौ १दशदलकमले मणिपूरके। तदुक्तं तत्रैव—
नाभि२स्त्र्यर्धाङ्गुलोपरि।
तत्पद्मं मणिपूरं च दशपत्रं सुशोभनम्३ ॥
लाकिनीमध्यगं तच्च डामर्यादिभिरावृतम्। इति।
अनाहते हृदयस्थाने द्वादशदलकमले। तदुक्तं तत्रैव—
चतुर्दशाङ्गुलादूर्ध्वं४ मणिपूराख्यपङ्कजात्।
पङ्कजं राकिनीमध्यं द्वादशारमनाहतम्॥
तत्रस्थकालरात्र्यादिशक्तिभिश्च समावृतम्।
तत्रस्थसूर्यबिम्बं५ तु ६नादोड्ड्यानाख्यपीठकम्॥ इति।
शुद्धे कण्ठस्थितषोडशदलकमले। तदुक्तं तत्रैव—
तस्मादेकाङ्गुलादूर्ध्वं विशुद्धं षोडशारकम्।
मध्यगा डाकिनी बाह्यपत्रेषु परमेश्वरि७ ॥
अमृताद्यक्षरान्त८स्थाश्चन्द्रबिम्बं तदूर्ध्वतः। इति।
नाभि शब्द से दस दल वाले मणिपूर चक्र का ग्रहण होता है। इस चक्र का भी
स्वच्छन्दसंग्रह में ही इस तरह से वर्णन है—
स्वाधिष्ठान चक्र से साढ़े तीन अंगुल ऊपर नाभिपद्म है। दस दल वाला यह सुन्दर
पद्म मणिपूर कहलाता है। इसमें १डामरी प्रभृति शक्तियों से घिरी हुई लाकिनी देवी का
ध्यान किया जाता है॥
बारह दल वाला हृदय स्थित कमल अनाहत कहलाता है। स्वच्छन्दसंग्रह में इसका
भी वर्णन किया गया है—
मणिपूर पंकज से १४ अंगुल ऊपर विद्यमान द्वादश दल कमल अनाहत कहलाता है।
इसमें २कालरात्रि आदि शक्तियों से घिरी हुई राकिनी देवी का ध्यान किया जाता है। इसी
चक्र में सूर्यबिम्ब के प्रतिनिधि नादमय उ(ओ)ड्ड्यान पीठ की स्थिति मानी जाती है॥
कण्ठस्थित षोडश दल कमल शुद्ध अर्थात् विशुद्धि चक्र के नाम से प्रसिद्ध है। इसका
भी वर्णन वहाँ इस तरह से किया गया है—
इससे एक अंगुल ऊपर षोडश दल वाला विशुद्ध चक्र है। इस चक्र के मध्य में
१. दशार-क. घ. ज. झ.। २. नाभेरष्टा-ग. घ. ज. झ. उ.। ३. भितम्-ग. घ.
ने. ज. झ. उ.। ४. दूर्ध्वं-ग. ज. उ.। ५. बिम्बे-ख. झ. उ.। ६. ओडीयाना-ग.।
७. श्वरी-क. ग. ने.। ८. रान्ताश्च-क. ने ।
१. ड से फ पर्यन्त दस अक्षरों की अधिष्ठात्री डामरी आदि फट्कारी पर्यन्त देवियों
का ध्यान यहाँ निहित है।
२. क से ठ पर्यन्त बारह अक्षरों की अधिष्ठात्री कालरात्रि आदि ठंकारी पर्यन्त
शक्तियों का ध्यान यहाँ करना चाहिये।

४० योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः
लम्बिकाग्रे अष्टदलकमले। तदुक्तं तत्रैव—
कण्ठोर्ध्वं परमेशानि लम्बिका चतुरङ्गुले।
तस्यामष्टदलं पद्मं १वशिन्यादिभिरावृतम्॥ इति।
भ्रुवोऽन्तरे आज्ञायां द्विदलकमले। तदुक्तं तत्रैव—
आज्ञाधारं द्विपत्राब्जं हक्षद्विदलसंयुतम्।
हंसवतीक्षमापार्श्वं२ तयोर्मध्ये तु हाकिनी॥ इति।
भ्रुव इत्येकवचनं भ्रूद्वयोपलक्षणम्। भ्रुवोरन्तर इत्यर्थः। इन्दौ बिन्दौ।
बिन्दुत्तदर्धरोधिनीनादनादान्तशक्तिव्यापिकासमनोन्मनीनामुपर्य्युपरि रूपाण्युच्चा-
रणकालं च वक्ष्यति। ३महाबिन्दौ परसादाख्ये४ देशकालरूपवर्जिते५।
डाकिनी देवी और बाह्य दलों में हे परमेश्वरि! सोलह स्वरों की अधिष्ठात्री १अमृता
आदि शक्तियाँ विराजमान हैं। इन सबके ऊपर चन्द्रबिम्ब है॥
लम्बिकाग्र शब्द से अष्टदल कमल का ग्रहण होता है। इसका भी वर्णन वहाँ इस
तरह से मिलता है—
हे परमेशानि! कण्ठ से चार अंगुल ऊपर लम्बिका स्थित है। इसमें २वशिनी आदि-
देवियों से आवृत अष्टदल पद्म है॥
'भ्रुवोऽन्तरे' शब्द का अर्थ दो दल वाला आज्ञा चक्र है। इसका भी वर्णन वहीं किया
गया है—
आज्ञाधार अर्थात् आज्ञा चक्र दो दल वाला है। ये दोनों दल ह और क्ष अक्षरों से
सुशोभित हैं। इस चक्र में हाकिनी देवी का निवास है तथा हंसवती और क्षमा३ नामक
शक्तियाँ इसके दोनों तरफ विद्यमान हैं॥
'भ्रुवोऽन्तरे' यहाँ एकवचन होते हुए भी वह द्विवचन का बोध कराता है। वास्तव
में 'भ्रुवोरन्तरे' ऐसा पाठ होना चाहिए। यहाँ छन्द की दृष्टि से 'भ्रुवोऽन्तरे'
यह पाठ कर दिया गया है। इन्दु शब्द से बिन्दु का ग्रहण होता है। बिन्दु,
अर्धचन्द्र, रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिका, समना और उन्मना की एक से दूसरे
के ऊपर स्थिति, स्वरूप और उनके उच्चारण का काल अभी आगे (१।२८-३४) बताया
१. वशिका-ने. ज. उ.। २. पार्श्वद्वयं-ख. ने. ज. झ. उ.। ३. 'महाबिन्दौ' नास्ति-
घ. ने. ज. उ.। ४. सादाख्यो-ख. ज.। ५. विवर्जितः-ख. ने. ज. उ.।
१. सोलह स्वरों की अधिष्ठात्री अमृता आदि सोलह शक्तियों के नाम स्वच्छन्द-
संग्रह के प्रमाण से योगिनीहृदयदीपिका (३।३४) में देखे जा सकते हैं। अनङ्गा आदि
आठ देवियों को छोड़कर वरदा आदि देवियों के नाम भी यहाँ स्वच्छन्दसंग्रह के उक्त
वचन के प्रमाण पर ही दिये गये हैं।
२. नित्याषाडशिकार्णव (१।७७-७९) में वर्णित वशिनी आदि आठ देवियों का यहाँ
स्मरण किया गया लगता है। ये नाम यहाँ दीपिका (३।६३) में भी देखे जा सकते हैं।
दीपिका (३।२९) के उक्त उद्धरण में इन देवियों के भी नाम हैं।

प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ४१
बिन्द्वाद्युन्मन्यन्ता भागाः सूक्ष्माः सूक्ष्मतराः स्वदेहचक्रविद्यानां साधारणाः ।
१कोऽर्थः ? अत्र त्रैलोक्यमोहना२दिबिन्द्वन्तान् स्थूलसूक्ष्मसूक्ष्मतरान् चक्रभागान्-
कुलाद्युन्मन्यन्तेषु स्थूलसूक्ष्मसूक्ष्मतरेषु भागेषु महाबिन्दौ च विभावये-
दित्यर्थः ॥२५-२६॥
पुनरपि त्रैविध्यमाह—
पुनश्चैवं त्रिधा चक्रं तु भावयेत् ।
एवमुक्तप्रकारेण विभावितं चक्रं पुनस्त्रिधा ३भावयेत् ।
त्रैविध्यमाह—
आज्ञान्तं सकलं प्रोक्तं ततः सकलनिष्कलम् ॥२७॥
उन्मन्यन्तं परे स्थाने निष्कलं च त्रिधा स्थितम् ।
आज्ञान्तम् अकुलाद्याज्ञापर्यन्तं चतुरस्रादित्रिकोणान्तं चक्राष्टकं स्थूलं भाव-
येत् । तद्भावनं सकलम् । ततो बिन्दुमारभ्य उन्मन्यन्तं ४चक्रसूक्ष्मसूक्ष्मतरभागान्
जायगा । महाबिन्दु से देश, काल और रूप से रहित परसादाख्य तत्त्व का ग्रहण होता
है । बिन्दु से लेकर उन्मना पर्यन्त भाग सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होते जाते हैं और इनकी स्थिति
साधक के शरीर में, श्रीचक्र में और श्रीविद्या में भी एक जैसी है। इसका अभिप्राय यह
है कि त्रैलोक्यमोहन चक्र से लेकर बिन्दु पर्यन्त चक्रों के स्थूल, सूक्ष्म और सूक्ष्मतर भागों
की अकुल से लेकर उन्मनी पर्यन्त सूक्ष्म और सूक्ष्मतर भागों में तथा महाबिन्दु में भावना
करनी चाहिये ॥२५-२६॥
इस चक्र की पुनः त्रिविध भावना का उपदेश करते हैं—
इस चक्र की पुनः त्रिविध भावना करनी चाहिये ।
उक्त (१।२५-२६) प्रकार से विभावित चक्र को पुनः तीन तरह से भावना करनी
चाहिये ।
इस त्रिविधता का ही वर्णन आगे किया जाता है—
आज्ञा पर्यन्त चक्र की सकल रूप में, उन्मनी पर्यन्त चक्र की सकल-निष्कल
रूप में और परस्थान (महाबिन्दु) की निष्कल रूप में, इस तरह से इस श्रीचक्र
की पुनः त्रिविध भावना करनी चाहिये ॥२७॥
अकुल से आज्ञा पर्यन्त १आठ स्थानों में चतुरस्र से त्रिकोण पर्यन्त आठ चक्रों की
स्थूल रूप में भावना करनी चाहिये । इसको सकल उपासना कहते हैं । तब बिन्दु से
१. 'कोऽर्थः' नास्ति-ख. ग. घ. ज. झ. उ. । २. नाद्युन्मन्यन्तान्—ख. ग. ने. ज.
डा. उ. । ३. विभाव-क. झ. उ. । ४. सूक्ष्मसूक्ष्मतरचक्रभागान्-क. ग. ।
१. पृ० ३६ की टिप्पणी २ देखिये । तदनुसार अकुल से आज्ञा पर्यन्त नौ चक्रों में
चतुरस्र से बिन्दु पर्यन्त नौ चक्रों की भावना करनी चाहिये ।

४२ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः
भावयेत् । तद्भावनं सकलनिष्कलम् । १परे स्थाने महाबिन्दौ शुद्धशून्यसंविदं भाव-
येत् । तद्भावनं निष्कलम् । २एवं त्रिधा स्थितम् । अकुलाद्याज्ञान्तास्तन्त्रान्तरेषु
विस्तरेणोक्ताः, अतो नात्रोक्ताः ॥२७॥
बैन्दवाद्युन्मन्यन्तानां स्वरूप३मुच्चारणकालं स्थानं चाह "दीपाकारः" इत्या-
दिना "मनोन्मनी" इत्यन्तेन (श्लो० २८-३४)—
दीपाकारोऽर्धमात्रश्च ललाटे वृत्त इष्यते ॥२८॥
दीपाकारः, दीपस्य यादृशं भासनं तादृशमस्येत्यर्थः । अर्धमात्रः । ह्रस्वस्यो-
च्चारणकालो मात्रेत्युच्यते । मात्राया अर्धमुच्चारणकालो यस्य सोऽर्धमात्रः ।
ललाटे वृत्त इष्यते । वर्त्तुलसंनिवेशो ललाटे भ्रुवोरुपरिभागे । दीपाकारोऽर्धमात्रो-
लेकर उन्मना पर्यन्त स्थानों में चक्र के सूक्ष्म से सूक्ष्मतर भागों की भावना करनी चाहिये ।
यह भावना सकल-निष्कल कहलाती है । परम स्थान महाबिन्दु में शुद्ध शून्य संवित्ति की
भावना करनी चाहिये । इस भावना को निष्कल कहते हैं । इस तरह से इन तीन
भावनाओं के आधार पर चक्र की त्रिविध स्थिति मानी जाती है । अकुल से आज्ञा पर्यन्त
चक्रों का अन्य तन्त्रों में १विस्तार से वर्णन मिलता है, अतः यहाँ (योगिनीहृदय में)
उनका वर्णन नहीं किया गया है ॥२७॥
अब बिन्दु से उन्मना पर्यन्त नाद कलाओं का स्वरूप, उच्चारण काल तथा स्थान का
वर्णन २८ से ३४ पर्यन्त श्लोकों में किया जा रहा है—
बिन्दु का स्वरूप दीपक सदृश भासमान वृत्ताकार है । उच्चारण का काल
अर्धमात्रा और स्थान इसका ललाट है ॥२८॥
दीपाकार का अर्थ है दीपक के सदृश भासमान । ह्रस्व स्वर के उच्चारण में जो
समय लगता है, उसको मात्रा कहते हैं । इस बिन्दु के उच्चारण का काल उसका आधा
है । दोनों भौंहों के ऊपर ललाट के बीच में गोल आकार वाला यह बिन्दु स्थित है ।
इसका आशय यह हुआ कि यह बिन्दु दीपक के सदृश उज्ज्वल तथा गोल आकार वाला है,
१. तत्रानुत्पन्ना निष्पन्दा वाक् शून्यसंविदुत्पत्त्यवस्था सूक्ष्मा मूलाधारात् प्रथममुदिते
परापरे स्थाने—ग. ज. झ. उ. । २. 'एवं' नास्ति—ख. ग. । ३. मुच्चारकालं चाह—ख.
ग. घ. उ. ।

  1. योगिनीहृदयदीपिका में उद्धृत स्वच्छन्दसंग्रह के वचनों में यह विषय विस्तार से
    वर्णित है । दीपिकाकार ने योगिनीहृदय वर्णित नौ चक्रों से संबद्ध वचन ही प्रायः उद्धृत
    किये हैं । दीपिका में उद्धृत उक्त ग्रन्थ के उद्धरणों के अनुसार उसमें कुल और
    अकुल नामक दो सहस्रदल कमलों के बीच में ३० आधार पद्मों का वर्णन किया गया है ।
    यह वर्णन अन्यत्र देखने को नहीं मिलता । यह महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ आज अनुपलब्ध है । इसकी
    खोज होनी चाहिये ।

प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ४३
च्चारणकालो वृत्तसंनिवेशो बिन्दुरित्यर्थः । बिन्द्रादीनां तु विस्तारः स्वच्छन्दसंग्रहे
प्रपञ्चितः । तत्र बिन्दोर्यथा—
बिन्द्रावरणमूर्ध्वतः ।
सूर्यकोटिप्रतीकाशमतिदीप्तं महद्गुणम् ॥
तन्मध्ये दशकोटीनां संख्यायोजनपङ्कजम् ।
तत्कर्णिकायामासीनः शान्त्यतीतेश्वरः प्रभुः ॥
पञ्चवक्त्रो दशभुजो विद्युत्पुञ्जनिभाकृतिः ।
निवृत्तिश्च प्रतिष्ठा च विद्या शान्तिरनुक्रमात् ॥
परिवार्य स्थिताश्चैताः शान्त्यतीतस्य सुन्दरि ।
वामभागे समासीना शान्त्यतीता मनोन्मनी ॥
पञ्चवक्त्रधराः सर्वा दशबाह्विन्दुभूषणाः ।
बिन्दुतत्त्वं समाख्यातं कोट्यर्बुदशतैर्वृतम् ॥इति ॥२८॥
अर्धचन्द्रस्तथाकारः पादमात्रस्तदूर्ध्वके ।
ज्योत्स्नाकारा तदष्टांशा रोधिनी त्र्यस्रविग्रहा ॥२९॥
इसके उच्चारण में मात्रा के उच्चारण का आधा समय लगता है और इसकी स्थिति
ललाट में है । स्वच्छन्दसंग्रह में बिन्दु प्रभृति का विस्तार से वर्णन किया गया है । वहाँ
बिन्दु का वर्णन इस तरह से किया गया है—
इसके ऊपर बिन्दु का आवरण है । यह करोड़ों सूर्यों के समान अत्यन्त उज्ज्वल बहुत
बड़ा स्थान है । इसके बीच में दस करोड़ योजन विस्तार वाला पंकज है । इस पद्म की
कर्णिका में भगवान् शान्त्यतीतेश्वर विराजमान हैं । इनके पाँच मुँह और दस भुजाएँ हैं ।
इनका स्वरूप विद्युत्पुंज के समान है । निवृत्ति, प्रतिष्ठा, विद्या और शान्ति नाम की चार
शक्तियाँ इनको घेर कर बैठी हुई हैं और इनके वामभाग में मन की अगोचर शान्त्यतीता
शक्ति विराजमान है । ये सभी शक्तियाँ पाँच मुँह और दस भुजाओं वाली हैं और इनके
ललाट पर चन्द्रकला शोभित है । इस तरह से करोड़ों-अरबों योजन विस्तार वाला यह
बिन्दु नाम का आवरण स्थित है । इसी को बिन्दु तत्त्व कहा जाता है ॥२८॥
अर्धचन्द्र भी दीपक के समान उज्ज्वल आकृति वाला है । मात्रा का चौथा
भाग इसके उच्चारण का काल है । बिन्दु के ऊपर इसका स्थान है । रोधिनी का
आकार त्रिकोणमय है और चांदनी के समान चमकता है । इसका उच्चारण काल
मात्रा का आठवां भाग है ॥ २९ ॥

४४ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः
अर्धचन्द्रः बिन्दोरर्धभागः, तथाकारः दीपाकार एव। पादमात्रः मात्राकालस्य
चतुर्थभागोच्चारणकाल इत्यर्थः। तदूर्ध्वके बिन्दोरूर्ध्वभागे। बिन्दूपरिदेशे पाद-
मात्रोच्चारणकालो दीपाकारोऽर्धचन्द्र इत्यर्थः। ज्योत्स्नाकारा चन्द्रिकासमकान्तिः,
१तदष्टांशा मात्राष्टांशोच्चारणकाला, त्र्यस्रविग्रहा त्रिकोणाकारा रोधिनी। द्वयोरपि
स्वच्छन्दसंग्रहे प्रपञ्चो यथा—
अर्धचन्द्रस्तदूर्ध्वे तु रोधिनी तस्य चोपरि।
ज्योत्स्ना ज्योत्स्नावती कान्तिः सुप्रभा विमलापि च॥
अर्धचन्द्र२स्थिता ह्येताः कलाः पञ्च प्रकीर्तिताः।
रुन्धिनी रोधिनी रोधा ज्ञानरोधा तमोपहा॥
निरोधिकाकलाः पञ्च कथितास्तव सुन्दरि।
ब्रह्मादिपरमेशानां परप्राप्तिनिरोधनात्॥
निरोधिकेति सा प्रोक्ता तस्या भेदाद् वरानने।
परसादाख्यसम्प्राप्तिः .... .... ॥इति॥२९॥
बिन्दुद्वयान्तरे दण्डः शेवरूपो मणिप्रभः।
कलांशो द्विगुणांशश्च नादान्तो विद्युदुज्ज्वलः॥३०॥
अर्धचन्द्र बिन्दु के आधे भाग से बनता है। यह भी दीपक के समान प्रकाशमय
आकृति वाला है। पादमात्र का अर्थ यह है कि इसके उच्चारण में एक मात्रा का चौथा
भाग समय लगता है। बिन्दु के ऊपर यह स्थित है। बिन्दु के ऊपर के भाग में स्थित,
चौथाई मात्रा उच्चारण काल वाला और दीपक के समान उज्ज्वल कान्ति वाला अर्धचन्द्र
कहलाता है। रोधिनी चन्द्रिका के समान कान्ति वाली और त्रिकोण सदृश आकृति
वाली है। इसका उच्चारण काल मात्रा काल का आठवां भाग है। अर्धचन्द्र और रोधिनी
का स्वच्छन्दसंग्रह में इस तरह से विस्तार किया गया है —
बिन्दु के ऊपर अर्धचन्द्र और अर्धचन्द्र के ऊपर रोधिनी स्थित है। ज्योत्स्ना,
ज्योत्स्नावती, कान्ति, सुप्रभा और विमला नाम की पांच कलाएँ निरोधिका में स्थित हैं।
हे सुन्दरि ! यह सब मैंने तुमको सुनाया है। यह निरोधिका इस लिये कहलाती है कि
ब्रह्मा प्रभृति श्रेष्ठ देवताओं को भी यह परतत्त्व तक पहुँचने से रोक देती है। इस
निरोधिका शक्ति का भेदन करने के उपरान्त ही परसादाख्य तत्त्व की प्राप्ति होती
है॥ २९॥
दो बिन्दुओं के बीच में एक सीधी रेखा—यही नाद का आकार है। शेव-
सदृश इस नाद की कान्ति मणि के समान उज्ज्वल है। इसका उच्चारण काल
१. अष्टांशा-ख. ने. ज. झ., अष्टांशः अष्टांशोच्चारणकालः-ग.। २. न्द्रोदिता-ख.,
न्द्रोत्थिता-क., न्द्रस्थिता-ग. ङ.।

प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ४५
हलाकारस्तु सव्यस्थबिन्दुयुक्तो विराजते ।
बिन्दुद्वयमध्यगत ऋजुरेखाकारः शेवरूपः, मुष्कद्वयमध्यगता शिरा शेव इत्यु-
च्यते, तत्तुल्यरूपः । मणिप्रभः पद्मरागसवर्णवर्णः । कलांशः, कलाः षोडशमात्राः,
षोडशांशोच्चारणकाल इत्यर्थः । स पुनः कलांशो नादस्तन्त्रेणोच्यते । “१‘कलो
नादस्तु गम्भीरे ध्वनौ तु मधुरास्फुटे” इत्यमरः । मधुरास्फुटो ध्वनिर्नादः । नाद-
प्रपञ्चः स्वच्छन्दसंग्रहे यथा—
रोधिन्याख्यं यदुक्तं ते नादस्तस्योर्ध्वसंस्थितः ।
पद्मकिञ्जल्कसंकाशः कोटिसूर्यसमप्रभः ॥
पुरैः परिवृतोऽसंख्यैर्मध्ये पञ्चकलावृतः ।
इन्धिका दीपिका चैव २रोचिका मोचिका तथा ॥
ऊर्ध्वगा मध्यगा तासां पञ्चमो परमा कला ।
चन्द्रकोटिसमप्रख्यं तन्मध्येऽर्बुदयोजनम् ॥
मात्रा का सोलहवां भाग है। नादान्त का उच्चारण काल मात्रा का ३२ वां
भाग है। यह बिजली के समान चमकीला है और इसका आकार हल के सदृश
है। इसके दक्षिण भाग में एक बिन्दु भी बना रहता है ॥ ३० ॥
दो बिन्दुओं के बीच में एक सीधी रेखा खींच देने पर उसका आकार शेव के समान
हो जाता है। दो अण्डकोशों के बीच की सीवन को शेव कहते हैं। नाद की आकृति
ऐसी ही होती है। पद्मराग मणि के समान इसकी कान्ति है। मात्रा का कलांश अर्थात्
सोलहवां भाग इस कलांश (नाद) का उच्चारण काल है। कलांश पद की दो बार
आवृत्ति करने से यह अर्थ निकलता है। ‘कलो नादस्तु’ इत्यादि अमरकोश के वचन के
अनुसार मधुर और अस्फुट ध्वनि को नाद कहते हैं। इस नाद का परिचय भी
स्वच्छन्दसंग्रह में दिया गया है—
अभी तुम्हें रोधिनी का स्वरूप समझाया है। इसके ऊपर नाद की स्थिति है। पद्म
की केसर के समान इसका वर्ण और करोड़ों सूर्यों के समान इसकी कान्ति है। यह
असंख्य भुवनों से आवृत है और उन सबके बीच में पांच कलाएं हैं। इनके नाम इन्धिका,
दीपिका, रोचिका, मोचिका और ऊर्ध्वगा हैं। पांचवीं सर्वश्रेष्ठ कला मध्यभाग में
विराजमान है। इन सब इन्धिका प्रभृति देवियों से घिरे हुए करोड़ों चन्द्र की समान कान्ति
वाले एक अर्बुद (अरब) योजन विस्तार वाले इस पद्म के बीच में बैठे हुए, अरबों
१. ‘कलो नादो ध्वनौ तु मधुरास्फुटे कलः—ख. ग. ज. झ. उ., ‘ध्वनौ तु मधुरास्फुटे।
'कलो नादस्तु गम्भीरे' (१।६।२२) इति तु मूलस्य पाठः । २. रेचिका—क. ख. नै.

४६ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः
पद्ममध्ये समासीनमीश्वरं चोर्ध्वगामिनम् ।
चन्द्रायुतप्रतीकाशं पञ्चवक्त्रं त्रिलोचनम् ॥
१इन्धिकाद्यैर्वृतं देवं शूलपाणिं जटाधरम् ।
तस्योत्सङ्गगतामूर्ध्वगामिनीं परमां शिवाम् ॥
ध्यायेत् ॥इति।
विद्युदुज्ज्वलः तडित्सदृशकान्तिः । हलाकारः लाङ्गलसदृशरूपः । सव्यस्थ-
बिन्दुयुक्तः बिन्दुद्वयमध्ये दक्षिणभागस्थितबिन्दुयुक्तः । द्विगुणांशश्च पूर्वोक्तषोड-
शांशानां द्विगुणांशो द्वात्रिंशत्तमो भागः । कोऽर्थः ? मात्राद्वात्रिंशत्तमांशोच्चारण-
कालो हलाकारादिविशेषणविशेषितो नादान्त इत्यर्थः । नादस्यान्तो लयो भवति
यत्र ब्रह्मारन्ध्रे, तस्य प्रपञ्चः स्वच्छन्दसंग्रहे यथा—
हलाकारस्तु नादान्तो भित्त्वा सर्वमिदं जगत् ।
अधःशक्त्या विनिर्भिद्य ऊर्ध्वशक्त्यवसानकः ॥
नाड्यां ब्रह्मबिले लीनस्त्वव्यक्तध्वनिलक्षणः ।
अतो ब्रह्मबिलं ज्ञेयं रुद्रकोट्यर्बुदैर्युतम्२ ॥
तत्र ३ब्रह्मशिवो ज्ञेयः शशाङ्कशसन्निभः ।
दशबाहुस्त्रिनेत्रश्च पञ्चवक्त्रेन्दुशेखरः ॥
चन्द्रों की समान कान्ति वाले, पांच मुँह और तीन नेत्र वाले, त्रिशूल हाथ में लिये जटाजूट-
धारी ऊर्ध्वगामी भगवान् शिव का और उनके उत्संग ( गोद ) में बैठी ऊर्ध्वगामिनी
भगवती भवानी का ध्यान करना चाहिए ॥
नादान्त बिजली के समान चमक वाला और हल के समान आकार वाला है । दो
बिन्दुओं में से एक बिन्दु इसकी दक्षिण की ओर रहता है । इसका उच्चारण काल सोलह
का दुगुना, अर्थात् मात्रा का ३२ वां भाग होता है। इसका अभिप्राय यह है कि नादान्त
का उच्चारण काल मात्रा का ३२ वां भाग है और इसका आकार हलाकार आदि विशे-
षताओं से युक्त है । नादान्त का स्थान ब्रह्मारन्ध्र में है, क्योंकि यहीं नाद का अन्त (लय)
होता है । स्वच्छन्दसंग्रह में नादान्त का प्रपंच ( विस्तृत वर्णन ) इस तरह से किया
गया है—
नादान्त का आकार हल के सदृश है, अतः इस सारे जगत् को भेद कर, अधःशक्ति
से लेकर ऊर्ध्वशक्ति पर्यन्त समस्त शक्ति चक्रों को भी भेद कर ब्रह्मबिल ( ब्रह्मरन्ध्र )
में स्थित नाडी ( सुषुम्ना ) में लीन हो जाता है । उस समय अव्यक्त मधुर ध्वनि के रूप
में मात्र योगीजन इसका अनुभव कर सकते हैं । यह ब्रह्मबिल ११ करोड़ अरब योजन
विस्तार वाला है । यहां ब्रह्म रूपी शिव निवास करते हैं । सैंकड़ों चन्द्रों के सदृश इनकी
१. इन्धिका-ग. ज. ङ. । २. र्वृतम्-क. ग. । ३. ब्रह्म-ग. ङ. ज. ।

प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ४७
ब्रह्माणी त्वपरा शक्तिर्ब्रह्मणोत्सङ्गगामिनी ।
द्वारं सा मोक्षमार्गस्य रोधयित्वा व्यवस्थिता ॥ इति ॥ ३० ॥
शक्तिर्वामस्थबिन्दूत्थस्थिरेराकारा तथा पुनः ॥ ३१ ॥
व्यापिका बिन्दुविलसत्त्रिकोणाकारतां गता ।
पुनःशब्देन पूर्वेभ्यो विशेषो द्योत्यते । पूर्वेषां बिन्द्वाद्यंशानां स्वरूपवर्णमात्रा-
कालांशा२ अभिकल्पिताः । शक्तिमारभ्य समनान्तानामंशानां स्वरूपवर्णमात्रा३-
कालाः पश्चाद् वक्ष्यन्त इत्यर्थः । शक्तिर्बिन्दुद्वयमध्ये वामभागस्थबिन्दूत्थ४स्थिरा-
कारा । शक्तिप्रपञ्चः स्वच्छन्दसंग्रहे यथा—
शक्तितत्त्वं समाख्यातं भुवनै५रावृतं महत् ।
आधारं भुवनानां च प्रवक्ष्यामि समासतः ॥
सूक्ष्मा चैव सुसूक्ष्मा च तथा चैवामृता मृता ।
चतुर्दिक्षु स्थितास्तासां मध्यस्था व्यापिनी ६स्मृता ॥
कान्ति है । ये दश भुजा वाले, तीन नेत्र वाले, पांच मुंह वाले और इन्दुशेखर हैं ।
इनकी गोद में ब्रह्माणी नाम की शक्ति विराजमान है । यह शक्ति मोक्ष के मार्ग को रोक
कर बैठी रहती है ॥ ३० ॥
शक्ति का आकार सीधी रेखा के वाम भाग में बिन्दु को रखने से बनता है ।
व्यापिका का आकार त्रिकोणमय है । इस त्रिकोण के नीचे एक बिन्दु शोभित
है ॥ ३१ ॥
श्लोक में विद्यमान पुनः शब्द एक विशेषता का द्योतक है । पूर्व वर्णित बिन्दु
प्रभृति का स्वरूप, वर्ण और मात्राकाल भी साथ में ही बताया गया है । अब शक्ति से
लेकर समना पर्यन्त अंशों का १स्वरूप, वर्ण और मात्राकाल बाद में बताया जायगा । दो
बिन्दुओं में से वाम भाग में स्थित बिन्दु से एक स्थिर रेखा खींच देने पर शक्ति का
आकार बनता है । स्वच्छन्दसंग्रह में यह इस तरह से वर्णित है—
शक्तितत्त्व अनेक महान् भुवनों से आवृत है । यही सारे भुवनों का आधार है ।
इसका मैं संक्षेप में वर्णन करूँगा । चार दिशाओं में स्थित सूक्ष्मा, सुसूक्ष्मा, अमृता और
मृता नाम की चार शक्तियों के बीच में व्यापिनी विराजमान है । यह पांचवीं शक्ति
१. शिवा—ग. ने. छ. झ. उ., शिवाकारतया—ने. ज. । २. कलांशाः कल्पिताः—ख. ग.
ने. ज. झ. उ. । ३. कलाः—क. ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ४. शिवा—ज. झ. उ. ।
५. राश्रितम्—ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ६. स्थिता—ख. ग. ।
१. बिन्दु से उन्मना पर्यन्त कलाओं के स्वरूप को जानने के लिये भास्करराय के
वरिवस्यारहस्य के अड्यार लाइब्रेरी, मद्रास से प्रकाशित संस्करण के अन्त में दिया गया
चित्र देखना चाहिये ।

४८ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः
पञ्चवक्त्रा त्रिनेत्रा च सुतेजस्का च पञ्चमी।
शक्तितत्त्वं समाख्यातं ध्यानान्मुक्तिफलप्रदम् ॥इति।
व्यापिका बिन्दोर्विलासाद् १वामादित्रिशक्तिमया त्रिकोणरूपतां गतेत्यर्थः।
इयं तु शक्तितत्त्वकथनेनैव कथिता स्वच्छन्दसंग्रहे यथा—२“सूक्ष्मा चैव” इत्यादि
“स्थिताः” इत्यन्तं पूर्वोक्तम् ॥३१॥
बिन्दुद्वयान्तरालस्था ३ऋजुरेखामयी पुनः ॥३२॥
समना बिन्दुविलसदृजुरेखा तथोन्मना।
स्पष्टम्। समनायाः प्रपञ्चः स्वच्छन्दसंग्रहे४—
चिदानन्दस्वरूपा तु पराशक्तिस्तदूर्ध्वतः।
समना नाम सा शक्तिः सर्वकारणकारणम् ॥
सर्वाण्डानि५ बिभर्तीयं शिवेन समधिष्ठिता।
अत्रारूढः स भगवान् शिवः परमकारणम् ॥
अत्यन्त तेजस्विनी है, पांच मुँह और तीन नेत्र वाली है। यह शक्तितत्त्व ध्यान मात्र से
मुक्ति का प्रदाता है ॥
व्यापिका बिन्दु के विलास से वामा प्रभृति तीन शक्तियों से संवलित त्रिकोण का
आकार धारण कर लेती है। स्वच्छन्दसंग्रह में इसका वर्णन शक्ति तत्त्व के अन्तर्गत ही
किया गया है। “सूक्ष्मा चैव” से लेकर “स्थिताः” पर्यन्त श्लोकों को अभी-अभी ऊपर के
अनुच्छेद में उद्धृत किया जा चुका है ॥३१॥
ऊपर और नीचे विद्यमान दो बिन्दुओं के बीच में स्थित सीधी रेखा से
समना का और एक बिन्दु के ऊपर शोभित सीधी रेखा से उन्मना का आकार
बनता है ॥३२॥
इस श्लोक का अर्थ स्पष्ट है। स्वच्छन्दसंग्रह में समना का परिचय इस तरह से
दिया गया है—
इस व्यापिनी शक्ति के ऊपर चिदानन्दस्वरूपिणी परा शक्ति विद्यमान है। यह समना
नाम की शक्ति सभी कारण पदार्थों की भी कारण है, अर्थात् सारे कारण पदार्थों की
सृष्टि इसी से होती है। शिव के द्वारा समधिष्ठित यह शक्ति ही सभी अण्डों का भरण-
१. 'वामादि' नास्ति-ग. च. उ.। २. सम्पूर्णः श्लोकः पुनरप्यत्र-ख. ग. ने. ज. उ. ।
३. लस्थऋ-ख. ग. च. छ. ज. झ. उ. । ४. भैरवे यथा-ख. ग. ने. ज. झ. उ. ।
५. सर्वान्तानि-ख. ग. ने. ज. झ. उ. ।

प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ४९
१सृष्टिं स्थितिं च संहारं तिरोभावमनुग्रहम् ।
शिवः करोति सततं सर्वकारणकारणम् ॥
शिवः सर्वस्य कर्तेयं शक्तिः कारणमिष्यते ।
एकस्मादेव बिन्दोर्विलसद्दृजुरेखारूपा उन्मना । उन्मनायाः प्रपञ्चः स्वच्छन्द-
संग्रहे यथा—
या शक्तिः कारणत्वेन तदूर्ध्वे २उन्मना ३स्मृता ।
४मनः संक्रमते यत्र तेन सा उन्मना स्मृता ॥
नात्र कालकलाभानं न तत्त्वं न च देवता ।
सुनिर्वाणं परं शुद्धं रुद्रवक्त्रं तदुच्यते ॥
शिवशक्तिरिति ख्यातं५ निर्विकल्पं निरञ्जनम् । इति ॥३२॥
शक्त्यादीनां समनान्तानां वर्णं मात्रांश६कालं चाह—
शक्त्यादीनां वपुः स्फूर्जद्द्वादशादित्यसंनिभम् ॥३३॥
पोषण करती है। इस समना शक्ति के सहारे ही परम कारण भगवान् शिव सृष्टि, स्थिति,
संहार, तिरोभाव और अनुग्रह नामक पाँच कृत्यों का निरन्तर संपादन करते रहते हैं
और इस तरह से वे भी सभी कारणों के कारण कहलाते हैं। यहाँ शिव सबके कर्ता और
शक्ति सबकी कारणस्वरूप है ।
एक ही बिन्दु के ऊपर शोभित हो रही सीधी रेखा से उन्मना का आकार बनता
है । इसका भी वर्णन स्वच्छन्दसंग्रह में किया गया है—
अभी जिस समना नाम की कारण शक्ति का वर्णन किया गया है, उसके ऊपर
उन्मना शक्ति स्थित है। यहाँ आकर मन लीन हो जाता है, इसलिये इसका नाम उन्मना
है। यहाँ मन के लीन हो जाने से काल की कला की, किसी तत्त्व या देवता की भी
प्रतीति नहीं होने पाती । परमशुद्ध सच्चे निर्वाण की यही स्थिति मानी जाती है । इसी
को ७रुद्रवक्त्र कहते हैं। यह शिव की निर्विकल्प निरंजन शक्ति के नाम से प्रसिद्ध
है ॥३२॥
अब शक्ति प्रभृति के वर्ण और मात्राकाल का वर्णन किया जाता है—
शक्ति प्रभृति का स्वरूप एक साथ उगे १२ आदित्यों के समान है। शक्ति
का उच्चारण काल मात्रा का ६४ वाँ भाग है। शक्ति से लेकर समना पर्यन्त
१. सृष्टिमिति श्लोको नास्ति–ख. ग. ने. ज. झ. उ. । २. उन्मनी–ख. ग. ने.
ज. झ. उ । ३. स्थिता–ने., मता–उग. । ४. नास्त्येषा पङ्क्तिः–ख. ग. ने. ज.
झ. उ. । ५. तां···कारा···ञ्जना–क. ख. । ६. मात्रांशकत्वं–उ., मात्रांत्वं कलां–ख. ।
७. विज्ञानभैरव (श्लोक २४) में रुद्रवक्त्र सौबीजक के नाम से वर्णित है।
४

५० योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः
चतुष्षष्टिस्तदूर्ध्वं तु द्विगुणं द्विगुणं ततः ।
शक्त्यादीनां तु मात्रांशो मनोन्मन्यास्तथोन्मनी ॥३४॥
मनोन्मन्या२ मनोन्मनीपर्यन्तम् । मनोन्मनी नाम समना, मनःसहितत्वात्,
तद्रहितत्वादुन्मनीत्युच्यते । शक्त्यादीनां ३मनोन्मनीपर्यन्तानामंशानां वपुः स्वरूपं
स्फूर्जद्द्वादशादित्यसंनिभम् एकत्र हेलयोदितद्वादशादित्यसवर्णवर्णम् । मात्रांश-
श्चतुष्षष्टिः मात्रांशकालश्चतुष्षष्टितमोंऽश इत्यर्थः । तदूर्ध्वं तु१ व्यापिकाया मात्रांशो-
च्चारणं द्विगुणं व्यापिकोच्चारणमात्रावयवकालोऽष्टाविंशत्युत्तरशततमो भाग
इत्यर्थः । ततः४ समनोच्चारणमात्रावयवकालः षडधिकपञ्चाशदुत्तरद्विशततमो
भाग इत्यर्थः । उन्मनी यथेदानीं५ कथितविशेषणा तथा निराकारा निरुच्चारा,
“यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह” (तै० उ० २।४) इत्युपनिषदुकरीत्या
अंशों का उच्चारण काल दुगुना सूक्ष्म होता जाता है । उन्मनी का न तो कोई
आकार होता है और न इसका उच्चारण ही संभव है ॥३३-३४॥
'मनोन्मन्याः' पद का अर्थ मनोन्मनी पर्यन्त किया जाता है । मनोन्मनी शब्द से यहाँ
समना गृहीत है, क्योंकि मन की स्थिति यहीं तक है । उन्मनी में मन की स्थिति नहीं
रहती । शक्ति से लेकर मनोन्मनी (समना) पर्यन्त अंशों का स्वरूप एक स्थान पर एका-
एक उगे १२ आदित्यों (सूर्यों) की कान्ति के समान है । १शक्ति का उच्चारण काल मात्रा
का ६४ वाँ भाग है । इसके ऊपर व्यापिका का उच्चारण काल इससे दुगुना, अर्थात् मात्रा
का १२८ वाँ भाग होगा । इसके बाद की समना का उच्चारण काल मात्रा का
२५६ वाँ भाग होगा । १उन्मना को निराकार और निरुच्चार कहा गया है, अर्थात्
इसका न तो कोई आकार है और न इसका उच्चारण ही किया जा सकता है । तैत्तिरीय
उपनिषद् में बताया गया है-“मन के साथ वाणी भी यहाँ तक आकर लौट जाती है,
क्योंकि उनकी यहाँ तक पहुँच नहीं है ।” इस तरह से वाणी और मन की गति यहाँ
१. व्यापिका-ग. उ. । २. 'मनोन्मन्याः' नास्ति-ग, उ. । ३. उन्मनी-ख. ग. ज.
झ. उ. । ४. 'ततः' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. दानीम-झ. उ. ।

  1. प्रस्तुत प्रकरण की व्याख्या करते समय तथा वरिवस्यारहस्य (पृ० १३-१४) में
    भी भास्करराय ने समना के समान उन्मना का भी उच्चारण काल मात्रा का २५६ वाँ
    भाग माना है । भास्करराय वरिवस्यारहस्य (पृ० १३-१४) में एक अन्य मत का उल्लेख
    करते हैं । तदनुसार उन्मना का उच्चारण काल मात्रा का ५१२ वाँ भाग है । श्रद्धेय
    कविराज जी भी अपने 'तान्त्रिक वाङ् मय में शाक्त दृष्टि' नामक ग्रन्थ में 'नादतत्त्व'
    शीर्षक के अन्तर्गत (पृ० ३०८) इस पक्ष की चर्चा करते हैं ।

प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ५१
<sup>१</sup>वाङ्मनोऽतीतगोचरत्वादुन्मनीत्युच्यते । महाबिन्दौ चाकाररूपवर्णोच्चारकाला न
विद्यन्ते । अतो नात्रोच्यन्ते, तस्य विश्वोत्तीर्णत्वात् । तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे—
तत्त्वातीतं वरारोहे वाङ्मनोऽतीतगोचरम् ॥
अनिष्कलं चासकलं नीरूपं <sup>२</sup>निर्विकल्पकम् ।
निर्द्वन्द्वं परमं तत्त्वं शिवाख्यं परमं पदम् ॥ इति ।
हकारादिबिन्द्वन्तानां स्थूलवर्णानामुच्चारणकालो मात्रा, बिन्द्वादिसमनान्ता-
नामर्धमात्रा । तदर्धादिक्रमेण लवपर्यन्तमुच्चारणकालः । लवो नाम<sup>३</sup>
नलिनीपत्रसंहत्यां सूक्ष्मसूच्यभिभेदने ।
दले दले तु यः कालः स कालो लववाचकः ॥ (प्र० सा० १।२९)
इति वचनात् । तदूर्ध्वं<sup>४</sup> शून्य एव, तदधिकसूक्ष्मतरकालाभावात् । एवं-
विध<sup>५</sup>भावनया शिव एव भूयादित्यर्थः । तदुक्तं विज्ञानभैरवभट्टारकैः—
आकर रुक जाती है । इसीलिये इसे उन्मना कहते हैं । महाबिन्दु में तो सुतरां आकार
(रूप), वर्ण और उच्चारण काल की भी कोई स्थिति नहीं है, अतः उनका यहाँ वर्णन
नहीं किया गया है, क्योंकि वह महाबिन्दु <sup>१</sup>विश्वोत्तीर्ण तत्त्व है । इसका वर्णन स्वच्छन्द-
संग्रह में इस तरह से किया गया है—
हे वरारोहे ! वाणी और मन से अगोचर, सभी तत्त्वों से अतीत यह महाबिन्दु
अनिष्कल, असकल, नीरूप, निर्विकल्पक, निर्द्वन्द्व परम तत्त्व है । यही शिव नामक परम
पद है ॥
हकार से लेकर बिन्दु पर्यन्त स्थूल वर्णों का उच्चारण काल एक मात्रात्मक है,
बिन्दु से समना पर्यन्त कलाओं का काल अर्धमात्रा है । प्रत्येक आगे वाली कला में यह
काल आधा होता जाता है । यह उच्चारण काल लव पर्यन्त सूक्ष्म होता है । प्रपंचसार में
लव का लक्षण इस तरह से वर्णित है—
कमल के सहस्र पत्रों को एक साथ रख कर उनको तीखी सुई से छेदते समय एक-
एक पत्र के छेदन में जो काल लगता है, उसी को लव कहा जाता है ॥
इसके ऊपर कुछ भी नहीं है, क्योंकि इससे अधिक सूक्ष्म काल की कल्पना ही नहीं
की जा सकती । इस तरह इन सूक्ष्म नाद-कलाओं का ध्यान करने वाला साक्षात् शिव
हो जाता है, जैसा कि विज्ञानभैरव के निम्न श्लोक में कहा गया है—
१. 'वाङ्' नास्ति-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । २. निरुपद्रवम्-ग. उ. । ३. 'नाम'
नास्ति-ख. ज. झ. । ४. तदूर्ध्वं लवोर्ध्वं-क. ने. ज. । ५. विधविश्व-ख. ग. ने. ज. झ. उ. ।
१. पृ० १५ की टिप्पणी देखिये ।

५२ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः
'पिण्डरूपस्य मन्त्रस्य स्थूलवर्णक्रमेण तु।
अर्धेन्दुबिन्दुनादान्तशून्योच्चाराद् भवेच्छिवः ॥ इति ।
(वि० भै०, श्लो० ४२)
अत्र 'बिन्द्वर्धेन्दु' इति वक्तव्ये वृत्तानुरोधेन व्यत्यासः । बिन्द्वर्धेन्दुनादान्त-
शून्योच्चाराद् भवेच्छिव इति प्रत्याहाररीत्या ग्रहणम् । अर्धेन्दोरुपरि रोधिनी-
नादयोर्नादान्तस्य चोपरि शक्तिव्यापिकासमनानां च विद्यमानत्वात् । शून्यशब्दे-
नोन्मना उच्यते । अतोऽर्धेन्दुबिन्दुनादान्तशून्योच्चाराद् भवेच्छिव इति २पिण्डरूपस्य
मन्त्रस्य संग्रहेणोक्तिः ॥३३-३४॥
देशकालानवच्छिन्नं तदूर्ध्वे परमं महत् ।
निसर्गसुन्दरं तत्तु परैरानन्दविघूर्णितम् ॥३५॥
तदूर्ध्वे हकारादिमहाबिन्द्वन्तानां सकल-सकलनिष्कल-केवलनिष्कलानां
त्रयाणामप्यूर्ध्वे । परमं महत् । महत्त्वं घटादीनामप्यस्ति न्यूनपरिमाणापेक्षया, अत
उक्तं परमिति । यतः परं महत्त्वं नास्ति तत् परमं महत् । अत एव देशकालान-
ॐकार, ह्रींकार प्रभृति पिण्ड मन्त्रों के स्थूल वर्णों का क्रमशः उच्चारण करने
के बाद बिन्दु, अर्धचन्द्र, नाद, नादान्त आदि सूक्ष्म कलाओं का क्रम से उच्चारण करने
से साधक शिव हो जाता है ॥
विज्ञानभैरव के इस श्लोक में 'बिन्द्वर्धेन्दु' ऐसा पाठ होना चाहिये, किन्तु छन्द की
दृष्टि से 'अर्धेन्दुबिन्दु' ऐसा पाठ है । बिन्दु, अर्धेन्दु, नादान्त और शून्य का उच्चारण
करने से शिव बन जाता है, इस वाक्य में प्रत्याहार की पद्धति अपनाई गई है । इससे
अर्धेन्दु के बाद रोधिनी और नाद का तथा नादान्त के बाद शक्ति, व्यापिका ओर
समना कलाओं का उच्चारण अभिप्रेत है । शून्य शब्द यहाँ उन्मना का बोधक है । अतः
'अर्धेन्दुबिन्दु' श्लोक की इस पंक्ति के द्वारा पिण्डमन्त्र की सभी कलाओं का संक्षेप में
उल्लेख हुआ है, ऐसा माना जाना चाहिये ॥३३-३४॥
इसके ऊपर देश और काल आदि से अपरिच्छिन्न वह परम महान् स्वभाव-
सुन्दर तत्त्व विद्यमान है, जो कि सदा परम आनन्द में लीन रहता है ॥३५॥
हकार से लेकर महाबिन्दु पर्यन्त कलाओं की यह जो त्रिविध – सकल, सकलनिष्कल
और केवल निष्कल नाम की भावनाएँ बताई गई हैं, इन सबसे ऊपर वह परम महत्
तत्त्व अवस्थित है । छोटे घड़े की अपेक्षा बड़े घड़े का भी परिमाण महत् (बड़ा) होता
है, अतः यहाँ उसका विशेषण परम जोड़ा गया है । जिससे अधिक बड़ा कोई न हो, उसे
१. वि० भै०, पृ० ४२। २. पिण्ड-क० ख०। ३. परमानन्द-च०, ख०, ग०, घ०, ङ०।

प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ५३
वच्छिन्नम् । देशकालाकारैरनवच्छिन्नमेव परमं महदित्युच्यते¹ । तेन निसर्ग-
सुन्दरम् । लोकेऽसुन्दरमपि वस्तु वस्त्राद्यलङ्कारैरारोपितैः सुन्दरमिव प्रतीयते ।
इदं तु स्वभावसुन्दरम्, सर्वैः स्वस्वात्मतया स्पृहणीयत्वात् । ²परानन्द-
विघूर्णितम् । आनन्दः शब्दादिविषयानुभवेऽप्यस्ति क्षणिकः, तत³ उच्यते परा-
नन्दविघूर्णितमिति । कोऽर्थः ? त्रित्रिरूप⁴समवस्थितवस्तुभ्यः पुरातनी देशकाला-
नवच्छिन्ना परममहद्रूपा स्वभावसुन्दरी परप्रकाशात्मकपरशिवसामरस्यपरि⁵-
पूर्णपरानन्दशालिनी विमर्शशक्तिः श्रीमहान्त्रिपुरसुन्दरीत्यर्थः ॥३५॥
"प्रसृतं विश्वलहरीस्थानं मातृत्रयात्मकम्"⁶ (१।११) इत्यत्र सूचितां मातृका-
मयवासनामिदानीं विवृणोति—
आत्मनः स्फुरणं पश्येद् यदा सा परमा कला ।
अम्बिकारूपमापन्ना परा वाक् समुदीरिता ॥३६॥
यहाँ परम महान् कहा गया है। देश, काल और आकार से परिमित न होने से यह परम
महान् है। इसीलिये यह निसर्गसुन्दर है। लोक में असुन्दर वस्तु को भी वस्त्र, अलंकार
आदि पहनाकर सुन्दर सा बना दिया जाता है, किन्तु यहाँ ऐसी बात नहीं है। यह तत्त्व
तो स्वभाव से ही सुन्दर है, क्योंकि सभी प्राणी इसको अपनी आत्मा ही मानते हैं
और आत्मा के साथ सभी का स्वाभाविक स्नेह रहता है। यह तत्त्व परानन्द से विघूर्णित
है। शब्द आदि लौकिक विषयों का अनुभव करने से भी क्षणिक आनन्द की सृष्टि होती
है। इससे विलक्षण आनन्द की सृष्टि परम तत्त्व की अनुभूति से होती है। इसीलिये इसको
परानन्दविघूर्णित कहा गया है। इसका अभिप्राय यह है कि तीन-तीन संख्या वाली समस्त
वस्तुओं से पहले विद्यमान, देश, काल और आकार से अपरिमित, परम महान् परिमाण
वाली, स्वभाव से ही सुन्दर और परम प्रकाशात्मक परम शिव के साथ समरस रूप में
अवस्थित, विमर्शशक्ति स्वरूपिणी यह महात्रिपुरसुन्दरी भगवती सदा परम आनन्द से
ओतप्रोत रहती है। अन्ततः इससे यह अभिप्राय निकलता है कि उक्त भावना के अभ्यास
से साधक तद्रूप हो जाता है, जैसा कि कामकलाविलास के पूर्वोद्धृत (पृ० १०) छठे श्लोक
में बताया गया है ॥३५॥
पहले (१।११) चक्र को मातृत्रयात्मक बताया गया था, उसी विषय को अब यहाँ
विस्तार से समझाया जा रहा है—
ऊपर वर्णित यह परम कला जब अपने ¹स्फुरण (विस्तार) को देखना चाहती
१. 'उच्यते' नास्ति—ख. ज. झ. । २. परमानन्द—ज. झ. उ. । ३. तदु—ख. ग.
ज. उ. । ४. समस्त—ग. उ. । ५. 'परिपूर्ण' नास्ति—ने. ज. झ. उ. । ६. इतः परम्—
'बैन्दवं चक्रम्' इत्यधिकं—ख. ने. ज. उ. ।
१. स्फुरण शब्द पूर्व प्रतिपादित (१।१०-११) स्फुरत्ता का पर्याय है। इस तरह से

५४ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः
सा परमा सर्ववर्णाद्यभूतविमर्शरूपा, कला विमर्शशक्तिः, आत्मनः परशिवस्य,
स्फुरणं पश्यन्त्यादिक्रमेण वैखरीपर्यन्तं विमर्शनम्, पश्येद् द्रष्टुमिच्छेत्, तदा
परमा शान्तात्मिका भूत्वा, अम्बिकारूपमापन्ना प्रकाशांशभूताया अम्बिकायाः
सामरस्यमापन्ना, परा वाक् समुदीरिता परा मातृकोच्यते। तदुक्तं संकेत-
पद्धत्याम्—"अनयोः सामरस्यं यत् परस्मिन् महसि स्फुटम्" इति ॥३६॥
बीजभावस्थितं विश्वं स्फुटीकर्तुं यदोन्मुखी।
वामा विश्वस्य वमनादङ्कुशाकारतां गता ॥३७॥
इच्छाशक्तिस्तदा सेयं पश्यन्तीवपुषा स्थिता।
है, तो सबसे पहले अम्बिका शक्ति का रूप धारण करती है। इसी को परा वाक्
कहा जाता है ॥३६॥
सभी वर्णों की आदिभूत विमर्शशक्ति जब प्रकाशात्मक शिव के विस्तार को पश्यन्ती
से लेकर वैखरी पर्यन्त वाणी के रूप में देखना चाहती है, तब वह परम शान्त विमर्श-
शक्ति प्रकाश की अंशभूत अम्बिका शक्ति से समरस हो जाती है और इस तरह से परा
वाणी, परा मातृका का स्वरूप धारण कर लेती है। संकेतपद्धति में इस स्थिति का वर्णन
इस तरह से किया गया है—"प्रकाश और विमर्श का सामरस्य इस परप्रकाशात्मक¹
स्वरूप में स्पष्ट है" ॥३६॥
यह परा वाणी अपने में बीज रूप से विद्यमान् जगत् को जब प्रकट करने
लगती है, तब विश्व का वमन करने के कारण अंकुश सदृश वामा शक्ति का रूप
पूर्व उपक्रान्त श्रीचक्र की निष्पत्ति-प्रक्रिया का यहाँ उपसंहार किया जा रहा है। इस
विषय की चर्चा पहले भी (पृ० १९ की टिप्पणी में) आ चुकी है।
१. 'परस्मिन् महसि' के स्थान पर 'परस्मिन्नहमि' पाठ उचित प्रतीत होता है।
कामकलाविलास की टीका चिद्वल्ली (पृ० १५) में यही पाठ गृहीत है। ऋजुविमर्शिनी
(पृ० ९८) और दीपिका (२।६३-६४) में उद्धृत संकेतपद्धति के इस वचन से पहले विद्य-
मान 'अकारः' इत्यादि श्लोक में अकार और हकार की प्रकाशविमर्शात्मकता का प्रति-
पादन किया गया है। पृ० १६-१७ की टिप्पणी में हम विस्तार से बता चुके हैं कि अहमा-
त्मक अद्वयतत्त्व से जिस बिन्दु तत्त्व की निष्पत्ति होती है, वही कामकला का रूप धारण
कर लेता है। यहाँ उस अद्वयतत्त्व से परा, पश्यन्ती आदि चार वाणियों का विकासक्रम
बताया गया है। कामकलाविलास (श्लो० २२-२७) तथा आगे उद्धृत (२।६३-६४)
संकेतपद्धति के वचनों से इस विषय की अधिक स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है। वहाँ
परम प्रकाशमय बिन्दुतत्त्व की परा वाणी-स्वरूपता का, एकादशधा पश्यन्ती का तथा
मध्यमा की नवधादशमशत का निरूपण किया गया है।