योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
२७० योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः
वाग्देव्यो वशिन्याद्याः । श्रीकण्ठादिन्यासः १ स्वच्छन्दसंग्रहोक्तः । तन्त्रान्तरे
प्रसिद्धत्त्वादिह नोक्तः । शिष्टं स्पष्टम् ।।८३-८४।।
कामेश्वर्यादिदेवीनां न्यासमाह—
आधारे हृदये पुनः ।
शिखायां बैन्दवस्थाने त्वग्निचक्रादिका न्यसेत् ।।८४।।
बैन्दवस्थाने शिखायामिति व्यत्ययेन क्रमो ज्ञेयः । बैन्दवस्थानम् "दीपाकारो-
ऽर्धमात्रश्च ललाटे वृत्त इष्यते" (१।२८) इति पूर्वोक्तं ललाटम् । शिखा नाम कुण्ड-
लिन्या अग्रं शिवस्य विश्रान्तिस्थानम् । अत्र श्रुतिः—"तस्याः शिखाया मध्ये पर-
मात्मा व्यवस्थितः" २ (तै० आ० १०।१२।१२) इति । तेन शिखाशब्देन तद्व्याप्ति-
स्थानं ब्रह्मरन्ध्रं लक्ष्यते । अग्निचक्रादिकाः—"अग्निचक्रे कामगिर्यालये मित्रेश-
नाथात्मके ३श्रीकामेश्वरीदेवीरुद्रात्मशक्तिश्रीपादुकां पूजयामि, सूर्यचक्रे जाल-
न्ध शनाथात्मके वज्रेश्वरीदेवीविष्ण्वात्मशक्तिश्रीपादुकां पूजयामि,
वशिनी आदि वाग्देवता कहलाती हैं। श्रीकण्ठादि न्यास स्वच्छन्दसंग्रह में वर्णित
है। १अन्य तन्त्रों में यह प्रसिद्ध है, अतः यहाँ उसका वर्णन नहीं किया गया है। बाकी
का अर्थ स्पष्ट है ।।८३-८४।।
कामेश्वरी आदि देवियों का न्यास अब बताते हैं—
आधार, हृदय, बैन्दव स्थान और शिखा में क्रमशः कामेश्वरी आदि देवियों
का विन्यास करे ।।८४।।
श्लोक में शिखा का पहले और बैन्दव स्थान का उल्लेख बाद में है, किन्तु इनका क्रम
बदल कर पहले बैन्दव स्थान और बाद में शिखा को रखना चाहिये। पहले (१।२८)
बताया जा चुका है कि बैन्दव स्थान ललाट को कहते हैं। कुण्डलिनी का अग्रभाग यहाँ
शिखा शब्द से बोधित होता है, जहाँ कि शिव विश्राम करते हैं। तैत्तिरीय आरण्यक
कहती है —"इस शिखा के मध्य में परमात्मा विराजमान हैं"। इस तरह से शिखा
शब्द से शिव की व्याप्ति का स्थान ब्रह्मरन्ध्र लक्षित होता है। अग्निचक्र आदि में कामे-
श्वरी आदि देवियों का न्यास निम्न मन्त्रों का उच्चारण करते हुए करना चाहिये—
"मित्रेशनाथ जिसके अधिपति हैं, ऐसे कामगिरि पीठरूप अग्निचक्र में रुद्रात्मक
श्रीकामेश्वरी देवी की पादुका का मैं पूजन करता हूँ। षष्ठीशनाथ जिसके अधिपति हैं,
१. श्रीकण्ठन्यासः-ख. ने. ज. झ. उ. । २. इतः परम्-'स ब्रह्मा स शिवः (स हरिः)
सेन्द्रः सोऽक्षरः परमः स्वराट्' इत्याधिकः पाठः-उ. । ३. 'श्री' नास्ति-ख. ने. ज. झ. ।
१. प्रपञ्चसार प्रदर्शित श्रीकण्ठ न्यास की चर्चा पहले पृ० १६५ की तीसरी टिप्पणी
में की जा चुकी है।
तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २७१
सोमचक्रे पूर्णगिरिपीठे ओड्डीशनाथात्मके भगमालिनीदेवीब्रह्मात्मशक्तिश्रीपादुकां
पूजयामि, ब्रह्मचक्रे ओड्याणपीठे १चर्यानाथात्मके श्रीमहान्त्रिपुरसुन्दरीदेवीपरब्रह्मा-
त्मशक्तिश्रीपादुकां पूजयामि" इति मन्त्रैर्न्यस्तव्याः। शक्तयोऽग्निसूर्यसोमब्रह्मचक्रा-
त्मिकाः२। कोऽर्थः ? आधारहृदयभ्रूमध्यब्रह्मरन्ध्रेषु वह्निसूर्यसोमब्रह्मचक्रेषु
कामगिरिजालन्धरपूर्णगिर्योड्याणपीठेषु रुद्रविष्णुब्रह्मपरब्रह्मात्मक३शक्ती:४
कामेश्वरीवज्रेश्वरीभगमालिनीमहात्रिपुरसुन्दरीर्न्यसेदित्यर्थः । अयमेवार्थः सम्प्र-
दायविद्भिर्देशिकेन्द्रैः५ पद्धतिषु प्रपञ्चितः ॥८४॥
तत्त्वन्यासमाह—
तत्त्वत्रयं समस्तं च विद्याबीजत्रयान्वितम् ।
पादादिनाभिपर्यन्तमागलं शिरसस्तथा ॥८५॥
व्यापकं चैव६ विन्यस्य
ऐसे जालन्धर पीठरूप सूर्यचक्र में विष्णु स्वरूप श्रीवज्रेश्वरी देवी की पादुका का मैं
पूजन करता हूँ, ओड्डीशनाथ जिसके अधिपति हैं, ऐसे पूर्णगिरि पीठमय सोमचक्र में
ब्रह्मात्मक श्रीभगमालिनी देवी की पादुका का पूजन करता हूँ । चर्यानाथ जिसके अधिपति
हैं, ऐसे ओड्याण पीठरूप ब्रह्मचक्र में परब्रह्मस्वरूपिणी श्रीमहान्त्रिपुरसुन्दरी देवी
की पादुका का मैं पूजन करता हूँ"। कामेश्वरी आदि चार शक्तियां यहां अग्नि,
सूर्य, सोम और ब्रह्मचक्र स्वरूपिणी हैं। इसका भाव यह है कि आधार, हृदय, भ्रूमध्य
और ब्रह्मरन्ध्र में; वह्नि, सूर्य, सोम और ब्रह्मचक्र मे; कामगिरि, जालन्धर, पूर्णगिरि
और ओड्याण पीठों में; रुद्र, विष्णु, ब्रह्म और परब्रह्म की शक्तियों के रूप में कामेश्वरी,
वज्रेश्वरी, भगमालिनी और महात्रिपुरसुन्दरी नामक देवियों का न्यास करे ।
त्रिपुरा सम्प्रदाय के जानकार बड़े-बड़े आचार्यों ने अपनी-अपनी पद्धतियों में इस अर्थ का
विस्तार किया है ॥८४॥
अब तत्त्व न्यास का उपदेश करते हैं--
विद्या के तीन बीजों का व्यस्त और समस्त रूप से उच्चारण करते हुए तीन
तत्त्वों का व्यस्त और समस्त रूप में पैर से नाभि पर्यन्त, नाभि से कण्ठ पर्यन्त,
कण्ठ से शिर पर्यन्त और फिर समस्त शरीर में व्यापक न्यास करे ॥८५-८६॥
१. श्रीचर्या-ने. ज. झ.। २. दिकाः-क. ख. ग. ने. । ३. त्मकचक्रेषु-ज. झ. उ. ।
४. 'शक्ती:' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. शिकैः-क. ने. ज. झ. उ. । ६. चेति-ख.
२७२ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः
तत्त्वत्रयम् आत्मविद्याशिवाख्यतत्त्वानां त्रयम् । समस्तं च तत्त्वत्रयसमष्टिरूपं
तुरीयं तत्त्वम् । तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे—
धरादिमायान्तमात्मतत्त्वं१स्यान्तर्गतं स्मृतम् ।
शुद्धविद्येश्वरसदाशिवा विद्याख्यतत्त्वगाः ॥
शिवशक्तिद्वयं चैव शिवतत्त्वं प्रकीर्तितम् ।
प्रमातृमेयप्रमितिरूपमेतत्तत्त्रयात्मकम् ॥
एतत् तत्त्वं शिवतत्त्वं सर्वतत्त्वमयं शुभम् । इति ।
विद्याबीजत्रयान्वितम् । विद्याया२ बीजानि वाग्भवकामराजशक्तिबीजानि,
एतद्बोजसमुदायरूपं ३तुर्यबोजम्, तैश्चतुर्भिर्बीजैरन्वितम् । पादादिनाभिपर्यन्तम्४ ।
५पर्यन्तपदसामर्थ्यान्नाभ्याद्यागलं ६लक्ष्यते, शिरस इति पञ्चमीसामर्थ्याद्
गलादिति च७ लभ्यते । कोऽर्थः ? आत्मविद्याशिवतुरीयतत्त्वानि मूलविद्यावाग्भव-
कामराजशक्तितुरीयबीजादिकानि चतुर्थ्यन्तनमो८न्तान्युच्चार्य पादादिनाभि९-
आत्मा, विद्या और शिव ये तीन तत्त्व हैं। समस्त रूप से इन्हीं तीन तत्त्वों का
समष्टि तुरीय तत्त्व कहलाता है। इनका वर्णन स्वच्छन्दसंग्रह में मिलता है—
पृथिवी से लेकर माया पर्यन्त तत्त्व आत्मतत्त्व के अन्तर्गत माने जाते हैं। शुद्धविद्या,
ईश्वर और सदाशिव ये विद्यातत्त्व के अन्तर्गत हैं। शिव और शक्ति ये दो तत्त्व शिव-
तत्त्व कहे जाते हैं। ये तीनों तत्त्व प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय के प्रतिनिधि हैं। इन सब
तत्त्वों का समष्टिस্বরূপ, जहाँ कि इन भेदों की प्रतीति समाप्त हो जाती है, तुरीय
परम शिवतत्त्व है।
ये चारों तत्त्व विद्या के तीन बीजों से व्यष्टि और समष्टि के रूप में जुड़े हुए हैं।
विद्या के तीन बीज वाग्भव, कामराज और शक्तिबीज के नाम से प्रसिद्ध हैं। इन बीजों
की समष्टि से तुर्यबीज बनता है। इन चार बीजों से उक्त चार तत्त्वों को संयुक्त
करना चाहिये। तब एक-एक बीज का उच्चारण करते हुए एक-एक तत्त्व का क्रमशः
पैर से लेकर नाभि पर्यन्त, पर्यन्त शब्द को आगे भी जोड़ कर नाभि से कण्ठ पर्यन्त,
'शिरसः' इस पंचमी विभक्ति के उदाहरण से गले से लेकर सिर तक उक्त तीन तत्त्वों
का न्यास करना चाहिये। इसका अभिप्राय यह है कि आत्मा, विद्या, शिव और तुरीय
तत्त्वों को मूलविद्या के वाग्भव, कामराज, शक्ति और तुरीय बीजों से संयुक्त कर उनको
चतुर्थी विभक्ति और नमः पद के साथ जोड़ देना चाहिये। तब एक-एक का उच्चारण
करते हुए पैर से नाभिपर्यन्त, नाभि से कण्ठपर्यन्त, कण्ठ से मस्तक पर्यन्त और फिर
१. त्वमन्त-क. ग. । २. विद्याबी-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. तुरीय-ख. ने. उ. ।
४. न्तं स्पष्टम्-क. ग. । ५. आगलमित्यादिसा-क. ग. । ६. लभ्यते-ख. ने. ज. झ. उ. ।
७. 'च' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ८. नमोऽन्तकानि-क. ग. । ९. नाभ्यन्तम्-ख. ने.
तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २७३
पर्यन्तम्, नाभ्यादिगलान्तम्, गलादिशिरोऽन्तं ¹समुपस्पृश्य व्यापकं न्यसे-
दित्यर्थः ॥८५-८६॥
भूयोऽपि पराहन्ताभावनामाह—
स्वात्मीकृत्य परं पुनः ।
परं विश्वोत्तीर्णं तेजः, पुनः स्वात्मीकृत्य । पूर्वं श्रीचक्रन्यासानन्तरं “स्वाभेदेन
विचिन्तयेत्” (३।८१) इति ²परेणैक्यमुक्तम्, इदानीं करशुद्ध्यादिन्यासानन्तर-
मपि पुनः परज्योतिर्मायावशात् स्वभिन्नमिव प्रतीयमानं स्वाभेदेन विचिन्तयेदिति
स्वात्मीकृत्य परं³ पुनः करशुद्ध्यादिन्याससामर्थ्यान्मायापगमे श्रीमहान्त्रिपुरसुन्दरीं
स्वात्मतया विभाव्येत्यर्थः ॥८६॥
अमृतप्लावनमाह—
सन्तर्पयेत् पुनर्देवीं सौम्याग्नेयामृतद्रवैः ॥८६॥
सौम्यं ब्रह्मारन्ध्राधोमुखसहस्रदलकमलकर्णिकामध्यगतपूर्णसोममण्डलमध्य-
स्थितत्रिकोणान्तरस्थितमनच्कानुत्तरात्म हार्धकलात्मकं सौम्यम् । मूलाधारचतुर्दल-
अन्त में तुरीय तत्त्व का तुरीय बीज से संयोजन कर पूरे शरीर में व्यापक न्यास करना
चाहिये ॥८५-८६॥
पुनः अपने में पराहन्ता की भावना का उपदेश करते हैं—
परम ज्योति की पुनः स्वात्मस्वरूप में भावना करे ॥
पर शब्द का अर्थ यहाँ विश्वोत्तीर्ण ज्योति है। उस विश्वोत्तीर्ण परम प्रकाश को
पुनः अपने से अभिन्न बना ले। पहले (३।८१) श्रीचक्र न्यास के बाद अभेद वासना
(भावना) का उपदेश दिया गया था। अब करशुद्धि आदि न्यासों को करने के बाद
पुनः पर ज्योति से अपनी अभिन्नता की भावना की बात कही गई है। यह इसलिये
कहा गया है कि माया के कारण साधक उस परम ज्योति को अपने से भिन्न देखने लगता
है। न्यास करके साधक यह भावना करे कि वह मुझ से अभिन्न है। करशुद्धि आदि
न्यासों की सामर्थ्य से जब उसका माया-मल हट जाय, तो वह अपने को महात्रिपुर-
सुन्दरी के रूप में ही देखे, उससे अपने को अभिन्न माने ॥८६॥
इसके बाद अपने को अमृत से प्लावित कर ले—
तब स्वात्मस्वरूप देवी को सौम्य और आग्नेय अमृत रस से सन्तृप्त कर
ले ॥८६॥
ब्रह्मारन्ध्र स्थित अधोमुख सहस्रदल कमल की कर्णिका के मध्य में स्थित पूर्ण सोम-
मण्डल के मध्य में विराजमान त्रिकोण के भीतर अनच्क, अनुत्तर, हार्धकलात्मक स्वरूप
१. संस्पृश्य-ख. ने. ज. झ. उ. । २. 'परे''''विचिन्तयेदिति' नास्ति-ख. ज. झ. उ. ।
३. 'परं' नास्ति-क. ग. ज. झ. उ. ।
१८
२७४ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः
कमलकर्णिकामध्यगतपूर्णवह्निमण्डलमध्यगतत्रिकोणान्तरस्थितमनच्कानुत्तरात्म-
सपरार्धकलारूपमाग्नेयम् । द्वयोरमृतानलकुण्डलिनीरूपयोरधऊर्ध्वं १प्रसरतोर्योनि-
लिङ्गाकारयोः सामरस्यात् २प्रसरदमृतद्रवासारैः सन्तर्पयेत् आप्लावयेत् । अयमेव
सम्प्रदायविद्भिर्देशिकैः पद्धतिषु परान्यास ३इत्युच्यते ॥८६॥
४उक्तचतुर्विधन्न्यासमनुवादपुरःसरमुपसंहरति—
एवं चतुर्विधो न्यासः कर्त्तव्यो वीरवन्दिते ।
षोढान्यासोऽणिमाद्यश्च मूलदेव्यादिकः प्रिये ॥८७॥
करशुद्ध्यादिकश्चैव साधकेन सुसिद्धये ।
एवमुक्तप्रकारेण । षोढान्यासादिः सुसिद्धये सुखेन न्याससामर्थ्यान्निराकृत-
प्रत्यूहतया परमनःश्रेयसप्राप्तये । साधकेन मुमुक्षुणा कर्त्तव्यः, न तु सिद्धेन, तस्य
मुक्तत्वात् । तदुक्तं विज्ञानभैरवभट्टारकैः—
को यहाँ सौम्य कहा गया है और मूलाधार स्थित चतुर्दल कमल की कर्णिका के मध्य
में स्थित पूर्ण वह्निमण्डल के मध्य में विराजमान त्रिकोण के भीतर अनच्क, अनुत्तर
सपरार्धकलात्मक स्वरूप को आग्नेय । ये दोनों अमृत और अनिल (अग्नि) कुण्डलिनियों
के स्वरूप हैं । इनका जब नीचे और ऊपर प्रसार होता है, तो ये योनि और लिंग का
स्वरूप धारण कर लेती हैं । इनके सामरस्य के कारण प्रवहमान अमृत रस की वृष्टि से
अपने को सन्तृप्त कर ले, आप्लावित कर ले । त्रिपुरा सम्प्रदाय के जानकार आचार्यगण
इसी को परा न्यास कहते हैं ॥८६॥
उक्त चतुर्विध न्यास का अनुवाद के साथ उपसंहार करते हैं—
हे वीरवन्दिते ! इस तरह से यह चतुर्विध न्यास करना चाहिये । हे प्रिये !
साधक को परम कल्याण की प्राप्ति के लिये षोढा न्यास, अणिमादि न्यास,
मूलदेव्यादि न्यास और करशुद्धादि न्यास करना चाहिये ॥८७-८८॥
इस तरह ऊपर बताई गई पद्धति से षोढान्यास आदि का न्यास करना चाहिये ।
इन न्यासों की सहायता से साधक सभी विघ्नों को दूर कर परम कल्याण की प्राप्ति में
समर्थ हो जाता है । मुमुक्षु साधक को ही ये न्यास करने हैं । मुक्त सिद्ध को इनकी
आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वह तो मुक्त हो चुका है । विज्ञानभैरव भट्टारक ने
कहा है—
१. प्रसृतयो-उ. । २. क्षरद-ख, ने. ज. झ. उ. । ३. 'इति' नास्ति-ख. । ४. एव-
मुक्ते-घ.
तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २७५
यैरेव पूज्यते द्रव्यैस्तर्प्यते वा परापरः ।
यश्चैव पूजकः ¹सर्वः स एवैकः क्व पूजनम् ॥ इति ॥८७-८८॥
(वि० भै०, श्लो०१५०)
न्यासचतुष्टयस्य कालभेदेन विनियोगमाह—
प्रातःकाले² तथा पूजासमये होमकर्मणि ॥८८॥
जपकाले³ तथा तेषां विनियोगः पृथक् पृथक् ।
पूजाकाले समस्तं वा कृत्वा साधकपुङ्गवः⁴ ॥८९॥
प्रातःकाले षोढान्यासम्, पूजासमयेऽणिमादिन्यासम्, होमसमये⁵ मूलदेव्यादिक-
न्यासम्, जपकाले करशुद्ध्यादिन्यासं कुर्यादित्ययं⁶ पृथक् पृथग् विनियोगः ।
अथवा पूजाकाले समस्तं चतुर्विधं न्यासं कृत्वा साधकपुङ्गवः साधकश्रेष्ठः, चतु-
र्विधन्यासकरणसामर्थ्याद् विशीर्यमाणपाश⁷पटलत्वात् प्रत्यासन्नमोक्षत्वात्⁸ कृत-
कृत्य एव ॥८८-८९॥
षट्त्रिंशत्तत्त्वपर्यन्तमासनं परिकल्प्य च ।
गुप्तादियोगिनीनां च मन्त्रेणाऽथ बलिं ददेत् ॥९०॥
परा देवी के साथ पर भैरव की जिन पुष्प आदि द्रव्यों से पूजा की जाती है और
जिन खीर मावा आदि से तृप्ति कराई जाती है तथा जो यह सब पूजा आदि करता है,
वह सब कुछ भगवान् भैरव का ही स्वरूप है। ऐसी स्थिति में कौन, किसका, किससे
पूजन करेगा ? ॥८७-८८॥
इन चारों न्यासों का समय के अनुसार विनियोग बताते हैं—
प्रातःकाल, पूजा के समय, होम के समय और जप करते समय क्रमशः
इनका अलग-अलग विनियोग करना चाहिये। अथवा श्रेष्ठ साधक को चाहिये
कि वह इन सबका पूजा के समय अनुष्ठान करे ॥
प्रातःकाल षोढान्यास, पूजा के समय अणिमादि न्यास, होम के समय मूलदेव्यादि
न्यास और जप के समय करशुद्ध्यादि न्यास करे। इस तरह से इन न्यासों का अलग-
अलग विनियोग किया जाता है। अथवा पूजा के समय समस्त चतुर्विध न्यास करके
साधकश्रेष्ठ अपूर्व शक्ति को प्राप्त कर लेता है। इससे उसके सारे पाशजाल छिन्न-
भिन्न हो जाते हैं और वह शीघ्र ही जीवन्मुक्त अवस्था को प्राप्त कर कृतकृत्य हो
जाता है ॥८८-८९॥
पृथ्वी से शिव पर्यन्त छत्तीस तत्त्वों की आसन के रूप में कल्पना कर के
गुप्ता आदि योगिनियों के मन्त्र से पूजा करे ॥९०॥
१. सर्व-ख. ने. झ. उ. । २. लेऽथवा पूजाकाले वा हो-ख. ने. च. छ. ज. झ. ।
३. लेऽथवा-ख. ने. च. छ. ज. झ. उ. । ४. सत्तमः-ख. ने. च. झ. । ५. काले मूलविद्या-
६. विनियोगः-ख. ने. च. छ. ज. झ. उ. । ७. पटलत्वात्-ख. ने. । ८. त्वात् कृतकृत्य एव-ख. उ. ।
२७६ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः
षट्त्रिंशत्तत्त्वपर्यन्तं क्षित्यादिशिवान्तं तत्त्वसमुदाय¹रूपमासनं परिकल्प्य
चिन्मरीचीनामाधारत्वादासनं श्रीचक्रं परिकल्प्य । तदुक्तं श्रीपराक्रमे—
हृत्सरोजान्तरे ध्यायन्² पृथिव्यादिशिवान्तकम् ।
³गुप्तादितत्कुसुमक्षेपेणाऽऽसनतां नयेत् ॥ इति ।
गुप्तादियोगिनीनामित्यत्र⁴ आदौ समस्तप्रकटपदमध्याहार्यम् । आदिपदेन
गुप्ततरसम्प्रदायकुलकौलनिगर्भरहस्यातिरहस्यपरापररहस्ययोगिन्यो गृह्यन्ते । बलिः
पूजा । तत्र निघण्टुः—"बलिः पूजोपहारेऽपि" इति । महाकविभिरप्युक्तम्—
“अवचितबलिपुष्पा" (कु० सं० १।६०) इति । कोऽर्थः ? भावितात्मा⁵ बाह्यपूजा-
करणात् पूर्वम् "यद्यद् बाह्यं वक्ष्यमाणं तत्तदान्तरमाचरेत्" इत्यस्मदुक्तरीत्याऽ-
ऽन्तर्यागार्थं स्वशरीरं तत्त्वसमुदायरूपं श्रीचक्रं विभाव्य "समस्तप्रकटगुप्तगुप्ततर-
पृथ्वी से शिव पर्यन्त छत्तीस तत्त्वों के समुदाय स्वरूप अपने शरीर को आसन मान-
कर, चिच्छक्ति की किरणों का प्रसार इसी के सहारे होता है, ऐसा मानकर, इसमें श्रीचक्र
की भावना करके साधक उसकी पूजा करे । श्रीपराक्रम में बताया गया है—
पृथिवी से शिव पर्यन्त छत्तीस तत्त्वों का अपने हृदयकमल में ध्यान करता हुआ
साधक गुप्ता आदि योगिनियों के मन्त्र से अभिमन्त्रित पुष्प के प्रक्षेप द्वारा उनको अपना
आसन बना ले ॥
यहाँ गुप्ता आदि योगिनियों से पहले समस्त¹ प्रकट पद का अध्याहार किया जाता
है । आदि शब्द से गुप्ततर, सम्प्रदाय, कुलकौल, निगर्भ, रहस्य, अतिरहस्य और परा-
पररहस्य योगिनियों का ग्रहण किया जायगा । बलि का अर्थ यहाँ पूजा है । निघण्टु में
बलि शब्द पूजा और उपहार का वाचक माना गया है । महाकवि कालिदास ने कुमार-
संभव में पार्वती के लिये 'अवचितबलिपुष्पा' विशेषण दिया है । उसका अर्थ है पूजा के
लिये जिसने पुष्प चुन लिये हैं । इसका अभिप्राय यह है कि "बाह्य पूजा में जो कुछ
बताया गया है, उसकी पहले आन्तर रूप से भी भावना करे" हमारी बताई गई इस
पद्धति से भावितात्मा साधक अन्तर्याग की सिद्धि के लिये अपने शरीर की तत्त्वसमुदाय
१. 'रूप' नास्ति—ने. ज. झ. उ. । २. व्याप्तं—ख. ज. उ. । ३. सौवर्णं—ख. ने. ज.
झ. उ. । ४. मित्यस्य—क. ग. । ५. तात्मपूजा—ख. ने. ज. उ. ।
- इन सबको मिलाकर नौ योगिनियों के नाम ये होंगे—प्रकटा, गुप्ता, गुप्ततरा,
सम्प्रदाया, कुलकौला, निगर्भा, रहस्या, अतिरहस्या और परापररहस्या । त्रिपुरा आदि
नौ चक्रेश्वरी विद्याएँ ही प्रकटा आदि नामों से पूजित होती हैं । इसका वर्णन आगे
किया जायेगा । इसलिए यहाँ...
तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २७७
सम्प्रदायकुलकौलनिगर्भरहस्यातिरहस्यपरापररहस्ययोगिनीश्री^१पादुकाभ्यो नमः”
इति योगिनीमूलमन्त्रेण स्वशिरसि पूजां कुर्यादित्यर्थः । ^२एतेन बाह्यपूजां सर्वा-
मप्यादवान्तः^३ कुर्यादिति सूच्यते ॥९०॥
आन्तरविघ्ननिरासमाह—
पिण्डरूपपदग्रन्थिभेदनाद् विघ्नभेदनँम् ।
गुह्यहृन्मुखमूर्धसु विद्यान्यासेन सुन्दरि ॥९१॥
गुह्यहृन्मुखमूर्धसु । गुह्यशब्देन गुदमेढ्रा^५न्तरालं लक्ष्यते । मुखशब्देन मुखाव-
यवो ललाटं लक्ष्यते । गुह्यहृन्मुखमूर्धसु चतुर्षु ^६स्थानेषु विद्यान्यासेन, विद्यायाः
सौभाग्यविद्याया बीजचतुष्टयन्यासेन । पिण्डं कुण्डलिनी । पिण्डशब्देन कुण्डलिनी-
स्थानं गुदमेढ्रान्तरं कन्दं लक्ष्यते । रूपपदेति^७ व्यत्ययो ज्ञेयः । पदं हंसः । पदशब्देन
स्वरूप श्रीचक्र के रूप में भावना करे और उसकी “समस्तप्रकट०” इत्यादि योगिनी मूल-
मन्त्र से अपने सिर पर पुष्पप्रक्षेप पूर्वक पूजा करे । इससे यह सूचित होता है कि सारी
बाह्य पूजा को पहले आन्तर पूजा के रूप में सम्पन्न करे ॥९०॥
आन्तर विघ्नों को दूर करने की विधि बताते हैं—
हे सुन्दरि ! गुह्य, हृदय, मुख और मूर्धा इन चार स्थानों में विद्यान्यास से
पिण्ड, पद, रूप और ग्रन्थि का भेदन कर साधक सभी आन्तर विघ्नों का भी
भेदन कर देता है ॥९१॥
गुह्य शब्द से गुदा और लिंग के बीच का स्थान और मुख शब्द से उसका अवयव
ललाट लक्षित होता । गुह्य, हृदय, ललाट और सिर इन चार स्थानों में सौभाग्यविद्या
के चार बीजों के न्यास से पिण्ड आदि का भेदन करे । पिण्ड कुण्डलिनी को कहते हैं ।
यहाँ पिण्ड शब्द से कुण्डलिनी का स्थान कन्द गृहीत होता है, जिसकी स्थिति गुदा और
लिंग के बीच में मानी गई है । ^१रूप और पद में व्यत्यय जानना चाहिये, अर्थात् पहले
१. ‘श्री’ नास्ति—ख. ने. उ., श्रीचक्र—झ. । २. अत एव—ख. ने. ज. उ. । ३. वन्ते
क—क. विहाय सर्वत्र । ४. भेदकम्—क. ग. । ५. न्तरं—ख. ने. झ. उ. । ६. ‘स्थानेषु’
नास्ति—ख, ने. ज. उ. । ७. देऽपि—उ. ब. विहाय सार्वत्रिकः पाठः ।
१. इसका अभिप्राय यह है कि श्लोक के ‘रूपपद’ इस पाठ में रूप शब्द को पहले
और पद शब्द को बाद में छन्द के अनुरोध से पढ़ दिया गया है, किन्तु उनका क्रम ‘पद-
रूप’ ऐसा होना चाहिये, क्योंकि पिण्ड के बाद पद और तब रूप की स्थिति मानी जाती
है । इसी बात को व्याख्याकार ने “रूपपदेति व्यत्ययो ज्ञेयः” इस वाक्य में कहा है ।
२७८ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः
हंसस्थानं हृदयं लक्ष्यते । रूपं बिन्दुः । रूपशब्देन बिन्दुस्थानं ललाटं लक्ष्यते ।
ग्रन्थिशब्देन यत्र विश्वं सूत्रे मणिरिव ग्रथ्यते तद् विश्वमूलं ब्रह्मरन्ध्रं चिन्मयं
लक्ष्यते । एतच्चतुष्टयभेदनाद् विघ्नभेदनम् । कोऽर्थः ? गुह्यादिस्थानचतुष्टये
विद्याबीजचतुष्टयन्यासेन "पातालादिषु लोकेषु ये विघ्ना भेदलक्षणाः" (सु० वा०
२३) इत्यभियुक्तवचनोक्तरीत्या पातालादिरूपाणि १ पिण्डपदरूप२ग्रन्थिस्थानि
३ गुदहृदयललाटब्रह्मरन्ध्राणि भेदलक्षणानि भित्त्वा तदूर्ध्वं ४ तदतीतचिन्मयाद्वय-
पदविश्रान्तिरन्तरो विघ्ननिरास इत्यर्थः । एतेन सर्वमपि बाह्यपूजान्त५मन्तः
कुर्यादित्युपलक्ष्यते ॥९१॥
अन्तर्यागे देहस्यैव यागगृहत्वात् तदन्तर्विघ्नान्निरस्य बहिर्याग६मन्दिरगतानां
विघ्नानामुत्सारणं कुर्यादित्याह—
यागमन्दिरगांश्चैव विघ्नानुत्सार्य मन्त्रवित् ।
पद और बाद में रूप को रखना चाहिये । पद का अर्थ है हंस । पद शब्द से हंस (प्राण)
का स्थान हृदय लक्षित होता है । रूप का अर्थ है बिन्दु । यहाँ रूप पद से बिन्दु का
स्थान ललाट गृहीत है । ग्रन्थि शब्द ब्रह्मरन्ध्र का वाचक है । इस चिन्मय स्थान में सारा
विश्व सूत्र में मणियों की तरह गुंथा हुआ है । इसीलिये यह विश्व का मूल कारण है ।
इन चारों का सौभाग्य विद्या के चार बीजों से भेदन करना ही सभी प्रकार के विघ्नों के
नाश का परम उपाय है । इसका अभिप्राय यह है कि सुभगोदयवासना में शिवानन्द
मुनि ने पाताल आदि लोकों में भेद दृष्टि को जन्म देने वाले विघ्नों की चर्चा की है ।
यहाँ पिण्ड, पद, रूप और ग्रन्थि स्थित गुदा, हृदय, ललाट और ब्रह्मरन्ध्र ही पाताल
आदि लोकों के विघ्न माने गये हैं । इनमें विद्यमान भेददृष्टि का उन्मूलन कर साधक
ऊपर उठे और इन सबके ऊपर प्रज्वलित चिन्मय अद्वय पद में विश्राम करे । आन्तर
विघ्नों का नाश इसी पद्धति से होता है । इससे भी यही सिद्ध होता है कि बाह्य पूजा
की सभी विधियों को पहले आन्तर पूजा के रूप में सम्पन्न करना चाहिये ॥९१॥
अन्तर्याग में यह शरीर ही यागगृह है । इस तरह से देहगत विघ्नों का निरास
कर अब साधक बाहर यागमन्दिर गत विघ्नों का भी उत्सारण करे, उसकी विधि
बताते हैं—
मन्त्रवित् साधक यागमन्दिर में घुसे विघ्नों का भी उत्सारण करे ॥
१. रूपेण—ख. ने. ज. झ. उ. । २. रूपरूपातीतस्थानानि—ख. ने. ज. झ. उ. ।
३. कन्द—ख. ने. ज. उ. । ४. तदूर्ध्वं ज्वलन्ती ततश्चिन्मया—क. ग. । ५. पूजानन्तर—
घ.। ६. 'मन्दिर' नास्ति—ख. ने. ज. झ. उ. ।
तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २७९
अपसर्पन्तु ते भूता ये भूता भुवि संस्थिताः ।
ये भूता विघ्नकर्तारस्ते नश्यन्तु १ शिवाज्ञया ॥
हूँ अस्त्राय फट्
इति मन्त्रेण मन्त्रवित् साधकः, निर्गच्छतां विघ्नानां निजवामाङ्गसंकोचाद् २
मार्गं दत्त्वा उत्सार्य ।
भूमिगतान् नभोगतान् दिव्यांश्च विघ्नानुत्सारयेदित्याह—
पाष्णिघातेन भौमांश्च तालेन च नभोगतान् ॥९२॥
अस्त्रमन्त्रेण ३दृष्ट्या च दिव्यान् विघ्नानपोहयेत् ।
४पाष्णिघातेन पाष्णिघातत्रयेण । भौमान् भूमिष्ठान् विघ्नान् । अस्त्रमन्त्रेणेति
सर्वत्रानुवर्तते । तालेन करतालत्रयेण । नभोगतान् अन्तरिक्षगतान् विघ्नान् ।
दृष्ट्या वीक्षणेन ५दिव्यांश्च विघ्नान् । अपोहयेत् निःसारयेत् ॥९२-९३॥
१अपसर्पन्तु इस श्लोक के उच्चारण के साथ "हूँ अस्त्राय फट्" इस मन्त्र का उच्चा-
रण करते हुए साधक उस यागमण्डप से निकल भागते हुए विघ्नों को अपने बायें अंग
को सिकोड़ कर मार्ग दिखाकर भगा दे । अपसर्पन्तु आदि श्लोक का अर्थ यह है कि जो
प्राणी इस यागमण्डप की भूमि में छिपे हुए हैं, वे यहाँ से निकल भागें । जो प्राणी विघ्न
उपस्थित करने वाले हैं, वे भगवान् शिव की आज्ञा से नष्ट हो जाँय ॥
इसके बाद भूमिगत, अन्तरिक्षगत और दिव्य विघ्नों को दूर करे—
पाष्णिघात से भूमिगत, ताल से नभोगत और दृष्टि से दिव्य विघ्नों का
उत्सारण करे । सर्वत्र अस्त्र मन्त्र का भी उच्चारण करे ॥९२-९३॥
पाष्णि (एडी) पर तीन बार आघात कर भूमिगत विघ्नों को अस्त्र मन्त्र का उच्चा-
रण करते हुए निकाल भगावे । तीन बार ताली बजाकर अस्त्र मन्त्र का उच्चारण करते
हुए अन्तरिक्षगत विघ्नों को निकाले और अपनी तिरछी दृष्टि से अस्त्र मन्त्र का उच्चारण
करते हुए दिव्य विघ्नों को निकाल भगावे ॥९२-९३॥
१. गच्छन्तु–ख. ने. उ. । २. ङ्गसंकोचतः–क. ग., ङ्गं संकोच्य–उ. । ३. विद्यांश्च
दृष्टचा–क. ग., दिव्यांश्च दृष्ट्या–उ. । ४. 'पाष्णि....दिव्यांश्च विघ्नान्' नास्ति–
गा. ज. झ. उ. । ५. विद्यांश्च–क. ग. ।
- श्रौत और स्मार्त पद्धतियों में भी यह मन्त्र इसी रूप में उपलब्ध होता है । यह
श्लोक योगिनीहृदय की किसी भी मातृका में नहीं मिलता और दीपिकाकार ने इसकी
व्याख्या भी नहीं की है ।
२८० योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः
निर्गतानां विघ्नानां पुनरप्रवेशाय वह्निप्राकारभावनामाह—
दिक्ष्वधोध्वं महावह्निप्राकारं परिभावयेत् ॥९३॥
संविदग्नौ महासारे विमर्शैकशरीरिणि ।
भेदाभासमिदं हव्यं जुहोम्यपुनरुद्भवम् ॥ (सु० वा० ६४)
इत्यभियुक्तवचनोक्तरीत्या सर्वतः स्फुरितपरसंविदेव महावह्निः, स एव
"प्राकारः, दुर्लङ्घ्यत्वात् । सर्वतो दिक्षु परिस्फुरदद्वयपरसंविदात्मकमहावह्नि-
प्राकारपरिकल्पनभावनया भेदप्रतीतिलक्षणानां विघ्नानामप्रवेश इत्यर्थः ॥९३॥
सूर्यपूजामाह—
सामान्यार्घ्येण देवेशि मार्तण्डं परिपूजयेत् ।
प्रकाशशक्तिसहितम्
सामान्यार्घ्यं विशेषार्घ्यं च वक्ष्यते (३।९८-१०३) । प्रकाशशक्तिसहितः,
प्रकाशः परमः शिवः, शक्तिर्विमर्शाख्या, तया सहितो नित्यसमवेतः ।
[निकाले गये विघ्न पुनः वापस न आ जाँय, इसके लिये यागमण्डप के चारों तरफ
अग्नि के बने परकोटे की भावना करे—
सभी दिशाओं में ऊपर-नीचे सर्वत्र प्रज्वलित महावह्नि के प्राकार की भावना
करे ॥९३॥
सुभगोदयवासना में शिवानन्द मुनि ने कहा है—
विमर्श के साथ समरसीभूत परम सारवान् संविद्रूपी प्रकाशात्मक वह्नि में मैं इस
भेद रूप में भासित हो रहे सारे जगत् रूपी द्रव्य की आहुति दे रहा हूँ, जिससे कि यह
फिर पैदा न हो जाय ॥
इस वचन के अनुसार सर्वत्र प्रकाशित हो रही परा संवित् ही महावह्नि है। इसी में
प्राकार (परकोटा) की कल्पना की जाती है, क्योंकि इसको लाँघ पाना कठिन है। सभी
दिशाओं में प्रज्वलित हो रही अद्वयात्मक परा संवित् स्वरूपिणी महावह्नि में प्राकार की
भावना करने से भेददृष्टि के कारण उत्पन्न होने वाले विघ्नसमुदाय का उस यज्ञस्थल
में पुनः प्रवेश नहीं होने पावेगा, यही इसका भाव है ॥९३॥
अब सूर्यपूजा की विधि बताते हैं—
हे देवेशि ! सामान्य अर्घ्य से प्रकाश शक्ति के साथ मार्तण्ड (सूर्य) की पूजा
करे ॥
सामान्यार्घ्य और विशेषार्घ्य का आगे (३।९८-१०३) वर्णन किया जायगा। प्रकाश
१. दिग्बन्धं च—च. उ. । २. ततो—ख. ने. च. छ. ज. झ. । ३. सर्व—ख. ने. ज.
झ. उ. । ४. सर्ववस्तुतापर—ख. ग. ने. ज. उ. । ५. महाप्राकारः—ज. ।
Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dvivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २८१
स्वप्रकाशशिव एव भास्करस्तद्विमर्शविभवा मरीचयः ।
^१यैः स भासयति वेद्यमण्डलं तस्य पूजनमहन्तया मतिः ॥
(चि० स्त० ५)
इत्यस्मदुक्तरीत्या सर्वं सामान्यार्घ्येण स्वात्माहम्भावनालक्षणया पूजया भाव-
येदित्यर्थः । बाह्यार्थस्तु स्पष्ट एव ॥९४॥
अस्यैव गुणाधिक्यमाह—
अरुणाकल्पमुज्ज्वलम् ॥९४॥
ग्रहादिपरिवारं च विश्वतेजोऽवभासकम्^२ ।
“स्वसंवित् त्रिपुरा देवी लौहित्यं तद्विमर्शनम्” इति प्रामाणिकवचनोक्तरीत्या
^३विमर्शविभवविधारणभूषणम् । उज्ज्वलम्, उदयास्तमयरहितत्वात् । ग्रहादिपरि-
वारं च । विषयान् गृह्णन्तीति ग्रहा इन्द्रियाणि, तेषामादि मनः, तत्परिवारं च
है परमशिव और विमर्श है शक्ति। प्रकाश शक्ति से नित्य समवेत है सूर्य। चिद्वि-
लास स्तव में यह इस तरह से वर्णित है—
स्वयं प्रकाशमान शिव ही भास्कर (सूर्य) है और शिव का विमर्शात्मक वैभव ही
सूर्य की किरणें हैं। इन्हीं किरणों से वह (सूर्य और शिव) इस सारे वेद्यस्वरूप जगत् को
भासित करते हैं। इनमें आत्मबुद्धि की भावना करना ही वास्तविक सूर्योपासना है ॥
इस तरह से प्रकाश और विमर्शात्मक शक्ति से सम्पन्न भगवान् सूर्य की सामान्यार्घ्य
से, अर्थात् स्वात्मस्वरूप में उनकी भावना करके आन्तर पूजा सम्पन्न करे और बाह्य
सामान्य अर्घ्य समर्पित कर बाह्य पूजा का अनुष्ठान करे ॥९४॥
अब सूर्य के ही विशेष गुणों को बताते हैं—
यह सूर्य अरुण आभावाले अलंकारों से सुशोभित है, सभी इन्द्रियां इसका
परिवार है और यही सारे तेजों का प्रकाशक ह ॥९४-९५॥
किसी ^1प्रामाणिक व्यक्ति ने कहा है—“स्वात्मसंवित् ही त्रिपुरा देवी है और
लौहित्य (ललाई) इसकी विमर्श शक्ति है”। इसके अनुसार यह प्रकाशात्मक सूर्य अपनी
विमर्शस्वरूपिणी ललाई का आभूषण धारण किये हुए है। यह उदय और अस्त से रहित
होने से सदा प्रकाशमान है । विषयों का ग्रहण करने वाली इन्द्रियाँ यहाँ ग्रह नाम से
१. तैः-ख. ने. ज. उ. । २. नम्-क. ग. । ३. विमर्शविधारणम्-ख. ज. झ. उ. ।
- यह श्लोकार्ध भी भास्करराय की सेतुबन्ध व्याख्या (५।४१) के अनुसार नित्या-
षोडशिकार्णव का अंग है, किन्तु दीपिकाकार इसको प्रामाणिक व्यक्ति का वचन मानते
हैं और ३।१६३ की व्याख्या में इसको अभियुक्त का वचन कहते हैं।
२८२ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः
विविधविषयग्रहणलक्षणसंकल्पप्रत्ययप्रवाहप्रवर्तकमित्यर्थः । अत्रोपनिषत् — “धियो
यो नः प्रचोदयात्” (ऋ० ३।४।१०) इति । विश्वतेजोऽवभासकम् । “तदेव१
ज्योतिषां ज्योतिः” (मु० उ० २।२।९) २इत्युपनिषदुक्तरीत्या बाह्यतेजो३गणप्रतीति-
कारणनिजस्फुरणम् । बाह्यार्थस्तु—सोमादयोऽत्र४ ग्रहाः, सूर्यस्य प्रधानत्वात् ।
आदिशब्देन५ षडङ्गानि गृह्यन्ते । स्पष्टमन्यत् ॥९४-९५॥
बाह्यचक्रोद्धारमाह—
सौम्याग्नेययुतैर्देवि रोचनागुरूकुङ्कुमैः ॥९५॥
मूलमुच्चारयन् सम्यग् भावयेच्चक्रराजकम् ।
कही गई हैं। इन इन्द्रियों में पहला मन है और बाकी इन्द्रियाँ उसका परिवार । यह
मन ही बाकी इन्द्रियों को विविध विषयों के ग्रहण में लगाता है और उसके द्वारा गृहीत
विषयों को अपनी संकल्प शक्ति के सहारे निरन्तर प्रवाहित करता रहता है। यह मन
ही यहाँ सूर्य है और अन्य इन्द्रियाँ उसका परिवार । इसी के लिये प्रसिद्ध गायत्री मन्त्र
में बताया गया है— “जो हमारी बुद्धि को प्रेरित करता है”। यह प्रकाशात्मक सूर्य
ही अन्य समस्त तेजों का प्रकाशक है। मुण्डक श्रुति कहती है— “वही सब ज्योतियों
की ज्योति है”। इन बाह्य तेजों को प्रकाशित करने के लिये ही वह स्वयं प्रकाशित
होता है। इस श्लोक में बताई गई बाह्यपूजा की विधि तो स्पष्ट है। ग्रह शब्द से
इस पक्ष में सोम आदि ग्रहों का ग्रहण किया जायगा, क्योंकि इनमें सूर्य ही प्रधान है
और सोम आदि ग्रह उसका परिवार है । आदि शब्द से १षडंग का ग्रहण किया जाता
है। बाकी का अर्थ स्पष्ट है ॥९४-९५॥
बाह्य चक्र के उद्धार की पद्धति बताते हैं—
हे देवि ! कपूर, केसर के साथ रोचना, अगुरु और कुंकुम को मिलाकर
मूलमन्त्र का उच्चारण करते हुए भली भाँति चक्रराज श्रीयन्त्र का लेखन करे
॥९५-९६॥
१. तदेवानुत्तरं-ख. ने. ज. झ. । २. इति श्रुत्युक्त-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. गुण-
ख. ने. ज. झ. उ. । ४. ‘अत्र’ नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. शब्दात्-क. ख. ग. ।
६. गालिखे-ख. ने. च. छ. ज. झ. ।
- पहले (२।५७) एक सौ ग्यारह आवरण देवताओं के प्रसंग में षडंगों की चर्चा
आ चुकी है। ऋजुविमर्शिनीकार (पृ० ११९) ने प्रपंचसार के एक श्लोक (६।६) को
उद्धृत किया है। वहाँ षडंगों का उल्लेख है। सुभगोदय (पृ० २८६) भी देखिये । यहाँ
उन्हीं षडंगों की पूजा का विधान है।
३. तृतीय विश्राम: पूजा-संकेत (अन्तर्याग, बहिर्याग, महात्रिपुरसुन्दरी समरसता एवं उपसंहार)
तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २८३
सौम्यं कर्पूरम्, सोमनामवाच्यत्वात् । आग्नेयं काश्मीरम्, १अग्निशिखासंज्ञक-
त्वात् । “काश्मीरजन्माग्निशिखम्” (२।६।१२४) इत्यमरः । रोचना गोरोचना;
अगुरुः कालागुरुः, कुङ्कुमं घसृणम्, एतैः २सुधया पङ्कीकृत्य, तेन स्वर्णादिमये
पट्टे हेमसूच्या ३विलिख्य । मूलं सौभाग्यविद्याम् । उच्चारयन्, परेण चेच्चक्रं
लेखयति । स्वयं चेल्लिखति तदोच्चरन् । चक्रराजं चतुराम्नायमयत्वात् ४सर्व-
पूजाचक्रेभ्योऽप्युत्तमम् । सम्यक् “समत्रिकोणशक्त्यग्रं समरेखं मनोहरम्” इत्य-
भियुक्तवचनोक्तरीत्या, भावयेत् लिखेत्, लेखयेद् ५वा । तदुक्तमभियुक्तैः– “कस्तूरी-
घसृणेन्दुचन्दन ६सुधाभिश्चक्रराजं लिखेत्” इति ॥९५-९६॥
योगिनीमूलमन्त्रेण क्षिपेत् पुष्पाञ्जलिं ततः ॥९६॥
सौम्य कपूर को कहते हैं, क्योंकि इसका भी नाम सोम है। काश्मीरी केसर आग्नेय
कहलाती है, क्योंकि इसका नाम अग्निशिखा है। अमरकोश में (२।६।१२४) में काश्मीर-
जन्मा, अग्निशिख आदि नाम इसके बताये गये हैं। रोचना गोरोचना (गोलोचन), अगुरु
कालागुरु (अगर) और कुंकुम घृसृण (रोरी) को कहते हैं। इन सबको सुधा में मिलाकर
चन्दन बना ले । इस चन्दन से सोने की सुई के द्वारा सोने आदि के पत्तर पर लिखे ।
दूसरे से लिखाते समय मूल सौभाग्यविद्या का उच्चारण कराया जाता है। साधक यदि
स्वयं श्रीचक्र का लेखन करता है, तो वह मन्त्र का उच्चारण भी स्वयं ही करता है।
इसको चक्रराज इसलिये कहा जाता है कि इसकी उपासना चारों आम्नायों में की जाती
है, अतः यह अन्य पूजा-चक्रों की अपेक्षा उत्तम है। किसी प्रामाणिक व्यक्ति ने बताया
है– “श्रीचक्र को लिखते समय इसके शिव और शक्ति त्रिकोण एक समान होने
चाहिये, रेखाएँ भी समान होनी चाहिये, जिससे यह देखने में मनोहर हो” । सम्यक्-
लेखन से इसी प्रकार का लेखन अभिप्रेत है । 'भावयेत्' क्रिया का प्रयोग यहाँ
लिखने अथवा लिखाने के अर्थ में हुआ है । इस प्रसंग में– “कस्तूरी, कुंकुम, कपूर,
चन्दन और सुधा को मिलाकर चक्रराज का लेखन करे” यह १प्रामाणिक वचन भी
स्मरणीय है ॥९५-९६॥
तब योगिनी के मूलमन्त्र से पुष्पांजलि समर्पित करे ॥९६॥
१. 'अग्नि....कत्वात्' नास्ति–ख. ने. ज. झ. । २. सुरया–ने. झ. उ. । ३. यन्त्र-
राजं वि–उ. । ४. तत् सर्वं–ख. ने. ज. झ. उ. । ५. येच्च–ख. ने. ज. झ. उ. ।
६. सुरा–ने. उ. ।
- श्लोक का यह अंश लुप्तागमसंग्रह, द्वितीय भाग (पृ० १२) में संगृहीत उदयाकर-
पद्धति के श्लोक का चतुर्थ पाद है । ज्ञानदीपविमर्शिनी में यह उद्धृत है ।
२८४ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः
योगिनीनां प्रकटादीनाम्, मूलमन्त्रेण “समस्तप्रकट०” इत्यादिना पूर्वोक्तेन,
पुष्पाञ्जलिं ततः तत्र१ श्रीचक्रे निक्षिपेत् ॥९६॥
२पुष्पाणामभावेऽपि कार्यतामाह—
मणिमुक्ताप्रवालैर्वा विलोमं मूलविद्यया ।
अशून्यं सर्वदा३ कुर्यात्
विलोमं प्रतिलोमम् । उच्चरितया ४मूलविद्यया सौभाग्यविद्यया । वाशब्दः
काकाक्षिवदुभयत्रापि५ संबद्धयते । अशून्यम् अविरहितम् । सर्वदा६ येन केन
प्रकारेण कुर्यात् । पुष्पाणामभावे मण्यादिभिर्वा योगिनीमूलमन्त्रेण सौभाग्यविद्यया
वा सर्वदा७ अशून्यं चक्रं कुर्यात्, पूजयेदित्यर्थः ॥९७॥
योगिनी शब्द यहाँ प्रकटा आदि योगिनियों का सूचक है। उन योगिनियों का मूल-
मन्त्र “समस्तप्रकट०” यहाँ पहले (३।९०) बताया जा चुका है। श्रीचक्र के लेखन के
बाद इसी मन्त्र से उस श्रीचक्र पर पुष्पांजलि समर्पित करे ॥९६॥
१पुष्प आदि के न मिलने पर यह करना चाहिये —
मणि, मुक्ता, प्रवाल से अथवा विलोम उच्चरित मूलविद्या से उस श्रीचक्र
को सदा अशून्य रखे ॥९७॥
विलोम का अर्थ है प्रतिलोम (उलटा)। मूलविद्या, सौभाग्यविद्या का उलटा उच्चा-
रण करते हुए इस श्रीचक्र को कभी शून्य न करे। काक (कौआ) की आँख की तरह
यहाँ ‘वा’ शब्द का संबन्ध मणि इत्यादि से अथवा मूलविद्या से भी हो जाता है। इनमें
से किसी एक के बिना इस श्रीचक्र को नहीं रखना चाहिये। सदा किसी न किसी एक का
संबन्ध उससे अवश्य रहना चाहिये। पुष्पों के अभाव में मणि इत्यादि से, योगिनी मूल-
मन्त्र से अथवा विलोम उच्चरित सौभाग्यविद्या से सदा इस चक्र को अवश्य अशून्य
रखकर पूजा करनी चाहिये ॥९७॥
१. ‘तत्र’ नास्ति-क. ख. ग. । २. पुष्पादीना-क. ग. । ३. सर्वथा-ख. च. छ.
ज. झ. । ४. ‘मूलविद्यया’ नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. यत्र संयुज्यते-ख. ने. झ. उ. ।
६. सर्वथा एकेनापि प्रकारेण-ख. ने. झ. उ. । ७. सर्वथा अशून्यं चक्रं पूज-ख. ने. ज.
झ. उ. ।
- पुष्पों के अभाव में मणि, मुक्ता, प्रवाल आदि बहुमूल्य रत्नों की चर्चा अटपटी
सी लगती है, किन्तु साथ ही यहाँ विकल्प के रूप में मूलविद्या की भी चर्चा है। इसका
अभिप्राय यह है कि सम्पन्न व्यक्ति श्रीचक्र को मणि, मुक्ता, प्रवाल आदि से अशून्य रखे
तथा साधनहीन व्यक्ति उस चक्र पर विलोम क्रम से मूलविद्या को ही लिख ले।
तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २८५
तथाऽकरणे निष्फलतामाह—
शून्ये विघ्नास्त्वनेकंशः ॥९७॥
मण्यादिभिः शून्ये सति श्रीचक्रेऽनेकंशः १ बहुशः, विघ्नाः सपर्यान्तरायाः संभ-
वेयुः ॥९७॥
सामान्यार्घ्यविधानमाह—
श्रीचक्रस्यात्मनश्चैव मध्ये त्वर्घ्यं प्रतिष्ठयेत् ।
श्रीचक्रस्य पूर्वोक्तरीत्या उद्धृतस्य, साधकस्य च मध्ये, अर्घ्यं वक्ष्यमाणरीत्या
२प्रतिष्ठयेत् ३प्रतिष्ठापयेत् ॥९७॥
अर्घ्यप्रतिष्ठा४प्रकारमाह—
चतुरस्रान्तरालस्थकोणषट्के सुरेश्वरि ॥९८॥
षडासनानि सम्पूज्य त्रिकोणस्यान्तरे पुनः ।
पीठानि चतुरो देवि कामूजाओ इति क्रमात् ॥९९॥
अर्चयित्वाऽर्घ्यपादे तु वह्नेर्दश कला यजेत् ।
ऐसा न करने पर पूजा निष्फल हो जाती है—
श्रीचक्र के शून्य रहने पर अनेक विघ्न आते हैं ॥९७॥
श्रीचक्र के मणि इत्यादि से शून्य रहने पर अनेक विघ्न पूजा के समय उपस्थित होने
लगते हैं ॥ ९७॥
अब सामान्य अर्घ्य की विधि बताते हैं—
श्रीचक्र के और अपने बीच में अर्घ्य की स्थापना करे ॥
पूर्वोक्त पद्धति से उद्धृत श्रीचक्र और साधक के बीच के स्थान में आगे बताई
जा रही पद्धति से अर्घ्य की स्थापना करे ॥ ९८॥
अर्घ्य की स्थापना का प्रकार यह है—
हे सुरेश्वरि ! चतुरस्र के अन्तराल में षट्कोण चक्र बनावे और उसमें छः
आसनों की पूजा करे । इसके बाद हे देवि ! षट्कोण के अन्तराल में स्थित
त्रिकोण में का पू जा ओ नामक चार पीठों की क्रम से पूजा करके तब अर्घ्य
के आधार पात्र में वह्नि की दस कलाओं की पूजा करे ॥९८-१००॥
१. कशो विघ्ना बहवो विघ्नाः-ख. ने. झ. उ. । २. प्रतिक्षिपेत्-क. ग. ।
३. 'प्रतिष्ठापयेत्' नास्ति-ख. ज. झ. व. उ. । ४. 'प्रकार' नास्ति-ख. ने. ज. उ. ।
५. पीठांस्त्रिचतुरो-क. च. उ. । ६. पात्रे-उ. ।
२८६ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः
चतुरस्रान्तरालस्य कोणषट्के आदौ चतुरस्रं लिखित्वा तदन्तर्वृत्तं तदन्तः षट्-
कोणं तन्मध्ये त्रिकोणमिति मण्डलं गोमयोपलिप्तभूतले मत्स्यमुद्रया विलिखेदिति
सामर्थ्यलभ्यम्। तदुक्तं श्रीपराक्रमे—
ततो गोमयसंलिप्ते चतुरस्रे भुवः स्थले।
प्रवहच्छ्वासहस्तेन कृतया मत्स्यमुद्रया॥
दिव्यगन्धं तुल्ययुक्तं विलिखेदर्घ्यमण्डलम्।
वेदास्रवृत्तषट्कोणत्रिकोणाभ्यन्तरेऽन्तरे ॥ इति।
एवं चतुरस्रवृत्तान्तरालकोणषट्के षडासनानि सम्पूज्य अमृतार्णवपोताम्बुजा-
त्मचक्रसर्वमन्त्रसाध्यसिद्धासनानि सम्पूज्य षट्कोणान्तरस्थत्रिकोणमध्ये का काम-
गिरिपीठम्, पू पूर्णगिरिपीठम्, जा जालन्ध्रपीठम्, ओ ओड्याणपीठं च क्रमात्²
त्रिकोणकोणेषु त्रयं मध्ये चैकमर्चयित्वा अर्घ्यपादे आधारे तत्र पात्रं प्रतिष्ठाप्याऽ-
भ्यर्च्य तन्मध्ये वह्निबिम्बमभ्यर्च्य तत्परितः कलाश्चाभ्यर्चयेत्। तदुक्तं स्वच्छन्द-
संग्रहे—
'चतुरस्रान्तरालस्थकोणषट्के' इस समस्त पद का यह अर्थ है कि पहले चतुरस्र को
लिखकर उसके अन्दर वृत्त बनावे और उस वृत्त के अन्दर षट्कोण और उसके मध्य में
त्रिकोण का लेखन करे। गोबर से लीप कर पवित्र की गई भूमि में मत्स्य मुद्रा से इस
मण्डल का निर्माण करना चाहिये। इस विषय में श्रीपराक्रम का यह वचन प्रमाण है—
तब गोबर से लीपी गई चतुरस्र भूमि पर, जिधर की श्वास चल रही है, उसी हाथ
से बनाई गई मत्स्य मुद्रा से सभी सुगन्धि द्रव्यों को समान मात्रा में मिला कर अर्घ्य-
मण्डल की रचना करे। चतुरस्र, वृत्त, षट्कोण और त्रिकोण की स्थिति एक दूसरे के
अन्दर बनानी चाहिये॥
इस प्रकार अर्घ्यमण्डल का निर्माण करके चतुरस्र और वृत्त के बीच के छः कोनों
में ¹अमृतार्णव, पोताम्बुज, आत्म, चक्र, सर्वमन्त्र, साध्यसिद्ध नामक छः आसनों की
पूजा करे। तब षट्कोण के अन्तराल स्थित त्रिकोण के—का कामरूप पीठ, जा जालन्धर
पीठ, पू पूर्णगिरि पीठ और ओ ओड्याण पीठ—इन चार पीठों में, अर्थात् त्रिकोण के
तीन कोनों में और बीच में क्रमशः एक एक देवी की पूजा करे। इसके बाद उस पर
अर्घ्यपात्र के आधार की स्थापना और पूजा करके उस आधार पात्र में अग्नि की और
उसके चारों तरफ अग्नि की कलाओं की पूजा करे। स्वच्छन्दसंग्रह में इस विषय में कहा
गया है —
१. णिज्य—ब. विहाय सार्वत्रिकः पाठः। २. क्रमात् त्रिचतुरस्त्रीन् वा चतुरो वा
त्रिकोणकोणेषु चतुरस्रे तन्मध्ये चार्चयित्वा, तत्राधारं प्रतिष्ठाप्य, अर्घ्यपादमाधारम्,
तस्मिन् मध्ये वह्निबिम्ब-क. ग.।
१. अमृतार्णवासन, पोताम्बुजासन, आत्मासन, चक्रासन, सर्वमन्त्रासन और साध्य-
सिद्धासन नामक छः आसनों की चर्चा ज्ञानदीपविमर्शिनी की नामपद्धति में हुई है।
तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २८७
षट्कोणान्तस्त्रिकोणे तु वह्निबिम्बं कलायुतम् ।
आवाह्याधारतो देवि पूजयेन्मन्त्रवित्तमः ॥ इति ।
क्रमाद् यादिक्षान्तदशवर्णपूर्वास्तस्य१ वह्नेर्दशकला धूम्रार्चिराद्या यजेत् ।
तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे—
यादिक्षान्तानि२ वर्णानि कला वह्नेर्महेश्वरि ।
एताः कलाः समभ्यर्च्य स्वस्ववर्णैर्यथाविधि ॥
स्वबीजाद्याश्चतुर्थ्यन्तनाममध्या नमोऽन्तिमाः३ ।
प्रोक्ता वह्निकलामन्त्रा नामानि शृणु साम्प्रतम् ॥
धूम्रार्चिर्नीलरक्ता४ च कपिला विस्फुलिङ्गिनी ।
ज्वालामालिन्यर्चिष्मती तदूर्ध्वं हव्यवाहिनी ॥
अष्टमी कव्यवाहा च रौद्री संहारिणी५ ततः६ ॥ इति ।
[७धूम्रार्चिरू(ष्टा?ष्मा) ज्वलिनी ज्वालिनी विस्फुलिङ्गिनी ।
सुश्रीः सुरूपा कपिला हव्यकव्यवहेश्वरी ॥
(शा० ति० २।१५)
इति तन्त्रान्तरे] ।।९८-११०।।
हे देवि ! उत्तम मन्त्रवेत्ता साधक षट्कोण के अन्तराल में निर्मित त्रिकोण में अर्घ्य-
पात्र की स्थापना कर उसमें अग्नि की कलाओं के साथ अग्निमण्डल की पूजा करे ।।
यहाँ क्रमशः यकार से क्षकार पर्यन्त दस वर्णों के उच्चारण के साथ धूम्रार्चि आदि
दस कलाओं की पूजा की जाती है। स्वच्छन्दसंग्रह में इसकी विधि वर्णित है—
हे महेश्वरि ! यकार से क्षकार पर्यन्त दस वर्ण हैं। अग्नि की कलाएँ भी दस ही हैं।
अपने अपने बीजवर्णों से इनकी पूजा करनी चाहिये। पहले अपना बीजाक्षर, तब चतुर्थी
विभक्ति के साथ नाम तथा अन्त में नमः पद का संयोजन करना चाहिये। अग्नि की
दस कलाओं के ये ही मन्त्र हैं। अब तुम इन कलाओं के नाम सुनो—धूम्रार्चि, नीलरक्ता,
कपिला, विस्फुलिङ्गिनी, ज्वालामालिनी, अर्चिष्मती, हव्यवाहिनी, कव्यवाहा, रौद्री और
संहारिणी ।।
अन्य तन्त्र (शारदातिलक, २।१५) में इन दस कलाओं के नाम ये बताये गये हैं—
धूम्रार्चि, ऊष्मा, ज्वलिनी, ज्वालिनी, विस्फुलिङ्गिनी, सुधी, सुरूपा, कपिला,
हव्यकव्यवहा और ईश्वरी ।।९९-१००।।
१. स्तस्यैव-ख. ने. ज. झ. उ. । २. न्तात्म-क. ग. । ३. न्तिकाः-क. ग. ज. ।
४. लक्ता-क. ग., वक्त्रा-ज., वर्णा-उ. । ५. संवाहिनी-क. ग. । ६ तथा-क. ग. ।
७. 'धूम्रा...न्तरे' नास्ति-ख. ने. झ. उ. ।
२८८ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः
अर्घ्यपात्रं प्रतिष्ठाप्य तत्र सूर्यकला यजेत् ॥ १००॥
पात्रे सूर्यकलाश्चैव कभादि द्वादशार्चयेत् ।
¹पात्रे अर्घ्यपात्रमध्ये, सूर्यबिम्बमभ्यर्च्य । तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे—
²अस्त्रप्रक्षालितं शङ्खं स्थापयित्वा तथोपरि ।
हृदयात् सूर्यबिम्बं च समावाह्य स्वमन्त्रतः ॥ इति ।
अत्र सूर्यकलाः पूजयेत् ।
कादिठान्तं भादिडान्तं वर्णजातं ³क्रमोत्क्रमात् ।
द्वयं द्वयं ⁴प्रयोक्तव्यं कलाश्च तदनन्तरम् ॥
इत्यस्मदुक्तरीत्या कभादि ककारादिभकारादि वर्ण⁵युगलयुक्तद्वादशादित्यकलाः
क्रमात् तपिन्याद्या द्वादश अर्चयेत् । तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे—
आधार पर अर्घ्यपात्र को स्थापना करके वहां सूर्य और उसकी कलाओं का
पूजन करे । सूर्य को बारह कलाओं का पूजन ककार आदि तथा भकार आदि
बारह-बारह वर्णों से किया जाता है ॥१००-१०१॥
आधार पर स्थापित उस पात्र में सूर्यमण्डल की पूजा करनी चाहिये । इस विषय
में स्वच्छन्दसंग्रह में बताया गया है—
उस आधार पर अस्त्र मन्त्र से प्रक्षालित शंख की स्थापना करे और उस पात्र में
अपने हृदय में से सूर्यमन्त्र के द्वारा सूर्य का आह्वान कर उस पात्र में स्थापित करे ॥
इसी पात्र के चारों तरफ सूर्य की कलाओं का पूजन करे । जैसा कि ¹हमने
बताया है—
ककार से ठकार पर्यन्त बारह वर्णों का उच्चारण क्रम से तथा भकार से डकार
पर्यन्त बारह वर्णों का उच्चारण व्युत्क्रम (उलटा क्रम) से किया जाता है । इस तरह से
दो-दो वर्णों का प्रयोग कर तब कलाओं का उच्चारण करे ॥
इस तरह से ककार आदि और भकार आदि दो-दो वर्णों का उच्चारण करते हुए
सूर्य की तपिनो आदि बारह कलाओं का पूजन करे । स्वच्छन्दसंग्रह में इस विषय का
वर्णन मिलता है—
१. पात्रमभ्यर्च्य पात्रमध्ये–ख. ने. ज. झ. उ. । २. अथ प्र–ख. ज. उ. ।
३. क्रमोऽक्रमात्–क. ग., क्रमात् क्रमात्–ने. झ. । ४. च वक्तव्यम्–ख. ने. झ. उ. ।
५. युग्म–ख उ. ।
- अमृतानन्द के मुद्रित ग्रन्थों में यह वचन नहीं मिलता । उनके अप्रकाशित ग्रन्थ
तत्त्वविमर्शिनी का यह हो सकता है ।
तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २८९
कादिठान्ताक्षरा देवि मूर्तिनाम्ना समीरिताः ।
तपिनो तापिनी चैव शोधनी शोषणी तथा ॥
भ्रामणी क्लेदिनी चैव वरेण्याकर्षिणी तथा ।
सुषुम्ना ^१वृष्टिवाहा च ज्येष्ठा चैव हिरण्यदा ॥
एताः सौरकलाश्चैव व्युत्क्रमाद् ^२भादिडान्तिमाः । इति ।
^३कभादिकथनाद् यकारादयो दश वह्निकलाः, अकारादयः षोडशः ^४स्वराः
सोमकला इति गम्यते । तत्र पात्रे लवङ्गादिभिः सुगन्धिकुसुमैश्च^५ वासितं
सलिलमापूर्य तस्मिन्निन्दुमण्डलमभ्यर्च्य । तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे—
एलालवङ्गकङ्कोलान् जातीफलसुसंयुतान् ।
सुगन्धिकुसुमैर्द्रव्यैः^६ सह तस्मिन् जले क्षिपेत् ॥ इति ।
नवयोनिं समालिख्य पूर्ववज्जलमध्यतः ।
विशुद्धितः समावाह्य ^७चन्द्रमण्डलमर्चयेत् ॥
इति (च) ॥१००-१०१॥
हे देवि ! ककार से ठकार पर्यन्त अक्षरों वाली सूर्य की मूर्ति मानी जाती है। तपिनो
तापिनी, शोधनी, शोषणी, भ्रामणी, क्लेदिनी, वरेण्या, आकर्षणी, सुषुम्ना, वृष्टिवाहा,
ज्येष्ठा और हिरण्यदा—ये बारह सूर्यकलाएँ हैं। इनमें भकार से डकार पर्यन्त वर्णों का
भी व्युत्क्रम से विन्यास किया जाता है ॥
कभादि को यहाँ सूर्य की कला बताया गया है। तदनुसार यकार आदि दस वर्ण
वह्नि की कलाएं तथा अकार आदि सोलह स्वर सोम की कलाएं हैं, इसकी जानकारी हो
जाती है। इस तरह से शंख पात्र में सूर्यमण्डल और उसकी कलाओं के पूजन के बाद
उस पात्र में लवङ्ग आदि सुगन्धि द्रव्यों और पुष्पों से सुवासित जल भरे और तब उसमें
चन्द्रमण्डल की पूजा करे, जैसा कि स्वच्छन्दसंग्रह में बताया गया है—
इलायची, लौंग, कक्कोल, जायफल आदि सुगन्धि द्रव्यों के साथ सुगन्धित पुष्पों से
सुवासित जल उस पात्र में भरे। ^1पहले नवयोनि चक्र का निर्माण करे और तब जलीय
धारणा के सहारे विशुद्धि चक्र से चन्द्रमण्डल का आह्वान कर वहाँ उसकी पूजा
करे ॥१००-१०१॥
१. तुष्टि-ख. ने. । २. डादिभान्तिमाः-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. कठादि-झ. ।
४. कलाः-ने. ज. झ. उ. । ५. मैर्वा वासितममृतसलिल-ख. ने. । ६. दिव्यैर्महत्तस्मिन्
जलं किरेत्-ख. ने. झ. उ. । ७. चतुरस्रे सम-ख. ने. छ. ज. झ. उ. ।
- यहाँ के दोनों श्लोक स्वच्छन्दसंग्रह के ही लगते हैं।
Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)