सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १५७
शब्दस्पर्शरूपरसगन्धपञ्च ¹गुणान्वितम् ।
पृथिवीतत्त्वमाख्यातं ²कठिनं सर्वधारणम् ॥
पृथ्व्यादिव्योमतत्त्वान्त³पञ्चकं पूर्वपूर्वकम् ।
कार्यदृष्ट्या⁴ समावृत्य वर्तते पञ्चकं क्रमात् ॥ इति⁵ ॥
पूर्वं विद्यास्थहकारपञ्चकस्य पञ्चभूतस्थितशब्दपञ्चक⁶लक्षकतामुक्त्वे-
दानीं ⁷वाय्वादिभूतचतुष्टयगतं स्पर्शचतुष्टयं वायुवाचकबीजैर्लक्षयति—
महामायात्रयेणापि कारणेन च बिन्दुना ॥ ३८ ॥
वाय्वग्निजलभूमीनां स्पर्शानां च चतुष्टयम् ।
उत्पन्नं भावयेद् देवि स्थूलसूक्ष्मविभेदतः ॥ ३९ ॥
महामाया ईकारः, तेषां त्रयं बीजत्रयशिखरवर्तिनामीकाराणां बिन्दुद्वयार्ध-
मात्रामयानां त्रयम् । कारणेन च बिन्दुना तदक्षर⁸त्रयकारणेनाकारहकारसामरस्य-
रूपेण कामाख्येनोर्ध्वबिन्दुना । वाय्वग्निजलभूमीनां स्पर्शानां चतुष्टयमुत्पन्नं
ये चार गुण रहते हैं । यह तत्त्व संग्रह क्रिया का निष्पादक है । शब्द, स्पर्श, रूप, रस
और गन्ध इन पाँच गुणों से युक्त पृथिवी तत्त्व है । यह कठोर है और सबको धारण
करने वाला है । पृथिवी से लेकर आकाश पर्यन्त पाँच तत्त्वों में पहला तत्त्व अपने कार्य
तत्त्व को अपने में समेटे हुए रहता है ॥
विद्यास्थित पाँच हकार पाँच भूतों में स्थित पाँच शब्दों को लक्षित करते हैं, इस
विषय का वर्णन करने के उपरान्त अब बताया जा रहा है कि विद्यागत वायुवाचक
बीजों से वायु प्रभृति चार भूतों के चार प्रकार के स्पर्शों को लक्षित किया जाता है—
हे देवि ! तीन महामायाओं और कारण बिन्दु से वायु, अग्नि, जल और
भूमिगत चार स्पर्शों को उत्पति हुई है, ऐसी भावना करनी चाहिये, क्योंकि
स्थूल और सूक्ष्म भूत के क्रम से स्पर्श गुण की अनुवृत्ति चार भूतों में मानी
जाती है ॥३८-३९॥
महामाया शब्द यहाँ ईकार का वाचक है । श्रीविद्या में तीन ईकार हैं । इनकी स्थिति
तीनों बीजों के अन्त में है तथा इनका आकार दो बिन्दु और हार्धकला से बना है ।
इनके अतिरिक्त एक कारण बिन्दु भी है । यह तीनों ईकाराक्षरों का कारण है और
इसकी स्थिति अकारहकारसामरस्यमय ऊर्ध्व बिन्दु के रूप में है, जिसको काम बिन्दु
१. गुणात्मकम्–ख. ने. ज. उ. । २. कथितं–ख. ज. उ. । ३. तत्त्वान्तं–ज. झ. उ. ।
४. कार्यं व्यत्यास–ने. ज. झ. । ५. इतः परं केवलं कपुस्तके विद्यमानः पाठोऽग्रे
सूक्ष्माक्षरेषु स्थापितः । ६. पञ्चकं पूर्वं कथयित्वे–क. ग. । ७. वायुवाचकैरक्षरैस्तद्गुणं
स्पर्शचतुष्टयं लक्षयतीत्याह–ने. ज. झ. उ. । ८. त्रयं नास्ति–ख. ने. ज. झ. उ. ।

१५८ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः
लक्ष्यं भावयेत् । स्थूलसूक्ष्मविभेदतः । सूक्ष्माणि पृथिव्यप्तेजांसि, स्थूलो वायुरर्वा-
चीनेभ्यः । अत एव एवंविधेन ईकारत्रयेणापि लक्षिता बिन्दवः ¹षट्संख्याकाः ।
कारणं बिन्दुः समष्टिवृत्तं हि, षड्बिन्दुलाञ्छितवृत्तात्मकत्वाद् वायुमण्डलस्य ।
तदुक्तमभियुक्तैः—"कण्ठादितालुपर्यन्तं वृत्तं षड्बिन्दुलाञ्छितम् । धूम्रम्" इति ।
[एवमन्यत्रापि—
समष्टिबिन्दुना वायुः स्थूलसूक्ष्मप्रभेदतः ।] तद्वायुमण्डलवाचकेन ईकारत्रयेण
समष्टिबिन्दुना च स्थूलसूक्ष्मविभेदतो वाय्वादि²भूतचतुष्टयस्थितं स्पर्शचतुष्टयं
लक्षयेदित्यर्थः ॥ ३८-३९ ॥
वायुवाचकैर्वायुगुणं स्पर्शचतुष्टयं लक्षयित्वेदानीं तेजोवाचकैरक्षरैस्तद्गुणं
रूपत्रयं लक्षयति—

कहते हैं । इन तीन ईकारों और कारण बिन्दु से वायु, अग्नि, जल और भूमिगत चार
प्रकार के स्पर्श उत्पन्न हुए हैं, ऐसी भावना करनी चाहिये । इन चतुर्विध स्पर्शों की
उत्पत्ति स्थूल-सूक्ष्म के भेद से होती है । इनमें पृथिवी, जल और तेज सूक्ष्म तथा वायु
इनसे स्थूल है । ऊपर बताया गया है कि ईकार का स्वरूप दो बिन्दुओं से बना है । तीन
ईकारों में मिलकर छः बिन्दु हुए और कारण बिन्दु समष्टि वृत्त का स्वरूप धारण कर
लेता है । इस तरह से छः बिन्दुओं से लांछित वृत्ताकार ¹वायुमण्डल का स्वरूप इससे
बन जाता है । किसी अभियुक्त ने वायुमण्डल का स्वरूप बताया है—"कण्ठ से तालु पर्यन्त
वृत्ताकार छः बिन्दुओं से लांछित वायुमण्डल होता है । यह धूम्र वर्ण का है" । ²[अन्यत्र भी
कहा गया है—"स्थूल और सूक्ष्म के भेद से समष्टि बिन्दु वायुमण्डल का बोध कराता
है ।"] इस तरह से वायुमण्डल के वाचक तीन ईकार और समष्टि बिन्दु में स्थूल और
सूक्ष्म के भेद से वायु प्रभृति चार भूतों में विद्यमान चार स्पर्शों की भावना करनी
चाहिये ।।३८-३९।।
विद्यागत वायुवाचक अक्षरों से वायु के गुणभूत चार स्पर्शों को लक्षित करने के बाद
अब तेजोवाचक अक्षरों में तेजोगत रूपत्रय की भावना बताते हैं—

१. षट् सन्ति—ख. ने. ज. झ. उ. । २. 'भूत' नास्ति—ख. ने. ज झ. उ. ।
१. वायुमण्डल का यह स्वरूप मूल ग्रन्थ (१।४२) में भी बताया गया है ।
२. कोष्ठक में संस्कृत के जिस अंश की व्याख्या की गई है, वह केवल एक मातृका
में उपलब्ध है और पूर्व श्लोक की व्याख्या में महास्वच्छन्दसंग्रह के उद्धरण के बाद
रखा गया है । वहाँ उसकी कोई प्रासंगिकता नहीं है, अतः हमने प्रसंग के अनुसार इसको
यहाँ रखकर उसका भाषानुवाद किया है ।

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १५९
रूपाणां त्रितयं तद्वत् त्रिभी रेफैर्विभावितम् ।
रूपाणां त्रितयं वह्निवारिभूमिष्ठानां रूपाणां त्रितयं त्रिभो रेफैर्विभावितं
लक्षितम् ॥
ननु रूपं पृथिव्यप्तेजसां साधारणम्, कथं तेजोबीजेन रेफेण लक्षितमित्यत
आह—
प्रधानं तेजसो रूपं तद्बीजेन हि जन्यते ॥४०॥
१सत्यं त्रिष्वपि भूतेषु विद्यते रूपम्, तथापि वाय्वाकाशयोरभावात् प्रथमं
तेजस एव२ रूपं प्रधानम् । पश्चादितरयोर्भूतयोस्तद्बीजेन रेफेण जन्यते ३प्रका-
श्यते । जननं प्रादुर्भावः ॥४०॥
पूर्वं तेजोवाचकैरक्षरैस्तेजोगुणं रूपत्रयं लक्षयित्वेदानीमब्वाचकैरक्षरैस्तद्गुणं
रसद्वयं लक्षयति—
विद्यास्थैश्चन्द्रबीजैस्तु स्थूलः सूक्ष्मो रसः स्मृतः ।
इसी तरह से विद्यागत तीन रेफों में तीन रूपों की भावना करे ॥
तेज, जल और पृथिवीगत रूप ही रूपत्रय के नाम से वर्णित है । विद्यागत तीन रेफों
से इनकी उत्पत्ति हुई है, ऐसी भावना करनी चाहिये ॥
रूप गुण पृथिवी, जल और तेज तीनों में रहता है, तब इसकी उत्पत्ति अग्निबीज
रेफ से कैसे मानी जाती है ? इसका समाधान करते हैं—
रूप गुण प्रधानतः तेजस्तत्त्व में ही रहता है, अतः उसकी उत्पत्ति अग्निबीज
से ही मानी जाती है ॥४०॥
आपका यह कहना ठीक है कि तीनों भूतों में रूप रहता है, तो भी वायु और
आकाश में तो यह है नहीं । उसके बाद प्रधानतः इसकी स्थिति सर्वप्रथम अग्नि में ही
मानी जाती है । जल और पृथिवी में रूप की उत्पत्ति इसके बाद ही होती है और वह
भी अग्निबीज रेफ के द्वारा ही लक्षित होती है । इस तरह अग्निबीज रेफ ही तीनों तत्त्वों
में रूप को प्रकाशित करता है । इस पूरे प्रकरण में उत्पत्ति का अर्थ प्रादुर्भाव करना
चाहिये ॥४०॥
इस तरह से अग्नितत्त्व के वाचक अक्षरों से त्रिविध रूपों की उत्पत्ति बताने के बाद
अब जलतत्त्व के वाचक अक्षरों से दो प्रकार के रसों की उत्पत्ति बताते हैं—
विद्यागत चन्द्रबीजों से स्थूल और सूक्ष्म रस की निष्पत्ति होती है ॥
१ 'सत्यं' नास्ति—ख. ने. ज. झ. उ. । २. 'एव' नास्ति—ख. ने. ज. झ. उ. ।
३. 'प्रकाश्यते' नास्ति—ख. ने. ज. झ. उ. ।

१६० योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः
१विद्याबीजस्थैश्चन्द्रबीजैः सकारैः। अभिधानमात्रमेतत्। तदुक्तमभि-
युक्तैः—
व्योमेन्दुवह्न्यधरबिन्दुभिरेकमन्य२द्रक्ताच्छकेन्द्रशिखिभिः सरमार्थचन्द्रैः।
अन्यद् द्युशीतकरपावकमन्वमन्तैर्बीजैरमोभिरुदिता त्रिपुरेति विद्या॥ इति।
(प्र० सा० ९।३)
स्थूलः सूक्ष्मः। स्थूलो रसोऽप्तत्त्वगतः, व्यापकत्वात्। सूक्ष्मो रसो भूतत्त्वगतः,
व्याप्यत्वात्। स्मृतः भावितः। स्मृतिर्हि भावना॥
ननु विद्यायां३ सकारत्रयमस्ति, अप्पृथिव्योस्तु रसद्वयमेव, इतरेण सकारेण
किमुच्यत इत्यत आह—
श्रीविद्या के बीजों में चन्द्रबीज (सकार) भी है। चन्द्रबीज सकार का १अभिधान
है, इसमें प्रपंचसार का यह वचन प्रमाण है—
व्योम हकार, इन्दु सकार, वह्नि रेफ, अधर ऐकार, बिन्दु अनुस्वार—इन सबके मिलने
पर त्रिपुरा विद्या का प्रथम बीज; रक्त हकार, अच्छ सकार, ककार, इन्द्र लकार,
शिखी रेफ, रमा ईकार, अर्धचन्द्र बिन्दु—इन सबके मिलने पर द्वितीय बीज तथा द्यु
हकार, शीतकर सकार, पावक रेफ, मनु औकार, अमन्त विसर्ग—इन सबके मिलने पर
तृतीय बीज बनता है। इन तीन बीजों वाली विद्या ही २त्रिपुरा विद्या कही जाती है।
जलतत्त्वगत रस स्थूल (व्यापक) और पृथिवी तत्त्वगत सूक्ष्म (व्याप्य) है, क्योंकि पृथिवी
की अपेक्षा जलतत्त्व अधिक व्यापक (बड़ा) है। अतः जलगत रस की स्थूल (व्यापक)
रूप में और पृथिवीगत रस की सूक्ष्म (व्याप्य) रूप में भावना की जाती है॥
प्रश्न उठता है कि विद्या में तो तीन सकार हैं, जल और पृथ्वी में रस दो ही प्रकार
का है, तब तीसरे सकार का क्या प्रयोजन है—
१. 'विद्याबीजस्थैः' नास्ति—ख. ने. ज. ब. उ.। २. 'रक्ताच्छ....विद्या' नास्ति—
ख. ग. ने. ज. ब.। ३. विद्यायामस्यां—ख. ने. ज. झ. उ.।

  1. इसका अभिप्राय यह है कि चन्द्र शब्द से सकार का बोध होता है। प्रपंचसार
    के जिस वचन को यहाँ प्रमाण के रूप में उद्धृत किया गया है, उसमें चन्द्र शब्द से
    विद्यागत सकार का उद्धार बताया गया है।
  2. नि० षो० की व्याख्या ऋजुविमर्शिनी (पृ० १०६) में इस श्लोक को आवाहनी
    विद्या के प्रसंग में उद्धृत किया गया है। इस विद्या का विनियोग त्रिपुरा के आवाहन
    के लिये किया जाता है, अतः प्रपंचसार में यह त्रिपुरा के नाम से ही संबोधित कर
    दी गई है।

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १६१
संबन्धो विदितो लोके रसस्याप्यमृतस्य च ॥४१॥
अमृतस्य सुधाया रसस्यापि संबन्धो लोके विदितः सुरासुरैरपांनिधौ मध्य-
माने तत्सारभूतममृतं समुदितमिति पुराणप्रसिद्ध्या¹ लोके विदितः² परिज्ञातः³ ।
अत्राप्तत्त्वसारभूतत्वात् तद्गुणो रसस्तृतीयसकारेण लक्ष्यते । कोऽर्थः ? अप्त्तत्त्वं
स्थूलम्, अमृतं तत्सारभूतं सूक्ष्मम्, तद्व्याप्या पृथिवी च सूक्ष्मा । तेन सलिलामृत-
पृथिव्यन्तरे⁴ त्रिधा स्थितो रसो विद्यास्थैस्त्रिभिः सकारैर्लक्ष्यत इत्यर्थः ॥४१॥
पूर्वमब्वाचकैरक्षरैरबगुणं रसत्रयं लक्षयित्वेदानीं पृथिवीवाचकैर्वर्णैः पृथिवीगुणं
गन्धं लक्षयति—
⁵वसुन्धरागुणो गन्धस्तल्लिपिर्गन्धवाचिका ।
वसुन्धरायाः पृथिव्याः, गुणो गन्धः । तल्लिपिः पृथिवीवाचकवर्णो लकारः ।
गन्धवाचिका गन्धस्य⁶ परिभाषणकरी ।
लोक में अमृत रस का भी संबन्ध विदित है । इस अमृत का ही तृतीय
सकार से बोध होता है ॥४१॥
अमृत (सुधा) के रस का भी संबन्ध लोक में विदित है कि देव और दानवों ने
मिलकर क्षीरसमुद्र का जब मन्थन किया था, तो समुद्र के जल से उसके सार के रूप में
अमृत निकला था । पुराणवर्णित यह कथा लोक में प्रसिद्ध है । यह अमृत जलतत्त्व का
सार है । अतः जल का यह अमृतमय रस विद्यागत तृतीय सकार से लक्षित होता है ।
इनमें जलतत्त्व स्थूल (व्यापक) है । जलतत्त्व का सारभूत अमृत सूक्ष्म (व्याप्य) है और
जलतत्त्व की व्याप्य पृथिवी का रस भी सूक्ष्म (व्याप्य) है । इस तरह जल, अमृत और
पृथिवी में विद्यमान त्रिविध रस विद्यागत तीन सकारों से लक्षित होता है ॥४१॥
इस तरह जलतत्त्व के वाचक अक्षरों से त्रिविध रस को लक्षित करने के बाद
अब पृथिवीवाचक वर्णों से पृथिवीगत गन्ध गुण की वासना बताते हैं—
गन्ध पृथिवी का गुण है । पृथिवी का वाचक वर्ण इस गन्ध को लक्षित
करता है ॥
वसुन्धरा (पृथिवी) का गुण गन्ध है । उसकी लिपि, अर्थात् पृथिवी तत्त्व का
वाचक वर्ण लकार, गन्ध की वाचिका है, पृथिवीवाचक वर्ण तद्गत गन्ध को भी
लक्षित करता है ॥
१. प्रसिद्धं-ख. ने. ज. उ. । २. 'विदितः' नास्ति-ख. ज. झ. उ. । ३. ज्ञातम् ।
अतोऽमृतसार-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. न्तरस्थितो-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. वसु-
नामाऽपि गन्ध-क. । ६. गन्धस्य प्रकाशिका-ने. ज. झ. उ.
११

१६२ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः
ननु विद्यायां लकारत्रयमस्ति, तत्रैकेन लकारेण पृथिवी १संस्थितो गुणो गन्धो
लक्षितः, शिष्टाभ्यां २लकाराभ्यां किं क्रियत इत्यत आह—
भुवनत्रयसंबन्धात् त्रिधात्वं तु महेश्वरि ॥४२॥
भुवनत्रयं लोकत्रयम्, तत्संबन्धात् लोकत्रयाधारत्वात्, आधाराधेयभावः३
संबन्धः, तस्मात् संबन्धाद्धेतोः पृथिव्या ४स्त्रिधात्वम्। तेन पृथिवी ५भागत्रयगत-
गन्धत्रयलक्षकं लकारत्रयमित्यर्थः ॥४२॥
“हकाराद् व्योम संभूतं ककारात्तु प्रभञ्जनः” (२।२९) ६इत्यत्र वायुवाचक-
तयोक्तस्य७ ककारस्य प्रमातृवाचकत्वेनापि वक्तुं शक्यत्वादन्यैरक्षरैः स्पर्शचतुष्टयं
लक्षयित्वेदानीं ककारत्रयेण प्रमातृत्रयं लक्षयति—
अशुद्धशुद्धमिश्राणां प्रमातॄणां परं वपुः।
क्रोधीशत्रितयेनाथ विद्यास्थेन प्रकाश्यते ॥४३॥
यहाँ पुनः प्रश्न उठता है कि विद्या में तो तीन लकार हैं, इनमें से एक से पृथिवीगत
गुण गन्ध लक्षित हो जायगा, बाकी दो लकारों का क्या प्रयोजन है ? अब इसी का
उत्तर देते हैं—
हे महेश्वरि ! भुवन (लोक) तीन होते हैं। इन तीनों भुवनों को लक्षित
करने के अभिप्राय से विद्या में तीन लकार स्थित हैं ॥ ४२ ॥
पृथिवी तीनों भुवनों (लोकों) से संबद्ध है। तीनों लोक इसी पर ठहरे हुए हैं, अतः
इनमें परस्पर आधाराधेयभाव संबन्ध है। इस संबन्ध के कारण पृथिवी तीन लोकों के रूप
में विभक्त मान ली जाती है। पृथिवी के इन तीन भागों में विद्यमान तीन गन्धों को
लक्षित करने के लिये ही विद्या में तीन लकार स्थित हैं ॥ ४२ ॥
पहले (२।२९) बताया गया है कि हकार से आकाश और ककार से वायुतत्त्व की
अभिव्यक्ति हुई। वायुतत्त्व के वाचक विद्यागत ककार तीन प्रमाताओं के भी वाचक हो
सकते हैं, अतः महामाया प्रभृति वर्णों से स्पर्शचतुष्टय की वासना (२।३८) बता कर
अब यहाँ विद्यागत तीन ककार वर्णों से तीन प्रमाताओं को लक्षित करते हैं—
अशुद्ध, शुद्ध और मिश्र स्वभाव वाले त्रिविध प्रमाताओं का वासनात्मक
स्वरूप विद्यागत तीन क्रोधीश ( ककार ) वर्णों से लक्षित होता है ॥ ४३ ॥
१. 'संस्थितो' नास्ति—ख. ने. ज. झ. ड. । २. 'लकाराभ्यां' नास्ति—ख. ने. ज.
झ. ड. । ३. 'भावः' नास्ति—ख. ने. ज. झ. ड. । ४. स्त्रित्वम्—ख. ने. ज. झ. ड. ।
५. भागत्रयाल्लोकत्रय—क. ग. । ६. इत्येवं—ख. ने. ज. झ. ड. । ७. क्तस्यापि—
झ. ड. । ८. णां प्र—ख. ने. ज. झ. ड. । ९. न्थितो—ख. ज. ।

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १६३
अशुद्धाः प्रमातारो भेद¹धीमात्रसाराः शिवाहमभावभावनाविहीनाः सकलाः
पशवः । तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे—
पशवस्त्रिप्रकाराः स्युस्तेष्वेके सकला मताः ।
प्रलयाकलनामानस्तेषां केचिन्महेश्वरि ॥
विज्ञानकेवलास्त्वन्ये तेषां रूपं क्रमाच्छृणु ।
अनादिमलसंच्छन्नो मायाकर्मवृतोऽविभुः ॥
शरीरी शिवतत्त्वाज्ञो² भेदैकरसिको लघुः ।
सर्वदा कर्मकर्ता³ च स्वकर्मफलभोजकः ॥
नित्यं विषयसंसक्तो⁴ बोध्यः शोध्यः पुमानयम् । इति ।
शुद्धाः प्रमातारः पक्वमलविज्ञानाः शिवतावन्मात्रसारा ⁵विज्ञानकेवलाः पशवः ।
तदुक्तं ⁶स्वच्छन्दसंग्रहे—
मात्र भेदबुद्धि की ही जिनमें प्रधानता रहती है, ऐसे प्रमाता अशुद्ध वर्ग के अन्त-
र्गत आते हैं । मैं शिव ही हूँ, इस तरह की भावना वे नहीं कर पाते । इनको सकल पशु
कहा जाता है । स्वच्छन्दसंग्रह में ये इस तरह से वर्णित हैं—
पशु तीन प्रकार के होते हैं । कुछ सकल पशु होते हैं । हे महेश्वरि ! इनमें से कुछ
प्रलयाकल नाम वाले और दूसरे ¹विज्ञानकेवल नाम वाले बन जाते हैं । तुम इन तीनों
पशुओं के स्वरूप को क्रमशः सुनो । अनादि आणव मल से घिरा हुआ, मायीय और कार्म
मल से भी आवृत पशु अपने विभु (व्यापक) स्वरूप को खो बैठता है । वह अपने शरीर तक
ही सीमित हो जाता है । शिवतत्त्व को वह नहीं जान पाता । उसमें भेदबुद्धि (द्वैत दृष्टि)
की ही प्रधानता रहती है । वह बहुत लघु हो जाता है, अपने चंचल (हलके) स्वभाव के
कारण अपनी गंभीरता को खो बैठता है । वह सदा अच्छे-बुरे कर्म करता रहता है और
फिर अपने किये इन कर्मों का फल भी भोगता रहता है । विषयों में सदा आसक्त रहने
वाले इस सकल नाम के पशुप्रमाता का बोधन और शोधन आवश्यक है, मन्त्रोपदेश और
दीक्षा द्वारा गुरु को इनका बोधन और शोधन करना चाहिये ॥
मायीय और कार्म मल जिनके परिपक्व हो गये हैं, द्वैत दृष्टि के हट जाने से जो
अपने को शिवममय ही समझते हैं, ऐसे शुद्ध प्रमाता विज्ञानकेवल नामक पशु कहलाते हैं ।
स्वच्छन्दसंग्रह में ये इस तरह से वर्णित हैं—
१. 'धी' नास्ति—ख. ने. ज. उ. । २. तत्त्वज्ञो—ख. ग. झ. उ. । ३. कान्तारे—
ज. । ४. संरक्तो भाव्यः साध्यः—ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ५. ज्ञान—ख. ने. ज. झ. ।
६. महास्व—ख. ग. झ. उ. ।
१. सिद्धान्त शैव ग्रन्थों में वर्णित विज्ञानाकल को ही यहाँ विज्ञानकेवल नाम से दिया
गया है । अशुद्ध, शुद्ध और मिश्र प्रमाताओं के क्रम के आधार पर यहाँ सकल, विज्ञान-

१६४ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः
मलमात्रेण संच्छन्नः¹ पशुर्विज्ञानकेवलः ।
सुपक्वमलविज्ञानकेवलः स स्वयं प्रिये ॥
²सुतीव्रशक्तिपातेन कुरुते ³तान् स केवलान् । इति ।
मिश्राः प्रमातारः पुर्यष्टकसूक्ष्मशरीरमात्रसंबद्धाः प्रारब्धकर्मानुभवार्थमनेक-
योनिषु संभूय तत्तत्कर्म⁴फलानुभवेन कर्मद्वयसाम्ये सति सुपक्कमलकर्माणो गुरुं
विनाऽपि⁵ शिवानुग्रहशालिनः क्रियाज्ञानसाधारणाः प्रलयाकलाः पशवः । तदुक्तं
स्वच्छन्दसंग्रहे—
मिश्राः प्रमातृरूपाः स्युः प्रलयाकलसंज्ञकाः ।
पुर्यष्टकशरीराश्च स्वस्वकर्मवशात् प्रिये ॥
जो केवल आणव मल से घिरा हुआ है, ऐसे पशु को विज्ञानकेवल कहते हैं।
मायीय और कार्म मल के परिपक्व हो जाने से यह विज्ञानकेवल अपने को शिव से
अभिन्न मानने लगता है। हे प्रिये ! भगवान् शिव स्वयं ही ऐसे व्यक्तियों को ¹तीव्र-
तम शक्तिपात के द्वारा इस तरह की केवलता प्रदान करते हैं ॥
मिश्र प्रमाता वे हैं, जो कि ²पुर्यष्टक के नाम से प्रसिद्ध सूक्ष्मशरीर से संबद्ध हैं।
अपने प्रारब्ध कर्मों के फलों का उपभोग करने के लिये अनेक योनियों में जन्म लेकर
इन्होंने अन्ततः अपने अनुभव के आधार पर शुभ और अशुभ कर्मों में समता दृष्टि प्राप्त
कर ली है और इस तरह से इनका कार्म मल पूर्ण परिपक्व हो गया है। बिना गुरु के
भी इनके ऊपर शिव का अनुग्रह हो जाता है और ऐसे व्यक्ति कर्म और ज्ञान में कोई
भेद नहीं देखते । इनको प्रलयाकल पशु कहा जाता है। इनका स्वच्छन्दसंग्रह में इस
तरह का वर्णन है—
मिश्र स्वरूप वाले प्रमाता प्रलयाकल कहलाते हैं। पुर्यष्टक नाम से वर्णित सूक्ष्मशरीर
मात्र से ये संबद्ध रहते हैं। हे प्रिये ! अपने-अपने कर्मों के कारण ये अनेक योनियों में जन्म
१. संबद्धः-क. ख. । २. स्वतीव्र-ख. ने. झ. उ. । ३. ज्ञांश्च-उ. । ४. 'फल'
नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. 'अपि' नास्ति-ख. ज. झ. ।
केवल और प्रलयाकल यह क्रम दिया गया है। वस्तुतः सकल, प्रलयाकल, विज्ञानकेवल
यही क्रम शास्त्रसंमत है।
१. तन्त्रसार (पृ० ११९-१२०), तन्त्रालोक (१३।२११-२५४) आदि में प्रथमतः मृदु,
मध्य और तीव्र के भेद से तीन प्रकार का तथा इनमें से प्रत्येक के तीन भेद कर नौ प्रकार
का शक्तिपात वर्णित है। तीव्रतीव्र शक्तिपात को ही यहाँ तीव्रतम शक्तिपात कहा गया है।
२. पुर्यष्टक शब्द की संक्षिप्त और विस्तृत व्याख्या के लिये क्रमशः विज्ञानभैरव
(पृ० ५३-५४) की तथा लुप्तागमसंग्रह, द्वितीय भाग के उपोद्घात (पृ० १३२-१३३)
की टिप्पणियाँ देखिये।

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १६५
सर्वयोनिषु संभूये भोगार्थं स्वस्वकर्मणाम्।
भुक्त्वा भोगानि तेषां तु कर्मसाम्ये शिवः स्वयम् ॥
सुपक्वमलकर्माणस्तान् किञ्चिदनुगृह्य च।
जलतत्त्वादितत्त्वानां मध्ये लोकेश्वरास्त्रिधा ॥ इति।
²तेषां त्रिविधानां प्रमातृणाम्। वपुः स्वरूपम्। परमन्यत्। क्रोधीशत्रितयेन
श्रीकण्ठन्यासपरिपाट्या क्रोधीशः ककारः, तेषां त्रितयेन। विद्यास्थेन बीजत्रित-
यस्थेन। प्रकाश्यते व्यज्यते। कोऽर्थः ? बीजत्रयगतककारत्रयेण सकल-विज्ञान-
लेते हैं और अपने अपने कर्मों का फल भोगते हैं। भोगों का उपभोग पूरा हो जाने पर
इनके शुभ और ¹अशुभ कर्म एकसे हो जाते हैं। उस समय भगवान् शिव स्वयं ही इनके
ऊपर अनुग्रह करते हैं, क्योंकि इनका कार्म मल पूर्ण परिपक्व हो जाता है। ये तीनों
प्रमाता ²जल, तेज और वायु नामक तीन तत्त्वों के अधिपति बन जाते हैं॥
इन त्रिविध प्रमाताओं का उत्कृष्ट स्वरूप, दीक्षा के बाद उत्पन्न हुआ वागीश्वरी देह,
विद्यागत तीन ककार वर्णों से लक्षित होता है। ³श्रीकण्ठ न्यास की पद्धति से क्रोधीश
ककार का सूचक है। विद्या में तीन क्रोधीश (ककार) हैं। विद्यास्थित इन तीन बीजों से
१. संप्राप्य भोगाद्यं-ख. ने. ज. उ. । २. एषां-ख. ने. उ., एवंविधानां-ज. ।
१. शुभ और अशुभ कर्मों की समान स्थिति को शैव शास्त्रों में कर्मसाम्य नाम दिया
गया है। इसके लिये लुप्ता. द्वि. के उपोद्घात (पृ० १५६-१५७) की टिप्पणी देखिये।
२. अभी पृ० १३८-१३९ की टिप्पणी में जल से प्रकृति पर्यन्त तत्त्वों में जलतत्त्व की,
पुरुष से मायान्त तत्त्वों में तेजस्तत्त्व की तथा ऊपर के तीन तत्त्वों में वायु तत्त्व की स्थिति
बताई गई है। तदनुसार दीक्षाप्राप्त सकल जीव प्रकृत्यण्ड का और प्रलयाकल मायाण्ड का
अधिपति बन जाता है। विज्ञानकेवल महामाया के साम्राज्य में पहुँच जाता है। सकल
प्रमाता तीनों मलों से घिरा हुआ है। प्रलयाकल का कार्म मल परिपक्व हो जाता है
और विज्ञानकेवल के मायीय और कार्म दोनों मल। इसका आणव मल बना रहता है।
मलों की इस स्थिति के आधार पर भी सकल, प्रलयाकल और विज्ञानकेवल यही क्रम
सिद्ध होता है।
३. प्रपंचसार (३।३९-४४) में श्रीकण्ठ से संवर्त पर्यन्त पचास नाम दिये गये हैं।
ये अकार से क्षकार पर्यन्त पचास वर्णों के सूचक है। मन्त्रोद्धार के प्रसंग में अकार आदि
वर्णों का प्रयोग न कर श्रीकण्ठ आदि पदों का ही प्रायः शास्त्रों में उल्लेख रहता है।
इस तरह से अकार से क्षकार पर्यन्त मातृका (वर्णमाला) के न्यास को ही यहाँ दीपिका-
कार ने श्रीकण्ठ न्यास के नाम से स्मरण किया है। तदनुसार क्रोधीश पद ककार का
सूचक है।

१६६ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः
केवल-प्रलयाकलाख्यत्रिविधपशुरूपाऽशुद्ध-शुद्ध-मिश्रप्रमातृत्रयस्वरूपं व्यञ्जयत
इत्यर्थः ॥४३॥
पूर्वं विद्यास्थक्रोधीशत्रितयेन प्रमातृत्रयं लक्षयित्वेदानीं विद्यास्थश्रीकण्ठद्वादश-
मध्ये आद्यदशकेनाव्यक्तम्, अनन्तरेण प्राणम्, चरमेणेशं च लक्षयति—
श्रीकण्ठदशकं तद्वदव्यक्तस्य हि वाचकम् ।
प्राणरूपेः स्थितो देवि तद्वदेकादशः परः² ॥४४॥
श्रीकण्ठदशकं हृल्लेखात्रयवर्जितहकारादिद्वादशाक्षरोपरिगतानामकाराणां
मध्ये श्रीकण्ठदशकम्, श्रीकण्ठा अकाराः, तेषां दशकम् । अव्यक्तो ³जीवोऽनादि-
मलसंच्छन्नतया स्वशिवत्वापरिज्ञानकारणेन्द्रियादिजडवर्गान्तःपातितया विन्यस्तः।
तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे—
अनादिमलसंच्छन्नो मायाकर्मवृतोऽविभुः ।
शरीरी शिवतत्त्वाज्ञो⁴ भेदैकरसिको लघुः ।। इति ।
त्रिविध प्रमाताओं का दीक्षा परिशुद्ध स्वरूप लक्षित होता है। इसका भाव यह है कि
विद्या के तीन बीजों में विद्यमान तीन ककारों से सकल, विज्ञानकेवल और प्रलयाकल
नामक अशुद्ध, शुद्ध और मिश्र नामक तीन प्रमाताओं का स्वरूप व्यक्त होता है ॥४३॥
विद्यास्थित तीन ककारों से तीन प्रमाताओं को लक्षित करने के बाद अब विद्यास्थित
बारह श्रीकण्ठ (अकार) अक्षरों में से प्रथम दस में अव्यक्त की, ग्यारहवें में प्राण और
बारहवें श्रीकण्ठ में ईश की भावना बताते हैं—
विद्यागत दस श्रीकण्ठ (अकार) वर्ण परशिव के समान अव्यक्त जीव के भी
वाचक हैं। हे देवि ! ग्यारहवाँ श्रीकण्ठ प्राणरूप है और बारहवाँ परपुरुष स्वरूप
है ॥४४॥
तीन हृल्लेखाओं को छोड़कर हकार आदि बारह अक्षरों के आगे बारह अकार विद्या
में विद्यमान हैं। इनमें से दस श्रीकण्ठ (अकार) अव्यक्त जीव के वाचक हैं। अनादि मल
से घिरा हुआ जीव अपने शिवत्व को पहचान न पाने के कारण यहाँ अव्यक्त के नाम से
कहा गया है, क्योंकि वह इन्द्रिय आदि जड़ पदार्थों के अधीन होकर स्वयं भी जड़सदृश
हो गया है। स्वच्छन्दसंग्रह के एक श्लोक में इसका स्वरूप बताया गया है। इसका अर्थ
१. भूतः-ख. ग. ने. च. छ. ज. झ. । २. इतः परम्—'परो द्वादशकस्तद्वत् पुरुषस्य
च वाचकः' इति श्लोकार्धं उमातृकायां दृश्यते । ३. जीवः करणेन्द्रियसंच्छन्नतया स्वशिवत्वं
जडवर्गान्तःपातितया च केवलचिन्मात्रतया न मन्यते, अनादिमलसंच्छन्नतया स्वशिवत्वा-
परिज्ञानात्—मातृका। ४. —ज्ञोऽपि—मातृका।

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १६७
तस्य वाचकम् । "अकारः सर्ववर्णाग्र्यः प्रकाशः परमः शिवः" इति संकेतपद्ध-
त्युक्तरीत्याऽकारवाच्यः परमशिवः, परमशिवांशत्वात् । तद्वत् परशिववत् । यथा
परमशिवोऽकारवाच्यः, तथा तदंशभूतो जीवोऽप्यकोरदशकेनोच्यत इत्यर्थः । तद्वद्
जीववत् । यथा शिवांशो जीवः परमशिववाचकश्रीकण्ठेन लक्ष्यते, तद्वद् जीववत्
एकादशश्च श्रोकण्ठो जीवाधारभूतप्राणरूपः स्थितः । प्राणो हि जीवस्याधारः,
प्राणेन विना जीवस्यानवस्थानात् । परः परो द्वादशः श्रीकण्ठः पुरुषस्य वाचकः,
विश्वस्य पूरणात् परमशिवः पुरुषः । तदुक्तं चिद्गगनचन्द्रिकायाम्—
विश्वसद्मनि ^२चिदात्मनीश्वरे पूरणात् पुरुषतामुपेयुषि ।
ये मनः प्रणिदधुर्महर्षयस्तान् पतञ्जलिमुखानुपामहे ॥९॥ इति ।
श्रुतिरपि—"पुरुष एवेदं सर्वम्" (ऋ०१०।९०।२) इति ॥ ४४ ॥
ननु श्रीकण्ठद्वादशकं विद्यायां विद्यते, एकेन शिवः कथ्यते, एकेन जीवः,
एकेन प्राण इति त्रिभिरेवालम्, किमन्यैरित्यत आह—
एकः सन्नेव पुरुषो बहुधा जायते हि सः ।
हम अभी अशुद्ध (सकल) प्रमाता के प्रसंग में कर चुके हैं। संकेतपद्धति के प्रमाण से
सभी वर्णों का आदिभूत अकार प्रकाशात्मक परमशिव का वाचक है। जैसे यह
प्रकाशात्मक परमशिव का वाचक है, उसी तरह से उसके अंशभूत जीव को भी यह बोधित
करता है और जैसे शिवांश जीव परमशिव के वाचक श्रीकण्ठ से लक्षित होता है, उसी
तरह से ग्यारहवें श्रीकण्ठ से जीवन का आधारभूत प्राण भी लक्षित होता है। इस
जीवात्मा का आधार प्राण ही है। प्राण के बिना जीव जीवित नहीं रह सकता। इसके
आगे का बारहवाँ श्रीकण्ठ पुरुष का वाचक है। यह पुरुष विश्व का पूरण करने वाला
परमशिव है। चिद्गगनचन्द्रिका में यह वर्णित है—
चिदात्मा परमेश्वर जब इस विश्वरूपी घर में अपने को पूरित कर देता है, तो वह
(विराट्) पुरुष का स्वरूप धारण कर लेता है। ऐसे पुरुष में जिन्होंने अपने चित्त को
समाहित कर दिया है, उन ^१पतंजलि प्रभृति को हम प्रणाम करते हैं ॥
ऋग्वेद के पुरुष सूक्त में भी कहा गया है—"यह पुरुष ही सब कुछ है" ॥४४॥
यहाँ शंका उठती है कि विद्या में १२ श्रीकण्ठ हैं। इनमें से एक से शिव, दूसरे से
जीव और तीसरे से प्राण का बोध हो जायेगा, ऐसी स्थिति में बाकी के श्रीकण्ठों का
क्या प्रयोजन है ? इसी का समाधान करते हैं—
पुरुष तो एक ही है, किन्तु वह अनेक रूपों में उत्पन्न होता रहता है, अनेक
स्वरूप धारण करता रहता है ॥
१. कारेणोच्यते-ख. ने. ज. झ. उ. । २. शिवात्म-ख. ने. ज. झ. उ., सदात्म-मु. ।

  1. पातंजल योगसूत्र के "ईश्वरप्रणिधानाद्वा" और "क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः
    पुरुषविशेष ईश्वरः" (१।२३-२४) इन दो सूत्रों की ओर यहाँ इंगित किया गया है।

१६८ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः
सत्यमेकेन शिव¹ उच्यते, द्वाभ्यां जीवप्राणौ, तथापि स एकः सन्नेव "एक-
मेवाद्वितीयं ब्रह्म" (त्रि० म० ना० ३।३), "सच्च त्यच्चाभवत्" (तै० उ० २।६)
इत्युपनिषदुक्तरीत्या सद्रूप ²एको हि पुरुषो बहुधा जायते । हिशब्दः प्रसिद्धौ । ³अपि
चास्मिन्नर्थे प्रमाणम्—"इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते" (ऋ० ४।७।३३) इति ।
एक एव हि भूतात्मा भूते भूते व्यवस्थितः ।
एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत् ॥ (ब्र० वि० उ० ११)
इति रीत्या⁴ सत्यमेक एव⁵ शिवो भवति, ⁶तथापि जीवप्राणात्मना ⁷बहुधा
भिन्न इतीममर्थं द्योतयितुं विद्यायां बहवः श्रीकण्ठाः स्थिता इत्यर्थः ॥
अक्षराणां वासनामुक्त्वा बिन्दूनां नादादीनां च वासनामाह—
रुद्रेश्वरसदेशाख्या देवता मितविग्रहाः ॥४५॥
बिन्दुत्रयेण कथिता अमितामितविग्रहाः ।
शान्तिः शक्तिश्च शम्भुश्च नादत्रितयबोधनाः ॥४६॥
यह शंका ठीक ही है कि एक से पुरुष और बाकी दो अकारों से जीव और प्राण का
बोध हो सकता है, किन्तु एक ही सद्रूप पुरुष अनेक रूपों में प्रकट होता रहता है, यह बात
अनेक श्रुतियों में वर्णित है और लोक में भी प्रसिद्ध है । महानारायणोपनिषद् कहती है
कि "ब्रह्म एक ही है, दूसरा कोई नहीं है" । तैत्तिरीयोपनिषद् का कहना है—"वह
ब्रह्म मूर्त और अमूर्त स्वरूप में अभिव्यक्त होता है"। ऋग्वेद का कहना है—
"परमैश्वर्य संपन्न ईश्वर अपनी माया शक्ति के सहारे अनेक रूप धारण कर लेता है"।
ब्रह्मबिन्दूपनिषद् का कहना है—"एक अकेला ही भूतात्मा प्रत्येक प्राणी में विराजमान
है । जल में प्रतिबिम्बित चन्द्रबिम्ब के समान यह एक और अनेक रूपों में भासित होता
रहता है"। इन प्रमाणों के आधार पर जैसे यह सही है कि शिव एक ही है, उसी तरह
से यह भी ठीक ही है कि वह जीव, प्राण आदि के रूप में बहुधा भिन्न भी दिखाई पड़ता
है । इसी अर्थ को बताने के लिये विद्या में अनेक श्रीकण्ठ (अकार) वर्णों की स्थिति है ॥
अक्षरों की वासना को बताने के बाद अब बिन्दु और नाद की भावना का प्रकार
बताते हैं—
परिच्छिन्न स्वरूप वाले रुद्र, ईश्वर और सदाशिव की वासना विद्यागत तीन
बिन्दुओं में की जाती है और अनन्त अपरिच्छिन्न स्वरूप वाले शान्ति, शक्ति
और शिव की वासना तीन नादों में की जाती है ॥४५-४६॥
१. पुरुषः कथ्यते-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । २. एकोऽपि-ख. ने. ज. झ. उ. ।
३. 'अपि च' नास्ति-क. ज. झ. उ. । ४. 'रीत्या' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. ।
५. 'एव' नास्ति-ख. ने. ज. उ. । ६. 'तथापि' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. ।
७. 'बहुधा' नास्ति-ख. ने. ज. उ. ।

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १६९
रुद्रस्तेजस्तत्त्वाधिपतिः। तेजस्तत्त्वान्तर्भूतं पुरुषरागविद्यानियतिकालकला-
मायान्तम्। तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे—"पुरुषादिकमायान्तं तेजस्तत्त्वं महेश्वरि"
इति। १शुद्धविद्येश्वरसदाशिवा वायुतत्त्वात्मकाः। तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे—"विद्या
चेश्वरसादाख्यौ वायुतत्त्वं समीरिनम्" इति। अतो रुद्रेश्वरसदेशाख्या देवता
मितविग्रहाः परिच्छिन्नरूपाः। तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे—"यत् सदाशिवपर्यन्तं
विनाशोत्पत्तिसंयुक्तम्" इति। बिन्दुत्रयेण कथिताः। बिन्दुत्रयं त्रिबोजशिखरवर्ति-
कामकलोर्ध्वगतानां बिन्दूनां त्रितयम्। अमितामितविग्रहाः शान्तिः शक्तिश्च
शम्भुश्च नादत्रितयबोधनाः। शान्तिरव्यक्तध्वनिलक्षणो नादोऽखिलं जगदधरीकृत्य
यत्र लयमेति सा ब्रह्मरन्ध्रावसानभूमिः, ऊर्ध्वशक्तीनां प्रशान्तिस्थानहेतुत्वात्।
तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे—
नाड्याधारस्तु २नादो वै भित्त्वा सर्वमिदं जगत्।
अधःशक्त्या ३विनिर्गत्य ऊर्ध्वशक्त्यवसानकः॥
यहाँ रुद्र तेजस्तत्त्व का अधिपति है। इस तत्त्व में पुरुष, राग, विद्या, नियति, काल,
कला और माया ये सात तत्त्व अन्तर्भूत हैं। स्वच्छन्दसंग्रह में बताया गया है—
"हे महेश्वरि ! पुरुष से माया पर्यन्त तत्त्व तेजस्तत्त्व का विस्तार है"। शुद्धविद्या, ईश्वर
और सदाशिव वायुतत्त्वात्मक हैं। स्वच्छन्दसंग्रह में इसका भी प्रतिपादन है—
"विद्या, ईश्वर और सादाख्य तत्त्व वायुतत्त्वात्मक हैं"। तेजस्तत्त्व और वायुतत्त्व के
अन्तर्गत होने से रुद्र, ईश्वर और सदाशिव नामक देवता परिच्छिन्न स्वरूप वाले हैं।
स्वच्छन्दसंग्रह में बताया गया है—"सदाशिव पर्यन्त सभी तत्त्व उत्पत्तिविनाशशील हैं"।
इनका बोध विद्यागत तीन बिन्दुओं से कराया गया है। ये तीन बिन्दु तीनों बीजों के
शिखर पर विराजमान कामकला के ऊपर स्थित है। अनन्त अपरिच्छिन्न स्वरूप वाले
शान्ति, शक्ति और शम्भु का बोध तीन नादों से होता है। अव्यक्त ध्वनिरूप नाद
समस्त जगत् को लांघ कर जहाँ लीन होता है, वह ब्रह्मरन्ध्र की अवसानभूमि यहाँ
१शान्ति के नाम से कही गई है, क्योंकि ऊपर की सभी शक्तियाँ यहाँ पूर्ण शान्ति
(विश्राम) का अनुभव करती हैं। स्वच्छन्दसंग्रह में यह इस तरह से वर्णित है—
नाड़ियों के सहारे उठने वाला नाद इस सारे जगत् को भेद कर आधार शक्ति से
निकल कर ऊपर सहस्रदल कमल में स्थित शक्ति में लीन हो जाता है। अव्यक्त ध्वनि
१. ईश्वरसदाशिवौ वायुतत्त्वात्मकौ-ख. ने. ज. झ. उ.। २. नादान्तो-ख. ने.
ज. झ. उ.। ३. विनिर्भिद्य-ख. ने. ज. झ. उ.।
१. ब्रह्मरन्ध्र की अवसान भूमि में स्थित शान्ति नामक नाड़ी की चर्चा अन्यत्र देखने
को नहीं मिलती। इस प्रसंग में भास्करराय की शान्ति पद की ब्रह्मपरक व्याख्या सम्प्रदाय
सम्मत नहीं जान पड़ती।

१७० योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः ]
'नाड्यां ब्रह्मबिले लीनस्त्वव्यक्तध्वनिलक्षणः । इति ।
शक्तिरूर्ध्वशक्तिः, उपरिगतं शक्तितत्त्वम् । तदुक्तमत्रैव—
ब्रह्माणी त्वपरा शक्तिर्ब्रह्मणोत्सङ्गगामिनो ।
द्वारं सा मोक्षमार्गस्य रोधयित्वा व्यवस्थिता ॥
तां भित्त्वा तु वरारोहे ऊर्ध्वशक्तिं परां शिवाम् ।
शक्तितत्त्वात्मिकां देवीं प्रसुप्तभुजगाकृतिम् ॥
शक्तितत्त्वं समाख्यातं भुवनैरावृतं महत् । इति ।
शम्भुः२ शिवतत्त्वं शक्तितत्त्वोपरि स्थितम् । तदुक्तमत्रैव—"शिवतत्त्वं समा-
ख्यातं तदूर्ध्वं शक्तितत्त्वतः" इति । अमितामितविग्रहाः । एतेऽनन्ता अपरिच्छिन्न-
रूपाः, व्योमतत्त्वान्तर्गतत्वात् । तदुक्तमत्रैव—"३शक्तितत्त्वं शिवो व्योम" इति ।
नादत्रितयबोधनाः । वाग्भवकामराजशक्तिबीजोपरिगतबिन्दुत्रयोपरिगतरोधिनो-
त्रितयोर्ध्वं४गतानां नादानां त्रयमेषां क्रमेण बोधकं लक्षकम्, तेन नादत्रितय-
बोधनाः । वाग्भवबीजोपरिगतबिन्दू परिवर्तिना नादेन शान्तिः, कामराजबीज-
वाला यह नाद ब्रह्मबिल (ब्रह्मरन्ध्र) में स्थित नाडी (शान्ति) में लीन हो जाता है ॥
शक्ति का अर्थ है ऊर्ध्वशक्ति, ऊपर स्थित सहस्रदल कमल में विद्यमान शक्ति ।
इसका भी वर्णन स्वच्छन्दसंग्रह में मिलता है—
ब्रह्मा की गोद में बैठी ब्रह्माणी अपरा शक्ति मानी जाती है। यह मोक्ष के मार्ग के
द्वार को रोक कर बैठी रहती है। हे वरारोहे ! इस शक्ति को भेद कर ऊर्ध्वशक्ति के
पास पहुँचना चाहिये । यह परा शक्ति सोये हुए सर्प की सी आकृति वाली है। इसी
को शक्तितत्त्व भी कहते हैं। यह शक्तितत्त्व अनेकों भुवनों से आवृत है। यह महान्
विस्तार वाला है ॥
शम्भु का अर्थ है शिवतत्त्व । यह शक्तितत्त्व के ऊपर स्थित है। इसका भी वर्णन
स्वच्छन्दसंग्रह में है—"इसको शिवतत्त्व कहते हैं। यह शक्तितत्त्व से ऊपर है"। शान्ति,
शक्ति और शम्भु ये तीनों अपरिमित अनन्त स्वरूपों वाले हैं, क्योंकि इनका अन्तर्भाव
व्योमतत्त्व में बताया गया है। जैसा कि स्वच्छन्दसंग्रह में कहा गया है—"शक्तितत्त्व और
शिवतत्त्व व्योममय (आकाशमय) हैं"। इन तीनों का स्वरूप तीन नादों से बोधित होता
है। वाग्भव, कामराज और शक्ति बीज के ऊपर तीन बिन्दु हैं। इन तीनों के ऊपर, तीनों
रोधिनी कलाओं के ऊपर, तीन नाद स्थित हैं। ये तीन नाद ही इनके बोधक हैं। इनमें
१. नाड्या-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । २. शम्भुः शिवः-ख. ज. झ. उ. ।
३. शिव-ख. ने. । ४. भागगतानां-ख. ने. ज. झ. उ. ।

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १७१
शिखरवर्तिना नादेन शक्तिः, तार्तीयबीजशिखरवर्तिना नादेन च शिवो व्यज्यत
इत्यर्थः ॥४५-४६॥
पूर्वं विद्याया बिन्दुनादमयवासनामुक्त्वेदानीं सर्वमन्त्रमयवासनामपि सोदा-
हरणामाह—
वागुरामूलवलये सूत्राद्याः कवलीकृताः ।
तथा मन्त्राः समस्ताश्च विद्यायामत्र संस्थिताः ॥४७॥
“वागुरा मृगबन्धनी” (अ० को० २।१०।२६) । अत्र तु वागुराशब्देन मत्स्य-
ग्रहणहेतुर्जालं लक्ष्यते, प्राणिग्रहणसामान्यात् । अन्यथा मूलवलये १सूत्राद्या इत्यनु-
पपन्नं स्यात्, मृगबन्धन्या मूलवलयस्याभावात्, रज्जुनिर्मितत्वात् सूत्रादी-
नामप्यभावात् । सूत्राद्याः सूत्राणि तन्तवः, आद्यशब्दाज्जालप्रान्ते आयसगुलिकाः
प्रोता गृह्यन्ते । यथा लोहमये वलये जालावयवानां तन्तूनां मूलं कवलितम्, तथा
समस्तमन्त्राणां मूलभूता२ वैखर्यपि विद्यायामस्यां विश्रान्ता । अतोऽत्र विद्यायां
समस्तमन्त्राः स्थिता इत्यर्थः ॥४७॥
से वाग्भव बीज के ऊपर स्थित बिन्दु के ऊपर विद्यमान नाद शान्ति का, कामराज बीज
का शिखरवर्ती नाद शक्ति का तथा तृतीय बीज का शिखरवर्ती नाद शिव का व्यंजक
है ॥४५-४६॥
विद्यागत बिन्दु और नाद की वासना को बताने के बाद अब उदाहरण के साथ यह
बताया जा रहा है कि इसी विद्या में सारे मन्त्र प्रतिष्ठित हैं—
वागुरा (जाल) के मूलवलय में जैसे सूत्र आदि जुड़े हुए हैं, उसी तरह से
समस्त मन्त्र इस विद्या में स्थित हैं ॥४७॥
अमरकोश के अनुसार पशुओं को फँसाने वाले जाल को वागुरा कहते हैं । प्रस्तुत
रूपक में इस शब्द का प्रयोग मछली पकड़ने वाले जाल के लिये किया गया है । प्राणियों
को फँसाना दोनों का सामान्य धर्म है । ये प्राणी स्थलचर, नभचर अथवा जलचर भी
हो सकते हैं । मूलवलय और सूत्र इन दो शब्दों की सार्थकता के लिये यहाँ वागुरा शब्द
का अर्थ मछली पकड़ने वाला जाल किया जायगा, क्योंकि पशुओं को फँसाने वाले जाल
में मूलवलय नहीं होता । वह रस्सी से बना रहता है, इसलिये उसमें सूत्र भी नहीं
रहते । सूत्र शब्द का अर्थ महीन धागा होता है । आद्य शब्द से जाल के किनारे पिरोई
गई लोहे की गोलियाँ गृहीत होती हैं । जैसे लोहे के कड़े में जाल के धागे बँधे रहते हैं,
उसी तरह से समस्त मन्त्रों की जननी वैखरी वाणी इस विद्या में जुड़ी हुई है । अतः इस
विद्या में समस्त मन्त्र विद्यमान हैं ॥४७॥
१. 'सूत्राद्या' नास्ति—ख. ने. ज. झ. उ. । २. भूतायां वैखरीवि—ख. ने. ज. झ. उ. ।

३७२ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः
गुरुपदेशक्रमेणायमर्थः संप्राप्यत इत्याह—
गुरुक्रमेण संप्राप्तः सम्प्रदायर्थ ईरितः ।
गुरुक्रमः पारम्पर्यक्रमः, तदुपदेशक्रमेणैव
शिवादिविग्रहात् पूर्णात् सर्वकारणकारणात् ।
ध्वनिरूपं परं सूक्ष्मं शुद्धं सकलतेजसाम् ॥
वाग्रूपं प्रसृतं तत्त्वमुन्मनाशक्तिकेबलम् ।
अव्यक्तं व्यक्तरूपेण निष्कलं क्रमकारणम् ॥
परानन्दस्वरूपं तत् स्वच्छन्दादिप्रभेदतः ।
अनुष्टुप्छन्दसा बद्ध्वा प्राह स्वच्छन्दभैरवः ॥
तद्विमृश्य प्रपञ्चेन प्रोवाचानाश्रितेश्वरः ।
तत्सर्वं शान्त्यतीतांशे कथितं बहुविस्तरम् ॥
अब भगवान् शिव बताते हैं कि इस विषय का ज्ञान गुरु-परम्परा से ही प्राप्त हो
सकता है—
गुरुओं की सम्प्रदाय परम्परा से प्राप्त इस अर्थ को सम्प्रदायर्थ के नाम
से कहा जाता है ॥
गुरु क्रम से, अर्थात् गुरु-परम्परा के क्रम से, एक गुरु के द्वारा दूसरे के कान में उप-
दिष्ट ज्ञान की परम्परा से ही इस सम्प्रदायार्थ का ज्ञान हो सकता है। स्वच्छन्दभैरव
में यह गुरु-परम्परा इस तरह से वर्णित है—
सभी कारणों के कारण परिपूर्ण स्वरूप शिव से, जो कि शिव से लेकर पृथ्वी
पर्यन्त ३६ तत्त्वों का स्वरूप धारण करते हैं, सभी प्रकाशात्मक पदार्थों के भी प्रकाशक,
शुद्ध शब्दब्रह्म स्वरूप, परम सूक्ष्म ध्वनिरूप, परा वाणीमय तत्त्व का प्रसार होता है।
प्रथमतः इसकी स्थिति उन्मना में ही रहती है। यह अव्यक्त अवस्था में स्थित ज्ञान
क्रमशः व्यक्त होता है, निष्कलावस्था से निकल कर यह कालकृत क्रम को अभिव्यक्त
करता है। परम आनन्द की अभिव्यक्ति का साधन यह ज्ञान स्वयं भी परमानन्द स्वरूप
है। स्वच्छन्दभैरव ^१स्वच्छन्द आदि शास्त्रों के रूप में अनुष्टुप् छन्द में निबद्ध कर इस
ज्ञान का उपदेश करते हैं। इसको भलीभांति समझ कर अनाश्रित शिव अपनी शान्त्य-
तीत कला को इस सारे ज्ञान का विस्तार से उपदेश देते हैं। इसी ज्ञान को अपने पर
१. स्वच्छन्द आदि ६४ भैरव तन्त्रों के नाम तन्त्रालोक की जयरथ निर्मित विवेक
नामक टीका (भा० १, पृ० ४२-४३) में उद्धृत श्रीकण्ठीसंहिता में मिलते हैं। वैरोचन
शिवाचार्य के प्रतिष्ठालक्षणसारसमुच्चय (२।११६-१२०) में केवल ३२ भैरवागमों के ही
नाम हैं। वहाँ भी पहला नाम स्वच्छन्द ही है।

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १७३
तदेतत् पररूपेण सदाख्येन शिवेन तु ।
मन्त्रसिंहासनस्थेन पञ्चमन्त्रशरीरिणा ॥
१कौलिकादिषु सिद्धान्तपूर्वाद्यखिलमागमम् ।
साधनं पुरुषार्थस्य कौलिकं चातिकौलिकम् ॥
असंख्यमप्रमेयं च शिवेन कथितं पुरा ।
तज्ज्ञानमीश्वरे दत्तमीश्वरेण शिवेच्छया ॥
विद्यायामादितो दत्तं विद्येशाय च तत्त्वतः ।
विद्येश्वरैण दत्तं तज्ज्ञानं नियमितं क्रमात् ॥
दत्तं रुद्रेभ्य एतच्च गुणतत्त्वेश्वराय च ।
श्रीकण्ठायेश्वरेणैव दत्तं तेन ततः परम् ॥
श्रीकण्ठेन २प्रधानादिदशरुद्रान्तिकं क्रमात् ।
दीक्षयित्वा विधानेन दत्तं वै ज्ञानमम्बिके ॥
दीक्षयित्वाऽभिषिच्याथ श्रीकण्ठेन मयाऽपि च ।
दत्तं श्रोदक्षिण ३सर्वं सर्वकामार्थसाधनम् ॥
रूप में स्थित मन्त्ररूपी सिंहासन पर विराजमान पंचमन्त्रतनु सदाशिव सिद्धान्त, पूर्व,
कौलिक आदि विभागों में विभक्त कर समस्त शास्त्रों का उपदेश करते हैं, जो कि
समस्त पुरुषार्थों के साधक हैं। कौलिक, अतिकौलिक आदि असंख्य भेदों में विभक्त इस
अद्भुत ज्ञान का उपदेश पहले शिव ने ईश्वर को किया था। शिव की इच्छा से प्रेरित
ईश्वर ने इस ज्ञान का उपदेश सारे रहस्य को समझाते हुए शुद्धविद्या और विद्येशों को
किया। विद्येश्वरों ने गुरु-परम्परा से प्राप्त इस नियमित ज्ञान को रुद्रों को और गुण-
तत्त्वों के ईश्वरों को दिया। ईश्वर ने यह ज्ञान श्रीकण्ठ को दिया और तब श्रीकण्ठ ने
प्रधान १ आदि दस रुद्रों के पास क्रम से इस ज्ञान को पहुँचाया। हे अम्बिके ! विधि-
पूर्वक दीक्षा देने के बाद ही इस ज्ञान का उपदेश किया गया था। श्रीकण्ठ ने और स्वयं
मैंने (भैरव) भी दीक्षित और अभिषिक्त शिष्यों को ही सभी कामनाओं और प्रयोजनों
की सिद्धि के लिये इस ज्ञान का उपदेश किया है ॥
१. कालिकादिषु-ख. ने. ज. उ. । २. प्रदानादि-ख. ने. ज. उ. । ३. पूर्वं-ने. ।

  1. अट्ठाईस सिद्धान्त शैवागमों के प्रवर्तक प्रणव आदि दस शिवों तथा अनादि आदि
    अठारह रुद्रों की नामावली किरणागम (वि० १०।४-२७) में मिलती है। स्वच्छन्दतन्त्र
    (१०।११९६-११९९) में भी ये नाम मिलते हैं। लगता है प्रणव नाम ही लिपिदोष के
    कारण यहाँ प्रधान बन गया है। प्रणव शिवभेद के अन्तर्गत हैं, रुद्रभेद के नहीं।

१७४ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः
इति स्वच्छन्दभैरवोक्तरीत्या मयोदितः स्वगुरुपारम्पर्योपदेशकमेणैव विषम-
पदैरसम्प्रदायविद्भिर्दुष्परिज्ञातार्थश्लोकैः पूर्वोक्तरीत्या कथितः सम्प्रदायार्थो विना
गुरूपदेशं व्युत्पत्तिबलेन पुराणादिश्लोकवद् ग्रहीतुमशक्य इत्यर्थः ॥
अथ क्रमप्राप्तं निगर्भार्थमाह-
निगर्भोऽपि महादेवि शिवगुर्वात्मगोचरः ॥४८॥
निगर्भो² निगर्भार्थः । शिवो वाङ्मनसागोचरः सकल-निष्कल-सकलनिष्कल-
भेदविशेष्यः, [³आत्मादिसकलगुणाभिषस्तादृशमेव स्वात्मतया वीक्षमाणो विदिताखिला-
गमार्थो गुरुः, तादृशगुरुकरुणकटाक्षपातविगलितसकलपाशविशद]चिद्रूपानुभवः ⁴[शिष्य]
आत्मा । तदुक्तं “स्वच्छन्दसंग्रहे—
इस प्रकार मेरे द्वारा बताई गई गुरु-परम्परा के क्रम से ही यह अर्थ प्राप्त होता
है, इसलिये सम्प्रदाय परम्परा से प्राप्त इस अर्थ को सम्प्रदायार्थ कहा जाता है । इस
गुरु-परम्परा के बिना निगूढ़ अर्थ वाले शब्दों का प्रयोग कर रचे गये इन श्लोकों का
अर्थ पुराण आदि के श्लोकों की तरह व्याकरण आदि की व्युत्पत्ति के सहारे नहीं लगाया
जा सकता ॥
अब क्रमप्राप्त ¹निगर्भार्थ का वर्णन करते हैं—
हे महादेवि ! शिव, गुरु और आत्मा में एकता का अनुसन्धान करना ही
निगर्भार्थ कहलाता है ॥४८॥
श्लोक में निगर्भ शब्द से निगर्भार्थ का ग्रहण किया जाता है । वाणी और मन के
अगोचर सकल, निष्कल और सकलनिष्कल भेदों वाला परम तत्त्व है शिव । आत्मा²
आदि समस्त गुणों से अभिहित होने वाला, अपने को इस परम तत्त्व से अभिन्न मानने
वाला, उसको अपना ही स्वरूप समझने वाला और समस्त शास्त्रों के अर्थ को जानने
वाला है गुरु । ऐसे गुरु की कृपादृष्टि पड़ने से जिसके सारे पाशजाल छिन्न-भिन्न हो गये
हैं और जिसके ज्ञानचक्षु खुल गये हैं, ऐसा शिष्य यहाँ आत्म-शब्द से अभिहित है ।
स्वच्छन्दसंग्रह इसमें प्रमाण है—
१. निगर्भार्थो-क. ग. ज. । २. 'निगर्भो' नास्ति-क. ग. ज. । ३. 'आत्मादि....
विशद' नास्ति-ख. ग. ज. ब. उ. । ४. 'शिष्य' नास्ति-ख. ग. ने. ज. उ.। ५. महास्व-
ख. ग. ने. ज. उ. ।

  1. यहाँ ४८ से ५१ श्लोक तक निगर्भार्थ का स्वरूप बताया गया है ।
  2. यहाँ दीपिका का सूक्ष्माक्षरों में दिया गया पाठ केवल क. मातृका में मिलता
    है । गुरु के लक्षण के प्रसंग में दिये गये "आत्मादिसकलगुणाभिषः" इस अंश का
    अभिप्राय अस्पष्ट सा लगता है ।

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १७५
तत्त्वातीतं वरारोहे वाङ्मनोऽतीतगोचरम् ।
१अनिष्कलं चासकलं नीरूपं निर्विकल्पकम् ॥
निर्द्वन्द्वं परमं तत्त्वं शिवाख्यं परमं पदम् । इति ।
सर्वविद्याविदाचार्यो मोक्षधर्मपरायणः ।
गुरुवक्त्रप्रयोगेण पशुं तत्रैव योजयेत् ॥ इति ।
गुरुः—
गृणीते तत्त्वमात्मीयमात्मोकृतजगत्त्रयम् ।
उपायोपेयरूपाय शिवाय गुरवे नमः ॥
इत्युक्तलक्षणः । एवंविध२शिवगुर्वात्मैक्यगोचरानुसन्धानात्मको निगर्भार्थ
इत्यर्थः ॥ ४८ ॥
ननु३ केन प्रकारेण शिवगुर्वात्मनामैक्यमनुसन्धीयत इत्यत आह—
तत्प्रकारं च देवेशि दिङ्मात्रेण वदामि ते ।
शिवगुर्वात्मनामैक्यानुसन्धानात् तदात्मकम् ॥ ४९ ॥
हे वरारोहे ! यह शिव नामक परम पद तत्त्वातीत है, अतः वाणी और मन का विषय
नहीं बन सकता । यह अनिष्कल, असकल, रूपरहित, निर्विकल्पक, निर्द्वन्द्व परम तत्त्व है ॥
मोक्ष की प्राप्ति के लिये धर्म के आचरण में लगे हुए सभी विद्याओं में निष्णात
१आचार्य को चाहिये कि अपने पशुप्राय शिष्य को भी गुरुमुख से प्राप्त ज्ञान का उपदेश
कर परम तत्त्व की तरफ उन्मुख कर दे ॥
गुरु के स्वरूप को बताने वाले श्लोक की व्याख्या पहले (२।२६) की जा चुकी है।
इस तरह से शिव, गुरु और आत्मा की एकता की खोज में प्रवृत्त कराने वाला अर्थ ही
निगर्भार्थ के नाम से यहाँ प्रतिपादित है ॥४८॥
अब इनकी एकता का अनुसन्धान कैसे किया जा सकता है, इसका प्रकार बताते हैं—
हे देवेशि ! शिव, गुरु और आत्मा की एकता के अनुसन्धान की विधि अब मैं
संक्षेप में बता रहा हूँ ॥४९
१. सुनिष्कलं वा सक-ख. ज. झ. उ. । २. विधगुर्वात्मशिष्यपरानु-ख. ने. ज. उ. ।
३. 'ननु' नास्ति-ख. ने. ज. उ. ।

  1. यहाँ उद्धृत तीन वचनों में से पहले स्वच्छन्दसंग्रह के वचन में शिव की चर्चा
    स्पष्ट है। दूसरे वचन में, जिसके आकर के विषय में कोई निश्चित सूचना नहीं है,
    आचार्य द्वारा अज्ञ जीव के उद्धार की चर्चा है। तीसरा वचन दीपिका में अनेक स्थानों
    पर अभियुक्तवचन के नाम से उद्धृत है। इसमें गुरु की चर्चा है। यहाँ शिव और गुरु के
    बाद आत्मा (पशु) की चर्चा आनी चाहिये थी, किन्तु पशु की पराधीनता को दिखाने के
    लिये यहाँ आचार्य की मुख्यता से काम लिया गया है।

१७६ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः
तत्प्रकारं शिवगुर्वात्मनामैक्यानुसन्धानात्मकम्, दिङ्मात्रेण वदामि न¹
विशेषप्रतिपादनप्रपञ्चेनेत्यर्थः ॥ ४९ ॥
तत्प्रकारमाह—
निष्कलत्वं शिवे बुद्ध्वा तद्रूपत्वं गुरोरपि ।
तन्निरीक्षणसामर्थ्यादात्मनश्च शिवात्मताम् ॥५०॥
भावयेद् भक्तिनम्रः सन् शङ्कोन्मेषाकलङ्कितः ।
कला अवयवाः, तद्रहितत्वं निष्कलत्वं निरवयवत्वम्, शिवे पूर्वोक्तलक्षणे,
बुद्ध्वा,
गृणीते तत्त्वमात्मीयमात्मीकृतजगत्त्रयम् ।
उपायोपेयरूपाय शिवाय गुरवे नमः ॥
इत्यभियुक्तवचनोकरीत्या निष्कलं ³निष्कलात्मकं शिवं स्वात्मतया वीक्ष्य-
माणस्यैव गुरुत्वाद् गुरोरपि तद्रूपत्वं शिवात्मकत्वं बुद्ध्वा, तन्निरीक्षणसामर्थ्यात्
शिव, गुरु और आत्मा की एकता के अनुसन्धान के प्रकार को अब मैं संक्षेप में बता
रहा हूँ । इस विषय का विशेष विस्तार यहाँ नहीं किया जा रहा है ॥४९॥
अब उसकी संक्षिप्त विधि का वर्णन किया जा रहा है—
शिव में निष्कलता को जान लेने के बाद गुरु में भी निष्कलात्मक शिवता
को पहचानना चाहिये । इसके बाद गुरु की कृपादृष्टि से प्राप्त ज्ञान के सहारे
सभी प्रकार की शंकाओं से मुक्त होकर शिष्य भक्तिश्रद्धापूर्वक अपने में भी
शिवता को पहचानने का प्रयत्न करे ॥५०-५१॥
कला का अर्थ है अवयव । कलाओं से जो रहित है, वह है निष्कल, निरवयव ।
अभी ऊपर जो शिव का स्वरूप बताया गया है । वह निष्कल है, ऐसा जान लेने के बाद
किसी अभियुक्त के वचन में, जिसकी व्याख्या पहले (२।२६) की जा चुकी है, बताये
गये लक्षणों वाले गुरु में भी निष्कल शिवात्मता की बुद्धि को जगाना चाहिये । निष्कला-
त्मक शिव को स्वात्मस्वरूप में देखने वाला ही गुरु हो सकता है, अतः इस प्रकार के
गुरु में, शिवात्मता की अनुभूति शिष्य के लिये आवश्यक है । इस तरह के शिष्य के
विषय में किसी ने कहा है—
१. नाशेषविशेषेण । २. 'किं' नास्ति । ३. निष्कलात्मकं नास्ति । ४. 'शिवे' नास्ति । ५. चेत् । ६. तु ।