योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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पड़ती, उसी तरह से इस प्रकाश की भी सत्ता और स्फुरत्ता को प्रकाशित करने के लिये
किसी प्रमाण की अपेक्षा नहीं है। निर्मल दर्पण में जैसे प्रतिबिम्ब प्रकाशित होता है, उसी
तरह से यह सारा विश्व इसी प्रकाशरूपी दर्पण में प्रतिभासित होता है।
इस भूमिका-बन्ध के साथ यहाँ पहले आदि-क्षान्त वर्णमाला की तथा शिवादि-
क्षित्यन्त तत्त्वों की सृष्टि का क्रम वर्णित है। इसके बाद यहाँ अनुत्तर से विसर्ग पर्यन्त
स्वरों की सृष्टि का क्रम बता कर स्वरों को 'बीज' तथा व्यंजनों की 'योनि' संज्ञा दी गई है।
यहाँ बताया गया है कि वट के बीज में जैसे हरा-भरा विशाल वृक्ष छिपा हुआ है,
उसी तरह से शृंगाट स्थित (अकार-हकार सामरस्यमय) बिन्दु में यह वर्ण और
तत्त्वात्मक, शब्दमय और अर्थमय सारा संसार छिपा हुआ है। इसी से उसका उद्भव
होता है और इसी में वह लीन भी हो जाता है। अन्त में यहाँ लय की प्रक्रिया को बताते
हुए कहा गया है कि इदन्ता को अहन्ता में विलीन कर देने वाला वीर साधक ही अशिव
का नाश करने वाले शिवपद को प्राप्त कर पाता है।
इस श्लोक को (अहमि प्रलयं कुर्वन्) दीपिकाकार ने तीन बार उद्धृत किया है। ल०
मातृका परापंचाशिका को रुद्रयामल का अंश मानती है। विज्ञानभैरव को रुद्रयामलसार
कहा जाता है। परात्रिंशिका और उत्तरषट्क को भी रुद्रयामल का ही सार या भाग माना
गया है। रुद्रयामल की विशिष्टता की ²हमने कई बार चर्चा की है। ³डॉ० तून
गान्द्रियान ने भी इस ग्रन्थ के विषय में अनेक सूचनाएँ दी हैं। इस ग्रन्थ के भी परिष्कृत
संस्करण की अतीव आवश्यकता है। तभी परात्रिंशिका, विज्ञानभैरव, उत्तरषट्क,
नित्याषोडशिकार्णव जैसे प्राचीन ग्रन्थों का सही रूप में तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया
जा सकेगा।
श्रीकुल (त्रिपुरा सम्प्रदाय) का साहित्य
योगिनीहृदय और उसकी टीका दीपिका के कर्ता अमृतानन्द के विषय में ⁴हम बहुत
कुछ लिख चुके हैं। दीपिका में उद्धृत ग्रन्थों और ग्रन्थकारों के विषय में भी प्रसङ्गतः
नित्याषोडशिकार्णव और लुप्तागमसंग्रह के उपोद्घात में लिखा जा चुका है। इधर
१. "सत्तावाचिनि बीजेऽस्मिन् सादिमायान्तिमं जगत्" (श्लो. ४४) यह पाठ मूल में
रहना चाहिये। तन्त्रालोक में यही पाठ है—"तद्वत् सानुत्तरादीनां कादिसान्ततया
स्थितिः" (३।१४९)। माया शब्द से ककार का ग्रहण किया जाता है, इसकी
चर्चा हम पृ. ३२८ की टिप्पणी में कर चुके हैं।
२. देखिये—विज्ञानभैरव उपोद्घात पृ. १ टि., नि. षो. उपोद्घात, पृ. ४४-४५
३. हिन्दु तान्त्रिक लिटरेचर इन् संस्कृत, पृ. ४० टि. ४७, ७८ टि. ।
४. द्रष्टव्य—तन्त्रयात्रा, पृ. ३५-४०, आगम और तन्त्रशास्त्र, पृ. ७६-८८