योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २५५
तस्य कोणान्याह-
दक्षनासा सृक्किणी च स्तनं वृषणमेव च ॥६१॥
सीवनी वाममुष्कं च स्तनं सृक्किणिनासिके ।
नासाग्रं चैव विज्ञेयं कोणानां दशकं तथा ॥६२॥
स्पष्टम् ॥६१-६२॥
अष्टकोणचक्रव्यापकमाह—
तदन्तरष्टकोणादिचक्राय नम इत्यपि ।
विन्यस्य
तदन्तः दशारान्तः, "अष्टकोणादिचक्राय नमः" इति मन्त्रेण चिबुकाद्यष्ट-
कोणानि संस्पृश्य व्यापकं विन्यस्य । अष्टकोणचक्रस्यादित्वं त्रिकोणा (दी? दि) तर-
चक्रेभ्यः प्रथममुत्पन्नत्वात् ॥६३॥
अष्टकोणेषु न्यस्तव्याः शक्तीराह—
तस्य कोणेषु वशिन्याद्यष्टकं न्यसेत् ॥६३॥
तस्य अष्टारचक्रस्य, कोणेषु । वशिन्याद्यष्टकं वशिनीकामेश्वरीमोदिनी-
विमलाऽरुणाजयिनीसर्वेश्वरीकौलिन्त्यः ॥६३॥
अन्तर्दशार के विन्यास के कोण ये हैं—
दक्ष नासापुट, सृक्किणी (होठों का दक्षिण भाग), दक्ष स्तन, दक्ष वृषण,
सीवनी, वाम मुष्क (वृषण), वाम स्तन, वाम सृक्किणी, वाम नासापुट और नासाग्र
ये अन्तर्दशार के दस कोण हैं ॥६१-६२॥
इसका अर्थ स्पष्ट है ॥६१-६२॥
अष्टकोण चक्र का व्यापक न्यास बताते हैं—
दशार चक्र के भीतर "अष्टकोणादिचक्राय नमः" इस मन्त्र से अष्टकोण
चक्र का विन्यास करे ॥६३॥
अन्तर्दशार चक्र के भीतर "अष्टकोणादिचक्राय नमः" इस मन्त्र से चिबुक (ठोडी)
आदि दस स्थानों को छूते हुए व्यापक न्यास करे। अष्टकोण को आदिचक्र इसलिये
कहा गया है कि त्रिकोण से अन्य चक्रों की अपेक्षा यह पहले उत्पन्न हुआ है ॥६३॥
अष्टकोण में न्यस्तव्यू शक्तियों को बताते हैं—
इस अष्टार चक्र के कोणों में वशिनी आदि आठ शक्तियों का विन्यास
करे ॥६३॥
इस अष्टार चक्र के आठ कोणों में वशिनी, कामेश्वरी, मोदिनी, विमला, अरुणा,
जयिनी, सर्वेश्वरी और कौलिनी इन आठ शक्तियों का विन्यास करे ॥६३॥