योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
इस ग्रन्थ के बारे में
योगवाशिष्ठ, जिसे 'महारामायण' भी कहा जाता है, अद्वैत वेदान्त का एक विशाल दार्शनिक ग्रन्थ है। परम्परा इसे महर्षि वाल्मीकि की रचना मानती है। इसमें युवा श्रीराम संसार की क्षणभङ्गुरता से विरक्त होकर प्रश्न करते हैं, और गुरु वसिष्ठ अनेक कथाओं और दृष्टान्तों के माध्यम से उन्हें यह सिखाते हैं कि जगत् मन की कल्पना है और आत्मज्ञान से ही मुक्ति होती है। लीला, कर्कटी, चूडाला और शिखिध्वज जैसी कथाएँ इसी ग्रन्थ से प्रसिद्ध हुईं।
ग्रन्थ छः प्रकरणों में है: वैराग्य, मुमुक्षु-व्यवहार, उत्पत्ति, स्थिति, उपशम और निर्वाण। प्रस्तुत संस्करण इसका हिन्दी गद्य-रूपान्तर है, जो वैराग्य प्रकरण से आरम्भ होता है। आरम्भ में अगस्त्य मुनि के शिष्य सुतीक्ष्ण पूछते हैं कि मोक्ष का कारण कर्म है, ज्ञान है, या दोनों; अगस्त्य उत्तर देते हैं कि कर्म से अन्तःकरण शुद्ध होता है और शुद्ध अन्तःकरण में ही ज्ञान से मुक्ति होती है। इसी प्रसंग से वसिष्ठ-राम संवाद की कथा खुलती है।
१७३४ पृष्ठों का यह विस्तृत हिन्दी संस्करण उन पाठकों के लिए है जो संस्कृत मूल के बिना भी पूरा ग्रन्थ पढ़ना चाहते हैं। स्कैन किए गए आरम्भिक पृष्ठों में अनुवादक का नाम नहीं दिखता।
✽ निर्वाण प्रकरण ✽ ६३१
दशम विलाससंवाद और एकादश वीतव । निर्वाणप्रकरण में २७ आख्यान कहे हैं—भुशुण्डि और वशिष्ठ का, महेश और वशिष्ठ का, शिलाकोश का, उपदेश अर्जुनगीता, स्वप्नसत्यरुद्र, वेताल का, भगीरथ का, गङ्गा अवतरण, शिखध्वज का, वृहस्पतिकचप्रबोध, मिथ्यापुरुष का, शृङ्गी गण का, इक्ष्वाकुनिर्वाण, मृगव्याध-दृष्टान्त, वलबृहस्पति, मङ्गीनिर्वाण, विद्याधर का, हरिणोपाख्यान, आख्यानोपाख्यान, विपश्चित् की कथा, शिवि का, शिला का, इन्द्र ब्राह्मण के पुत्रों का, कुन्ददन्त का, महा-प्रश्न उत्तरवाक्य, शिष्य-गुरु-महोत्सव और ग्रंथप्रशंसाफल, चतुष्टय-प्रकरणों में सब पचास आख्यान वर्णन किये गये हैं ।
इति श्रीयोगवासिष्ठे महारामायणे वशिष्ठरामचन्द्रसंवादे निर्वाणप्रकरणे मोक्षोपायवर्णनं नाम द्विशताधिकैकोननवतितमस्सर्गः ॥ २८६ ॥
श्रीयोगवासिष्ठ के निर्वाणप्रकरण का उत्तरार्द्ध समाप्त ।
इति
श्रीमती कमला भार्गव द्वारा—तेजकुमार प्रेस (प्रा०) लिमिटेड, लखनऊ में मुद्रित ।