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सर्वकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 82, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 82

मुमुक्षु प्रकरण । ८३

इतना कहकर वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जीवन्मुक्ति और विदेह-
मुक्ति में कुछ भेद नहीं है । जैसे जल स्थिर है तो भी जल है और तरङ्ग है
तो भी जल है वैसे ही जीवन्मुक्ति और विदेहमुक्ति में कुछ भेद नहीं है ।
हे रामजी ! जीवन्मुक्ति और विदेहमुक्ति का अनुभव तुमको प्रत्यक्ष नहीं
भासता क्योंकि स्वमंवेद है और उनमें जो भेद भासता है सो असम्यक्-
दर्शी को भासता है ज्ञानवान् को भेद नहीं भासता । हे मननकर्ताओं
में श्रेष्ठ रामजी ! जैसे वायु स्पन्दरूप होती है तो भी वायु है और
निस्स्पन्द होती है तो भी वायु है, निश्चय करके कुछ भेद नहीं पर और
जीव को स्पन्द होती है तो भासती और निस्स्पन्द होती है तो नहीं
भासती वैसे ही ज्ञानवान् पुरुष को जीवन्मुक्ति और विदेहमुक्ति में कुछ भेद
नहीं, वह सदा अद्वैत निश्चयवाला और इच्छा से रहित है । जब जीव को
उसका शरीर भासता है तब जीवन्मुक्ति कहते हैं और जब शरीर अदृश्य
होता है तब विदेहमुक्ति कहते हैं । पर उसको दोनों तुल्य हैं । हे रामजी !
अब प्रकृत प्रसङ्ग को जो श्रवण का भूषण है सुनिये । जो कुछ सिद्ध होता
है सो अपने पुरुषार्थ से सिद्ध होता है । पुरुषार्थ बिना कुछ सिद्ध नहीं
होता । लोग जो कहते हैं कि दैव करेगा सो होगा यह मूर्खता है ।
चन्द्रमा जो हृदय को शीतल और उल्लासकर्ता भासता है इसमें यह
शीतलता पुरुषार्थ से हुई है । हे रामजी ! जिस अर्थ की प्रार्थना और यत्न
करे और उससे फिरे नहीं तो अवश्य पाता है । पुरुषयत्न किसका
नाम है सो सुनिये । मन्तजन और सत्यशास्त्र के उपदेशरूप उपाय से
उसके अनुसार चित्त का विचरना पुरुषार्थ (यत्न) है और उससे
इतर जो चेष्टा है उसका नाम उन्मत्त चेष्टा है । जिस निमित्त यत्न करता
है सोई पाता है । एक जीव पुरुषार्थ (प्रयत्न) करके इन्द्र की पदवी पाकर
त्रिलोकी का पति हो सिंहासन पर आरूढ़ हुआ है । हे रामचन्द्र ! आत्म-
तत्त्व में जो चैतन्य संवित् है सो संवेदन रूप होकर फुरती है और सोई
अपने पुरुषार्थ से ब्रह्म पद को प्राप्त हुई है । इसलिए देखो जिसको कुछ
सिद्धता प्राप्त हुई सो अपने पुरुषार्थ से ही हुई है । केवल चैतन्य आत्मतत्त्व
है । उसमें चित्त संवेदन स्पन्दरूप है । यह चित्त संवेदन ही अपने पुरुषार्थ