योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 67, कुल 1734 में से
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है उसको यह जगत् रमणीय भासता है। जगत् को देखते ही देखते नष्ट हो
जाता है । इस स्वप्नपुरी की नाईं संसार की में कैसे इच्छा करूँ यह तो
दुःख का निमित्त है ? जैसे विष मिली मिठाई खानेवाले मृत्यु पाते हैं वैसे
ही विषय भोगनेवाले नष्ट होते हैं ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे वैराग्यप्रकरणे जगद्विपर्ययवर्णन-
न्नाम त्रयोविंशतितममसर्गः ॥२३॥
श्रीरामजी बोले हे मुनीश्वर ! इस संसार में भोगरूपी अग्नि लगी
है उससे सब जलते हैं । जैसे ताल में हाथी के पाँव से कमल नष्ट हो
जाता है वैसे ही भोग में मनुष्य दीन हो जाते हैं, जैसे वायु में मेघ नष्ट हो
जाता है वैसे ही काम, क्रोध और दुराचार से शुभ गुण नष्ट हो जाते हैं ।
जैसे भटकटैया के पत्ते और फल में काँटे हो जाते हैं वैसे ही विषयों की
वासणारूपी कण्टक आ लगते हैं । हे मुनीश्वर ! यह सब जगत् नाचरूपी
है, कोई पदार्थ स्थिर नहीं । वासणारूपी जल और इन्द्रियरूपी गाँठ है उसमें
पुरुष काल से ग्रसा है वह बड़े दुःख पावेगा । हे मुनीश्वर ! वासणारूपी
सूत में जीवरूपी मोती पिरोये हुए हैं और मनरूपी नट आय पिरोय कर
चैतन्यरूपी आत्मा के गले में डालता है । जब वासणारूपी तागा टूट
पड़ता है तब यह सब भ्रम भी निवृत्त हो जाता है । हे मुनीश्वर ! इस
जीव को भोग की इच्छा ही बन्धन का कारण है उसी से यह भटकता
है और शान्ति नहीं पाता । इससे मुझको किसी भोग की इच्छा नहीं
न राज्य की ही इच्छा है और न घर की न वन की इच्छा है, न मरने का
दुःख ही मानता हूँ और न जीने का सुख मानता हूँ । मुझे किसी पदार्थ
का सुख नहीं, सुख तो आत्मज्ञान से होता है, अन्यथा किसी पदार्थ में
नहीं होता । जैसे सूर्य के उदय हुये बिना अन्धकार का नाश नहीं होता
वैसे ही आत्मज्ञान के बिना संसार के दुःख का नाश नहीं होता । इससे
आप वही उपाय कहिये जिससे मोह का नाश हो और में सुखी होऊँ । हे
मुनीश्वर ! भोग के भोगनेवाले अहङ्कार को मैंने त्याग दिया, फिर भोग
की इच्छा कैसे हो ? हे मुनीश्वर ! विषयरूप सर्प ने जिसका स्पर्श किया
उसका नाश हो जाता है । सर्प जिसको काटता है वह एक ही बेर उसको