योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 53, कुल 1734 में से
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युवावस्था में भी पुत्रादिक उसकी टहल करते थे पर वही सब उसको वृद्धा-
वस्था में जैसे वृद्ध बैल को बैलवाला त्याग देता है वैसे ही त्याग देते हैं,
देखके हँसते हैं और अपमान करते हैं। उनको यह सब कंट की नाईं भासता
है। हे मुनीश्वर ! ऐसी नीच अवस्था की मुझको इच्छा नहीं! अब जो कुछ
कर्तव्य हो मुझसे कहिये मैं करूँ ? इस शरीर की तीनों अवस्था में कोई
सुखदायी नहीं, क्योंकि बाल्यावस्था महामूढ़ है, युवावस्था महाविकारवान
है और जरावस्था महादुःख का पात्र है। बाल्यावस्था को युवावस्था ग्रास
कर लेती है; युवावस्था को जरावस्था ग्रास कर लेती है और जरावस्था को
मृत्यु ग्रास कर लेती है। यह अवस्था सब अल्पकाल की हैं, इनके आश्रय से
मुझको क्या सुख होगा ? इससे आप मुझे वही उपाय बताइये जिससे
इस दुःख से मुक्त हो जाऊँ। हे मुनीश्वर ! जब जरावस्था आती है तब मरना
भी निकट आता है। जैसे सन्ध्या आने से रात्रितत्काल आ जाती है और
जो सन्ध्या के आने से दिन की इच्छा करते हैं वह मूर्ख हैं वैसे ही जरा के आने
से जीने की आशा रखनी महामूर्खता है। हे मुनीश्वर ! जैसे बिल्ली चिन्तन
करती है कि चूहा आवे तो पकड़ लूँ वैसे ही मृत्यु भी देखती है कि
जरावस्था आवे तो मैं इसका ग्रास कर लूँ। हे मुनीश्वर ! यह परम नीच
अवस्था है। यह जब आती है तब शरीर को जर्जरीभूत कर देती है;
कँपाने लगती है और शरीर को निर्बल और क्रूर कर देती है। जैसे कमल
पर बरफ की वर्षा हो और वह जर्जरीभूत हो जाय वैसे ही यह शरीर को
जर्जरीभूत कर डालती है। जैसे वन में बाघ आकर शब्द करते हैं और मृग
का नाश करते हैं वैसे ही खाँसी रूपी बाघ आकर मृगरूपी बल का नाश करते
हैं। हे मुनीश्वर ! जब जरा आती है तब जैसे चन्द्रमा के उदय से कमलिनी
म्लैन आती है वैसे ही मृत्यु प्रसन्न होती है। यह जरावस्था बड़ी दुष्टा है;
इसने बड़े बड़े योद्धाओं को भी दीन कर दिया है। यद्यपि बड़े-बड़े शूर संग्राम में
शत्रुओं को जीतते हैं पर उनको भी जरा ने जीत लिया है। जो बड़े-बड़े
पर्वतों को चूर्ण कर डालते हैं उनको भी जरा पिशाचिनी ने महादीन कर
दिया है। इस जरारूपी राक्षसी ने सबको दीन कर दिया है। यह सबको
जीतनेवाली है। हे मुनीश्वर ! जैसे वृक्ष में अग्नि लगती और उसमें