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सर्वकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 23, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 23

२४ | योगवाशिष्ठ ।

हो सो हमसे कहो। इतना कहकर वाल्मीकिजी बोले, हे भारद्वाज ! जैसे मेघ को देखकर मोर प्रसन्न होता है तैसे ही विश्वामित्र के वचन सुनकर रामजी प्रसन्न हुए और अपने हृदय में निश्चय किया कि अब मुझको अभीष्ट पद की प्राप्ति होगी।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे वैराग्यप्रकरणे गमममाजवर्णनोनाम षष्ठस्सर्गः ॥ ६ ॥

श्रीरामजी बोले, हे भगवन् ! जो वृत्तान्त है सो तुम्हारे सम्मुख क्रम में कहता हूँ। मैं राजा दशरथ के घर में उत्पन्न होकर क्रम से बड़ा हुआ और आगे वेद पढ़कर ब्रह्मचर्यादिक व्रत धारण किये; तदनन्तर घर में आया तो मेरे हृदय में विचार हुआ कि तीर्थाटन करूं और देवद्वारों में जाकर देवों के दर्शन करूं। निदान में पिता की आज्ञा लेकर तीर्थों में गया और गङ्गा आदि सम्पूर्ण तीर्थों में स्नान और शालग्राम और केदार आदि ठाकुरों के विधिसंयुक्त दर्शन करके यहाँ आया। फिर उत्साह हुआ तब यह विचार आया कि प्रातःकाल उठकर स्नान सन्ध्यादिक कर्म करके भोजन करना। जब इस प्रकार से कुछ दिन व्यतीत हुए तब मेरे हृदय में एक विचार उत्पन्न हुआ जो मेरे हृदय को खेंच ले गया। जैसे नदी के तट पर तृण बेल होती है उसको नदी का प्रवाह खेंच ले जाता है तैसे ही मेरे हृदय में जो कुछ जगत की आस्थाव्यापी बेल थी उसको विचाररूपी प्रवाह खेंच लेगया। तब मैंने जाना कि राज्य करने में क्या है, भोग में क्या है और जगत क्या है—सब भ्रममात्र है—इसकी वासना मूढ़ गँवार है; यह स्थावर, जङ्गम जगत सब मिथ्या है। हे मुनीश्वर ! जितने कुछ पदार्थ हैं वह सब मन में उत्पन्न होते हैं सो मन ही भ्रममात्र है अनहोता मन दुःखदायी हुआ है। मन जो पदार्थों को सत्य जानकर दौड़ता है और सुखदायक जानता है सो मृगतृष्णा के जलवत् है। जैसे मृगतृष्णा के जल को देखकर मृग दौड़ते हैं और दौड़ते दौड़ते थक कर गिर पड़ते हैं तो भी उनको जल प्राप्त नहीं होता तैसे ही मूर्ख जीव पदार्थों को सुखदायी जानकर भोगने का यत्न करते हैं और शान्ति नहीं पाते। हे मुनीश्वर ! इन्द्रियों के भोग सर्पवत् हैं जिनका भोगे हुआ जन्म मरण और जन्म से जन्मान्तर पाना है। भोग और जगत सब भ्रममात्र