योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1653, कुल 1734 में से
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❇ योगवासिष्ठ ❇
समय है । जैसे एक ऋतु के होते दूसरे का आना नहीं होता, वैसे ।
तुम्हारा आना ठीक नहीं । तब वर कहेंगे, हे शाप ! तुम्हारा क
ऋषि मनुष्य है, और हमारा कर्त्ता देवता । मनुष्य के देवता पूजनी
हैं, क्योंकि बड़े हैं, इससे तुम जाओ । जब इस प्रकार वर कहेंगे, त
शाप क्रोधित होंगे और मारने के लिए त्रिशूल हाथ में उठावेंगे, त
वर कहेंगे, हे शाप ! यदि तुम और हम लड़ेंगे तो पीछे किसी वृ
न्यायकर्त्ता के पास जावेंगे, जो हमारा न्याय चुका देगा । इससे प्रथ
ही क्यों न जावें, तब शाप कहेंगे, हे वर ! जो कोई युक्तिसहित वचन
कहता है, उसे सब कोई मानते हैं । तुमने अच्छा कहा, चलो । ऐसे
चर्चा करके दोनों ब्रह्मपुरी में जावेंगे और ब्रह्माजी को प्रणाम करेंगे
फिर सब वृत्तान्त कहकर कहेंगे, हे देव ! हमारा न्याय करो । उन ब्राह्मणों
को वर स्पर्श करे अथवा शाप स्पर्श करे ? तब ब्रह्माजी कहेंगे, हे साधु !
जिसका अभ्यास उनके भीतर दृढ़ हो, वह प्रवेश करे । तब वर के स्थान
शाप जाकर ढूँढ़ेंगे और शाप के स्थान वर जाकर ढूँढ़ेंगे और ढूँढ़कर
शाप आकर कहेंगे, हे स्वामी ! हमारी हार हुई और वरों की जय हुई,
क्योंकि उनके भीतर वर ही स्थित है । जिसका अभ्यास हृदय में स्थित
है, उसी की जय होती है । सो इनके भीतर वज्रसार की नाईं वर स्थित
है । हे स्वामी ! हमारा आधिभौतिक शरीर कोई नहीं; हम तो संकल्प-
रूप हैं । जिस संकल्प की दृढ़ता होती है, वही उदय होता है । वर का
दाताभी भी ज्ञानमात्र होता है; वर को लेता भी वही ज्ञानरूप है और
वर को ग्रहण करनेवाला जानता है कि यह हमारा स्वामी है । उस
संकल्प से वर का कर्त्ता देवता जानता है कि मैंने वर दिया है और
ग्रहण करनेवाला जानता है कि मैंने वर लिया है । हे ईश्वर ! उनका
जो वररूप संकल्प है, वह उनके निश्चय में दृढ़ हो जाता है । जिस
संकल्प की संवित् से एकता होती है, वही प्रकट होता है । इसी प्रकार
शाप भी है । परन्तु न कोई वर है, न शाप है । दोनों संकल्परूप हैं ।
जैसा संकल्प का अनुभव आकाश में दृढ़ होता है, वही भासित होता
है । वर देने वाला भी अनुभवसत्ता है, और लेनेवाला भी आत्मसत्ता