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सर्वकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

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DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

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पृष्ठ 1447

६४२ * योगवाशिष्ठ *

जिसको एक आत्मा में निश्चय होता है, वह जन्म-मरण आदि विकारों से रहित होता है, और जिसको नानात्वरूप जगत् में निश्चय होता है वह जन्म-मरण से नहीं छूटता ।

हे राम ! जिसकी बुद्धि में पदार्थों का रङ्ग चढ़ता है, वह रागद्वेष-रूपी नरक से मुक्त नहीं होता, और जिसको एक आत्मा का अभ्यास होता है, उसे अभ्यास के बल से सब जगत् आत्मतत्त्व भासित होता है, और वह राग-द्वेष से मुक्त होता है । जैसे स्वप्न में किसी को अपना जाग्रत्स्वरूप स्मरण आता है तो वह स्वप्न के सब जगत् को अपना देखता है, वैसे ही जिसको आत्मज्ञान होता है, उसको सब जगत् अपना रूप ही दिखता है । सर्वदा आत्मसत्ता अनुभवरूप जाग्रत् ज्योति है । जिसको ऐसी आत्मसत्ता में नास्ति की भावना होती है, वह कि गड्ढे में कीट होता है; पाषाण, वृक्ष, पर्वत आदि स्थावरयोनियों को प्राप्त होता है और उनमें चिरकाल तक रहता है । जबतक उसकी बुद्धि का द्वैत का संयोग होता है, तबतक वह जगद्भ्रम देखता है—और भ्रम नहीं मिटता । पर जब उसकी संवित् की द्वैत का संयोग मिट जाता है, तब जगद्भ्रम निवृत्त हो जाता है । हे राम ! सम्यक्ज्ञान से जगत् के भ्रम का अभाव हो जायगा । अभाव का निश्चय जगने पर फिर जगत् नहीं भासित होता । जब संसार के पदार्थों में संवित् बिंधी हुई है, तब जैसा निश्चय होगा, वैसा ही प्राप्त होगा और उसी निश्चय के अनुसार गति होगी । राम ने पूछा, हे भगवन् ! नास्तिकवादी का वृत्तान्त तो आपने कहा, सो मैंने जाना, पर जो पुरुष हृदय में जगत् को सत्य जानता है, आत्मबोध के मार्ग में दूर है और शुद्धस्वरूप को नहीं जानता, उसके मोक्ष की क्या युक्ति है और उसकी क्या अवस्था होती है यह मेरे बोध की दृढ़ता के निमित्त कहिए ?

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इसका उत्तर मैंने प्रथम ही तुमसे कहा है पर अब फिर तुमने जो पूछा है इससे फिर कहता हूँ। पहले तो पुरुष का अर्थ सुनो । हे राम ! यह जगत् न नेत्रों में स्थित है, न श्रवण में है और न नासिका आदि इन्द्रियों में है—किन्तु चैतन्य संवित् में स्थित है । चैतन्य