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सर्वकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

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DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

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पृष्ठ 1389

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ५८३

सिमट कर अपने सूक्ष्मकारण में जाकर लीन होते हैं, इसी का नाम महाप्रलय है, तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि सूक्ष्मभूत के रहने महाप्रलय नहीं होता। और जो तुम कहो कि संवेदन जो अज्ञान है, जिसमें अहं फुरता है, उसका नाम महाप्रलय है, तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि मूर्च्छा में जीव को अज्ञान होता है, परंतु फिर सृष्टि भासित होती है और मृत्यु होती है। सो मृत्यु वही मूर्च्छा है। पर उसमें भी फिर पाञ्च-भौतिक शरीर भासित होता है और आगे जगत् भासित होता है। इससे इसका नाम भी महाप्रलय नहीं। जो तुम कहो कि जबतक यह पाञ्च-भौतिक शरीर है, तबतक जगत् है और इसका अभाव होने पर महाप्रलय होता है, तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि जब शरीर को जीव छोड़ता है और उसकी क्रिया नहीं होती तो वह पिशाच होता है।

इस शरीर का जब नीरूप होना है और मनुष्य शव हो जाता है, तब क्षत्रिय-ब्राह्मण की संज्ञा नहीं रहती। इससे तुम देखो कि केवल देह का नाश भी महाप्रलय नहीं है और प्रमाद से विपर्यय का नाम भी महाप्रलय नहीं है। महाप्रलय उसको कहते हैं, जिसमें सबका अभाव हो जाय। और सबका अभाव तब होता है, जब वासना का क्षय हो जाता है। इसलिए वासना के क्षय को ज्ञानी लोग निर्वाण कहते हैं। जैसे जबतक निद्रा है, तब तक स्वप्न का जगत् दिखता है और जाग्रत् में स्वप्न के जगत् का अभाव हो जाता है, वैसे ही जबतक वासना है, तबतक जगत् है, जब वासना का क्षय होता है, तब जगत् का अभाव होता है। हे राम! वासना भी फुरती नहीं, आभासमात्र है। जो तुम कहो कि आमता क्यों है? तो जो कुछ भासित होता है, वह सदा अपने भाव में आप स्थित है। हे राम! उत्थान होने का नाम बन्धन है और उत्थान के मिटने का नाम मोक्ष है। हे राम! नेत्र के खोलने और मूँदने में भी कुछ यत्न है, पर मुक्त होने में कुछ यत्न नहीं। जो वृत्ति बहिर्मुख हुई तो बन्धन हुआ और वृत्ति अन्तर्मुख हुई तो मुक्त हुआ। इसमें क्या यत्न है। इसलिए सुषुप्त की नाईं निर्वासनिक हो जाओ। जब अहंसंवेदन फुरता है, तब मिथ्या जगत् सत्य सा भासित होता है। आगे तुम्हारी जो