योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1135, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ३२७
बिजली की तरह यह क्षण में उपजता और क्षण में लीन होता है। पर
मेघ में बिजली दिखती है। जहाँ मेघ होता है, वहाँ बिजली भी होती
है, इससे मेघ में बिजली उत्पन्न हुई तो उसका कारण मेघ है। हे मुनी-
श्वर ! इस चित्तस्पन्दन कला के कारण की उत्पत्ति ब्रह्म में कैसे हुई है
यह कृपा करके मुझसे समझाकर कहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे राम !
यह जो वितंडास्वरूप तुम तर्क करते हो, सो कुछ नहीं—इस नष्ट-बुद्धि
को त्यागो। यह तो बालक भी जानते हैं कि बिजली क्षणभंगुर है, सत्य
नहीं। तुम्हारा और क्या प्रयोजन है, सो कहो। यह कारण-कार्यरूप का
तर्क कैसा करते हो ? राम बोले, हे भगवन् ! यह स्पन्दनकला सत्य है
या असत्य ? इसका कारण कौन है, जिससे यह उठती है ?
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! सब प्रकार से सर्वात्मा ही स्थित है। चित्त
और चित्तस्पन्दन, यह भेदकल्पना वास्तव में कुछ नहीं। ब्रह्म ही
अपने स्वरूप में आप स्थित है। और सब भ्रम से भाषित होते हैं।
जैसे भ्रमदृष्टि से आकाश में मोती दिखते हैं और नेत्र मूँदकर खोलो
तो तरुवर प्रतीति होते हैं, वैसे ही यह जगत् भ्रम से भाषित होता है।
हे राम ! हम इस संसारसमुद्र के पार हुए हैं। हम सदृश ज्ञानवानों के
यथार्थ वचन सुनकर हृदय में धारण करो तो शीघ्र ही आत्मपद की प्राप्ति
हो। और जो मूर्खता करके मेरे वचनों को न धारण करोगे तो तुम्हारे
दुःख न नष्ट होंगे और वृक्ष, तृण, बेल आदि की योनि पाओगे। हे
राम ! आकाश और काल आदि सब पदार्थ कल्पना से सिद्ध हुए हैं—
आत्मा में कोई नहीं। हे राम ! वायु से रहित जो समुद्र का चञ्चलभाव
है, उसका कारण कौन है ? दीपक में जो प्रकाश और अग्नि में
उष्णता है, उस प्रकाश और उष्णता का कारण कौन है ? वायु के
निस्पन्द और स्पन्द का कारण कौन है ? जैसे इनका कारण कोई
नहीं, वायु का रूप ही स्पन्द निःस्पन्द है, अग्नि का रूप उष्णता है
और दीपक का रूप प्रकाश है, वैसे ही कल्पना भी आत्मस्वरूप है—
भिन्न नहीं।
हे राम ! यह कल्पना जो तुमको भाषित होती है, उसको त्याग