योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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सुख-दुःख देखने भरके होते हैं, उसे स्पर्श नहीं करते । उसमें केवल मत्त
समान पद का निश्चय होता है और उसको कोई सङ्ग स्पर्श ना
करता । जैसे आकाश को धूल लेप नहीं होता, वैसे ही आत्मा व
गुणों का सम्बन्ध नहीं होता । जो पुरुष ऐसा जानता है, उसको ज्ञानी
कहते हैं ।
जब जीव निःस्पन्द होता है, तब आत्मा होता है और जब उस
वासना का स्पन्दन होता है, तब वह संसारी होता है । जब चित्त
जगता है, तब अनेक सृष्टि भासित होती है, और जब चित्त स्फुरण
रहित होता है, तब संसार का अत्यन्ताभाव होता है और प्रध्वंसाभाव
भी नहीं भासित होता है । तब संसार भी केवल आत्मरूप हो जाता है
इससे हे राजन् ! वासना को त्यागकर चित्त को स्थित करो ।
वासना ही मल है । जब वासना का त्याग होगा, तब केवल आकाश
की तरह अपने को स्वच्छ जानोगे ! आत्मा वाणी का विषय नहीं
वह केवल आत्मत्वमात्र, अपने रूप में स्थित और सर्वदा उदयरूप
है । विश्व भी आत्मा का चमत्कार है; कुछ भिन्न वस्तु नहीं । द्रष्टा,
दर्शन, दृश्य की त्रिपुटी अज्ञान से भासित होती है; आत्मा सर्वदा
एकरूप और त्रिपुटी से रहित है । चित्त के स्फुरण से आत्मा ही त्रिपुटी
रूप होकर स्थित हुआ है, इससे चित्त को स्थिर कर देखो कि आत्मा
में भिन्न कुछ वस्तु नहीं । वासना के स्फुरण में संसार है, जब वह मिटती
है, तब संसार भी मिट जाता है । उस वासना के स्फुरण की निवृत्ति
लिए सात भूमिका कहता हूँ ।
जब प्रथम जिज्ञासु होता है, तब चाहता है कि संतजनों का संग कर
ब्रह्मविद्या-शास्त्र को देखे और सुने—यह प्रथम भूमिका है । भूमि
चित्त के ठहरने के स्थान को कहते हैं । फिर जब सत्संग और शास्त्र
में बुद्धि बढ़ी, तब सन्तों और शास्त्रों के कहने को विचारना कि मैं कौन
हूँ और संसार क्या है—यह दूसरी भूमिका है । उसके उपरान्त यह विचार-
ना कि मैं आत्मा हूँ; संसार मिथ्या है और मुझमें कोई संसार नहीं
बारम्बार ऐसी भावना करना तीसरी भूमिका है । जब आत्मभावना