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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

DevanagariHindipublished429 पृष्ठ

३०६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
जानता है वह वेदवित् है; किन्तु उसको काटनेवाला ही जानता है। यहाँ कहते
हैं-मैं भी वेदवित् हूँ। उन वेदविदों में अपनी भी गणना करते हैं। अतः श्रीकृष्ण
भी यहाँ वेदवित् पुरुषोत्तम हैं, जिसे पाने का अधिकार मानवमात्र को है।
अन्त में उन्होंने बताया कि लोक में दो प्रकार के पुरुष हैं। भूतादिकों के
सम्पूर्ण शरीर क्षर हैं। मन की कूटस्थ अवस्था में यही पुरुष अक्षर है; किन्तु है
द्वन्द्वात्मक और इससे भी परे जो परमात्मा, परमेश्वर, अव्यक्त और अविनाशी
कहा जाता है, वह वस्तुतः अन्य ही है। यह क्षर और अक्षर से परेवाली
अवस्था है, यही परमस्थिति है। इससे संगत करते हुए कहते हैं कि मैं भी क्षर-
अक्षर से परे वही हूँ, इसलिये लोग मुझे पुरुषोत्तम कहते हैं। इस प्रकार उत्तम
पुरुष को जो जानते हैं वे ज्ञानी भक्तजन सदैव, सब ओर से मुझे ही भजते हैं।
उनकी जानकारी में अन्तर नहीं है। अर्जुन! यह अत्यन्त गोपनीय रहस्य मैंने
तेरे प्रति कहा। प्राप्तिवाले महापुरुष सबके सामने नहीं कहते; किन्तु अधिकारी
से दुराव भी नहीं रखते। अगर दुराव करेंगे तो वह पायेगा कैसे?
इस अध्याय में आत्मा की तीन स्थितियों का चित्रण क्षर, अक्षर और
अति उत्तम पुरुष के रूप में स्पष्ट किया गया, जैसा इससे पहले किसी अन्य
अध्याय में नहीं है। अतः-
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसम्वादे ‘पुरुषोत्तमयोगो’ नाम पञ्चदशोऽध्यायः।।१५।।
इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र
विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के सम्वाद में ‘पुरुषोत्तम योग’ नामक पन्द्रहवाँ
अध्याय पूर्ण होता है।
इति श्रीमत्परमहंसपरमानन्दस्य शिष्य स्वामीअड़गड़ानन्दकृते
श्रीमद्भगवद्गीतायाः ‘यथार्थ गीता’ भाष्ये ‘पुरुषोत्तमयोगो’ नाम
पञ्चदशोऽध्यायः।।१५।।
इस प्रकार श्रीमत् परमहंस परमानन्दजी के शिष्य स्वामी अड़गड़ानन्दकृत
‘श्रीमद्भगवद्गीता’ के भाष्य ‘यथार्थ गीता’ में ‘पुरुषोत्तम योग’ नामक पन्द्रहवाँ
अध्याय पूर्ण होता है।
।। हरिः ॐ तत्सत् ।।

षोडशोऽध्यायः दैवासुर सम्पद् विभाग योग

।। ॐ श्री परमात्मने नमः ।।
।। अथ षोडशोऽध्यायः ।।
योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण के प्रश्न प्रस्तुत करने की अपनी विशिष्ट
शैली है। पहले वे प्रकरण की विशेषताओं का उल्लेख करते हैं, जिससे पुरुष
उसकी ओर आकर्षित हो, तत्पश्चात् वे उस प्रकरण को स्पष्ट करते हैं।
उदाहरण के लिये कर्म को लें। उन्होंने दूसरे अध्याय में ही प्रेरणा दी कि-
अर्जुन! कर्म कर। तीसरे अध्याय में उन्होंने इंगित किया कि निर्धारित कर्म
कर। निर्धारित कर्म है क्या? तो बताया- यज्ञ की प्रक्रिया ही कर्म है। फिर
उन्होंने यज्ञ का स्वरूप न बताकर पहले बताया कि यज्ञ आया कहाँ से और
देता क्या है? चौथे अध्याय में तेरह-चौदह विधियों से यज्ञ का स्वरूप स्पष्ट
किया, जिसको करना कर्म है। यहाँ कर्म स्पष्ट होता है, जिसका शुद्ध अर्थ है
योग-चिन्तन, आराधना, जो मन और इन्द्रियों की क्रिया से सम्पन्न होता है।
इसी प्रकार उन्होंने अध्याय नौ में दैवी और आसुरी सम्पद् का नाम
लिया। उनकी विशेषताओं पर बल दिया कि- अर्जुन! आसुरी स्वभाववाले
मुझे तुच्छ कहकर पुकारते हैं। हूँ तो मैं भी मनुष्य-शरीर के आधारवाला
क्योंकि मनुष्य-शरीर में ही मुझे यह स्थिति मिली है; किन्तु आसुरी स्वभाववाले,
मूढ़ स्वभाववाले मुझे नहीं भजते, जबकि दैवी सम्पद् से युक्त भक्तजन अनन्य
श्रद्धा से मुझे उपासते हैं। किन्तु इन सम्पत्तियों का स्वरूप, उनका गठन अभी
तक नहीं बताया गया। अब अध्याय सोलह में योगेश्वर उनका स्वरूप स्पष्ट
करने जा रहे हैं, जिनमें प्रस्तुत है पहले दैवी सम्पद् के लक्षण-
श्रीभगवानुवाच
अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्।।१।।
भय का सर्वथा अभाव, अन्तःकरण की शुद्धता, तत्त्वज्ञान के लिये
ध्यान में दृढ़ स्थिति अथवा निरन्तर लगन, सर्वस्व का समर्पण, इन्द्रियों का

३०८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
भली प्रकार दमन, यज्ञ का आचरण (जैसा स्वयं श्रीकृष्ण ने अध्याय चार में
बताया है- संयमाग्नि में हवन, इन्द्रियाग्नि में हवन, प्राण-अपान में हवन और
अन्त में ज्ञानाग्नि में हवन अर्थात् आराधना की प्रक्रिया, जो केवल मन और
इन्द्रियों की अन्तःक्रिया से सम्पन्न होती है। तिल, जौ, वेदी इत्यादि सामग्रियों
से होनेवाले यज्ञ का इस गीतोक्त यज्ञ से कोई सम्बन्ध नहीं है। श्रीकृष्ण ने ऐसे
किसी कर्मकाण्ड को यज्ञ नहीं माना।), स्वाध्याय अर्थात् स्व-स्वरूप की ओर
अग्रसर करानेवाला अध्ययन, तप अर्थात् मनसहित इन्द्रियों को इष्ट के अनुरूप
ढालना तथा ‘आर्जवम्’- शरीर और इन्द्रियोंसहित अन्तःकरण की सरलता-
अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्।
दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्॥२॥
अहिंसा अर्थात् आत्मा का उद्धार (आत्मा को अधोगति में पहुँचाना ही
हिंसा है। श्रीकृष्ण कहते हैं- यदि मैं सावधान होकर कर्म में न बरतूँ तो इस
सम्पूर्ण प्रजा का हनन करनेवाला और वर्णसंकर का कर्त्ता होऊँ। आत्मा का
शुद्ध वर्ण है परमात्मा, उसका प्रकृति में भटकना वर्णसंकर है, आत्मा की हिंसा
है और आत्मा का उद्धार ही अहिंसा है।), सत्य (सत्य का अर्थ यथार्थ और
प्रिय भाषण नहीं है। आप कहते हैं- यह वस्त्र हमारा है, तो क्या आप सच
बोलते हैं? इससे बड़ा झूठ और क्या होगा? जब शरीर आपका नहीं है, नश्वर
है तो इसे ढाँकने का वस्त्र कब आपका है? वस्तुतः सत्य का स्वरूप योगेश्वर
ने स्वयं बताया है कि- अर्जुन! सत्य वस्तु का तीनों कालों में कभी अभाव
नहीं है। यह आत्मा ही सत्य है, यही परमसत्य है-इस सत्य पर दृष्टि रखना।),
क्रोध का न होना, सर्वस्व का समर्पण, शुभाशुभ कर्मफलों का त्याग, चित्त की
चंचलता का सर्वथा अभाव, लक्ष्य के विपरीत निन्दित कार्यों को न करना,
सम्पूर्ण प्राणियों में दयाभाव, इन्द्रियों का विषयों से संयोग होने पर भी उनमें
आसक्ति का अभाव, कोमलता, अपने लक्ष्य से विमुख होने में लज्जा, व्यर्थ
की चेष्टाओं का अभाव तथा-
तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता।
भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत॥३॥

षोडश अध्याय ३०९
तेज (जो एकमात्र ईश्वर में है, उसके तेज से जो कार्य करता है।
महात्मा बुद्ध की दृष्टि पड़ते ही अंगुलिमाल के विचार बदल गये। यह उस तेज
का ही परिणाम था जिससे कल्याण का सृजन होता है, जो बुद्ध में था), क्षमा,
धैर्य, शुद्धि, किसी में शत्रुभाव का न होना, अपने में पूज्यता के भाव का सर्वथा
अभाव- यह सब तो हे अर्जुन ! दैवी सम्पद् को प्राप्त पुरुष के लक्षण हैं। इस
प्रकार कुल छब्बीस लक्षण बताये, जो सब-के-सब तो साधना में परिपक्व
अवस्थावाले पुरुष में सम्भव हैं और आंशिक रूप में आप में भी निश्चित हैं
तथा आसुरी सम्पद् से आप्लावित मनुष्यों में भी ये गुण हैं किन्तु प्रसुप्त रहते
हैं, तभी तो घोर पापी को भी कल्याण का अधिकार है। अब आसुरी सम्पद् के
प्रमुख लक्षण बताते हैं-
दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च।
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम्।।४।।
हे पार्थ! पाखण्ड, घमण्ड, अभिमान, क्रोध, कठोर वाणी और अज्ञान-
यह सब आसुरी सम्पद् को प्राप्त पुरुष के लक्षण हैं। दोनों सम्पदाओं का कार्य
क्या है?-
दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता।
मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव।।५।।
इन दोनों प्रकार की सम्पदाओं में से दैवी सम्पद् तो 'विमोक्षाय'-
विशेष मोक्ष के लिये है और आसुरी सम्पदा बन्धन के लिये मानी गयी है। हे
अर्जुन! तू शोक मत कर; क्योंकि दैवी सम्पदा को प्राप्त हुआ है। विशेष मुक्ति
को प्राप्त होगा अर्थात् मुझे प्राप्त होगा। ये सम्पदाएँ रहती कहाँ हैं?-
द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च।
दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु।।६।।
हे अर्जुन! इस लोक में भूतों के स्वभाव दो प्रकार के होते हैं- देवों के
जैसा और असुरों के जैसा। जब हृदय में दैवी सम्पद् कार्यरूप ले लेती है तो
मनुष्य ही देवता है और जब आसुरी सम्पद् का बाहुल्य हो तो मनुष्य ही असुर
है। सृष्टि में ये दो ही जातियाँ हैं। वह चाहे अरब में पैदा हुआ है, चाहे

३१० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
आस्ट्रेलिया में; कहीं भी पैदा हुआ हो, बशर्ते है इन दो में से ही। अभी तक
देवों का स्वभाव ही विस्तार से कहा गया, अब असुरों के स्वभाव को मुझसे
विस्तारपूर्वक सुन।
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः।
न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते।।७।।
हे अर्जुन ! असुर लोग ‘कार्यम् कर्म’ में प्रवृत्त होने और अकर्तव्य कर्म
से निवृत्त होना भी नहीं जानते। इसलिये उनमें न शुद्धि रहती है, न आचरण
और न सत्य ही रहता है। उन पुरुषों के विचार कैसे होते हैं?-
असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्।
अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम्।।८।।
वे आसुरी प्रकृतिवाले मनुष्य कहते हैं कि जगत् आश्रयरहित है, सर्वथा
झूठा है और बिना ईश्वर के अपने आप स्त्री-पुरुष के संयोग से उत्पन्न हुआ है,
इसलिये केवल भोगों को भोगने के लिये है। इसके सिवाय और क्या है?
एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः।
प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः।।९।।
इस मिथ्या दृष्टिकोण के अवलम्बन से जिनका स्वभाव नष्ट हो चुका है
वे मन्दबुद्धि, अपकारी, क्रूरकर्मी मनुष्य केवल जगत् का नाश करने के लिये
ही उत्पन्न होते हैं।
काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः।
मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः।।१०।।
वे मनुष्य दम्भ, मान और मद से युक्त हुए किसी भी प्रकार पूर्ण न
होनेवाली कामनाओं का आश्रय लेकर, अज्ञान से मिथ्या सिद्धान्तों को ग्रहण
करके अशुभ तथा भ्रष्ट व्रतों से युक्त हुए संसार में बरतते हैं। वे व्रत भी करते
हैं; किन्तु भ्रष्ट हैं।
चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः।
कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः।।११।।
वे अन्तिम श्वास तक अनन्त चिन्ताओं को लिये रहते हैं और विषयों

षोडश अध्याय ३११
को भोगने में तत्पर वे 'बस इतना ही आनन्द है'- ऐसा मानते हैं। उनकी
मान्यता रहती है कि जितना हो सके भोग संग्रह करो, इसके आगे कुछ नहीं है।
आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः।
ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान्।।१२।।
आशारूपी सैकड़ों फाँसियों से (एक फाँसी से ही लोग मर जाते हैं, यहाँ
सैकड़ों फाँसियों से) बँधे हुए काम-क्रोध के परायण विषय-भोगों की पूर्ति के
लिये वे अन्यायपूर्वक धनादि बहुत से पदार्थों को संग्रह करने की चेष्टा करते
हैं। अतः धन के लिये वे रात-दिन असामाजिक कदम उठाया करते हैं। आगे
कहते हैं-
इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम्।
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्।।१३।।
वे सोचते हैं कि मैंने आज यह पाया है, इस मनोरथ को प्राप्त करूँगा।
मेरे पास इतना धन है और फिर कभी इतना हो जायेगा।
असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि।
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी।।१४।।
वह शत्रु मेरे द्वारा मारा गया और दूसरे शत्रुओं को भी मैं मारूँगा। मैं ही
ईश्वर और ऐश्वर्य को भोगनेवाला हूँ। मैं ही सिद्धियों से युक्त, बलवान् और
सुखी हूँ।
आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया।
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः।।१५।।
मैं बड़ा धनी और बड़े कुटुम्बवाला हूँ। मेरे समान दूसरा कौन है? मैं
यज्ञ करूँगा, मैं दान दूँगा, मुझे हर्ष होगा- इस प्रकार के अज्ञान से वे विशेष
मोहित रहते हैं। क्या यज्ञ, दान भी अज्ञान है? इस पर अध्याय १७ में स्पष्ट
किया है। इतने पर भी वे नहीं रुकते बल्कि अनेक भ्रान्तियों के शिकार रहते हैं।
इस पर कहते हैं-
अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः।
प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ।।१६।।

३१२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
अनेक प्रकार से भ्रमित हुए चित्तवाले, मोह-जाल में फँसे हुए, विषय-
भोगों में अत्यन्त आसक्त वे आसुरी स्वभाववाले मनुष्य अपवित्र नरक में
गिरते हैं। आगे श्रीकृष्ण स्वयं बतायेंगे कि नरक क्या है?
आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः।
यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम्॥१७॥
अपने आपको ही श्रेष्ठ माननेवाले, धन और मान के मद से युक्त होकर
वे घमण्डी मनुष्य शास्त्रविधि से रहित केवल नाममात्र के यज्ञों द्वारा पाखण्ड से
यजन करते हैं। क्या वही यज्ञ करते हैं, जैसा श्रीकृष्ण ने बताया है? नहीं, उस
विधि को छोड़कर करते हैं; क्योंकि विधि योगेश्वर ने स्वयं बतायी है। (अध्याय
४/२४-३३ तथा अध्याय ६/१०-१७)
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः।
मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः॥१८॥
वे दूसरों की निन्दा करनेवाले; अहंकार, बल, घमण्ड, कामना और
क्रोध के परायण हुए पुरुष अपने और दूसरों के शरीर में स्थित मुझ अन्तर्यामी
परमात्मा से द्वेष करनेवाले हैं। शास्त्रविधि से परमात्मा का सुमिरन एक यज्ञ है।
जो इस विधि को त्यागकर नाममात्र का यज्ञ करते हैं, यज्ञ के नाम पर कुछ-
न-कुछ करते ही रहते हैं, वे अपने और दूसरे के शरीर में स्थित मुझ परमात्मा
से द्वेष करनेवाले हैं। लोग द्वेष करते ही रहते हैं और बच भी जाते हैं, क्या ये
भी बच जायेंगे? इस पर कहते हैं- नहीं,
तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान्।
क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु॥१९॥
मुझसे द्वेष करनेवाले उन पापाचारी, क्रूरकर्मी नराधमों को मैं संसार में
निरन्तर आसुरी योनियों में ही गिराता हूँ। जो शास्त्रविधि को त्यागकर यजन
करते हैं वे पापयोनि हैं, वही मनुष्यों में अधम हैं, इन्हीं को क्रूरकर्मी कहा गया।
अन्य कोई अधम नहीं है। पीछे कहा था, ऐसे अधमों को मैं नरक में गिराता
हूँ, उसी को यहाँ कहते हैं कि उन्हें अजस्र आसुरी योनियों में गिराता हूँ। यही
नरक है। साधारण जेल की यातना भयंकर होती है और यहाँ अनवरत आसुरी

षोडश अध्याय ३१३
योनियों में गिरने का क्रम कितना दुःखद है। अतः दैवी सम्पद् के लिये
प्रयत्नशील रहना चाहिये।
आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि।
मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्॥२०॥
कौन्तेय! मूर्ख मनुष्य जन्म-जन्मान्तरों तक आसुरी योनि को प्राप्त हुए
मुझे न प्राप्त होकर पहले से भी अति नीच गति को प्राप्त होते हैं, जिसका नाम
नरक है। अब देखें, नरक का उद्गम क्या है?–
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्॥२१॥
काम, क्रोध और लोभ ये तीन प्रकार के नरक के मूल द्वार हैं। ये
आत्मा का नाश करनेवाले, उसे अधोगति में ले जानेवाले हैं। अतः इन तीनों
को त्याग देना चाहिये। इन्हीं तीनों पर आसुरी सम्पद् टिकी हुई है। इन्हें त्यागने
से लाभ?–
एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः।
आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम्॥२२॥
कौन्तेय! नरक के इन तीनों द्वारों से मुक्त हुआ पुरुष अपने परमकल्याण
के लिये आचरण कर पाता है, जिससे वह परमगति अर्थात् मेरे को प्राप्त होता
है। इन तीनों विकारों को त्यागने पर ही मनुष्य नियत कर्म करता है, जिसका
परिणाम परमश्रेय है।
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्॥२३॥
जो पुरुष उपर्युक्त शास्त्रविधि को त्यागकर [वह शास्त्र कोई अन्य नहीं,
‘इति गुह्यतमं शास्त्रम्’ ( १५/२०) गीता स्वयं पूर्णशास्त्र है, जिसे स्वयं
श्रीकृष्ण ने बताया है, उस विधि को त्यागकर] अपनी इच्छा से बरतता है, वह
न सिद्धि को प्राप्त होता है, न परमगति को और न सुख को ही प्राप्त होता है।
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥२४॥

३१४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
इसलिये अर्जुन! तेरे लिये इस कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य की व्यवस्था में
कि मैं क्या करूँ, क्या न करूँ?– इसकी व्यवस्था में शास्त्र ही एक प्रमाण है।
ऐसा जानकर शास्त्रविधि से नियत किये हुए कर्म को ही तुझे करना योग्य है।
अध्याय तीन में भी योगेश्वर श्रीकृष्ण ने ‘नियतं कुरु कर्म त्वं’-
नियत कर्म पर बल दिया और बताया कि यज्ञ की प्रक्रिया ही वह नियत कर्म
है और वह यज्ञ आराधना की विधि-विशेष का चित्रण है, जो मन का सर्वथा
निरोध करके शाश्वत ब्रह्म में प्रवेश दिलाता है। यहाँ उन्होंने बताया कि काम,
क्रोध और लोभ नरक के तीन प्रमुख द्वार हैं। इन तीनों को त्याग देने पर ही उस
कर्म का (नियत कर्म का) आरम्भ होता है, जिसे मैंने बार-बार कहा, जो
परमश्रेय-परमकल्याण दिलानेवाला आचरण है। बाहर सांसारिक कार्यों में जो
जितना व्यस्त है, उतना ही अधिक काम, क्रोध और लोभ उसके पास सजा-
सजाया मिलता है। कर्म कोई ऐसी वस्तु है कि काम, क्रोध और लोभ को त्याग
देने पर ही उसमें प्रवेश मिलता है, कर्म आचरण में ढल पाता है। जो उस विधि
को त्यागकर अपनी इच्छा से आचरण करता है, उसके लिये सुख, सिद्धि
अथवा परमगति कुछ भी नहीं है। अब कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य की व्यवस्था में
शास्त्र ही एकमात्र प्रमाण है। अतः शास्त्रविधि के ही अनुसार तुझे कर्म करना
उचित है और वह शास्त्र है ‘गीता’।
निष्कर्ष-
इस अध्याय के आरम्भ में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने दैवी सम्पद् का विस्तार
से वर्णन किया। जिसमें ध्यान में स्थिति, सर्वस्व का समर्पण, अन्तःकरण की
शुद्धि, इन्द्रियों का दमन, मन का शमन, स्वरूप को स्मरण दिलानेवाला
अध्ययन, यज्ञ के लिये प्रयत्न, मनसहित इन्द्रियों को तपाना, अक्रोध, चित्त
का शान्त प्रवाहित रहना इत्यादि छब्बीस लक्षण बताये, जो सब-के-सब तो
इष्ट के समीप पहुँचे हुए योग-साधना में प्रवृत्त किसी साधक में सम्भव हैं।
आंशिक रूप से सब में हैं।
तदनन्तर उन्होंने आसुरी सम्पद् में प्रधान चार-छः विकारों का नाम
लिया; जैसे- अभिमान, दम्भ, कठोरता, अज्ञान इत्यादि और अन्त में निर्णय
दिया कि अर्जुन! दैवी सम्पद् तो ‘विमोक्षाय’- पूर्ण निवृत्ति के लिये है,

षोडश अध्याय ३१५
परमपद की प्राप्ति के लिये है और आसुरी सम्पद् बन्धन और अधोगति के
लिये है। अर्जुन! तू शोक न कर; क्योंकि तू दैवी सम्पद् को प्राप्त हुआ है।
ये सम्पदाएँ होती कहाँ हैं? उन्होंने बताया कि इस लोक में मनुष्यों के
स्वभाव दो प्रकार के होते हैं- देवताओं-जैसा और असुरों-जैसा। जब दैवी
सम्पद् का बाहुल्य होता है तो मनुष्य देवताओं-जैसा होता है और जब आसुरी
सम्पद् का बाहुल्य होता है तो मनुष्य असुरों-जैसा है। सृष्टि में बस मनुष्यों की
दो ही जाति हैं; चाहे वह कहीं पैदा हुआ हो, कुछ भी कहलाता हो।
तत्पश्चात् उन्होंने आसुरी स्वभाववाले मनुष्यों के लक्षणों का विस्तार
से उल्लेख किया। आसुरी सम्पद् को प्राप्त पुरुष कर्तव्य कर्म में प्रवृत्त होना
नहीं जानता और अकर्तव्य कर्म से निवृत्त होना नहीं जानता। वह कर्म में जब
प्रवृत्त ही नहीं हुआ तो न उसमें सत्य होता है, न शुद्धि और न आचरण ही होता
है। उसके विचार में जगत् आश्रयरहित, बिना ईश्वर के अपने आप स्त्री-पुरुष
के संयोग से उत्पन्न हुआ है, अतः केवल भोग भोगने के लिये है। इससे आगे
क्या है?- यह विचार कृष्णकाल में भी था। सदैव रहा है। केवल चार्वाक ने
कहा हो, ऐसी बात नहीं है। जब तक जनमानस में दैवी-आसुरी सम्पद् का
उतार-चढ़ाव है तब तक रहेगा। श्रीकृष्ण कहते हैं- वे मन्दबुद्धिवाले पुरुष
सबका अहित (कल्याण का नाश) करने के लिये ही जगत् में पैदा होते हैं। वे
कहते हैं- मेरे द्वारा यह शत्रु मारा गया, उसे मारूँगा। इस प्रकार अर्जुन ! काम-
क्रोध के आश्रित वे पुरुष शत्रुओं को नहीं मारते बल्कि अपने और दूसरों के
शरीर में स्थित मुझ परमात्मा से द्वेष करनेवाले हैं। तो क्या अर्जुन ने प्रण करके
जयद्रथादि को मारा? यदि मारता है तो आसुरी सम्पद्वाला है, उन परमात्मा से
द्वेष करनेवाला है; जबकि अर्जुन को श्रीकृष्ण ने स्पष्ट कहा कि तू दैवी सम्पद्
को प्राप्त हुआ है, शोक मत कर। यहाँ भी स्पष्ट हुआ कि ईश्वर का निवास
सबके हृदय-देश में है। स्मरण रखना चाहिये कि कोई तुम्हें सतत देख रहा है।
अतः सदैव शास्त्रनिर्दिष्ट क्रिया का ही आचरण करना चाहिये अन्यथा दण्ड
प्रस्तुत है।
योगेश्वर श्रीकृष्ण ने पुनः कहा कि आसुरी स्वभाववाले क्रूर मनुष्यों को
मैं बारम्बार नरक में गिराता हूँ। नरक का स्वरूप क्या है? तो बताया, बारम्बार

३१६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
नीच-अधम योनियों में गिरना एक दूसरे का पर्याय है। यही नरक का स्वरूप
है। काम, क्रोध और लोभ नरक के तीन मूल द्वार हैं। इन तीनों पर ही आसुरी
सम्पद् टिकी हुई है। इन तीनों को त्याग देने पर ही उस कर्म का आरम्भ होता
है, जिसे मैंने बार-बार बताया है। सिद्ध है कि कर्म कोई ऐसी वस्तु है, जिसका
आरम्भ काम, क्रोध और लोभ को त्याग देने पर ही होता है।
सांसारिक कार्यों में, मर्यादित ढंग से सामाजिक व्यवस्थाओं का निर्वाह
करने में भी जो जितने व्यस्त हैं काम, क्रोध और लोभ उनके पास उतने
अधिक सजे-सजाये मिलते हैं। वस्तुतः इन तीनों को त्याग देने पर ही परम में
प्रवेश दिलानेवाले निर्धारित कर्म में प्रवेश मिलता है। इसलिये मैं क्या करूँ,
क्या न करूँ? - इस कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य की व्यवस्था में शास्त्र ही प्रमाण है।
कौन-सा शास्त्र? यही गीताशास्त्र; 'किमन्यै शास्त्रविस्तरैः।' इसलिये इस
शास्त्र द्वारा निर्धारित किये हुए कर्म-विशेष (यज्ञार्थ कर्म) को ही तू कर।
इस अध्याय में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने दैवी और आसुरी दोनों सम्पदाओं
का विस्तार से वर्णन किया। उनका स्थान मानव-हृदय बताया। उनका फल
बताया। अतः-
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसंवादे 'दैवासुरसम्पद्विभागयोगो' नाम
षोडशोऽध्यायः॥१६॥
इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र
विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के सम्वाद में 'दैवासुर सम्पद् विभाग योग'
नामक सोलहवाँ अध्याय पूर्ण होता है।
इति श्रीमत्परमहंसपरमानन्दस्य शिष्य स्वामीअड़गड़ानन्दकृते
श्रीमद्भगवद्गीतायाः 'यथार्थ गीता' भाष्ये 'दैवासुरसम्पद्विभागयोगो'
नाम षोडशोऽध्यायः॥१६॥
इस प्रकार श्रीमत् परमहंस परमानन्दजी के शिष्य स्वामी अड़गड़ानन्दकृत
'श्रीमद्भगवद्गीता' के भाष्य 'यथार्थ गीता' में 'दैवासुर सम्पद् विभाग योग'
नामक सोलहवाँ अध्याय पूर्ण होता है।
।। हरिः ॐ तत्सत् ।।

सप्तदशोऽध्यायः ॐ तत्सत् व श्रद्धात्रय विभाग योग

॥ ॐ श्री परमात्मने नमः॥
॥अथ सप्तदशोऽध्यायः॥
अध्याय सोलह के अन्त में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने स्पष्ट कहा कि काम,
क्रोध और लोभ के त्यागने पर ही कर्म आरम्भ होता है, जिसे मैंने बार-बार
कहा है। नियत कर्म को बिना किये न सुख, न सिद्धि और न परमगति ही
मिलती है। इसलिये अब तुम्हारे लिये कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य की व्यवस्था में
कि क्या करूँ, क्या न करूँ?- इस सम्बन्ध में शास्त्र ही प्रमाण है। कोई अन्य
शास्त्र नहीं; बल्कि 'इति गुह्यतमं शास्त्रमिदम्।' (१५/२०) गीता स्वयं
शास्त्र है। अन्य शास्त्र भी हैं; किन्तु यहाँ इसी गीताशास्त्र पर दृष्टि रखें, दूसरा न
ढूँढ़ने लगें। दूसरी जगह ढूँढ़ेंगे तो यह क्रमबद्धता नहीं मिलेगी, अतः भटक
जायेंगे।
इस पर अर्जुन ने प्रश्न किया कि भगवन्! जो लोग शास्त्रविधि को
त्यागकर पूर्ण श्रद्धा से युक्त होकर 'यजन्ते'- यजन करते हैं, उनकी गति
कैसी है? सात्त्विकी है, राजसी अथवा तामसी है? क्योंकि पीछे अर्जुन ने सुना
था कि सात्त्विक, राजस अथवा तामस, जब तक गुण विद्यमान हैं, किसी-न-
किसी योनि के ही कारण होते हैं। इसलिये प्रस्तुत अध्याय के आरम्भ में ही
उसने प्रश्न रखा-
अर्जुन उवाच
ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः।
तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः ॥१॥
हे कृष्ण ! जो मनुष्य शास्त्रविधि को छोड़कर श्रद्धासहित यजन करते हैं,
उनकी गति कौन-सी है? सात्त्विकी है, राजसी है अथवा तामसी है? यजन में
देवता, यक्ष, भूत इत्यादि सभी आ जाते हैं।

३१८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
श्रीभगवानुवाच
त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा।
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु।।२।।
अध्याय दो में योगेश्वर ने बताया कि- अर्जुन! इस योग में निर्धारित
क्रिया एक ही है। अविवेकियों की बुद्धि अनन्त शाखाओंवाली होती है, इसलिये
वे अनन्त क्रियाओं का विस्तार कर लेते हैं। दिखावटी शोभायुक्त वाणी में उसे
व्यक्त भी करते हैं। उनकी वाणी की छाप जिनके चित्त पर पड़ती है, अर्जुन!
उनकी भी बुद्धि नष्ट हो जाती है, न कि कुछ पाते हैं। ठीक इसी की पुनरावृत्ति
यहाँ पर भी है कि जो ‘शास्त्रविधिमुत्सृज्य’– शास्त्रविधि को त्यागकर भजते
हैं, उनकी श्रद्धा भी तीन प्रकार की होती है।
इस पर श्रीकृष्ण ने कहा- मनुष्य की आदत से उत्पन्न हुई वह श्रद्धा
सात्त्विकी, राजसी तथा तामसी- ऐसे तीन प्रकार की होती है, उसे तू मुझसे
सुन। मनुष्य के हृदय में यह श्रद्धा अविरल है।
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः।।३।।
हे भारत! सभी मनुष्यों की श्रद्धा उनके चित्त की वृत्तियों के अनुरूप
होती है। यह पुरुष श्रद्धामय है। इसलिये जो पुरुष जैसी श्रद्धावाला है, वह
स्वयं भी वही है। प्रायः लोग पूछते हैं- मैं कौन हूँ? कोई कहता है- मैं तो
आत्मा हूँ। किन्तु नहीं, यहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं कि जैसी श्रद्धा, जैसी
वृत्ति वैसा पुरुष।
गीता योग-दर्शन है। महर्षि पतंजलि भी योगी थे। उनका योग-दर्शन है।
योग है क्या? उन्होंने बताया- ‘योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।’ ( १/२ ) चित्त की
वृत्तियों का सर्वथा रुक जाना योग है। किसी ने परिश्रम करके रोक ही लिया,
तो लाभ क्या है? ‘तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्।’ ( १/३ )- उस समय यह
द्रष्टा जीवात्मा अपने ही शाश्वत स्वरूप में स्थित हो जाता है। क्या स्थित

सप्तदश अध्याय ३१९
होने से पूर्व यह मलिन था? पतंजलि कहते हैं- ‘वृत्तिसारूप्यमितरत्र।’
(१/४)– दूसरे समय में जैसा वृत्ति का रूप है, वैसा ही वह द्रष्टा है। यहाँ
योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं– यह पुरुष श्रद्धामय है, श्रद्धा से ओतप्रोत, कहीं-
न-कहीं श्रद्धा अवश्य होगी और जैसी श्रद्धावाला है, वह स्वयं भी वही है।
जैसी वृत्ति, वैसा पुरुष। अब तीनों श्रद्धाओं का विभाजन करते हैं–
यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः।
प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः॥४॥
उनमें से सात्त्विक पुरुष देवताओं को पूजते हैं, राजस पुरुष यक्ष और
राक्षसों को पूजते हैं तथा अन्य तामस पुरुष प्रेत और भूतों को पूजते हैं। वे
पूजन में अथक परिश्रम भी करते हैं।
अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः।
दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः॥५॥
वे मनुष्य शास्त्रविधि से रहित घोर कल्पित (कल्पित क्रियाएँ रचकर)
तप तपते हैं। दम्भ और अहंकार से युक्त, कामना और आसक्ति के बल से
बँधे हुए–
कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः।
मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान्॥६॥
वे शरीररूप से स्थित भूतसमुदाय को और अन्तःकरण में स्थित मुझ
अन्तर्यामी को भी कृश करनेवाले हैं अर्थात् दुर्बल करनेवाले हैं। आत्मा प्रकृति
के दरारों में पड़कर विकारों से दुर्बल और यज्ञ-साधनों से सबल होती है। उन
अज्ञानियों (अचेतों) को निश्चय ही तू असुर जान अर्थात् वे सब-के-सब
असुर हैं। प्रश्न पूरा हुआ।
शास्त्रविधि को त्यागकर भजनेवाले सात्त्विक पुरुष देवताओं को, राजस
पुरुष यक्ष-राक्षसों को और तामस पुरुष भूत-प्रेतों को पूजते हैं। केवल पूजते
ही नहीं, घोर तप तपते हैं; किन्तु अर्जुन! शरीररूप से भूतों को और अन्तर्यामी

३२० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
रूप से स्थित मुझ परमात्मा को दुर्बल करनेवाले हैं, मुझसे दूरी पैदा करते हैं
न कि भजते हैं। उनको तू असुर जान अर्थात् देवताओं को पूजनेवाले भी असुर
ही हैं। इससे अधिक कोई क्या कहेगा? अतः जिसके ये सभी अंशमात्र हैं, उन
मूल एक परमात्मा का भजन करें। इसी पर योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बारम्बार बल
दिया है।
आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः।
यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु।।७।।
अर्जुन! जैसे श्रद्धा तीन प्रकार की होती है, वैसे ही सबको अपनी-
अपनी प्रकृति के अनुसार भोजन भी तीन प्रकार का प्रिय होता है और वैसे ही
यज्ञ, तप और दान भी तीन-तीन प्रकार के होते हैं। उनके भेद को तू मुझसे
सुन। पहले प्रस्तुत है आहार-
आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः ।
रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः।।८।।
आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख और प्रीति को बढ़ानेवाले; रसयुक्त,
चिकने और स्थिर रहनेवाले तथा स्वभाव से ही हृदय को प्रिय लगनेवाले
भोज्य पदार्थ सात्त्विक पुरुष को प्रिय होते हैं।
योगेश्वर श्रीकृष्ण के अनुसार, स्वभाव से हृदय को प्रिय लगनेवाला,
बल, आरोग्य, बुद्धि और आयु बढ़ानेवाला भोज्य पदार्थ ही सात्त्विक है। जो
भोज्य पदार्थ सात्त्विक है, वही सात्त्विक मनुष्य को प्रिय होता है। इससे स्पष्ट
हो जाता है कि कोई भी खाद्य वस्तु सात्त्विकी, राजसी अथवा तामसी नहीं
होती, उसका प्रयोग सात्त्विकी, राजसी अथवा तामसी हुआ करता है। न दूध
सात्त्विक है, न प्याज राजसी और न लहसुन तामसी है।
जहाँ तक बल, बुद्धि, आरोग्य और हृदय को प्रिय लगने का प्रश्न है, तो
विश्वभर में मनुष्यों को अपनी-अपनी प्रकृति, वातावरण और परिस्थितियों के
अनुकूल विभिन्न खाद्य सामग्रियाँ प्रिय होती हैं, जैसे- बंगालियों तथा मद्रासियों
को चावल प्रिय होता है और पंजाबियों को रोटी। एक ओर तो अरबवासियों

सप्तदश अध्याय ३२१
को दुम्बा, चीनियों को मेढक, तो दूसरी ओर ध्रुव-जैसे ठंडे प्रदेशों में मांस
बिना गुजारा नहीं है। रूस और मंगोलिया के आदिवासी खाद्य में घोड़े इस्तेमाल
करते हैं, यूरोपवासी गाय तथा सुअर दोनों खाते हैं; फिर भी विद्या, बुद्धि-
विकास तथा उन्नति में अमेरिका और यूरोपवासी प्रथम श्रेणी में गिने जा रहे हैं।
गीता के अनुसार रसयुक्त, चिकना और स्थिर रहनेवाला भोज्य पदार्थ
सात्त्विक है। लम्बी आयु, अनुकूल, बल-बुद्धि बढ़ानेवाला, आरोग्यवर्द्धक
पदार्थ सात्त्विक है। स्वभाव से हृदय को प्रिय लगनेवाला भोज्य पदार्थ सात्त्विक
है। अतः कहीं किसी खाद्य पदार्थ को घटाना-बढ़ाना नहीं है। परिस्थिति,
परिवेश तथा देशकाल के अनुसार जो भोज्य वस्तु स्वभाव से प्रिय लगे और
जीवनी शक्ति प्रदान करे, वही सात्त्विकी है। वस्तु सात्त्विकी, राजसी या तामसी
नहीं होती, उसका प्रयोग सात्त्विकी, राजसी अथवा तामसी होता है।
इसी अनुकूलन के लिये जो व्यक्ति घर-परिवार त्यागकर केवल ईश्वर-
आराधन में लिप्त हैं, संन्यास आश्रम में हैं, उनके लिये मांस-मदिरा त्याज्य है;
क्योंकि अनुभव से देखा गया है कि ये पदार्थ आध्यात्मिक मार्ग के विपरीत
मनोभाव उत्पन्न करते हैं, अतः इनसे साधन-पथ से भ्रष्ट होने की अधिक
सम्भावना है। जो एकान्त-देश का सेवन करनेवाले विरक्त हैं, उनके लिये
योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अध्याय छः में आहार के लिये एक नियम दिया कि
'युक्ताहार विहारस्य' इसी को ध्यान में रखकर आचरण करना चाहिये। जो
भजन में सहायक है उतना (वही) आहार ग्रहण करना चाहिये।
कट्वम्ललवणात्युष्णातीक्ष्णरूक्षविदाहिनः।
आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः॥९॥
कड़वे, खट्टे, अधिक नमकीन, अत्यन्त गर्म, तीखे, रूखे, दाहकारक
और दुःख, चिन्ता तथा रोगों को उत्पन्न करनेवाले आहार राजस पुरुष को प्रिय
होते हैं।
यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्।
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्॥१०॥

३२२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
जो भोजन देर का बना हुआ है, 'गतरसं'– रसरहित, दुर्गन्धयुक्त,
बासी, उच्छिष्ट (जूठा) और अपवित्र भी है, वह तामस पुरुष को प्रिय होता है।
प्रश्न पूरा हुआ। अब प्रस्तुत है 'यज्ञ'–
अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते।
यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः॥११॥
जो यज्ञ 'विधिदृष्टः'– शास्त्रविधि से निर्धारित किया गया है (जैसा
पीछे अध्याय ३ में यज्ञ का नाम लिया, अध्याय ४ में यज्ञ का स्वरूप बताया
कि बहुत से योगी प्राण को अपान में, अपान को प्राण में हवन करते हैं। प्राण–
अपान की गति निरोध कर प्राणों की गति स्थिर कर लेते हैं, संयमाग्नि में हवन
करते हैं। इस प्रकार यज्ञ के चौदह सोपान बताये, जो सब-के-सब ब्रह्म तक
की दूरी तय करा देनेवाली एक ही क्रिया की ऊँची–नीची अवस्थाएँ हैं। संक्षेप
में यज्ञ चिन्तन की प्रक्रिया का चित्रण है, जिसका परिणाम सनातन ब्रह्म में
प्रवेश है। जिसका विधान इस शास्त्र में किया गया है।) उसी शास्त्र-विधान पर
पुनः बल देते हैं कि अर्जुन ! शास्त्रविधि से नियत किये हुए, जिसे करना ही
कर्त्तव्य है तथा जो मन का निरोध करनेवाला है, जो फल को न चाहनेवाले
पुरुषों द्वारा किया जाता है, वह यज्ञ सात्त्विक है।
अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत्।
इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्॥१२॥
हे अर्जुन ! जो यज्ञ केवल दम्भाचरण के लिये ही हो या फल को उद्देश्य
बनाकर किया जाता है, उसे राजस यज्ञ जान। यह कर्त्ता यज्ञ की विधि जानता
है; किन्तु दम्भाचरण या फल को उद्देश्य बनाकर करता है कि अमुक वस्तु
मिलेगी तथा लोग देखें कि यज्ञ करता है– प्रशंसा करेंगे, ऐसा यज्ञकर्त्ता वस्तुतः
राजसी है। अब तामस यज्ञ का स्वरूप बताते हैं–
विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम्।
श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते॥१३॥
जो यज्ञ शास्त्रविधि से रहित है, जो अन्न (परमात्मा) की सृष्टि कर

सप्तदश अध्याय ३२३
सकने में असमर्थ है, मन के अन्तराल में निरुद्ध करने की क्षमता से रहित है,
दक्षिणा अर्थात् सर्वस्व के समर्पण से रहित है तथा जो श्रद्धारहित है, ऐसा यज्ञ
तामस यज्ञ कहा जाता है। ऐसा पुरुष वास्तविक यज्ञ को जानता ही नहीं। अब
प्रस्तुत है तप-
देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्।
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते।।१४।।
परमदेव परमात्मा, द्वैत पर जय प्राप्त करनेवाले द्विज, सद्गुरु और
ज्ञानीजनों का पूजन, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य तथा अहिंसा शरीर-सम्बन्धी
तप कहा जाता है। शरीर सदैव वासनाओं की ओर बहकता है, इसे अन्तःकरण
की उपर्युक्त वृत्तियों के अनुरूप तपाना शारीरिक तप है।
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते।।१५।।
उद्वेग न पैदा करनेवाला, प्रिय, हितकारक और सत्य भाषण तथा परमात्मा
में प्रवेश दिलानेवाले शास्त्रों के चिन्तन का अभ्यास, नाम-जप- यह वाणी-
सम्बन्धी तप कहा जाता है। वाणी विषयोन्मुख विचारों को भी व्यक्त करती
रहती है, इसे उस ओर से समेटकर परमसत्य परमात्मा की दिशा में लगाना
वाणी-सम्बन्धी तप है। अब मन-सम्बन्धी तप देखें-
मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः।
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते।।१६।।
मन की प्रसन्नता, सौम्यभाव, मौन अर्थात् इष्ट के अतिरिक्त अन्य विषयों
का स्मरण भी न हो, मन का निरोध, अन्तःकरण की सर्वथा पवित्रता- यह
मन-सम्बन्धी तप कहा जाता है। उपर्युक्त तीनों शरीर, वाणी और मन का तप
मिलाकर एक सात्त्विक तप है।
श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः।
अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते।।१७।।

३२४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
फल को न चाहते हुए अर्थात् निष्काम कर्म से युक्त पुरुषों द्वारा परम
श्रद्धा से किये हुए उपर्युक्त तीनों तपों को मिलाकर सात्त्विक तप कहते हैं। अब
प्रस्तुत है राजस तप-
सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत्।
क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्॥१८॥
जो तप सत्कार, मान और पूजा के लिये अथवा केवल पाखण्ड से ही
किया जाता है, वह अनिश्चित एवं चंचल फलवाला तप राजस कहा गया है।
मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः।
परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्॥१९॥
जो तप मूर्खतापूर्वक हठ से; मन, वाणी और शरीर के पीडासहित
अथवा दूसरे का अनिष्ट करने के लिये बदले की भावना से किया जाता है, वह
तप तामस कहा गया है।
इस प्रकार सात्त्विक तप में शरीर, मन और वाणी को मात्र इष्ट के
अनुरूप ढालना है। राजस तप में तप की क्रिया वही है; किन्तु दम्भमान
सम्मान की इच्छा से तपते हैं। प्रायः महात्मा लोग घर-बार छोड़ने के बाद भी
इस विकार के शिकार हो जाते हैं और तीसरा तामस तप अविधिपूर्वक होता है,
दूसरों को पीड़ा पहुँचाने के दृष्टिकोण से होता है। अब प्रस्तुत है दान-
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्॥२०॥
दान देना ही कर्त्तव्य है- इस भाव से जो दान देश (स्थान), काल
(समयानुकूल) और सत्यपात्र के प्राप्त होने पर बदले में उपकार की भावना
से रहित होकर दिया जाता है, वह दान सात्त्विक कहा गया है।
यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः।
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्॥२१॥
जो दान क्लेशपूर्वक (जो देते नहीं बनता लेकिन देना पड़ रहा है) तथा
प्रत्युपकार की भावना से कि यह करूँगा तो यह मिलेगा अथवा फल को

सप्तदश अध्याय ३२५
उद्देश्य बनाकर फिर दिया जाता है, वह दान राजस कहा गया है।
अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते।
असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम्।।२२।।
जो दान बिना सत्कार किये अथवा तिरस्कारपूर्वक झिड़ककर अयोग्य
देश-काल में अनधिकारियों को दिया जाता है, वह दान तामस कहा गया है।
'पूज्य महाराज जी' कहा करते थे- "हो, कुपात्र को दान देने से दाता नष्ट हो
जाता है।" ठीक इसी प्रकार श्रीकृष्ण का कहना है कि दान देना ही कर्त्तव्य है।
देश, काल और पात्र के प्राप्त होने पर बदले में उपकार न चाहने की भावना
से उदारता के साथ दिया जानेवाला दान सात्त्विक है। कठिनाई से निकलनेवाला,
बदले में फल की भावना से दिया जानेवाला दान राजस है और बिना सत्कार
के, झिड़कियों के साथ प्रतिकूल देश-काल में कुपात्र को दिया जानेवाला दान
तामस है, लेकिन है दान ही; किन्तु जो देह, गेह इत्यादि सबके ममत्व को
त्यागकर एकमात्र इष्ट पर ही निर्भर है, उसके लिये दान का विधान इससे और
उन्नत है- वह है सर्वस्व का समर्पण, सम्पूर्ण वासनाओं से हटकर मन का
समर्पण; जैसा कि श्रीकृष्ण ने कहा है- 'मय्येव मन आधत्स्व।' अतः दान
नितान्त आवश्यक है। अब प्रस्तुत है ॐ, तत् और सत् का स्वरूप-
ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा।।२३।।
अर्जुन! ॐ, तत् और सत्- ऐसा तीन प्रकार का नाम 'ब्रह्मणः निर्देशः
स्मृतः'- ब्रह्म का निर्देश करता है, स्मृति दिलाता है, संकेत करता है और ब्रह्म
का परिचायक है। उसी से 'पुरा'- पूर्व में (आरम्भ में) ब्राह्मण, वेद और
यज्ञादि रचे गये हैं। अर्थात् ब्राह्मण, यज्ञ और वेद ओम् से पैदा होते हैं। ये
योगजन्य हैं। ओम् के सतत चिन्तन से ही इनकी उत्पत्ति है, और कोई तरीका
नहीं है।
तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः।
प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम्।।२४।।