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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

DevanagariHindipublished429 पृष्ठ

सप्तम अध्याय १६७
मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव।।७।।
धनंजय! मेरे सिवाय किंचिन्मात्र भी दूसरी वस्तु नहीं है। यह सम्पूर्ण
जगत् सूत्र में मणियों के सदृश मेरे में गुँथा हुआ है। है तो; परन्तु जानेंगे कब?
जब (इसी अध्याय के प्रथम श्लोक के अनुसार) अनन्य आसक्ति (भक्ति) से
मेरे परायण होकर योग में उसी रूप से लग जाएँ। इसके बिना नहीं। योग में
लगना आवश्यक है।
रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः।
प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु।।८।।
कौन्तेय! जल में मैं रस हूँ, चन्द्रमा और सूर्य में प्रकाश हूँ, सम्पूर्ण वेदों
में ओंकार हूँ- (ओ+अहं+कार) स्वयं का आकार हूँ, आकाश में शब्द और
पुरुषों में पुरुषत्व हूँ। तथा मैं-
पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ।
जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु।।९।।
पृथिवी में पवित्र गन्ध और अग्नि में तेज हूँ। सम्पूर्ण जीवों में उनका
जीवन हूँ और तपस्वियों में उनका तप हूँ।
बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्।
बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्।।१०।।
पार्थ! तू सम्पूर्ण भूतों का सनातन कारण अर्थात् बीज मुझे ही जान। मैं
बुद्धिमानों की बुद्धि और तेजस्वियों का तेज हूँ। इसी क्रम में योगेश्वर श्रीकृष्ण
कहते हैं-
बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्।
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ।।११।।
हे भरतश्रेष्ठ अर्जुन! मैं बलवानों की कामना और आसक्तिरहित बल हूँ।
संसार में सब बलवान् ही तो बनते हैं। कोई दण्ड-बैठक लगाता है, तो कोई
परमाणु इकट्ठा करता है; किन्तु नहीं, श्रीकृष्ण कहते हैं- काम और राग से

१६८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
परे जो बल है वह मैं हूँ। वही वास्तविक बल है। सब भूतों में धर्म के अनुकूल
कामना मैं हूँ। परब्रह्म परमात्मा ही एकमात्र धर्म है, जो सबको धारण किये हुए
है। जो शाश्वत आत्मा है वही धर्म है। जो उससे अविरोध रखनेवाली कामना
है, मैं हूँ। आगे भी श्रीकृष्ण ने कहा- अर्जुन ! मेरी प्राप्ति के लिये इच्छा कर। सब
कामनाएँ तो वर्जित हैं; किन्तु उस परमात्मा को पाने की कामना आवश्यक है
अन्यथा आप साधन कर्म में प्रवृत्त नहीं होंगे। ऐसी कामना भी मेरी ही देन है।
ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये।
मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि।।१२।।
और भी जो सत्त्वगुण से उत्पन्न होनेवाले भाव हैं, जो रजोगुण और
तमोगुण से उत्पन्न होनेवाले भाव हैं, उन सबको तू मुझसे ही उत्पन्न होनेवाले हैं,
ऐसा जान। परन्तु वास्तव में उनमें मैं और वे मेरे में नहीं हैं। क्योंकि न मैं उनमें
खोया हुआ हूँ और न वे ही मुझमें प्रवेश कर पाते हैं; क्योंकि मुझे कर्म से स्पृहा
नहीं है। मैं निर्लेप हूँ, मुझे इनमें कुछ पाना नहीं है। इसलिये मुझमें प्रवेश नहीं
कर पाते। ऐसा होने पर भी-
जिस प्रकार आत्मा की उपस्थिति से ही शरीर को भूख-प्यास लगती है,
आत्मा को अन्न अथवा जल से कोई प्रयोजन नहीं है, उसी प्रकार प्रकृति
परमात्मा की उपस्थिति में ही अपना कार्य कर पाती है। परमात्मा उसके गुण
और कार्यों से निर्लेप रहता है।
त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत्।
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम्।।१३।।
सात्त्विक, राजस और तामस इन तीन गुणों के कार्यरूप भावों से यह
सारा जगत् मोहित हो रहा है इसलिये लोग इन तीनों गुणों से परे मुझ अविनाशी
को तत्त्व से भली प्रकार नहीं जानते। मैं इन तीनों गुणों से परे हूँ अर्थात् जब
तक अंशमात्र भी गुणों का आवरण विद्यमान है, तब तक कोई मुझे नहीं
जानता। उसे अभी चलना है, वह राही है और-
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते।।१४।।

सप्तम अध्याय १६९
यह त्रिगुणमयी मेरी अद्भुत माया दुस्तर है; किन्तु जो पुरुष मुझे ही
निरन्तर भजते हैं, वे इस माया का पार पा जाते हैं। यह माया है तो दैवी, परन्तु
अगरबत्ती जलाकर इसकी पूजा न करने लगें। इससे पार पाना है।
न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः।
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः।।१५।।
जो मुझे निरन्तर भजते हैं, वे जानते हैं। फिर भी लोग नहीं भजते। माया
के द्वारा जिनके ज्ञान का अपहरण कर लिया गया है, जो आसुरी स्वभाव को
धारण किये हुए, मनुष्यों में अधम, काम-क्रोधादि दुष्कृतियों को करनेवाले
मूढ़लोग मुझे नहीं भजते। तो भजता कौन है?-
चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन।
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ।।१६।।
हे भरतश्रेष्ठ अर्जुन ! 'सुकृतिनः'- उत्तम अर्थात् नियत कर्म (जिसके
परिणाम में श्रेय की प्राप्ति हो, उसको) करनेवाले 'अर्थार्थी' अर्थात् सकाम,
'आर्तः' अर्थात् दुःख से छूटने की इच्छावाले, 'जिज्ञासुः' अर्थात् प्रत्यक्ष रूप
से जानने की इच्छावाले और 'ज्ञानी' अर्थात् जो प्रवेश की स्थिति में हैं- ये
चार प्रकार के भक्तजन मुझे भजते हैं।
'अर्थ' वह वस्तु है, जिससे हमारे शरीर अथवा सम्बन्धों की पूर्ति हो।
इसलिये अर्थ, कामनाएँ सब कुछ पहले तो भगवान द्वारा पूर्ण होती हैं। श्रीकृष्ण
कहते हैं कि मैं ही पूर्ण करता हूँ; किन्तु इतना ही वास्तविक 'अर्थ' नहीं है।
आत्मिक सम्पत्ति ही स्थिर सम्पत्ति है, यही अर्थ है।
सांसारिक 'अर्थ' की पूर्ति करते-करते भगवान वास्तविक अर्थ आत्मिक
सम्पत्ति की ओर बढ़ा देते हैं; क्योंकि वे जानते हैं कि इतने ही से मेरा भक्त
सुखी नहीं होगा इसलिये वे आत्मिक सम्पत्ति भी उसे देने लगते हैं। 'लोक
लाहु परलोक निबाहू।' ( रामचरितमानस, १/१९/२ )- लोक में लाभ
और परलोक में निर्वाह ये दोनों भगवान की वस्तुएँ हैं। अपने भक्त को खाली
नहीं छोड़ते।

१७० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
'आर्त्त:'- जो दुःखी हो, 'जिज्ञासु:'- समग्रता से जानने की इच्छावाले
जिज्ञासु मुझे भजते हैं। साधना की परिपक्व अवस्था में दिग्दर्शन (प्रत्यक्ष दर्शन)
की अवस्थावाले ज्ञानी भी मुझे भजते हैं। इस प्रकार चार प्रकार के भक्त मुझे
भजते हैं, जिनमें ज्ञानी श्रेष्ठ है अर्थात् ज्ञानी भी भक्त ही है। इन सबमें भी-
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते।
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ।।१७।।
अर्जुन! उनमें भी नित्य मुझमें एकीभाव में स्थित अनन्य भक्तिवाला
ज्ञानी विशिष्ट है; क्योंकि साक्षात्कार के सहित जाननेवाले ज्ञानी को मैं अत्यन्त
प्रिय हूँ और वह ज्ञानी भी मुझे अत्यन्त प्रिय है। वह ज्ञानी मेरा ही स्वरूप है।
उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्।
आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्।।१८।।
यद्यपि ये चारों प्रकार के भक्त उदार ही हैं (कौन-सी उदारता कर दी?
क्या आपके भक्ति करने से भगवान को कुछ मिल जाता है? क्या भगवान में
कोई कमी है जिसे आपने पूरा कर दिया? नहीं, वस्तुतः वही उदार है जो अपनी
आत्मा को अधोगति में न पहुँचाये, जो उसके उद्धार के लिये अग्रसर है। इस
प्रकार यह सब उदार हैं।) परन्तु ज्ञानी तो साक्षात् मेरा स्वरूप ही है, ऐसी मेरी
मान्यता है; क्योंकि वह स्थिरबुद्धि ज्ञानी भक्त सर्वोत्तम गतिस्वरूप मुझमें ही
स्थित है। अर्थात् वह मैं हूँ, वह मुझमें है। मुझमें और उसमें कोई अन्तर नहीं
है। इसी पर पुनः बल देते हैं-
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः।।१९।।
अभ्यास करते-करते बहुत जन्मों के अन्त के जन्म में, प्राप्तिवाले जन्म
में साक्षात्कार को प्राप्त हुआ ज्ञानी 'सब कुछ वासुदेव ही है'- इस प्रकार मेरे
को भजता है। वह महात्मा अतिदुर्लभ है। वह किसी वासुदेव की प्रतिमा नहीं
गढ़वाता बल्कि अपने भीतर ही उस परमदेव का वास पाता है। उसी ज्ञानी
महात्मा को श्रीकृष्ण तत्त्वदर्शी भी कहते हैं। इन्हीं महापुरुषों से बाहर समाज में

सप्तम अध्याय १७१
कल्याण सम्भव है। इस प्रकार के प्रत्यक्ष तत्त्वदर्शी महापुरुष श्रीकृष्ण के शब्दों
में अतिदुर्लभ हैं।
जब श्रेय और प्रेय (मुक्ति और भोग) दोनों ही भगवान से मिलते हैं,
तब तो सभी को एकमात्र भगवान का भजन करना चाहिये, फिर भी लोग उन्हें
नहीं भजते। क्यों? श्रीकृष्ण के ही शब्दों में-
कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः।
तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया।।२०।।
“वह तत्त्वदर्शी महात्मा अथवा परमात्मा ही सब कुछ है।”-लोग ऐसा
समझ नहीं पाते; क्योंकि भोगों की कामनाओं द्वारा लोगों के विवेक का
अपहरण कर लिया गया है, इसलिये वे अपनी प्रकृति अर्थात् जन्म-जन्मान्तरों
से अर्जित संस्कारों के स्वभाव से प्रेरित होकर मुझ परमात्मा से भिन्न अन्य
देवताओं और उनके लिये प्रचलित नियमों की शरण लेते हैं। यहाँ 'अन्य
देवता' का प्रसंग पहली बार आया है।
यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति।
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्।।२१।।
जो-जो सकाम भक्त जिस-जिस देवता के स्वरूप को श्रद्धा से पूजना
चाहता है, मैं उसी देवता के प्रति उसकी श्रद्धा को स्थिर करता हूँ। मैं स्थिर
करता हूँ; क्योंकि देवता नाम की कोई वस्तु होती तब तो वह देवता ही श्रद्धा
को स्थिर करता।
स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते।
लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान्।।२२।।
वह पुरुष उस श्रद्धा से युक्त होकर उस देव-विग्रह के पूजन में तत्पर
होता है और देवता के माध्यम से मेरे ही द्वारा निर्मित उन इच्छित भोगों को
निःसन्देह प्राप्त होता है। भोग कौन देता है? मैं ही देता हूँ। उसकी श्रद्धा का
परिणाम है भोग, न कि किसी देवता की देन। किन्तु वह फल तो पा ही लेता
है फिर इसमें बुराई क्या है? इस पर कहते हैं-

१७२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्।
देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि।।२३।।
परन्तु उन अल्पबुद्धिवालों का वह फल नाशवान् है। आज फल है तो
भोगते-भोगते नष्ट हो जायेगा इसलिये नाशवान् है। देवताओं को पूजनेवाले
देवताओं को प्राप्त होते हैं अर्थात् देवता भी नाशवान् हैं। देवताओं से लेकर
यावन्मात्र जगत् परिवर्तनशील और मरणधर्मा है। मेरा भक्त मुझे ही प्राप्त होता
है, जो अव्यक्त है 'नैष्ठिकीं परमशान्ति' पाता है।
अध्याय तीन में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा कि इस यज्ञ द्वारा तुमलोग
देवताओं अर्थात् दैवी सम्पद् की उन्नति करो। ज्यों-ज्यों दैवी सम्पद् की उन्नति
होगी, वही तुम्हारी उन्नति है। क्रमशः उन्नति करते-करते परमश्रेय को प्राप्त
कर लो। यहाँ देवता उस दैवी सम्पद् का समूह है, जिससे परमदेव परमात्मा
का देवत्व अर्जित किया जाता है। दैवी सम्पद् मोक्ष के लिये है, जिसके
छब्बीस लक्षणों का निरूपण गीता के सोलहवें अध्याय में किया गया है।
'देवता' हृदय के अन्तराल में परमदेव परमात्मा के देवत्व को अर्जित
करानेवाले सद्गुणों का नाम है। थी तो यह अन्दर की वस्तु; किन्तु कालान्तर
में लोगों ने भीतर की वस्तु को बाहर देखना प्रारम्भ कर दिया। मूर्तियाँ गढ़ लीं,
कर्मकाण्ड रच डाले और वास्तविकता से दूर खड़े हो गये। श्रीकृष्ण ने इस
भ्रान्ति का निराकरण उपर्युक्त चार श्लोकों में किया। गीता में पहली बार 'अन्य
देवताओं' का नाम लेते हुए उन्होंने कहा कि देवता होते ही नहीं। लोगों की
श्रद्धा जहाँ झुकती है, वहाँ मैं ही खड़ा होकर उनकी श्रद्धा को पुष्ट करता हूँ
और मैं ही वहाँ फल भी देता हूँ। वह फल भी नश्वर है। फल नष्ट हो जाते हैं,
देवता नष्ट हो जाते हैं और देवताओं को पूजनेवाला भी नष्ट हो जाता है।
जिनका विवेक नष्ट हो गया है, वे मूढ़बुद्धि ही अन्य देवताओं को पूजते हैं।
श्रीकृष्ण तो यहाँ तक कहते हैं कि अन्य देवताओं को पूजने का विधान ही
अयुक्तिसंगत है (आगे देखेंगे, अध्याय ९/२३)।
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः।
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम्।।२४।।

सप्तम अध्याय १७३
यद्यपि जब देवताओं के नाम पर देवता नाम की कोई वस्तु है ही नहीं,
जो फल मिलता है वह भी नाशवान् है, फिर भी सब लोग मेरा भजन नहीं
करते; क्योंकि बुद्धिहीन पुरुष (जैसा पिछले श्लोक में आया कि कामनाओं
द्वारा जिनका ज्ञान अपहृत हो गया है वे) मेरे सर्वोत्तम, अविनाशी और परमप्रभाव
को भली प्रकार नहीं जानते, इसलिये वे मुझ अव्यक्त पुरुष को व्यक्तिभाव को
प्राप्त हुआ मानते हैं, मनुष्य मानते हैं। अर्थात् श्रीकृष्ण भी मनुष्य शरीरधारी
योगी थे, योगेश्वर थे। जो स्वयं योगी हों और दूसरों को भी योग प्रदान करने
की जिनमें क्षमता हो, उन्हें योगेश्वर कहते हैं। साधना के सही दौर में पड़कर
क्रमशः उत्थान होते-होते महापुरुष भी उसी परमभाव में स्थित हो जाते हैं।
शरीरधारी होते हुए भी वे उसी अव्यक्त स्वरूप में स्थित हो जाते हैं; फिर भी
कामनाओं से विवश मन्दबुद्धि के लोग उन्हें साधारण व्यक्ति ही मानते हैं। वे
सोचते हैं कि हमारी ही तरह तो यह भी पैदा हुए हैं, भगवान कैसे हो सकते हैं?
उन बेचारों का दोष भी क्या है? दृष्टिपात करते हैं तो शरीर ही दिखायी पड़ता
है। वे महापुरुष के वास्तविक स्वरूप को देख क्यों नहीं पाते? इस पर
योगेश्वर श्रीकृष्ण से ही सुनें-
नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः।
मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम्॥२५॥
सामान्य मनुष्य के लिये माया एक परदा है, जिसके द्वारा परमात्मा
सर्वथा छिपा है। योग-साधना समझकर वह इसमें प्रवृत्त होता है। इसके
पश्चात् योगमाया अर्थात् योगक्रिया भी एक आवरण ही है। योग का अनुष्ठान
करते-करते उसकी पराकाष्ठा योगारूढ़ता आ जाने पर वह छिपा हुआ परमात्मा
विदित होता है। योगेश्वर कहते हैं- मैं अपनी योगमाया से ढँका हुआ हूँ।
केवल योग की परिपक्व अवस्थावाले ही मुझे यथार्थ देख सकते हैं। मैं सबके
लिये प्रत्यक्ष नहीं हूँ इसलिये यह अज्ञानी मनुष्य मुझ जन्मरहित (जिसे अब
जन्म नहीं लेना है), अविनाशी (जिसका नाश नहीं होना है), अव्यक्त स्वरूप
(जिसे पुनः व्यक्त नहीं होना है) को नहीं जानता। अर्जुन भी श्रीकृष्ण को
अपनी ही तरह मनुष्य मानता था। आगे उन्होंने दृष्टि दी तो अर्जुन गिड़गिड़ाने

१७४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
लगा, प्रार्थना करने लगा। वस्तुतः अव्यक्तस्थित महापुरुष को पहचानने में
हमलोग प्रायः अन्धे ही हैं। आगे कहते हैं-
वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन।
भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन।।२६।।
अर्जुन! मैं अतीत, वर्तमान और भविष्य में होनेवाले सम्पूर्ण प्राणियों
को जानता हूँ; परन्तु मुझे कोई नहीं जानता। क्यों नहीं जान पाता?-
इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत।
सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप।।२७।।
भरतवंशी अर्जुन! इच्छा और द्वेष अर्थात् राग-द्वेषादि द्वन्द्व के मोह से
संसार के सम्पूर्ण प्राणी अत्यन्त मोह को प्राप्त हो रहे हैं इसलिये मुझे नहीं जान
पाते। तो क्या कोई जानेगा ही नहीं? योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं-
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्।
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः।।२८।।
परन्तु पुण्यकर्म (जो संसृति का अन्त करनेवाला है, जिसका नाम
कार्यम् कर्म, नियत कर्म, यज्ञ की प्रक्रिया कहकर बारम्बार समझाया है, उस
कर्म को) करनेवाले जिन भक्तों का पाप नष्ट हो गया है, वे राग-द्वेषादि द्वन्द्व के
मोह से भली प्रकार मुक्त होकर, व्रत में दृढ़ रहकर मुझे भजते हैं। किसलिये
भजते हैं?-
जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये।
ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम्।।२९।।
जो मेरी शरण होकर जरा और मरण से मुक्ति पाने के लिये प्रयत्न करते
हैं, वे पुरुष उस ब्रह्म को, सम्पूर्ण अध्यात्म को और सम्पूर्ण कर्म को जानते हैं।
और इसी क्रम में-
साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः।
प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः।।३०।।

सप्तम अध्याय १७५
जो पुरुष अधिभूत, अधिदैव तथा अधियज्ञ के सहित मुझे जानते हैं,
मुझमें समाहित चित्तवाले वे पुरुष अन्तकाल में भी मुझको ही जानते हैं, मुझमें
ही स्थित रहते हैं और सदैव मुझे प्राप्त रहते हैं। छब्बीसवें-सत्ताइसवें श्लोक
में उन्होंने कहा-मुझे कोई नहीं जानता; क्योंकि वे मोहग्रस्त हैं। किन्तु जो उस
मोह से छूटने के लिये प्रयत्नशील हैं, वे (१) सम्पूर्ण ब्रह्म, (२) सम्पूर्ण
अध्यात्म, (३) सम्पूर्ण कर्म, (४) सम्पूर्ण अधिभूत, (५) सम्पूर्ण अधिदैव
और (६) सम्पूर्ण अधियज्ञसहित मुझको जानते हैं अर्थात् इन सबका परिणाम
मैं (सद्गुरु) हूँ। वही मुझे जानता है, ऐसा नहीं कि कोई नहीं जानता।
निष्कर्ष-
इस सातवें अध्याय में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया कि- अनन्य भाव से
मुझमें समर्पित होकर, मेरे आश्रित होकर जो योग में लगता है वह समग्र रूप
से मुझे जानता है। मुझे जानने के लिये हजारों में कोई विरला ही प्रयत्न करता
है और प्रयत्न करनेवालों में विरला ही कोई जानता है। वह मुझे पिण्डरूप में
एकदेशीय नहीं वरन् सर्वत्र व्याप्त देखता है। आठ भेदोंवाली मेरी जड़ प्रकृति
है और इसके अन्तराल में जीवरूप मेरी चेतन प्रकृति है। इन्हीं दोनों के संयोग
से पूरा जगत् खड़ा है। तेज और बल मेरे ही द्वारा हैं। राग और काम से रहित
बल तथा धर्मानुकूल कामना भी मैं ही हूँ। जैसा कि सब कामनाएँ तो वर्जित हैं,
लेकिन मेरी प्राप्ति के लिये कामना कर। ऐसी इच्छा का अभ्युदय होना मेरा ही
प्रसाद है। केवल परमात्मा को पाने की कामना ही 'धर्मानुकूल कामना' है।
श्रीकृष्ण ने बताया कि- मैं तीनों गुणों से अतीत हूँ। परम का स्पर्श
करके परमभाव में स्थित हूँ; किन्तु भोगासक्त मूढ़ पुरुष सीधे मुझे न भजकर
अन्य देवताओं की उपासना करते हैं, जबकि वहाँ देवता नाम का कोई है ही
नहीं। पत्थर, पानी, पेड़ जिसको भी वे पूजना चाहते हैं, उसी में उनकी श्रद्धा
को मैं ही पुष्ट करता हूँ। उसकी आड़ में खड़ा होकर मैं ही फल देता हूँ; क्योंकि
न वहाँ कोई देवता है, न किसी देवता के पास कोई भोग ही है। लोग मुझे
साधारण व्यक्ति समझकर नहीं भजते; क्योंकि मैं योग-प्रक्रिया द्वारा ढँका हुआ

१७६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
हूँ। अनुष्ठान करते-करते योगमाया का आवरण पार करनेवाले ही मुझ शरीरधारी
को भी अव्यक्त रूप में जानते हैं, अन्य स्थितियों में नहीं।
मेरे भक्त चार प्रकार के हैं- अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी। चिन्तन
करते-करते अनेक जन्मों के अन्तिम जन्म में प्राप्तिवाला ज्ञानी मेरा ही स्वरूप
है अर्थात् अनेक जन्मों से चिन्तन करके उस भगवत्स्वरूप को प्राप्त किया
जाता है। राग-द्वेष के मोह से आक्रान्त मनुष्य मुझे कदापि नहीं जान सकते;
किन्तु राग-द्वेष के मोह से रहित होकर जो नियतकर्म (जिसे संक्षेप में आराधना
कह सकते हैं) का चिन्तन करते हुए जरा-मरण से छूटने के लिये प्रयत्नशील
हैं, वे पुरुष सम्पूर्ण रूप से मुझे जान लेते हैं। वे सम्पूर्ण ब्रह्म को, सम्पूर्ण
अध्यात्म को, सम्पूर्ण अधिभूत को, सम्पूर्ण अधिदैव को, सम्पूर्ण कर्म को और
सम्पूर्ण यज्ञ के सहित मुझे जानते हैं। वे मुझमें प्रवेश करते हैं और अन्तकाल
में भी मुझको ही जानते हैं अर्थात् फिर कभी वे विस्मृत नहीं होते।
इस अध्याय में परमात्मा की समग्र जानकारी का विवेचन है, अतः-
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसम्वादे ‘समग्रबोधः’ नाम सप्तमोऽध्यायः॥७॥
इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र
विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद में ‘समग्र जानकारी’ नामक सातवाँ
अध्याय पूर्ण होता है।
इति श्रीमत्परमहंसपरमानन्दस्य शिष्य स्वामीअड़गड़ानन्दकृते
श्रीमद्भगवद्गीतायाः “यथार्थगीता” भाष्ये ‘समग्रबोधः’ नाम
सप्तमोऽध्यायः॥७॥
इस प्रकार श्रीमत् परमहंस परमानन्दजी के शिष्य स्वामी अड़गड़ानन्दकृत
‘श्रीमद्भगवद्गीता’ के भाष्य ‘यथार्थ गीता’ में ‘समग्र जानकारी’ नामक सातवाँ
अध्याय पूर्ण होता है।
।। हरिः ॐ तत्सत् ।।

अष्टमोऽध्यायः अक्षर ब्रह्मयोग

।। ॐ श्री परमात्मने नमः ।।
।। अथाष्टमोऽध्यायः ।।
सातवें अध्याय के अन्त में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा कि पुण्यकर्म
(नियत कर्म, आराधना) को करनेवाले योगी सम्पूर्ण पापों से छूटकर उस
व्याप्त ब्रह्म को जानते हैं अर्थात् कर्म कोई ऐसी वस्तु है, जो व्याप्त ब्रह्म की
जानकारी दिलाता है। उस कर्म को करनेवाले व्याप्त ब्रह्म को, सम्पूर्ण कर्म
को, सम्पूर्ण अध्यात्म को, सम्पूर्ण अधिदैव, अधिभूत और अधियज्ञसहित
मुझको जानते हैं। अतः कर्म कोई ऐसी वस्तु है, जो इन सबसे परिचय कराता
है। वे अन्तकाल में भी मुझको ही जानते हैं। उनकी जानकारी कभी विस्मृत
नहीं होती है।
इस पर अर्जुन ने इस अध्याय के प्रारम्भ में ही उन्हीं शब्दों को दुहराते
हुए प्रश्न रखा-
अर्जुन उवाच
किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम।
अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते।।१।।
हे पुरुषोत्तम! वह ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है? कर्म क्या है?
अधिभूत तथा अधिदैव किसे कहा जाता है?
अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन।
प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः।।२।।
हे मधुसूदन! यहाँ अधियज्ञ कौन है और वह इस शरीर में कैसे है?
सिद्ध है कि अधियज्ञ अर्थात् यज्ञ का अधिष्ठाता कोई ऐसा पुरुष है, जो मनुष्य
शरीर के आधारवाला है। समाहित चित्तवाले पुरुषों द्वारा अन्त समय में आप
किस प्रकार जानने में आते हैं? इन सातों प्रश्नों का क्रम से निर्णय देने के लिये
योगेश्वर श्रीकृष्ण बोले-

१७८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
श्रीभगवानुवाच
अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते।
भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसञ्जितः॥३॥
‘अक्षरं ब्रह्म परमम्’- जो अक्षय है, जिसका क्षय नहीं होता, वही
परम ब्रह्म है। ‘स्वभावः अध्यात्मम् उच्यते’- स्वयं में स्थिर भाव ही अध्यात्म
अर्थात् आत्मा का आधिपत्य है। इससे पहले सभी माया के आधिपत्य में रहते
हैं; किन्तु जब ‘स्व’-भाव अर्थात् स्वरूप में स्थिरभाव (स्वयं में स्थिरभाव)
मिल जाता है तो आत्मा का ही आधिपत्य उसमें प्रवाहित हो जाता है। यही
अध्यात्म है, अध्यात्म की पराकाष्ठा है। ‘भूतभावोद्भवकरः’- भूतों के वे
भाव जो कुछ-न-कुछ उद्भव करते हैं अर्थात् प्राणियों के वे संकल्प जो भले
अथवा बुरे संस्कारों की संरचना करते हैं उनका विसर्ग अर्थात् विसर्जन,
उनका मिट जाना ही कर्म की पराकाष्ठा है। यही सम्पूर्ण कर्म है, जिसके लिये
योगेश्वर ने कहा- ‘वह सम्पूर्ण कर्म को जानता है।’ वहाँ कर्म पूर्ण है, आगे
आवश्यकता नहीं है (नियत कर्म) इस अवस्था में जबकि भूतों के वे भाव जो
कुछ-न-कुछ रचते हैं, भले अथवा बुरे संस्कार-संग्रह करते हैं, बनाते हैं, वे
जब सर्वथा शान्त हो जायें, यहीं कर्म की सम्पूर्णता है। इसके आगे कर्म करने
की आवश्यकता नहीं रह जाती। अतः कर्म कोई ऐसी वस्तु है, जो भूतों के
सम्पूर्ण संकल्पों को, जिनसे कुछ-न-कुछ संस्कार बनते हैं उनका शमन कर
देती है। कर्म का अर्थ है (आराधना) चिन्तन, जो यज्ञ में है।
अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम्।
अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर॥४॥
जब तक अक्षय भाव नहीं मिलता, तब तक नष्ट होनेवाले सम्पूर्ण क्षर
भाव अधिभूत अर्थात् भूतों के अधिष्ठान हैं। वही भूतों की उत्पत्ति के कारण हैं।
‘पुरुषः च अधिदैवतम्’- प्रकृति से परे जो परम पुरुष है, वही अधिदैव
अर्थात् सम्पूर्ण देवों (दैवी सम्पद्) का अधिष्ठाता है। दैवी सम्पद् उसी परमदेव
में विलीन हो जाती है। देहधारियों में श्रेष्ठ अर्जुन ! इस मनुष्य-तन में मैं ही
‘अधियज्ञ’ हूँ अर्थात् यज्ञों का अधिष्ठाता हूँ। अतः इसी शरीर में, अव्यक्त
स्वरूप में स्थित महापुरुष ही अधियज्ञ है। श्रीकृष्ण एक योगी थे। जो सम्पूर्ण

अष्टम अध्याय १७९
यज्ञों का भोक्ता है, अन्त में यज्ञ उसमें प्रवेश पा जाते हैं। वही परमस्वरूप मिल
जाता है। इस प्रकार अर्जुन के छः प्रश्नों का समाधान हुआ। अब अन्तिम प्रश्न
कि अन्तकाल में कैसे आप जानने में आते हैं, जो कभी विस्मृत नहीं होते?
अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्।
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः॥५॥
योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो पुरुष अन्तकाल में अर्थात् मन के
निरोध और विलयकाल में मेरा ही स्मरण करते हुए शरीर के सम्बन्ध को छोड़
अलग हो जाता है, वह 'मद्भावम्'- साक्षात् मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है,
इसमें संशय नहीं है।
शरीर का निधन शुद्ध अन्तकाल नहीं है। मरने के बाद भी शरीरों का
क्रम पीछे लगा रहता है। संचित संस्कारों की सतह के मिट जाने के साथ ही
मन का निरोध हो जाता है। और वह मन भी जब विलीन हो जाता है तो वहीं
पर अन्तकाल है, जिसके बाद शरीर धारण नहीं करना पड़ता। यह क्रियात्मक
है। केवल कहने से, वार्ताक्रम से समझ में नहीं आता। जब तक वस्त्रों की तरह
शरीर का परिवर्तन हो रहा है, तब तक शरीरों का अन्त कहाँ हुआ? मन के
निरोध और निरुद्ध मन के भी विलयकाल में जीते-जी शरीर के सम्बन्धों का
विच्छेद हो जाता है। यदि मरने के बाद ही यह स्थिति मिलती तो श्रीकृष्ण भी
पूर्ण न होते। उन्होंने कहा कि अनेक जन्मों के अभ्यास से प्राप्तिवाला ज्ञानी
साक्षात् मेरा स्वरूप है। मैं वह हूँ और वह मुझमें है। लेशमात्र भी उसमें और
मुझमें अन्तर नहीं है। यह जीते-जी प्राप्ति है। जब फिर कभी शरीर न मिले,
वही शरीरों का अन्त है।
यह तो वास्तविक शरीरान्त का चित्रण हुआ, जिसके पश्चात् जन्म नहीं
लेना पड़ता है। दूसरा शरीरान्त मृत्यु है, जो लोक-प्रचलित है; किन्तु इस
शरीरान्त के पश्चात् पुनः जन्म लेना पड़ता है-
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः॥६॥
कौन्तेय! मृत्यु के समय मनुष्य जिस-जिस भी भाव को स्मरण करता हुआ
शरीर को त्यागता है, उस-उस को ही प्राप्त होता है। तब तो बड़ा सस्ता सौदा है,

१८० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
आजीवन मौज करें और मरने लगें तो भगवान का स्मरण कर लेंगे। किन्तु
श्रीकृष्ण कहते हैं- ऐसा होता नहीं, ‘सदा तद्भावभावितः’- उस ही भाव का
चिन्तन कर पाता है, जैसा जीवन भर किया है। वही विचार बरबस आ जाता
है जिसका जीवन भर अभ्यास किया गया है, अन्यथा नहीं हो पाता। अतः-
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम् ॥७॥
इसलिये अर्जुन! तू हर समय मेरा स्मरण कर और युद्ध कर। मुझमें
अर्पित मन और बुद्धि से युक्त होकर तू निःसन्देह मुझे ही प्राप्त होगा। निरन्तर
चिन्तन और युद्ध एक साथ कैसे सम्भव है? हो सकता है कि निरन्तर चिन्तन
और युद्ध का यही स्वरूप हो कि ‘जय कन्हैयालाल की’, ‘जय भगवान् की’
कहते रहें और बाण चलाते रहें। किन्तु स्मरण का स्वरूप अगले श्लोक में
स्पष्ट करते हुए योगेश्वर कहते हैं-
अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना।
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्॥८॥
हे पार्थ! उस स्मरण के लिये योग के अभ्यास से युक्त हुआ (मेरा
चिन्तन और योग का अभ्यास पर्याय है) मेरे सिवाय दूसरी ओर न जानेवाले
चित्त से निरन्तर चिन्तन करनेवाला परम प्रकाशस्वरूप दिव्यपुरुष अर्थात्
परमात्मा को प्राप्त होता है। मान लीजिये कि यह पेन्सिल भगवान है, तो इसके
सिवाय अन्य किसी वस्तु का स्मरण नहीं आना चाहिये। इसके अगल-बगल
आपको पुस्तक दिखायी पड़ती है या अन्य कुछ भी, तो आपका स्मरण
खण्डित हो गया। स्मरण जब इतना सूक्ष्म है कि इष्ट के अतिरिक्त दूसरी वस्तु
का स्मरण भी न हो, मन में तरंगें भी न आयें, तो स्मरण और युद्ध दोनों एक
साथ कैसे होंगे? वस्तुतः जब आप चित्त को सब ओर से समेटकर अपने एक
आराध्य के स्मरण में प्रवृत्त होंगे तो उस समय मायिक प्रवृत्तियाँ काम-क्रोध,
राग-द्वेष बाधा के रूप में सामने प्रकट ही हैं। आप स्मरण करेंगे; किन्तु वे
आपके अन्दर उद्वेग पैदा करेंगी, आपका मन स्मरण से चलायमान करना
चाहेंगी। उन बाह्य प्रवृत्तियों का पार पाना ही युद्ध है। निरन्तर चिन्तन के साथ
ही युद्ध सम्भव है। गीता का एक भी श्लोक बाह्य मारकाट का समर्थन नहीं
करता। चिन्तन किसका करें? इस पर कहते हैं-

अष्टम अध्याय १८१
कविं पुराणमनुशासितार-
मणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः।
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप-
मादित्यवर्णं तमसः परस्तात्॥९॥
उस युद्ध के साथ वह पुरुष सर्वज्ञ, अनादि, सबके नियन्ता, सूक्ष्म से भी
अतिसूक्ष्म, सबके धारण-पोषण करनेवाले किन्तु अचिन्त्य (जब तक चित्त
और चित्त की लहर है, तब तक वह दिखायी नहीं देता। चित्त के निरोध और
विलयकाल में ही जो विदित होता है), नित्य प्रकाशस्वरूप और अविद्या से
परे उस परमात्मा का स्मरण करता है।
पीछे बताया- मेरा चिन्तन करता है, यहाँ कहते हैं- परमात्मा का।
अतः उस परमात्मा के चिन्तन (ध्यान) का माध्यम तत्त्वस्थित महापुरुष है।
इसी क्रम में-
प्रयाणकाले मनसाचलेन
भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव।
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक्
स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम्॥१०॥
जो निरन्तर उस परमात्मा का स्मरण करता है, वह भक्तियुक्त पुरुष
'प्रयाणकाले'- मन के विलीन अवस्थाकाल में योगबल से अर्थात् उसी
नियत कर्म के आचरण द्वारा भृकुटी के मध्य में प्राण को भली प्रकार स्थापित
करके (प्राण-अपान को भली प्रकार सम करके, न अन्दर से उद्वेग पैदा हो न
बाह्य संकल्प कोई लेनेवाला हो, सत्-रज-तम भली प्रकार शान्त हों, सुरत इष्ट
में ही स्थित हो, उस काल में) वह अचल मन अर्थात् स्थिर बुद्धिवाला पुरुष
उस दिव्यपुरुष परमात्मा को प्राप्त होता है। सतत स्मरणीय है कि उसी एक
परमात्मा की प्राप्ति का विधान योग है। उसके लिये नियत क्रिया का आचरण
ही योगक्रिया है, जिसका सविस्तार वर्णन योगेश्वर ने चौथे-छठें अध्याय में
किया है। अभी उन्होंने कहा- "निरन्तर मेरा ही स्मरण कर।" कैसे करे? तो
इसी योग-धारणा में स्थिर रहते हुए करना है। ऐसा करनेवाला दिव्यपुरुष को
ही प्राप्त होता है, जो कभी विस्मृत नहीं होता। यहाँ इस प्रश्न का समाधान हुआ

१८२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
कि आप प्रयाणकाल में किस प्रकार जानने में आते हैं? पाने योग्य पद का
चित्रण देखें, जो गीता में स्थान-स्थान पर आया है-
यदक्षरं वेदविदो वदन्ति
विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति
तत्ते पदं सङ्ग्रहेण प्रवक्ष्ये॥११॥
'वेदविद्' अर्थात् अविदित तत्त्व को प्रत्यक्ष जाननेवाले लोग जिस
परमपद को 'अक्षरम्'- अक्षय कहते हैं, वीतराग महात्मा जिसमें प्रवेश के
लिये यत्नशील रहते हैं, जिस परमपद को चाहनेवाले ब्रह्मचर्य का पालन करते
हैं (ब्रह्मचर्य का अर्थ जननेन्द्रिय मात्र का निरोध नहीं, बल्कि 'ब्रह्म आचरति
स ब्रह्मचारी'- बाह्य स्पर्शों को मन से त्यागकर ब्रह्म का निरन्तर चिन्तन-
स्मरण ही ब्रह्मचर्य है, जो ब्रह्म का दर्शन करा उसी में स्थान दिला शान्त हो
जाता है। इस आचरण से इन्द्रिय-संयम ही नहीं, बल्कि सकलेन्द्रिय-संयम
स्वतः हो जाता है। इस प्रकार जो ब्रह्मचर्य का आचरण करते हैं), जो हृदय में
संग्रह करने योग्य है, धारण करने योग्य है उस पद को मैं तेरे लिये कहूँगा। वह
पद है क्या, कैसे पाया जाता है? इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं-
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च।
मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम्॥१२॥
सब इन्द्रियों के दरवाजों को रोककर अर्थात् वासनाओं से अलग रहकर,
मन को हृदय में स्थित करके (ध्यान हृदय में ही धरा जाता है, बाहर नहीं।
पूजा बाहर नहीं होती), प्राण अर्थात् अन्तःकरण के व्यापार को मस्तिष्क में
निरोधकर योग-धारणा में स्थित होकर (योग को धारण किये रहना है, दूसरा
तरीका नहीं है)-
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्।
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्॥१३॥
जो पुरुष 'ओम् इति'- ओम् इतना ही, जो अक्षय ब्रह्म का परिचायक
है, इसका जप तथा मेरा स्मरण करता हुआ शरीर का त्याग कर जाता है, वह
पुरुष परमगति को प्राप्त होता है।

अष्टम अध्याय १८३
श्रीकृष्ण एक योगेश्वर, परमतत्त्व में स्थित महापुरुष, सद्गुरु थे। योगेश्वर
श्रीकृष्ण ने बताया कि 'ओम्' अक्षय ब्रह्म का परिचायक है, तू इसका जप कर
और ध्यान मेरा कर। प्राप्ति के हर महापुरुष का नाम वही होता है जिसे वह
प्राप्त है, जिसमें वह विलय है इसलिये नाम ओम् बताया और रूप अपना।
योगेश्वर ने 'कृष्ण-कृष्ण' जपने का निर्देश नहीं दिया लेकिन कालान्तर में
भावुकों ने उनका भी नाम जपना आरम्भ कर दिया और अपनी श्रद्धा के अनुसार
उसका फल भी पाते हैं; जैसा कि, मनुष्य की श्रद्धा जहाँ टिक जाती है वहाँ मैं
ही उसकी श्रद्धा को पुष्ट करता तथा मैं ही फल का विधान भी करता हूँ।
भगवान शिव ने 'राम' शब्द के जपने पर बल दिया। 'रमन्ते योगिनो
यस्मिन् स रामः।' 'रा और म के बीच में कबिरा रहा लुकाय।' रा और
म इन दो अक्षरों के अन्तराल में कबीर अपने मन को रोकने में सक्षम हो गये।
श्रीकृष्ण ओम् पर बल देते हैं। ओ अह॑ स ओम् अर्थात् वह सत्ता मेरे
भीतर है, कहीं बाहर न ढूँढ़ने लगे। यह ओम् भी उस परम सत्ता का परिचय
देकर शान्त हो जाता है। वास्तव में उन प्रभु के अनन्त नाम हैं; किन्तु जप के
लिये वही नाम सार्थक है जो छोटा हो, श्वास में ढल जाय और एक परमात्मा
का ही बोध कराता हो। उससे भिन्न अनेक देवी-देवताओं की अविवेकपूर्ण
कल्पना में उलझकर लक्ष्य से दृष्टि न हटा दें।
'पूज्य महाराज जी' कहा करते थे कि- “मेरा रूप देखें और श्रद्धानुसार
कोई भी दो-ढाई अक्षर का नाम- 'ॐ', 'राम', 'शिव' में से कोई एक लें,
उसका चिन्तन करें और उसी के अर्थस्वरूप इष्ट के स्वरूप का ध्यान करें।"
ध्यान सद्गुरु का ही किया जाता है। आप राम, कृष्ण अथवा 'वीतराग विषयं
वा चित्तम्।'- वीतराग महात्माओं अथवा 'यथाभिमतध्यानाद्वा।' (पातंजल
योग०, १/३७, ३९) अभिमत अर्थात् योग के अभिमत, अनुकूल किसी
का भी स्वरूप पकड़ें, वे अनुभव में आपको मिलेंगे और आपके समकालीन
किसी सद्गुरु की ओर बढ़ा देंगे, जिनके मार्गदर्शन से आप शनैः-शनैः प्रकृति
के क्षेत्र से पार होते जायेंगे। मैं भी प्रारम्भ में एक देवता (कृष्ण के विराट् रूप)
के चित्र का ध्यान करता था; किन्तु पूज्य महाराज जी के अनुभवी प्रवेश के
साथ वह शान्त हो गया।

१८४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
प्रारम्भिक साधक नाम तो जपते हैं; किन्तु महापुरुष के स्वरूप का
ध्यान करने में हिचकते हैं। वे अपनी अर्जित मान्यताओं का पूर्वाग्रह छोड़ नहीं
पाते। वे किसी अन्य देवता का ध्यान करते हैं, जिसका योगेश्वर श्रीकृष्ण ने
निषेध किया है। अतः पूर्ण समर्पण के साथ किसी अनुभवी महापुरुष की शरण
लें। पुण्य-पुरुषार्थ सबल होते ही कुतर्कों का शमन और यथार्थ क्रिया में प्रवेश
मिल जायेगा। योगेश्वर श्रीकृष्ण के अनुसार इस प्रकार 'ॐ' के जप और
परमात्मस्वरूप सद्गुरु के स्वरूप का निरन्तर स्मरण करने से मन का निरोध
और विलय हो जाता है और उसी क्षण शरीर के सम्बन्ध का त्याग हो जाता है।
केवल मरने से शरीर पीछा नहीं छोड़ता।
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥१४॥
“मेरे अतिरिक्त और कोई चित्त में है ही नहीं”- अन्य किसी का
चिन्तन न करता हुआ अर्थात् अनन्य चित्त से स्थिर हुआ जो अनवरत मेरा
स्मरण करता है, उस नित्य मुझमें युक्त योगी के लिये मैं सुलभ हूँ। आपके
सुलभ होने से क्या मिलेगा?-
मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्।
नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः॥१५॥
मुझे प्राप्त कर वे दुःखों के स्थानस्वरूप क्षणभंगुर पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं
होते, बल्कि परमसिद्धि को प्राप्त होते हैं अर्थात् मुझे प्राप्त होना अथवा परमसिद्धि
को प्राप्त होना एक ही बात है। केवल भगवान ही ऐसे हैं, जिन्हें पाकर उस पुरुष
का पुनर्जन्म नहीं होता। फिर पुनर्जन्म की सीमा कहाँ तक है?-
आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन।
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते॥१६॥
अर्जुन! ब्रह्मा से लेकर कीट-पतंगादि सभी लोक पुनरावर्ती हैं, जन्म
लेने और मरने तथा पुनः-पुनः इसी क्रम में चलनेवाले हैं; किन्तु कौन्तेय! मुझे
प्राप्त होकर उस पुरुष का पुनर्जन्म नहीं होता।
धर्मग्रन्थों में लोक-लोकान्तरों की परिकल्पना ईश्वर-पथ की विभूतियों
का बोध कराने के आन्तरिक अनुभव या रूपक मात्र हैं। अन्तरिक्ष में न तो

अष्टम अध्याय १८५
कोई ऐसा गड़्ढा है जहाँ कीड़े काटते हों और न ऐसा महल जिसे स्वर्ग कहा
जाता हो। दैवी सम्पद् से युक्त पुरुष देवता और आसुरी सम्पद् से युक्त मनुष्य
ही असुर हैं। श्रीकृष्ण के ही सगे-सम्बन्धी कंस राक्षस और बाणासुर दैत्य थे।
देव, मानव, तिर्यक् योनियाँ ही विभिन्न लोक हैं। श्रीकृष्ण के अनुसार यह
जीवात्मा मन और पाँचों इन्द्रियों को लेकर जन्म-जन्मान्तर के संस्कारों के
अनुरूप नया शरीर धारण कर लेता है।
अमर कहे जानेवाले देवता भी मरणधर्मा हैं- ‘क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं
विशन्ति’। इससे बड़ी क्षति क्या होगी? वह देव-तन ही किस काम का,
जिसमें संचित पुण्य भी समाप्त हो जाय? देवलोक, पशुलोक, कीट-पतंगादि
लोक भोगलोक मात्र हैं। केवल मनुष्य ही कर्मों का रचयिता है, जिसके द्वारा
वह उस परमधाम तक को प्राप्त कर सकता है, जहाँ से पुनरावर्तन नहीं होता।
यथार्थ कर्म का आचरण करके मनुष्य देवता बन जाय, ब्रह्मा की स्थिति प्राप्त
कर ले; किन्तु वह पुनर्जन्म से तब तक नहीं बच सकता, जब तक कि मन के
निरोध और विलय के साथ परमात्मा का साक्षात्कार करके उसी परमभाव में
स्थित न हो जाय। उदाहरणार्थ उपनिषदें भी इस सत्य का उद्घाटन करती हैं-
यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः।
अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते।।
(बृहदारण्यकोपनिषद्, ४/४/७; कठोपनिषद्, २/३/१४)
जब हृदय में स्थित सम्पूर्ण कामनाएँ समूल नष्ट हो जाती हैं, तब
मरणधर्मा मनुष्य अमर हो जाता है और यहीं, इसी संसार में, इसी मनुष्य-
शरीर में परब्रह्म का भलीभाँति साक्षात् अनुभव कर लेता है।
प्रश्न उठता है कि क्या ब्रह्मा भी मरणधर्मा है? अध्याय तीन में तो
योगेश्वर श्रीकृष्ण ने प्रजापति ब्रह्मा के प्रसंग में कहा कि प्राप्ति के पश्चात् बुद्धि
मात्र यन्त्र है, उसके द्वारा परमात्मा ही व्यक्त होता है। ऐसे महापुरुषों के द्वारा
ही यज्ञ की संरचना हुई है और यहाँ कहते हैं कि ब्रह्मा की स्थिति प्राप्त
करनेवाला भी पुनरावर्ती है। योगेश्वर श्रीकृष्ण कहना क्या चाहते हैं?
वस्तुतः जिन महापुरुषों के द्वारा परमात्मा ही व्यक्त होता है, उन महापुरुषों
की बुद्धि भी ब्रह्मा नहीं है; लेकिन लोगों को उपदेश देने के कारण, कल्याण

१८६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
का सूत्रपात करने के कारण ब्रह्मा कहे जाते हैं। स्वयं में वे ब्रह्मा भी नहीं हैं।
उनके पास अपनी बुद्धि रह ही नहीं जाती। किन्तु इसके पूर्व साधनाकाल में
बुद्धि ही ब्रह्मा है- ‘अहंकार सिव बुद्धि अज, मन ससि चित्त महान।’
(रामचरितमानस, ६/१५क)
साधारण मनुष्य की बुद्धि ब्रह्मा नहीं है। बुद्धि जब इष्ट में प्रवेश करने
लगती है तभी से ब्रह्मा की रचना होने लगती है, जिसके चार सोपान मनीषियों
ने कहे हैं। पीछे अध्याय तीन में बता आये हैं, स्मरण के लिये पुनः देख सकते
हैं- ब्रह्मविद्, ब्रह्मविद्वर, ब्रह्मविद्वरीयान्, ब्रह्मविद्वरिष्ठ। ब्रह्मविद् वह बुद्धि है,
जो ब्रह्मविद्या से संयुक्त हो। ब्रह्मविद्वर वह है, जिसे ब्रह्मविद्या में श्रेष्ठता प्राप्त
हो। ब्रह्मविद्वरीयान् वह बुद्धि है जिससे वह ब्रह्मविद्या में दक्ष ही नहीं वरन्
उसका नियन्त्रक, संचालक बन जाता है। ब्रह्मविद्वरिष्ठ बुद्धि का वह अन्तिम
छोर है जिसमें इष्ट प्रवाहित है। यहाँ तक बुद्धि का अस्तित्व है; क्योंकि प्रवाहित
होनेवाला इष्ट अभी कहीं अलग है और ग्रहणकर्त्ता बुद्धि अलग है। अभी वह
प्रकृति की सीमा में है। अब स्वयं प्रकाशस्वरूप में जब बुद्धि (ब्रह्मा) रहती है,
जागृत है तो सम्पूर्ण भूत (चिन्तन का प्रवाह) जागृत हैं और जब अविद्या में
रहती है तो अचेत हैं। इसी को प्रकाश और अन्धकार, रात्रि और दिन कहकर
सम्बोधित किया जाता है। देखें-
ब्रह्मा अर्थात् ब्रह्मविद्वेत्ता की वह श्रेणी, जिसमें इष्ट प्रवाहित है, उसको
प्राप्त सर्वोत्कृष्ट बुद्धि में भी विद्या (जो स्वयं प्रकाशस्वरूप है, उसमें मिलाती
है) का दिन और अविद्या की रात्रि, प्रकाश और अन्धकार का क्रम लगा रहता
है, यहाँ तक साधक में माया कामयाब होती है। प्रकाशकाल में अचेत भूत
सचेत हो जाते हैं, उन्हें लक्ष्य दिखायी पड़ने लगता है तथा बुद्धि के अन्तराल
में अविद्या की रात्रि के प्रवेशकाल में सभी भूत अचेत हो जाते हैं। बुद्धि
निश्चय नहीं कर पाती। स्वरूप की ओर बढ़ना बन्द हो जाता है। यही ब्रह्मा का
दिन और यही ब्रह्मा की रात्रि है। दिन के प्रकाश में बुद्धि की सहस्रों प्रवृत्तियों
में ईश्वरीय प्रकाश छा जाता है और अविद्या की रात्रि में इन्हीं सहस्रों परतों में
अचेतावस्था का अन्धकार आ जाता है।
शुभ और अशुभ, विद्या और अविद्या- इन दोनों प्रवृत्तियों के सर्वथा
शान्त होने पर अर्थात् अचेत और सचेत, रात्रि में विलीन और दिन में उत्पन्न