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सर्वकोश
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

DevanagariHindipublished429 पृष्ठ

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पृष्ठ 52

प्रथम अध्याय १७
इस प्रकार खड़े हुए उन सम्पूर्ण बन्धुओं को देखकर अत्यन्त करुणा से
आवृत्त वह कुन्तीपुत्र अर्जुन शोक करता हुआ बोला। अर्जुन शोक करने लगा;
क्योंकि उसने देखा कि यह सब तो अपना परिवार ही है, अतः बोला-
अर्जुन उवाच
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्।।२८।।
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति।
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते।।२९।।
हे कृष्ण ! युद्ध की इच्छावाले खड़े हुए इस स्वजन-समुदाय को देखकर
मेरे अंग शिथिल हुए जाते हैं, मुख सूखा जाता है और मेरे शरीर में कम्प तथा
रोमाञ्च हो रहा है। इतना ही नहीं-
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः।।३०।।
हाथ से गाण्डीव गिरता है, त्वचा भी जल रही है। अर्जुन को ज्वर-सा
हो आया। संतप्त हो उठा कि यह कैसा युद्ध है जिसमें स्वजन ही खड़े हैं?
अर्जुन को भ्रम हो गया। वह कहता है- अब मैं खड़ा रह पाने में भी अपने को
असमर्थ पा रहा हूँ, अब आगे देखने की सामर्थ्य नहीं है।
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव।
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे।।३१।।
हे केशव ! इस युद्ध का लक्षण भी विपरीत ही देखता हूँ। युद्ध में अपने
कुल को मारकर परमकल्याण भी नहीं देखता हूँ। कुल को मारने से कल्याण
कैसे होगा?
न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च।
किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा।।३२।।
सम्पूर्ण परिवार युद्ध के मुहाने पर है। इन्हें युद्ध में मारकर विजय,
विजय से मिलनेवाला राज्य और राज्य से मिलनेवाला सुख अर्जुन को नहीं
चाहिये। वह कहता है- कृष्ण ! मैं विजय नहीं चाहता। राज्य तथा सुख भी नहीं
चाहता। गोविन्द ! हमें राज्य या भोग अथवा जीवन से भी क्या प्रयोजन है?
क्यों? इस पर कहता है-