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सर्वकोश
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

DevanagariHindipublished429 पृष्ठ

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पृष्ठ 50

प्रथम अध्याय १५
अर्जुन उवाच
सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत।।२१।।
संयमरूपी संजय ने अज्ञान से आवृत्त मन को समझाया कि हे राजन्!
इसके उपरान्त 'कपिध्वज:'- वैराग्यरूपी हनुमान, वैराग्य ही ध्वज है जिसका
(ध्वज राष्ट्र का प्रतीक माना जाता है। कुछ लोग कहते हैं- ध्वजा चंचल थी,
इसलिये कपिध्वज कहा गया। किन्तु नहीं, यहाँ कपि साधारण बन्दर नहीं
स्वयं हनुमान थे, जिन्होंने मान-अपमान का हनन किया था- 'सम मानि
निरादर आदरही।' (मानस, ७/१३/छन्द) प्रकृति की देखी-सुनी वस्तुओं
से, विषयों से राग का त्याग ही 'वैराग्य' है। अतः वैराग्य ही जिसकी ध्वजा है)
उस अर्जुन ने व्यवस्थित रूप से धृतराष्ट्र-पुत्रों को खड़े देखकर शस्त्र चलने की
तैयारी के समय धनुष उठाकर 'हृषिकेशम्'-जो हृदय के सर्वज्ञाता हैं, उन
योगेश्वर श्रीकृष्ण से यह वचन कहा- "हे अच्युत ! (जो कभी च्युत नहीं
होता) मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच खड़ा करिये।" यहाँ सारथी को दिया
गया आदेश नहीं, इष्ट (सद्गुरु) से की गयी प्रार्थना है। किसलिये खड़ा करें?-
यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान्।
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन्रणसमुद्यमे ।।२२।।
जब तक मैं इन स्थित हुए युद्ध की कामनावालों को अच्छी प्रकार देख
न लूँ कि इस युद्ध के उद्योग में मुझे किन-किन के साथ युद्ध करना योग्य है-
इस युद्ध-व्यापार में मुझे किन-किन के साथ युद्ध करना है।
योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ।।२३।।
दुर्बुद्धि दुर्योधन का युद्ध में कल्याण चाहनेवाले जो-जो राजा लोग इस
सेना में आये हैं, उन युद्ध करनेवालों को मैं देखूँगा, इसलिये खड़ा करें।
मोहरूपी दुर्योधन। मोहमयी प्रवृत्तियों का कल्याण चाहनेवाले जो-जो राजा
इस युद्ध में आये हैं, उनको मैं देख लूँ।
सञ्जय उवाच
एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् ।।२४।।