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सर्वकोश
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

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पृष्ठ 299

२६४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
इस प्रकार शान्ति को प्राप्त हुआ जो पुरुष सब भूतों में द्वेषभाव से
रहित, सबका प्रेमी और हेतुरहित दयालु है और जो ममता से रहित, अहंकार
से रहित, सुख-दुःख की प्राप्ति में सम तथा क्षमावान् है,
सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः।।१४।।
जो निरन्तर योग की पराकाष्ठा से संयुक्त है, लाभ तथा हानि में सन्तुष्ट
है, मन तथा इन्द्रियोंसहित शरीर को वश में किये हुए है, दृढ़ निश्चयवाला है,
वह मुझमें अर्पित मन-बुद्धिवाला मेरा भक्त मुझे प्रिय है।
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः।।१५।।
जिससे कोई भी जीव उद्वेग को प्राप्त नहीं होता और जो स्वयं भी किसी
जीव से उद्विग्न नहीं होता एवं हर्ष, सन्ताप, भय और समस्त विक्षोभों से मुक्त
है, वह भक्त मुझे प्रिय है।
साधकों के लिये यह श्लोक अत्यन्त उपयोगी है। उन्हें इस ढंग से रहना
चाहिये कि उनके द्वारा किसी के मन को ठेस न लगे। इतना तो साधक कर
सकते हैं; किन्तु दूसरे लोग इस आचरण से नहीं चलेंगे। वे तो संसारी हैं ही,
वे तो आग उगलेंगे, कुछ भी कहेंगे; किन्तु पथिक को चाहिये कि अपने हृदय
में उनके द्वारा (उनके आघातों से) भी उथल-पुथल न होने दे। चिन्तन में सुरत
लगी रहे, क्रम न टूटे। उदाहरण के लिये आप स्वयं सड़क पर नियमानुकूल
बायें से चल रहे हैं, कोई मदिरा पीकर चला आ रहा है, उससे बचना भी
आपकी जिम्मेदारी है।
अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः।
सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः।।१६।।
जो पुरुष आकांक्षाओं से रहित, सर्वथा पवित्र है, 'दक्षः' अर्थात् आराधना
का विशेषज्ञ है (ऐसा नहीं कि चोरी करता हो तो दक्ष है। श्रीकृष्ण के
अनुसार कर्म एक ही है, नियत कर्म- आराधना-चिन्तन, उसमें जो दक्ष है),