यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा
स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंएकादश अध्याय २४३
अर्जुन! मैं लोकों का नाश करनेवाला बढ़ा हुआ काल हूँ और इस
समय इन लोकों को नष्ट करने के लिये प्रवृत्त हुआ हूँ। प्रतिपक्षियों की सेना में
स्थित जितने योद्धा हैं वे सब तेरे बिना भी नहीं रहेंगे, वे जीवित नहीं बचेंगे
इसीलिये प्रवृत्त हुआ हूँ।
तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व
जित्वा शत्रून्भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम्।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव
निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्॥३३॥
इसलिये अर्जुन! तू युद्ध के लिये खड़ा हो, यश प्राप्त कर। शत्रुओं को
जीत, समृद्धि-सम्पन्न राज्य को भोग। ये सब शूरवीर मेरे द्वारा पहले से ही मारे
हुए हैं। सव्यसाचिन्! तू केवल निमित्तमात्र बन।
प्रायः सर्वत्र श्रीकृष्ण ने कहा है कि वह परमात्मा न कुछ स्वयं करता
है, न कराता है, न संयोग ही जोड़ता है; मोहावृत्त बुद्धि के कारण ही लोग
कहते हैं कि परमात्मा कराता है; किन्तु यहाँ वे स्वयं ताल ठोंककर खड़े हो
जाते हैं कि, अर्जुन! कर्त्ता-धर्त्ता तो मैं हूँ। मेरे द्वारा ये पहले से ही मारे हुए हैं।
तू खड़ा भर हो, यश ले ले। ऐसा इसलिये है कि 'सो केवल भगतन हित
लागी।' (रामचरितमानस, १/१२/५) अर्जुन उसी अवस्था को प्राप्त कर
चुका था कि भगवान स्वयं ताल ठोंककर खड़े हो गये। अनुराग ही अर्जुन है।
अनुरागी के लिये भगवान सदैव खड़े हैं, उन्हीं के कर्त्ता हैं, रथी बन जाते हैं।
यहाँ गीता में तीसरी बार साम्राज्य का प्रकरण आया। पहले अर्जुन
लड़ना नहीं चाहता था। उसने कहा कि पृथिवी के धन-धान्यसम्पन्न अकण्टक
साम्राज्य तथा देवताओं के स्वामीपन अथवा त्रैलोक्य के राज्य में भी मैं उस
उपाय को नहीं देखता, जो इन्द्रियों को सुखानेवाले मेरे इस शोक को दूर कर
सके। जब तड़पन बनी ही रहेगी तो हमें नहीं चाहिये। योगेश्वर ने कहा- इस
युद्ध में हारोगे तो देवत्व और जीतने पर महामहिम की स्थिति मिलेगी और
यहाँ ग्यारहवें अध्याय में कहते हैं कि ये शत्रु मेरे द्वारा मारे गये हैं, तू निमित्तमात्र
भर बन जा, यश को प्राप्त कर और समृद्ध राज्य को भोग। फिर वही बात,
जिस बात से अर्जुन चौंकता है, जिससे वह शोक मिटता हुआ नहीं देखता,