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सर्वकोश
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

DevanagariHindipublished429 पृष्ठ

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पृष्ठ 262

दशम अध्याय २२७
मादा, पुरुष अथवा स्त्री कुछ भी कहलाएँ, श्रीकृष्ण के शब्दों में पुरुष ही हैं।
दूसरा है अक्षर पुरुष, जो कूटस्थ चित्त के स्थिर काल में देखने में आता है।
यही कारण है कि इस योगपथ में स्त्री-पुरुष सभी समान स्थिति के महापुरुष
होते आये हैं। किन्तु यहाँ स्मृति, शक्ति, बुद्धि इत्यादि स्त्रियों के ही गुण बताये
गये। क्या इन सद्गुणों की आवश्यकता पुरुषों के लिये नहीं है? कौन ऐसा
पुरुष है जो श्रीमान्, कीर्तिमान्, वक्ता, स्मरणशक्तिसम्पन्न, मेधावी, धैर्यवान्
और क्षमावान् नहीं बनना चाहता? बौद्धिक स्तर पर कमजोर लड़कों में इन्हीं
गुणों का विकास करने के लिये माता-पिता पढ़ाई की अतिरिक्त व्यवस्था
करते हैं। यहाँ कहते हैं कि ये लक्षण केवल स्त्रियों में पाये जाते हैं। ये गुण
अर्जुन में भी थे, जबकि अर्जुन नर है। युद्ध के आरम्भ में ही वह पीछे हट
गया- भले ही शस्त्रधारी कौरव मुझे मार डालें, गोविन्द! मैं युद्ध नहीं करूँगा।
भगवान ने कहा- अर्जुन! यदि तुम इस धर्ममय युद्ध को नहीं करोगे तो
स्वधर्म, कीर्ति और यश खोकर पाप को प्राप्त होगे। वैरी लोग तुम्हारी अपकीर्ति
का दीर्घकाल तक गायन करेंगे। माननीय पुरुष के लिये अपकीर्ति मृत्यु से भी
बढ़कर होती है। यहाँ पुरुष के लिये भी कीर्ति आवश्यक बताया गया।
गीता के समापन पर संजय ने निर्णय दिया कि जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण
हैं, धनुर्धर पार्थ है वहीं श्रीः है, विजय है, विभूति और अचल नीति है- ऐसा
मेरा मत है। कीर्ति, श्रीः, विभूति- ये गुण तो नारियों के हैं, अर्जुन के साथ
कैसे?
अध्याय १५/१५ में भगवान् कहते हैं, 'सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो
मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।'- अर्जुन! मैं सबके हृदय में समाविष्ट होकर
सदा निवास करता हूँ। बुद्धि, स्मृति, ज्ञान (वास्तविक जानकारी) और विकारों
से अलग रहने की क्षमता मेरी देन है।
वस्तुतः मानव की चित्तवृत्ति ही 'नारी' है। शरीर तो वस्त्र मात्र है। स्त्री,
पुरुष, नपुंसक इत्यादि शरीर की आकृतियाँ हैं, स्वरूप की नहीं। शरीर के
अन्तराल में चित्तवृत्ति प्रकृति की ओर स्वयमेव प्रवाहमान है। इन वृत्तियों में
ईश्वरीय भाव, स्मृति, मेधा, धैर्य, क्षमा इत्यादि गुण भगवान से ही प्रसारित