यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा
स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनवम अध्याय १९७
अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप।
अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि।।३।।
परंतप अर्जुन! इस धर्म में (जिसका थोड़ा भी साधन करने पर विनाश
नहीं होता) श्रद्धारहित पुरुष (एक इष्ट में मन को केन्द्रित न रखनेवाला पुरुष)
मुझे न प्राप्त होकर संसार-क्षेत्र में भ्रमण करता ही रहता है। अतः श्रद्धा
अनिवार्य है। क्या आप संसार से परे हैं? इस पर कहते हैं-
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना।
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः।।४।।
मुझ अव्यक्त स्वरूप से यह सब जगत् व्याप्त है अर्थात् मैं जिस स्वरूप
में स्थित हूँ, वह सर्वत्र व्याप्त है। सभी प्राणी मुझमें स्थान पाये हैं किन्तु मैं
उनमें स्थित नहीं हूँ; क्योंकि मैं अव्यक्त स्वरूप में स्थित हूँ। महापुरुष जिस
अव्यक्त स्वरूप में स्थित हैं, वहीं से (शरीर छोड़कर उसी अव्यक्त स्तर से ही)
बात करते हैं। इसी क्रम में आगे कहते हैं-
न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्।
भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः।।५।।
वस्तुतः सब भूत भी मुझमें स्थित नहीं हैं क्योंकि वे मरणधर्मा हैं,
प्रकृति के आश्रित हैं; किन्तु मेरी योगमाया के ऐश्वर्य को देख कि जीवधारियों
को उत्पन्न और पोषण करनेवाला मेरा आत्मा भूतों में स्थित नहीं है। मैं
आत्मस्वरूप हूँ, इसलिये मैं उन भूतों में स्थित नहीं हूँ। यही योग का प्रभाव है।
इसको स्पष्ट करने के लिये योगेश्वर श्रीकृष्ण दृष्टान्त देते हैं-
यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान्।
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय।।६।।
जैसे आकाश से ही उत्पन्न होनेवाला महान् वायु आकाश में सदैव
स्थित है किन्तु उसे मलिन नहीं कर पाता, ठीक वैसे ही सम्पूर्ण भूत मुझमें
स्थित हैं, ऐसा जान। ठीक इसी प्रकार मैं आकाशवत् निर्लेप हूँ। वे मुझे मलिन
नहीं कर पाते। प्रश्न पूरा हुआ। यही योग का प्रभाव है। अब योगी क्या करता
है? इस पर कहते हैं-