यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा
स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)
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होने योग्य है। अनन्य भक्ति का तात्पर्य है कि परमात्मा के सिवाय अन्य किसी
का स्मरण न करते हुए उनसे जुड़ जाय। अनन्य भाव से लगनेवाले पुरुष भी
कब तक पुनर्जन्म की सीमा में हैं और कब वे पुनर्जन्म का अतिक्रमण कर
जाते हैं? इस पर योगेश्वर कहते हैं-
यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः।
प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ।।२३।।
हे अर्जुन! जिस काल में शरीर त्यागकर गये हुए योगीजन पुनर्जन्म को
नहीं पाते और जिस काल में शरीर त्यागने पर पुनर्जन्म पाते हैं, मैं अब उस
काल का वर्णन करता हूँ।
अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्।
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः।।२४।।
शरीर-सम्बन्ध का त्याग करते समय जिनके समक्ष ज्योतिर्मय अग्नि
जल रही हो, दिन का प्रकाश फैला हो, सूर्य चमक रहा हो, शुक्लपक्ष का चन्द्र
बढ़ रहा हो, उत्तरायण का निरभ्र और सुन्दर आकाश हो, उस काल में प्रयाण
करनेवाले ब्रह्मवेत्ता योगीजन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।
अग्नि ब्रह्मतेज का प्रतीक है। दिन विद्या का प्रकाश है। शुक्लपक्ष
निर्मलता का द्योतक है। विवेक, वैराग्य, शम, दम, तेज और प्रज्ञा ये षडैश्वर्य
ही षण्मास हैं। ऊर्ध्वरेता स्थिति ही उत्तरायण है। प्रकृति से सर्वथा परे इस
अवस्था में जानेवाले ब्रह्मवेत्ता योगीजन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं, उनका पुनर्जन्म
नहीं होता; किन्तु अनन्य चित्त से लगे हुए योगीजन यदि इस आलोक को प्राप्त
नहीं कर पाये, जिनकी साधना अभी पूर्ण नहीं है, उनका क्या होता है? इस पर
कहते हैं-
धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम्।
तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते।।२५।।
जिसके प्रयाणकाल में धुआँ फैल रहा हो, योगाग्नि हो (अग्नि यज्ञ-
प्रक्रिया में पायी जानेवाली अग्नि का स्वरूप है।) किन्तु धुएँ से आच्छादित
हो, अविद्या की रात्रि हो, अँधेरा हो, कृष्णपक्ष का चन्द्रमा क्षीण हो रहा हो,
कालिमा का बाहुल्य हो, षड्विकारों (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर)