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सर्वकोश
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

DevanagariHindipublished429 पृष्ठ

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पृष्ठ 198

।। ॐ श्री परमात्मने नमः।।
।। अथ सप्तमोऽध्यायः ।।
गत अध्यायों में गीता के मुख्य-मुख्य प्रायः सभी प्रश्न पूर्ण हो गये हैं।
निष्काम कर्मयोग, ज्ञानयोग, कर्म तथा यज्ञ का स्वरूप और उसकी विधि, योग
का वास्तविक स्वरूप और उसका परिणाम तथा अवतार, वर्णसंकर, सनातन,
आत्मस्थित महापुरुष के लिये भी लोकहितार्थ कर्म करने पर बल, युद्ध
इत्यादि पर विशद चर्चा की गयी। अगले अध्यायों में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने इन्हीं
से सन्दर्भित अनेक पूरक प्रश्नों को लिया है, जिनका समाधान तथा अनुष्ठान
आराधना में सहायक सिद्ध होगा।
छठें अध्याय के अन्तिम श्लोक में योगेश्वर ने यह कहकर प्रश्न का
स्वयं बीजारोपण कर दिया कि जो योगी 'मद्गतेनान्तरात्मना'- मुझमें अच्छी
प्रकार स्थित अन्तःकरणवाला है, उसे मैं अतिशय श्रेष्ठ योगी मानता हूँ। परमात्मा
में अच्छी प्रकार स्थिति क्या है? बहुत से योगी परमात्मा को प्राप्त तो होते हैं
फिर भी कहीं कोई कमी उन्हें खटकती है। लेशमात्र भी कसर न रह जाय, ऐसी
अवस्था कब आयेगी? सम्पूर्णता से परमात्मा की जानकारी कब आयेगी? कब
होती है? इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं-
श्रीभगवानुवाच
मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः।
असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु।।१।।
पार्थ ! तू मुझमें आसक्त हुए मनवाला, बाहरी नहीं अपितु 'मदाश्रयः'-
मेरे परायण होकर योग में लगा हुआ (छोड़कर नहीं) मुझको जिस प्रकार
संशयरहित जानेगा, उसको सुन। जिसे जानने के पश्चात् लेशमात्र भी संशय न
रह जाय, विभूतियों की उस समग्र जानकारी पर पुनः बल देते हैं-