यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा
स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)
पृष्ठ 177, कुल 429 में से
संदर्भ में पढ़ें१४२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
निष्कर्ष-
इस अध्याय के आरम्भ में अर्जुन ने प्रश्न किया कि कभी तो आप
निष्काम कर्मयोग की प्रशंसा करते हैं और कभी आप संन्यास-मार्ग से कर्म
करने की प्रशंसा करते हैं, अतः दोनों में एक को, जो आपका सुनिश्चित किया
हो, परमकल्याणकारी हो, उसे कहिये। श्रीकृष्ण ने बताया- अर्जुन ! परमकल्याण
तो दोनों में है। दोनों में वही निर्धारित यज्ञ की क्रिया ही की जाती है, फिर भी
निष्काम कर्मयोग विशेष है। बिना इसे किये संन्यास (शुभाशुभ कर्मों का
अन्त) नहीं होता। संन्यास मार्ग नहीं, मंजिल का नाम है। योगयुक्त ही संन्यासी
है। योगयुक्त के लक्षण बताये कि वही प्रभु है। वह न करता है, न कुछ कराता
है; बल्कि स्वभाव में प्रकृति के दबाव के अनुरूप लोग व्यस्त हैं। जो साक्षात्
मुझे जान लेता है वही ज्ञाता है, वही पण्डित है। यज्ञ के परिणाम में लोग मुझे
जानते हैं। श्वास-प्रश्वास का जप और यज्ञ-तप जिसमें विलय होते हैं, मैं ही
हूँ। यज्ञ के परिणामस्वरूप मेरे को जानकर वे जिस शान्ति को प्राप्त होते हैं,
वह भी मैं ही हूँ अर्थात् श्रीकृष्ण-जैसा, महापुरुष-जैसा स्वरूप उस प्राप्तिवाले
को भी मिलता है। वह भी ईश्वरों का ईश्वर, आत्मा का भी आत्मस्वरूपमय
हो जाता है, उस परमात्मा के साथ एकीभाव पा लेता है (एक होने में जन्म
चाहे जितने लगें।)। इस अध्याय में स्पष्ट किया कि यज्ञ-तपों का भोक्ता,
महापुरुषों के भी अन्दर रहनेवाली शक्ति महेश्वर है, अतः-
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसम्वादे 'यज्ञभोक्तामहापुरुषस्थमहेश्वरः' नाम पञ्चमोऽध्यायः ।।५।।
इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र
विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के सम्वाद में 'यज्ञभोक्ता महापुरुषस्थ महेश्वर'
नामक पाँचवाँ अध्याय पूर्ण होता है।
इति श्रीमत्परमहंसपरमानन्दस्य शिष्य स्वामीअड़गड़ानन्दकृते
श्रीमद्भगवद्गीतायाः 'यथार्थगीता' भाष्ये
'यज्ञभोक्तामहापुरुषस्थमहेश्वरः' नाम पञ्चमोऽध्यायः ।।५।।
इस प्रकार श्रीमत् परमहंस परमानन्दजी के शिष्य स्वामी अड़गड़ानन्दकृत
'श्रीमद्भगवद्गीता' के भाष्य 'यथार्थ गीता' में 'यज्ञभोक्ता महापुरुषस्थ महेश्वर'
नामक पाँचवाँ अध्याय पूर्ण होता है।
।। हरिः ॐ तत्सत् ।।