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सर्वकोश
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

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पृष्ठ 173

१३८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
ब्राह्मण, चाण्डाल, कुत्ता, हाथी और गाय सब पर समान दृष्टिवाला होता है;
क्योंकि उसकी दृष्टि हृदयस्थित आत्म-स्वरूप पर पड़ती है। ऐसे महापुरुष को
परमगति में क्या मिला है और कैसे? इस पर प्रकाश डालते हुए योगेश्वर
श्रीकृष्ण बताते हैं-
इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः।
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः॥१९॥
उन पुरुषों द्वारा जीवित अवस्था में ही सम्पूर्ण संसार जीत लिया गया,
जिनका मन समत्व में स्थित है। मन के समत्व का संसार जीतने से क्या
सम्बन्ध? संसार मिट ही गया, तो वह पुरुष रहा कहाँ? श्रीकृष्ण कहते हैं,
'निर्दोषं हि समं ब्रह्म'- वह ब्रह्म निर्दोष और सम है, इधर उसका मन भी
निर्दोष और सम स्थितिवाला हो गया। 'तस्मात् ब्रह्मणि ते स्थिताः'- इसलिये
वह ब्रह्म में स्थित हो जाता है। इसी का नाम अपुनरावर्ती परमगति है। यह कब
मिलती है? जब संसाररूपी शत्रु जीतने में आ जाय। संसार कब जीतने में आता
है? जब मन का निरोध हो जाय, समत्व में प्रवेश पा जाय (क्योंकि मन का
प्रसार ही जगत् है)। जब वह ब्रह्म में स्थित हो जाता है तब ब्रह्मविद् का लक्षण
क्या है? उसकी रहनी स्पष्ट करते हैं-
न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम्।
स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः॥२०॥
उसका कोई प्रिय-अप्रिय होता नहीं। इसलिये जिसे लोग प्रिय समझते
हैं, उसे पाकर वह हर्षित नहीं होता और जिसे लोग अप्रिय समझते हैं (जैसा
धर्मावलम्बी चिह्न लगाते हैं), उसे पाकर वह उद्वेगवान् नहीं होता है। ऐसा
स्थिरबुद्धि, 'असम्मूढः'- संशयरहित, 'ब्रह्मवित्'- ब्रह्म से संयुक्त ब्रह्मवेत्ता
'ब्रह्मणि स्थितः'- परात्पर ब्रह्म में सदैव स्थित है।
बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम्।
स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते॥२१॥
बाहर संसार के विषय-भोगों में अनासक्त पुरुष अन्तरात्मा में स्थित जो
सुख है, उस सुख को प्राप्त होता है। वह पुरुष 'ब्रह्मयोगयुक्तात्मा'- परब्रह्म