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सर्वकोश
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

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पृष्ठ 165

१३० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
कर्म- ये दोनों ही परमश्रेय को दिलानेवाले हैं; परन्तु इन दोनों मार्गों से संन्यास
अथवा ज्ञानदृष्टि से किये जानेवाले कर्म की अपेक्षा निष्काम कर्मयोग श्रेष्ठ है।
प्रश्न स्वाभाविक है कि श्रेष्ठ क्यों है?
ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते॥३॥
महाबाहु अर्जुन! जो न किसी से द्वेष करता है, न किसी की आकांक्षा
करता है वह सदैव संन्यासी ही समझने योग्य है। चाहे वह ज्ञानमार्ग से या
निष्काम कर्ममार्ग से ही क्यों न हो। राग, द्वेषादि द्वन्द्वों से रहित वह पुरुष
सुखपूर्वक भवबन्धन से मुक्त हो जाता है।
साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः।
एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्॥४॥
निष्काम कर्मयोग तथा ज्ञानयोग इन दोनों को वही अलग-अलग बताते
हैं जिनकी समझ इस पथ में अभी बहुत हल्की है, न कि पूर्णज्ञाता पण्डित
लोग; क्योंकि दोनों में से एक में भी अच्छी प्रकार स्थित हुआ पुरुष दोनों के
फलरूप परमात्मा को प्राप्त होता है। दोनों का फल एक है, इसलिये दोनों एक
ही समान हैं।
यत्साङ्ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते।
एकं साङ्ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ॥५॥
जहाँ सांख्य-दृष्टि से कर्म करनेवाला पहुँचता है, वहीं निष्काम-माध्यम
से कर्म करनेवाला भी पहुँचता है। इसलिये जो दोनों को फल की दृष्टि से एक
देखता है, वही यथार्थ जाननेवाला है। जब दोनों एक ही स्थान पर पहुँचते हैं
तो निष्काम कर्मयोग विशेष क्यों? श्रीकृष्ण बताते हैं-
संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः।
योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति॥६॥
अर्जुन! निष्काम कर्मयोग का आचरण किये बिना ‘संन्यासः’- अर्थात्
सर्वस्व का न्यास प्राप्त होना दुःखप्रद है। जब योग का आचरण प्रारम्भ ही नहीं
किया तो असम्भव-सा है। इसलिये भगवत्स्वरूप का मनन करनेवाला मुनि,