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सर्वकोश
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

DevanagariHindipublished429 पृष्ठ

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धर्म-सिद्धान्त — एक
१. सभी प्रभु के पुत्र-
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।
मनः षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।। (गीता, १५/७)
सभी मानव ईश्वर की सन्तान हैं।
२. मानव तन की सार्थकता-
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्।। (गीता, ९/३३)
सुखरहित, क्षणभंगुर किन्तु दुर्लभ मानव-तन को पाकर मेरा भजन कर
अर्थात् भजन का अधिकार मनुष्य-शरीरधारी को है।
३. मनुष्य की केवल दो जाति-
द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च।
दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु।। (गीता, १६/६)
मनुष्य केवल दो प्रकार के हैं- देवता और असुर। जिसके हृदय में दैवी
सम्पत्ति कार्य करती है वह देवता है तथा जिसके हृदय में आसुरी सम्पत्ति
कार्य करती है वह असुर है। तीसरी कोई अन्य जाति सृष्टि में नहीं है।
४. हर कामना ईश्वर से सुलभ-
त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा
यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते।
ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक-
मश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान्।। (गीता, ९/२०)
मुझे भजकर लोग स्वर्ग तक की कामना करते हैं; मैं उन्हें देता हूँ।
अर्थात् सब कुछ एक परमात्मा से सुलभ है।
५. भगवान की शरण से पापों का नाश-
अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः।
सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि।। (गीता, ४/३६)
सम्पूर्ण पापियों से अधिक पाप करनेवाला भी ज्ञानरूपी नौका द्वारा
निःसन्देह पार हो जायेगा।