यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 89, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वार्ध सातवां अध्याय
लिए वर्चस्व प्रदान कीजिए. आप हमारे अपान के लिए वर्चस्व प्रदान कीजिए. आप
हमारे उदान के लिए वर्चस्व प्रदान कीजिए. आप हमारे मन में वर्चस्व दीजिए. आप
हमारी वाणी में वर्चस्व दीजिए. आप हमारे कर्म में वर्चस्व दीजिए. आप हमारे नेत्र में
वर्चस्व दीजिए. आप हमारे कानों को वर्चस्व दीजिए. ( २७ )
आत्मने मे वर्चोदा वर्चसे पवस्वौजसे मे वर्चोदा वर्चसे पवस्वायुषे मे वर्चोदा वर्चसे
पवस्व विश्वाभ्यो मे प्रजाभ्यो वर्चोदसौ वर्चसे पवेथाम्.. ( २८ )
आप हमारी आत्मा में वर्चस्व दीजिए. आप हमारे ओज में वर्चस्व दीजिए. आप
हमारी आयु में वर्चस्व दीजिए. आप हमारी सारी प्रजा में वर्चस्व दीजिए. आप हमारी
पृथ्वी के सभी साधनों को वर्चस्व दीजिए. ( २८ )
कोसि कतमोसि कस्यासि को नामासि.
यस्य ते नामामन्महि यं त्वा सोमेनातीत्पाम.
भूर्भुवः स्वः सुप्रजाः प्रजाभिः स्या ७ष सुवीरो वीरैः सुपोषः पोषैः.. ( २९)
हे सोम! आप कौन हैं ? आप कहां से हैं ? आप किस के हैं ? आप का क्या
नाम है, जिसे जान कर हम आप को सोमरस से तृप्त कर सकें. आप सर्वत्र व्याप्त
हैं. आप की कृपा से हम अच्छी संतान वाले, वीरों वालें हों एवं अच्छे पोषण से
पुष्ट हों. ( २९ )
उपयामगृहीतोसि मधवे त्वोपयामगृहीतोसि माधवाय त्वोपयामगृहीतोसि शुक्राय
त्वोपयामगृहीतोसि शुचये त्वोपयामगृहीतोसि नभसे त्वोपयामगृहीतोसि नभस्याय
त्वोपयामगृहीतोसीषे त्वोपयामगृहीतोस्यूर्जे त्वोपयामगृहीतोसि सहसे
त्वोपयामगृहीतोसि सहस्याय त्वोपयामगृहीतोसि तपसे त्वोपयामगृहीतोसि तपस्याय
त्वोपयामगृहीतोस्य ७ष हसस्पतये त्वा.. ( ३० )
हे सोम! आप को कलश में ग्रहण किया गया है. आप को मधु के लिए कलश
से ग्रहण किया गया है. आप को माधव हेतु ग्रहण किया गया है. आप को शुक्र के
लिए ग्रहण किया गया है. हे सोम! आप को पवित्रता के लिए ग्रहण किया गया है.
आप को नभ हेतु ग्रहण किया गया है. आप को ऊर्जा हेतु ग्रहण किया गया है. हे सोम!
आप को साहस के लिए ग्रहण किया गया है. हे सोम! आप को साहस से ग्रहण किया
गया है. हे सोम! आप को तप के लिए ग्रहण किया गया है. हे सोम! आप को मर्यादा
के लिए ग्रहण किया गया है. ( ३० )
इन्द्राग्नी ऽ आ गत ७ष सुतं गीर्भिर्नभो वरेण्यम्.
अस्य पातं धियेषिता.
उपयामगृहीतोसीन्द्राग्निभ्यां त्वैष ते योनिरिन्द्राग्निभ्यां त्वा.. ( ३१ )
हे सोम! आप को इंद्र देव हेतु कलश में ग्रहण किया है. आप को अग्नि हेतु
यजुर्वेद - ८९