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सर्वकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 80, कुल 421 में से

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पृष्ठ 80

पूर्वार्ध छठा अध्याय
समिधा से प्रज्वलित हैं. अग्नि हमारी स्तुतियां सुनने की कृपा करें. हम उन के लिए
हवि समर्पित करते हैं. जल देव हमारी स्तुतियां सुनने की कृपा करें. हम उन के लिए
हवि समर्पित करते हैं. बुद्धि की देवी हमारी स्तुतियां सुनने की कृपा करें. हम उन
के लिए हवि समर्पित करते हैं. विद्वान् यज्ञ में स्तुतियां पढ़ते हैं. सविता देव उन्हें सुनने
की कृपा करें. उन के लिए यह आहुति समर्पित हैं. ( २६ )
देवीरापो अपां नपाद्यो व ऽ ऊर्मिर्हविष्य ऽ इन्द्रियावान् मदिन्तमः.
तं देवेभ्यो देवत्रा दत्त शुक्रपेभ्यो येषां भाग स्थ स्वाहा.. (२७)
दिव्य जल! आप के लहरदार प्रवाह इंद्रियों की शक्ति बढ़ाने वाले हैं. आप के
लहरदार प्रवाह आनंददायी हैं. उस जल को देवों व रक्षक के लिए समर्पित कीजिए.
उसे वीर्य बढ़ाने के लिए समर्पित कीजिए. इस में आप का भी एक भाग है. इन सब
के लिए स्वाहा. ( २७ )
कार्षिरसि समुद्रस्य त्वा क्षित्या ऽ उन्नयामि.
समापो अद्भिर्गमत समोषधीभिरोषधीः.. ( २८)
समुद्र तक पृथ्वी की उर्वरता के लिए आप को ऊपर की ओर उठाते हैं. इस
जल के साथ जलों को मिला कर ओषधियां उत्पन्न होती हैं. ओषधियों को भी
ओषधि के साथ मिलाया जाता है. ( २८ )
यमग्ने पृत्सु मर्त्यमवा वाजेषु यं जुनाः. स यन्ता शश्वतीरिषः स्वाहा.. (२९)
हे अग्नि! आप जिन यजमानों के पास से देवताओं तक हवि पहुंचाते हैं, वे
लोग आप की कृपा से यज्ञ करते हैं. वे यजमान शाश्वत (स्थायी) और इष्ट धन
को प्राप्त करते हैं. अग्नि के लिए स्वाहा. ( २९ )
देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्.
आ ददे रावासि गभीरमिममध्वरं कृधीन्द्राय सुषूतमम्.
उत्तमेन पविनोर्जस्वन्तं मधुमन्तं पयस्वन्तं निग्राभ्या स्थ देवश्रुतस्तर्पयत मा मनो मे.. (३०)
हम यजमान सूर्योदय के समय यज्ञ के साधन को अश्विनीकुमारों के हाथों में
ग्रहण कराते हैं. अग्नि के लिए स्वाहा. पूषा देव के लिए स्वाहा. आप इच्छापूरक हैं.
हम इंद्र देव के लिए यज्ञ करना चाहते हैं. हम उन के लिए यज्ञ को ऊर्जस्वी पदार्थों
से पवित्र करते हैं. हम उन के लिए यज्ञ को रसीले और पवित्र पदार्थों से पवित्र करते
हैं. वे हवि को भलीभांति ग्रहण करने की कृपा करें. आप हमें तृप्ति प्रदान करने की
कृपा करें. ( ३० )
मनो मे तर्पयत वाचं मे तर्पयत प्राणं मे तर्पयत चक्षुर्मे तर्पयत श्रोत्रं मे तर्पयतात्मानं
मे तर्पयत प्रजां मे तर्पयत पशून्मे तर्पयत गणान्मे तर्पयत गणा मे मा वितृषन्.. (३१)
८० - यजुर्वेद 632/5