यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 372, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्तरार्ध तैंतीसवां अध्याय
इंद्र देव युवा, हमारे सखा, विशाल व शत्रुनाशी हैं. वे बहु प्रशंसित और
सामर्थ्यशाली हैं. ( २४ )
इन्द्रेहि मत्स्यन्धसो विश्वेभिः सोमपर्वभिः. महाँ २ अभिष्टिरोजसा.. ( २५)
हे इंद्र देव! आप महान्, आदरणीय व सब को आनंद देने वाले हैं. आप सोम
उत्सव में पधारिए. आहुति ग्रहण कर के प्रसन्न होइए. हमें ओजस्वी बनाइए. हमारे
अभीष्ट पूरिए. ( २५ )
इन्द्रो वृत्रमवृणोच्छर्धनीतिः प्र मायिनाममिनादृर्पणीतिः.
अहन् व्य १ष समुशधग्वनेष्वाविर्धेना ऽ अकृणोद्राभ्याणाम्.. ( २६)
हे इंद्र देव! आप वृत्रासुर, मायावी राक्षसों व दुष्टों का दलन करने वाले हैं. आप
आह्लादक और हमारी स्तुतियों को प्रकट करते हैं. ( २६ )
कुतस्त्वमिन्द्र माहिनः सन्नेको यासि सत्पते किं त ऽ इत्था.
सं पृच्छसे समराणः शुभानैर्वोचेस्तन्नो हरिवो यत्ते अस्मे.
महाँ २ इन्द्रो य ऽ ओजसा कदा चन स्तरीरसि कदा चन प्र युच्छसि.. ( २७)
हे इंद्र देव! आप महिमाशाली सज्जनों के स्वामी हैं. आप अकेले कहां जाते हैं ?
आप इस प्रकार क्यों जाते हैं. अच्छी तरह जाते हुए आप से यह प्रश्न पूछा जाता है.
आप के घोड़े हरे रंग के हैं. आप ओजस्वी हैं. आप कभी भी हिंसा आदि नहीं करते हैं.
आप हमारे शुभचिंतक और अपने हैं. इसीलिए हम आप से यह सब पूछ रहे हैं. ( २७ )
आ तत्त ऽ इन्द्रायवः पनन्ताभि य ऽ ऊर्वं गोमन्तं तितृत्सान्.
सकृत्स्वं ये पुरुपुत्रां मही ६ष सहस्रधारां बृहतीं दुदुक्षन्.. ( २८)
हे इंद्र देव! आप गोस्वामियों के घातकों व भूपतियों ( भूमिस्वामी ) के हत्यारों
को मारते हैं. पृथ्वी पर सहस्रों धाराओं वाले सोम को निचोड़ते हैं. उस का दोहन
करते हैं. श्रेष्ठ कर्मों वाले आप के पुत्र आप की महिमा का गान करते हैं. ( २८ )
इमां ते धियं प्र भरे महो महीमस्य स्तोत्रे धिषणा यत्त ऽ आनजे.
तमुत्सवे च प्रसवे च सासहिमिन्द्रं देवासः शवसामदन्ननु.. (२९)
हे इंद्र! हम आप की बुद्धि को धारण करते हैं. आप महान व पृथ्वी का
भरणपोषण करने में समर्थ हैं. हम आप की स्तुति करते हैं. उत्सव और प्रसव के
समय हमें कष्ट पहुंचाने वाले शत्रुओं का साहसी इंद्र देव दमन करते हैं. देवगण भी
आनंदित हो कर इंद्र देव के गुण गाते हैं. ( २९ )
विभ्राड् बृहत्पिबतु सोम्यं मध्वायुर्दधद्यज्ञपतावविह्रुतम्.
वातजूतो यो अभिरक्षति त्मना प्रजाः पुपोष पुरुधा वि राजति.. (३०)
हे इंद्र देव! आप चमकीले व विशाल हैं. आप सोमरस को पीने की कृपा
३७२ - यजुर्वेद