यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 174, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वार्ध चौदहवां अध्याय
को उत्पन्न किया. उन्होंने अनुष्टुप् से तुर्यवाट जाति को उत्पन्न किया. इष्टका इस
लोक की रक्षा करने की कृपा करे. हम इंद्र देव से इस लोक की रक्षा करने की
कृपा करने का अनुरोध करते हैं. (१०)
इन्द्राग्नी अव्यथमानामिष्टकां दृ ᳪ हतं युवम्.
पृष्ठेन द्यावापृथिवी अन्तरिक्षं च वि बाधसे.. (११)
हे इंद्र देव! हे अग्नि! आप पीड़ाहिन हो कर इष्टका को स्थापित करने की कृपा
कीजिए. इष्टका अपने पृष्ठ भाग से स्वर्गलोक, पृथ्वीलोक व अंतरिक्षलोक को
व्याप्त करती है. (११)
विश्वकर्मा त्वा सादयत्वन्तरिक्षस्य पृष्ठे व्यचस्वतीं प्रथस्वतीमन्तरिक्षं यच्छान्तरिक्षं दृ ᳪ
हान्तरिक्षं मा हि ᳪ सी:.
विश्वस्मै प्राणायापानाय व्यानायोदानाय प्रतिष्ठायै चरित्राय.
वायुष्ट्वाभि पातु मह्या स्वस्त्या छर्दिषा शन्तमेन तया देवतयाऽङ्गिरस्वद् ध्रुवा सीद.. (१२)
हे इष्टका! विश्वकर्मा आप को पृथ्वी के पृष्ठ भाग पर अधिष्ठित करने की
कृपा करें. आप प्रथम अंतरिक्ष को धारण कीजिए. आप अंतरिक्ष का विस्तार
कीजिए. आप अंतरिक्ष के प्रति हिंसा मत कीजिए. आप सब के प्राण, अपान,
व्यान, उदान की रक्षा व चरित्र की प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए अंतरिक्ष को धारण
कीजिए. (१२)
राज्यसि प्राची दिग्विराडसि दक्षिणा दिक् सम्राडसि प्रतीची दिक् स्वराडस्युदीची
दिगधिपत्न्यसि बृहती दिक्.. (१३)
हे इष्टका! आप रानी हैं. आप पूर्व दिशा में सुशोभित होती हैं. आप विराट् हैं.
आप दक्षिण दिशा स्वरूप हैं. आप सम्राट् हैं. आप पश्चिम दिशा स्वरूप हैं. आप
स्वयं प्रकाशित हैं. आप उत्तर दिशा स्वरूप हैं. आप सभी विशाल दिशाओं की
अधिष्ठाता व पत्नी हैं. (१३)
विश्वकर्मा त्वा सादयत्वन्तरिक्षस्य पृष्ठे ज्योतिष्मतीम्.
विश्वस्मै प्राणायापानाय व्यानाय विश्वं ज्योतिर्यच्छ.
वायुष्टेऽधिपतिस्तया देवतयाऽङ्गिरस्वद् ध्रुवा सीद.. (१४)
हे इष्टका! विश्वकर्मा आप को अंतरिक्ष के पृष्ठभाग पर विराजमान कराएं.
आप ज्योतिष्मती हैं. आप सब के प्राण, अपान व व्यान की रक्षा के लिए ज्योति
प्रदान कराएं. वायु आप के इष्ट अधिपति हैं. उन की दिव्यता से आप अंगिरा की
भांति स्थिर हो कर विराजने की कृपा करें. (१४)
नभश्च नभस्यश्च वार्षिकावृतू अग्नेरन्तःश्लेषोसि कल्पेतां द्यावापृथिवी कल्पन्तामाप
ऽओषधयः कल्पन्तामग्नयः पृथङ्मम ज्यैष्ठ्याय सव्रताः.
१७४ - यजुर्वेद